असम में बाढ़ की भयावहता के पीछे अवैध खनन की अहम भूमिका है: बनदीप दत्ता

नई दिल्ली। असम में आई भीषण बाढ़ ने एक बार फिर पूर्वोत्तर भारत में पर्यावरणीय असंतुलन, अवैध खनन और प्राकृतिक आपदाओं के बीच संबंध को गंभीर बहस का विषय बना दिया है। बाढ़ के कारण बड़ी संख्या में लोगों का जनजीवन प्रभावित हुआ है तथा जान-माल के नुकसान की खबरों ने राज्य की आपदा प्रबंधन व्यवस्था और पर्यावरण संरक्षण की नीतियों पर सवाल खड़े किए हैं। दिल्ली में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में आउटरीच कांग्रेस के असम अध्यक्ष एवं कांग्रेस प्रवक्ता बनदीप दत्ता ने आरोप लगाया कि असम में बाढ़ से हुई व्यापक तबाही के पीछे प्राकृतिक कारणों के साथ-साथ मानव निर्मित परिस्थितियां भी जिम्मेदार हैं। उन्होंने विशेष रूप से गैरकानूनी खनन को इस संकट का प्रमुख कारण बताया।

अवैध खनन और पर्यावरणीय क्षति

प्रेस कॉन्फ्रेंस में बनदीप दत्ता ने दावा किया कि असम में बड़े पैमाने पर हो रहे अवैध खनन ने प्राकृतिक पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। उनके अनुसार, खनन गतिविधियों के कारण पहाड़ी क्षेत्रों और नदियों के आसपास की प्राकृतिक संरचना प्रभावित हुई है। जंगलों की कटाई, पहाड़ियों का कमजोर होना और प्राकृतिक जल निकासी तंत्र में हस्तक्षेप जैसी गतिविधियां भारी बारिश के दौरान परिस्थितियों को और गंभीर बना सकती हैं।

खनन के दौरान पहाड़ियों और धरातलीय संरचनाओं में बड़े पैमाने पर बदलाव किए जाने से मिट्टी की स्थिरता प्रभावित होने की आशंका रहती है। ऐसे क्षेत्रों में लगातार वर्षा होने पर भूस्खलन का खतरा बढ़ सकता है। इसी संदर्भ में कांग्रेस नेता ने मेघालय और नागालैंड में कथित अवैध माइनिंग गतिविधियों का उल्लेख करते हुए कहा कि इसका प्रभाव असम के कई जिलों में देखने को मिला है।

दत्ता के अनुसार, मेघालय और नागालैंड में हो रही कथित अवैध खनन गतिविधियों का असर असम के शिवसागर और जोरहाट जिलों में विशेष रूप से दिखाई दिया। इन क्षेत्रों में भारी भूस्खलन और उससे जुड़ी तबाही का उल्लेख करते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि भूस्खलन के पीछे प्रमुख कारण अवैध खनन है।

हालांकि किसी प्राकृतिक आपदा के कारणों का वैज्ञानिक रूप से निर्धारण करने के लिए विस्तृत भूवैज्ञानिक, पर्यावरणीय और प्रशासनिक जांच आवश्यक होती है, लेकिन इस आरोप ने पूर्वोत्तर क्षेत्र में खनन गतिविधियों की निगरानी और उनके पर्यावरणीय प्रभावों पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। यदि खनन गतिविधियों ने वास्तव में प्राकृतिक ढलानों, जल धाराओं और वन क्षेत्रों को प्रभावित किया है, तो इसके कारण आपदा का प्रभाव बढ़ने की संभावना की स्वतंत्र जांच की जानी चाहिए।

प्रधानमंत्री से असम दौरे की मांग

प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह मांग भी उठाई गई कि भारत के प्रधानमंत्री को तत्काल असम का दौरा करना चाहिए और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों की स्थिति का प्रत्यक्ष जायजा लेना चाहिए। ऐसी प्राकृतिक आपदा के समय केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय महत्वपूर्ण हो जाता है। प्रभावित लोगों को राहत, पुनर्वास, स्वास्थ्य सुविधाएं, खाद्य सामग्री तथा सुरक्षित आवास उपलब्ध कराने के लिए पर्याप्त संसाधनों की आवश्यकता होती है।

