स्वाधीनता दिवस एक बार फिर हम हर्ष और उल्लास के साथ मनाएंगे। लाल किले के साथ तमाम देशवासी तिरंगे को फहराते हुए स्वाधीनता सेनानियों की याद तरो-ताजा करेंगे। उनके संघर्ष और बलिदान से मिली आज़ादी को बचाने का संकल्प लेंगे।हर बार की तरह बच्चे देश भक्ति के दीवानों और शहीदों की जय-जयकार करेंगे और देशभक्ति के तराने गाएंगे, नाचेंगे। बापू के अहिंसक आंदोलन की भी याद करेंगे वगैरह वगैरह। लालकिले के प्राचीर से देश की आवाज़ दुनिया सुनेंगे यह एक तरह से अब पारम्परिक रस्म की भांति होने लगा है हमारा आज़ादी का उत्सव।
होना यह चाहिए कि हमें सतत उन लोगों से सावधान रहने की ज़रुरत है जो देश की आज़ादी को, उससे हासिल अधिकारों को निरंतर कंदरा में डालने का षड्यंत्र पिछले 11 सालों से कर रहे हैं। खैरियत है, जनता ने उन्हें ताज तो दिया पर कमान पूरी तरह नहीं सौंपी। लेकिन झूठ और अहंकार में डूबी वर्तमान सरकार इस ओर चोरी और चुपके-चुपके कदम बढ़ा रही है। उन प्रश्नों को जानना और उसका समाधान हमें ही करना होगा।
जिस देश में पैदा होने पर हमें सदैव गर्व होता रहा है जिसका यशगान हम बचपन से करते रहे। ‘सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा’ दिलो दिमाग में आज भी सतत गूंजता है। जिस के सर का ताज हिमालय हो अरब, बंगाल और हिंद महासागर जिसके पग पखारते हों। जिस देश में थार सा गर्म मरुस्थल और लद्दाख सा ठंडा क्षेत्र हो। बादलों के घर मेघालय में सर्वाधिक वर्षा चेरापूंजी में हो। अरावली, विंध्याचल, सतपुड़ा जैसे प्राचीन पर्वत हों। दलदल, रेगिस्तान तथा विशाल गंगा जमुना और ब्रह्मपुत्र के उपजाऊ मैदान हों। नीलगिरी की पहाड़ियों की रौनकें खास हो। कश्मीरियत की खुशबू अलौकिक हो। राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, गुजरात मालवा, मिथिलांचल, अवध और पूर्वांचल की छटा निराली हो। गेटवे ऑफ इंडिया भारत का प्रवेशद्वार। और आज़ादी के लिए शहादत देने वाले लोगों की याद संजोए इंडिया गेट हो।
वैसे ही तरह तरह की वनस्पतियां, जीव जंतु और विभिन्न प्रजातियों के लोगों का समागम हो। वेशभूषा, भाषाएं खान-पान, रीति-रिवाज, रहन सहन असमान होने के बावजूद सब एक सूत्र से बंधे सदियों से हों। उनमें आज नफरत की आग इस बुरी तरह सुलगाई जा रही है कि लगता है यह हमारा वह भारत नहीं है।
यूं तो भारत मूलतः आदिवासी लोगों का ही है जो विभिन्न दूसरी संस्कृतियों के आगमन से अपने को सुरक्षित रखने घने जंगलों और ऊंचे पहाड़ों में पहुंच गए।उनकी सदाशयता का ही परिणाम कि इस देश में शक, हूण, मंगोलियन, आर्यन, द्रविड़, मुगल, पठान, डच, फ्रेंच, अंग्रेज आए। यह भी सच है कि तमाम प्रजातियों के घाल मेल से ही हिंदुस्तान या भारत का तथाकथित जैविक विकास हुआ। आश्चर्यजनक तो यह है कि जिस मुगल संस्कृति ने भारत को सबसे ज़्यादा दुनिया में पहचान दिलाई।
गंगा जमुनी तहजीब की बुनियाद रखी। उर्दू अदबी जुबान दी, शायरी, ग़ज़ल गायकी का हुनर दिया। दीन ए इलाही धर्म का पैगाम दिया। ताजमहल, लालकिला, कुतुबमीनार आदि दी। सूफी संत दिए। रहीम खानखाना दिए। उसी पर सबसे ज़्यादा हमले हो रहे हैं। आज़ादी की लड़ाई में उनके अवदान को देखना हो तो इतिहास पढ़िएगा। यह जान लीजिए इंकलाब का नारा-मौलाना हसरत मोहानी, मादरे वतन की जय-अजीम उल्ला, जय हिंद-आबिद हसन सफानी, भारत छोड़ो-यूसुफ मेहर अली ने दिए। क्या इसे भुलाया जा सकता है।
लोगों का ख्याल है कि भारत पाक विभाजन के बाद ही विद्वेष की चिंगारी भड़की। लेकिन इसके बीज 1925 में ही बो दिए गए थे। इसे यूं भी कह सकते हैं कि यह आग अंग्रेजों ने देश के उन गद्दारों से मिलकर भड़काई जो बाद में सिर्फ आज़ादी के एक साल बाद गांधी जी की हत्या के रुप में सामने आई। लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू और उनके गृहमंत्री सरदार पटेल ने इन परिस्थितियों में देश को एक बनाए रखा। दोनों ने मिल कर अंग्रेजों और देश के गद्दारों की चाल असफल कर दी। ये गद्दार नागपुर गुफा में बैठकर 60 साल तक जो देश विरोधी प्लान बनाए उसकी बदौलत 2014 में गुजरात नरसंहार के कथित आरोपी मुख्यमंत्री और तड़ीपार गृहमंत्री भारत के सर्वेसर्वा बन गए। प्रतिफल सामने है ही। हाथ कंगन को आरसी क्या?
