नई दिल्ली। कार्टूनिस्ट हेमंत मालवीय की अग्रिम जमानत की याचिका को सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया है। पीएम मोदी और आरएसएस कार्यकर्ताओं से संबंधित उनके कार्टून के खिलाफ इंदौर में संघ के एक कार्यकर्ता ने एफआईआर दर्ज करायी थी। इस मामले की सुनवाई 14 जुलाई को होगी।
न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने 14 जुलाई को हेमंत मालवीय द्वारा दायर उस याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति व्यक्त की, जिसमें उन्होंने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के 3 जुलाई के आदेश को चुनौती दी है। उच्च न्यायालय ने यह कहते हुए उन्हें राहत देने से इंकार कर दिया था कि उन्होंने धार्मिक भावनाओं को आहत किया है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग किया है।
वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर, जो मालवीय की ओर से पेश हुईं, ने तर्क दिया कि उच्च न्यायालय ने गलती से यह मान लिया कि आरोपी को दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 41-ए / भारत न्याय संहिता (BNSS) की धारा 35 और सुप्रीम कोर्ट के अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2014) मामले में दिए गए दिशा-निर्देशों का संरक्षण प्राप्त नहीं है।
CrPC की धारा 41-ए / BNSS की धारा 35 यह प्रावधान करती है कि आरोपी को तत्काल गिरफ्तार करने के बजाय पुलिस अधिकारी के समक्ष उपस्थित होने के लिए नोटिस जारी किया जाए। अर्नेश कुमार मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया था कि किसी को भी, विशेषकर उन मामलों में जिनमें अपराध की सज़ा सात वर्ष से कम की कैद है, तत्काल गिरफ्तार नहीं किया जा सकता जब तक कि उसके लिए ठोस कारण न हों।
ग्रोवर ने दलील दी कि यह मामला उस कार्टून से संबंधित है जिसे मालवीय ने 2021 में कोविड-19 महामारी के दौरान बनाया था।
मालवीय के खिलाफ इस वर्ष मई में इंदौर के लसूड़िया थाने में स्थानीय वकील और आरएसएस कार्यकर्ता विनय जोशी की शिकायत पर प्राथमिकी दर्ज की गई थी।
शिकायत में आरोप लगाया गया कि मालवीय ने सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक सामग्री अपलोड कर हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत किया और साम्प्रदायिक सौहार्द्र को भंग किया।
एफआईआर में कई “आपत्तिजनक” पोस्टों का उल्लेख किया गया, जिनमें भगवान शिव पर कथित अनुचित टिप्पणियों के साथ-साथ मोदी, आरएसएस कार्यकर्ताओं और अन्य से संबंधित कार्टून, वीडियो, फ़ोटो और टिप्पणियाँ शामिल थीं।
मालवीय की याचिका खारिज करते हुए उच्च न्यायालय ने कहा था:
“… आवेदक द्वारा आरएसएस, जो कि एक हिन्दू संगठन है, तथा इस देश के प्रधानमंत्री को उक्त कार्टून में दर्शाते हुए उसके साथ ही एक अपमानजनक टिप्पणी को समर्थन देना और अनावश्यक रूप से उसमें भगवान शिव का नाम जोड़ना, संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का घोर दुरुपयोग है और शिकायतकर्ता के कथनानुसार यह अपराध की परिभाषा में आता है।”
“… उक्त पोस्ट तब और अधिक आपत्तिजनक हो जाती है जब इसमें भगवान शिव से जुड़ी उपरोक्त अपमानजनक पंक्तियाँ भी जोड़ दी जाती हैं, और जिनका स्वयं आवेदक ने समर्थन किया है तथा दूसरों को भी इस कार्टून के साथ प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया है। यह कृत्य किसी भी प्रकार से सद्भावना या अच्छे उद्देश्य से किया गया नहीं कहा जा सकता।”
उच्च न्यायालय ने आगे कहा था कि यह स्पष्ट रूप से धार्मिक भावनाओं को आहत करने का एक जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण प्रयास था और मालवीय ने “स्पष्ट रूप से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा को लांघ दिया है।”
(जनचौक की रिपोर्ट। ज्यादातर इनपुट टेलीग्राफ से लिए गए हैं।)