(मोदी पर) हंसना मना है?

ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जो चाहे बर्दाश्त कर लें, पर उनकी हंसी उड़े या कोई उन पर हंसे, यह उन्हें कतई गंवारा नहीं। हाल में कई ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जब मोदी सरकार ने कार्टून चित्रों और एनीमेशन वीडियो को निशाना बनाया है। 

शुरुआत वायर के एक एनीमेशन वीडियो से हुई जिसमें मशहूर बालगीत “लकड़ी की काठी…” की तर्ज पर उनके संसद में चर्चा से भागने पर तंज कसा गया था।

फिर, इजरायल यात्रा (अमेरिका इजरायल के ईरान पर हमले से पूर्व) के दौरान इजराइली प्रधानमंत्री के साथ उनके हंसने पर एक नामालूम कलाकार का एक मिमिक्री वीडियो आया और इंटरनेट पर छा गया, लेकिन इस वीडियो को भी ब्लॉक करवा दिया गया। 

इसके बाद तो कई कार्टूनिस्टों, व्यंग्य वीडियो बनाने वालों पर सरकार की मेहरबानी हुई और किसी का कंटेंट हटवाया गया तो किसी का सोशल मीडिया खाता (फेसबुक, ट्विटर यानी एक्स आदि) ही गायब करवा दिया गया।

सरकार के निशाने पर मालिटिक्स, नेशनल दस्तक, भगत राम आदि के अलावा मोहम्मद ज़ुबैर जैसे फैक्ट चेकर भी आए। हालांकि, ज़ुबैर समेत कुछ मामलों में कारण कॉमेडी न होकर सरकारी नीतियों, रुख की सतत् आलोचना है।

इससे पहले 4पीएम चैनल बंद करवाया गया था। शिवसेना (उद्धव ठाकरे समूह) की पत्रिका “मार्मिक” के मुखपृष्ठ पर एक व्यंग्यचित्र पर भी सरकारी कृपा बरसी थी। और भी कई उदाहरण हैं।

यह तो पिछले बारह सालों में निर्विवाद रूप से साबित हो चुका है कि मोदीजी सवालों का सामना नहीं कर सकते और आलोचना, भले स्वस्थ क्यों न हो, नहीं झेल सकते। सामने से भले “लोकतंत्र में आलोचना जरूरी है” मार्का फैंसी बातें बोलें।  

“मीडिया को बेहतर तरीके से हैंडल कर सकता था…” ऐसा मोदी 2002 गुजरात दंगों के बाद बीबीसी से साक्षात्कार में स्वीकार कर चुके हैं, जब वह गुजरात के मुख्यमंत्री थे। आज भी मोदी जी को सबसे ज्यादा दिक्कत मीडिया से ही होती है। 

सच तो यह है कि मुख्यधारा के मीडिया के बड़े हिस्से, जिसमें टेलीविजन और प्रिंट शामिल है, पर सरकारी शिकंजा कसा जा चुका है। उनकी समस्या डिजिटल, सोशल मीडिया बना हुआ है, जिसे वैकल्पिक मीडिया भी कहा जा सकता है। 

इसमें मुख्य तौर पर दो तरह के लोग हैं। एक, जो कभी मुख्यधारा के मीडिया का हिस्सा थे और 2014 के बाद किनारे किए गए और सबने अपने छोटे आउटलेट (वेबसाइट, यूट्यूब चैनल) शुरू किए और दूसरे, जो सोशल मीडिया या कहें कि रील युग की ही पैदाइश हैं और मूल रूप से पत्रकार थे भी नहीं लेकिन अपनी कॉमेडी, मिमिक्री या कंटेंट पर सरकार के रवैए से और ज्यादा आक्रामक और सरकार विरोधी हो गए। 

यह तबका आज सरकार के निशाने पर है। रचनात्मक तरीके से की गई इनकी आलोचना चूंकि वायरल होकर चंद घंटों में करोड़ों लोगों तक पहुंचने की क्षमता रखती है, इसलिए सरकार में डर है कि बेहिसाब पैसा फूंककर, मीडिया कंट्रोल से एक दशक में बनाई उसकी छवि बिगड़ न जाए और नैरेटिव व पर्सपेक्टिव का उसका खेल खराब न हो जाए।

यही डर कारण है कि सोशल मीडिया में न्यूज कंटेंट साझा करने पर भी रोक लगाने के उद्देश्य से आईटी कानून में बदलाव किए जा रहे हैं। निकट भविष्य में सोशल मीडिया समेत मीडिया पर हमले तेज़ होंगे, जिसके लिए कंटेंट क्रिएटरों और मीडियाकर्मियों को तैयार रहना होगा।

(लेखक जनचौक से मुंबई से सहयोगी के तौर पर जुड़े हुए हैं।)

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