हम जहां अपनी भारतीयता पर गर्व करते रहे हैं वह था हमारा सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां। इसकी खासियत थी विविधताओं से भरा इस देश का इतिहास। जिसने हमें दुनिया में इज़्जत बख़्शी।
यही वजह है कि जब आज़ाद भारत का संविधान बना तो इन बातों का ख़्याल रखा गया जिससे भाईचारे की यह बहुविध संस्कृति को आंच ना आए। तमाम देशवासियों, महिला पुरुष को मताधिकार का हक मिला। अभिव्यक्ति की आज़ादी के साथ अपने अपने धर्म ,भाषा, रीति-रिवाज, खान-पान के अधिकार मिले। सबको शिक्षा और अन्नाधिकार मिला, और सबसे बड़ी बात जनता को अपने प्रतिनिधि चुनने का अधिकार मिला।मतलब जनता का जनता के लिए,जनता का शासन प्रजातंत्र मिला। चुनाव के लिए स्वतंत्र चुनाव आयोग,जांच के लिए स्वतंत्र एजेंसियां और स्वतंत्र न्यायपालिका मिली।
तकरीबन पचास साल इन समस्त व्यवस्थाओं को देश में कुछेक अव्यवस्थाओं को छोड़कर देश एक सुनियोजित विकास के साथ विकासशील देश की श्रेणी में प्रविष्ट कर गया। देश खाद्यान्न संकट से उभरा। पंचवर्षीय योजनाओं ने कृषि के साथ बड़े बड़े औद्योगिक संस्थान तैयार किए। पंडित नेहरु इन्हें औद्योगिक तीर्थ कहते थे। देश आत्मनिर्भर हुआ।साथ ही साथ भारत देश के पूज्य बापू महात्मा गांधी अहिंसा और सत्य के पुजारी तथा नेहरू शांतिदूत के रूप में अन्तर्राष्ट्रीय जगत में आज भी अपना सिक्का जमाए हुए हैं। दूजा कोई नहीं।
इन तमाम उपलब्धियों के दौर में प्रजातंत्र की सुदृढ़ता से भी दुनिया ने सबक लिया। युद्ध की जगह समझौता को जगह मिली। लेकिन देश को सबसे पहला ग्रहण बापू की हत्या के समय लगा जब देश आज़ाद ही हुआ था। यह दुर्दांत हत्या हमारे देश में हमारे लोगों ने ही षड्यंत्र पूर्वक की थी। प्रधानमंत्री नेहरु और गृहमंत्री वल्लभ भाई पटेल ने देश को एक बड़े सदमे से संभाल लिया। हां ये ज़रूर हुआ पटेल के कहने पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। लेकिन इतनी बड़ी घटना को नज़र अंदाज़ करते हुए समझौतावादी और शांति के उपासक नेहरू ने संघ से दुश्मनी ना लेते हुए उन्हें देशवासी के नाते एक सांस्कृतिक संगठन के रूप में कार्य करने की अनुमति दे दी।
यही चूक, देश पर इतनी भारी हो गई कि संघ ने सांस्कृतिक संगठन के नाम पर देश के कोने कोने में सरस्वती शिशु मंदिर स्थापित कर लिए, अंदरूनी स्तर पर उनमें शाखाएं पनपने लगीं। वहां से निकले छात्र और शाखाओं से निकले नेताओं ने 2014 में छल छद्म से देश में अपनी सरकार भारतीय जनता पार्टी नाम से स्थापित कर ली।
यहां से देश में एक ऐसा दौर शुरू हुआ जिसने राजनीति में वैमनस्यता को बढ़ावा दिया साथ ही देश में हिंदू,-मुसलमान के बीच नफरत की आग सुलगा दी। इसकी चिंगारियां भारत विभाजन और बापू की हत्या में भी साफ दृष्टि गोचर होती हैं। इससे पूर्व गुजरात नरसंहार और बाबरी मस्जिद ढांचा तोड़कर इन्होंने हिंदुओं के ध्रुवीकरण का काम कर लिया था। इधर कांग्रेस के लंबे शासन के ख़िलाफ़ जनमानस को अन्ना हजारे टीम ने तिरंगा लहराकर कांग्रेस पर कथित भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर जनमानस को भरमाया। लोकपाल बिल के नाम पर जोड़ा।