प्रधानमंत्री का दौरा न केवल प्रभावित नागरिकों के बीच विश्वास पैदा कर सकता है, बल्कि केंद्र सरकार की ओर से दीर्घकालिक राहत और पुनर्वास के लिए आवश्यक सहायता का आकलन करने में भी सहायक हो सकता है। इसके साथ ही असम के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के लिए स्थायी समाधान तलाशना भी आवश्यक है, क्योंकि राज्य लंबे समय से बाढ़ की समस्या का सामना करता रहा है।

बनदीप दत्ता ने असम तक सीमित न रहकर पूरे पूर्वोत्तर भारत में पर्यावरणीय संकट का मुद्दा उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि खनन माफिया ने असम सहित पूरे पूर्वोत्तर राज्यों के पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया है। उनके आरोप के अनुसार, अवैध खनन को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है और मुख्यमंत्री सहित कई मंत्रियों के साथ कथित गठजोड़ के कारण ऐसी गतिविधियां जारी हैं।

ये आरोप गंभीर प्रकृति के हैं और इनकी पुष्टि के लिए निष्पक्ष जांच की आवश्यकता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी व्यक्ति या संस्था पर लगाए गए आरोपों को जांच और प्रमाण के आधार पर ही अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचाया जाना चाहिए। यदि अवैध खनन और राजनीतिक संरक्षण के आरोपों में तथ्य पाए जाते हैं, तो जिम्मेदार व्यक्तियों और संस्थाओं के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।

बनदीप दत्ता ने कहा कि अवैध खनन पर नियंत्रण केवल कानून बनाने से संभव नहीं है। इसके लिए खनन क्षेत्रों की नियमित निगरानी, पर्यावरणीय नियमों का कठोर पालन, अवैध गतिविधियों पर तत्काल कार्रवाई और स्थानीय प्रशासन की जवाबदेही सुनिश्चित करना आवश्यक है। आधुनिक तकनीक, सैटेलाइट इमेजरी और डिजिटल निगरानी के माध्यम से संवेदनशील क्षेत्रों में खनन गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती है।

साथ ही, उन क्षेत्रों का वैज्ञानिक अध्ययन भी जरूरी है जहां लगातार भूस्खलन, मिट्टी का कटाव और बाढ़ की समस्या बढ़ रही है। विशेषज्ञों की रिपोर्ट के आधार पर यह निर्धारित किया जाना चाहिए कि प्राकृतिक परिस्थितियों और मानव गतिविधियों में से किसका कितना योगदान है। इससे भविष्य में आपदा प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण की बेहतर रणनीति बनाई जा सकती है।

असम की वर्तमान बाढ़ ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए केवल राहत और बचाव कार्य पर्याप्त नहीं हैं। पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना और प्राकृतिक संसाधनों का जिम्मेदार उपयोग भी उतना ही आवश्यक है। दिल्ली की प्रेस कॉन्फ्रेंस में कांग्रेस नेता बनदीप दत्ता द्वारा अवैध खनन को बाढ़ और भूस्खलन से जोड़कर लगाए गए आरोपों ने इस विषय को राजनीतिक और सामाजिक विमर्श के केंद्र में ला दिया है।

अब आवश्यकता है कि असम तथा पूरे पूर्वोत्तर में अवैध खनन से जुड़े आरोपों की निष्पक्ष और वैज्ञानिक जांच कराई जाए। जहां नियमों का उल्लंघन पाया जाए, वहां कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही बाढ़ और भूस्खलन से प्रभावित लोगों को तत्काल राहत एवं पुनर्वास उपलब्ध कराया जाना चाहिए।

प्रधानमंत्री सहित केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर दीर्घकालिक पर्यावरणीय नीति तैयार करनी होगी, जिसमें विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित हो। पूर्वोत्तर भारत की जैव विविधता और प्राकृतिक संपदा न केवल वहां रहने वाले लोगों की धरोहर है, बल्कि पूरे देश की महत्वपूर्ण प्राकृतिक विरासत है। इसलिए अवैध खनन, वनों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों के अनियंत्रित दोहन पर प्रभावी रोक लगाना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।

(हिम्मत सिंह की रिपोर्ट।)

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