बागडोर हाथ आते ही इन्होंने संविधान समाप्त करने के इरादे से पहले चुनाव आयोग को कठपुतली बनाया, ईवीएम में हेराफेरी से राज्यों में चुनाव जीते। जहां हारे, वहां सरकार गिराने खरीद-फरोख्त का काम किया।दलबदल कराने में ईडी, सीबीआई,आईटी जैसी संस्थाओं का दुरुपयोग किया। शैक्षणिक संस्थानों में संघ के लोगों को कमान सौंपी वे भाजपा के लठैतों के केंद्र बन गए।इतना ही नहीं मनुवाद की तैयारी के लिए सिलेबस में भी इतिहास से छेड़छाड़ की गई। शिक्षा और स्वास्थ्य संस्थान के साथ रेल, हवाई सेवा का निजीकरण कर देश के लोगों के बुनियादी अधिकार छीने गए । भ्रष्टाचार शिष्टाचार बन गया। लोकपाल भूल गए।रेल गिरी, हवाई जहाज गिरे पुल धराशाई हुए , परीक्षाओं में पेपर आउट होने लगे,दवाई के साथ आम उपभोक्ता सामग्री मंहगी हुई।सरेआम सरकार के प्रिय लोगों ने बैंक लूटे। कोरोना काल में आए बड़े सहयोग को छुपाया , इलेक्टोरल बांड ने जो दानदाता थे उन्हें नकली सामान बनाने और ऊंचे दामों पर बेचने की आज़ादी दी।
और तो और आज़ादी में अभूतपूर्व योगदान देने वाले महात्मा गांधी के ख़िलाफ़ उनके हत्यारे गोडसे को स्थापित करने का काम हुआ। गांधी को देश में भुलाने गुजरात के प्राथमिक पाठ्यक्रम में ये भी पढ़ाया गया गांधी की हत्या नहीं हुई वे अपनी मौत मरे।इसी तरह देश के लाड़ले जवाहर लाल तो आज भी हर काम में आड़े आते हैं।उनका देश के लिए समर्पित परिवार इन्हें फूटी आंखों को नहीं सुहाता।इतना ही नहीं देश की सम्पदा दो पूंजीपतियों के नाम कर देना और ये कहना कि देश नहीं बिकने दूंगा।
कहने वाला खुद तो अच्छे दिनों का लुत्फ ले रहा है और आमजन गरीब से गरीब तर हो रहा है।देश के हालात तो बिगड़े ही देश की सम्प्रभुता को तार तार कर दिया।चीन ने ज़मीन दबाई और अमेरिका ने मोदी जी का गला दबा के सरेंडर कराया। याद आती हैं इंदिरा जी की जब उन्होंने पूर्वी पाकिस्तान मिटाकर बांग्लादेश बनाया। सिक्किम देश को भारत का राज्य बनाया। इस दौरान अमरीकी धमकी से वे नहीं डरी और सोवियत रूस से 25 वर्षीय मैत्री स्थापित कर देश को सुरक्षित कर लिया। अमरीका को मुंह की खानी पड़ी।
आज के जो हालात हैं उससे तो यही लग रहा है भारत को आज चीन और अमेरिका के बीच पिसने छोड़ दिया गया है। उन्हें देश के संविधान और जनतंत्र से कोई मतलब नहीं उनका लक्ष्य है येन केन प्रकारेण देश को हिंदू राष्ट्र बनाना सत्ता में बने रहना।यह आसान नहीं इसलिए वे चुनाव में वोटरों के मत की चोरी करते रहे हैं।अब जब इस कमज़ोर और बैसाखियों पर खड़ी सरकार के संविधान विरोधी कारनामों की पोल अदालतों में सतत खुलती चली जा रही है।तो देशप्रेमियों का यह पहला कर्तव्य है कि वे इन तमाम प्रश्नों को समझें और देश की अस्मिता ,उसके संविधान और प्यारे तिरंगे झंडे की रक्षा के लिए संकल्पित हों।
यह लड़ाई कठिन ज़रुर है क्योंकि झूठ और लूट में अग्रणी सरकार को मोदी मीडिया का भी समर्थन प्राप्त है। प्रजातंत्र के चारों स्तंभ क्षतिग्रस्त हैं। उनमें सुधार देश की अवाम ही ला सकती है क्योंकि वे ही सरकार बनाते हैं।उन्हें भलीभांति इस फर्जी लोकतांत्रिक सरकार से निपटना है तो हौसला बुलंद रखना होगा।डरे नहीं,देश की आज़ादी बचाने जहां भी हों मुखर होकर प्रयास करें। झांसों में ना आएं। आज़ादी के जश्न में शरीक हों लेकिन उन प्रश्नों के हल के लिए संघर्षरत रहें जो हमें फिर गुलाम बनाने की जुगत में हैं। देश एक बार फिर गद्दारों के वंशजों के कारण खतरे में है। इनकी पहचान हो गई है इसलिए सावधानी बरतें डरे नहीं।स्वतंत्रता अमर रहे, मंगलकामनाएं।
(सुसंस्कृति परिहार लेखिका और एक्टिविस्ट हैं।)