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हड़ताली कर्मियों से समझौता करने की बजाए सफाई व्यवस्था को काॅरपोरेट को सौंपने की जिद पर अड़े हैं खट्टर

धीरेश सैनी

देश की राजधानी दिल्ली से सटा हरियाणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट `स्वच्छ भारत अभियान` के खोखेलपन को बयां कर रहा है। हरियाणा के सफाई कर्मचारी 9 मई से हड़ताल पर हैं पर वहां की भारतीय जनता पार्टी सरकार उनकी मांगों से मुंह फेरे बैठी है। सीएम मनोहर लाल खट्टर से बातचीत नाकाम हो जाने के एक दिन बाद गुरुवार को नगर पालिका कर्मचारी संघ ने सफाई कर्मचारियों की हड़ताल को मांग पूरी होने तक जारी रखने का ऐलान कर दिया है। दिलचस्प बात यह है कि सफाई कर्मचारियों की प्रमुख मांग वही है, जिन्हें पूरी करने का वादा भाजपा किया था और मांगों को विधानसभा चुनाव के घोषणापत्र में शामिल था। कर्मचारी नेताओं का आरोप है कि सरकार में बैठे भाजपा नेता सफाई के ठेके के नाम पर एक चीनी कंपनी को जनता का पैसा लुटाकर बंदरबांट में जुटे हुए हैं।

हरियाणा के कर्मचारियों के सबसे जुझारु और ताक़तवर संगठन `सर्व कर्मचारी संघ` से संबद्ध नगर पालिका कर्मचारी संघ के नेतृत्व में प्रदेश भर के सफ़ाई कर्मचारी 9 मई से हड़ताल पर हैं। देश की राजधानी से सटे और `विकास` पर इठलाने वाले इस राज्य की सरकार का रवैया इस हड़ताल को लेकर पहले दिन से ही बेहद नकारात्मक है।

यह हैरानी की बात लग सकती है कि किसी राज्य में सफाई कर्मचारियों की हड़ताल को नौ दिन बीत चुके हों पर सरकार उन मांगों को नकारने की ज़िद पर अड़ी बैठी हो जिन्हें पूरा करने की बात इस सरकार को चलाने वाली पार्टी भाजपा के घोषणापत्र में शामिल हो। हालांकि, सरकारी, अर्द्ध सरकारी विभागों, निगमों, निकायों को ठप कर सब कुछ कॉरपोरेट को सौंपने पर आमादा सरकारों के ऐसे रवैये पर हैरान होना ही इन दिनों हैरत की बात है। सफाई कर्मचारियों की जो प्रमुख मांगें हैं-ठेका प्रथा पर रोक लगाई जाए, अस्थायी कर्मचारियों को स्थायी किया जाए, समान काम-समान वेतन मिले और एक्सग्रेसिया पॉलिसी बहाल की जाए।

नगर पालिका संघ की राज्य कार्यकारिणी के सदस्य अशोक थोरिया कहते हैं कि-

सफाई कर्मचारियों की हड़ताल का निर्णय एकाएक नहीं लिया गया।राज्य की भारतीय जनता पार्टी की सरकार को चार सालों में बार-बार चुनाव घोषणापत्र के वादों की याद दिलाने के लिए आंदोलन किया जाता रहा। 9 मई को तीन दिन की हड़ताल का ऐलान किया गया था लेकिन संबंधित विभाग की मंत्री कविता जैन की टिप्पणियों के बाद हड़ताल को तीन दिन के लिए बढ़ाना पड़ा। कोई रास्ता नहीं निकला तो हड़ताल को फिर से तीन दिन के लिए बढ़ाया गया।

हरियाणा सरकार के प्रधान सचिव के साथ बातचीत विफल हो जाने पर 16 मई को नगरपालिका कर्मचारी संघ के प्रतिनिधिमंडल की चंडीगढ़ में मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के साथ बातचीत भी किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी। कल गुरुवार को सर्व कर्मचारी संघ के नेताओं की उपस्थिति में नगर पालिका कर्मचारी संघ की राज्य कार्यकारिणी की बैठक रोहतक में हुई और सफ़ाई कर्मचारियों की हड़ताल के बेमियादी होने का ऐलान कर दिया गया।

नगर पालिका कर्मचारी संघ, हरियाणा के अध्यक्ष नरेश शास्त्री के मुताबिक-

कैबिनेट मंत्री कविता जैन, और राज्य मंत्री मनीष ग्रोवर की उपस्थिति में मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के साथ हुई बातचीत में सरकार का रवैया पूरी तरह नकारात्मक रहा। सफाई के लिए ठेका प्रथा खत्म करने की मांग पर मुख्यमंत्री का कहना था कि जिन कंपनियों का ठेका खत्म होता जाएगा, उन्हें आगे से ठेका नहीं दिया जाएगा जबकि कर्मचारियों की मांग सभी ठेके एक झटके में रद्द करने की है।

अस्थायी कर्मचारियों को स्थायी करने के सवाल पर सरकार के प्रधान सचिव ने सुप्रीम कोर्ट का बहाना बनाया तो कर्मचारी नेताओं ने नये सिरे से पॉलिसी जारी कर इस मांग को पूरा करने के लिए कहा। नरेश शास्त्री ने सवाल किया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए समान काम-समान वेतन क्यों नहीं लागू कर दिया जाता। सवाल है कि हरियाणा के शहरों में जगह-जगह गंदगी के ढेर लगे होने और बीमारियां फैलने की आशंका के बावजूद हरियाणा सरकार सफ़ाई कर्मचारियों के आंदोलन को लेकर इतनी हठधर्मी क्यों हैं। कर्मचारी नेता नरेश शास्त्री कहते हैं कि-

सरकार का विश्वास एक ऐसी सुचारु व्यवस्था को बनाए रखने में नहीं है जो कमज़ोर तबकों को रोजगार भी देती हो। सब कुछ कॉरपोरेट को लुटा देने की ज़िद में कर्मचारियों की मांगों की उपेक्षा की जा रही है। गौरतलब है कि नगर निगमों, नगर पालिकाओं और नगर परिषदों में अपेक्षित नियुक्तियां करने के बजाय सरकार की नीति विभिन्न इलाकों में सफाई का काम मोटा पैसा लुटाकर प्राइवेट कंपनियों को सौंपने की है।

अनिल शास्त्री के मुताबिक, खट्टर सरकार किसी `ईको ग्रीन` कंपनी पर मेहरबान है। एक मीट्रिक टन कूड़ा उठाने के लिए एक हजार रुपये का भुगतान किया जाता है। अनुमान के मुताबिक-

प्रदेश में करीब 400 करोड़ रुपये महीने इस कंपनी को भुगतान किया जाता होगा जबकि सरकार चाहे तो महज 100 करोड़ रुपये महीने खर्च कर निकायों के सफाई कर्मचारियों के जरिये सफाई व्यवस्था सुचारु ढंग से चल सकती है। प्रदेश में करीब 62 हजार कर्मचारियों की जरूरत होगी। फिलहाल यह संख्या करीब 25 हजार है। अस्थायी कर्मचारियों को स्थायी करने, नयी नियुक्तियां करने और कर्मचारियों को संवैधानिक रूप से वेतन का भुगतान करने में प्राइवेट कंपनी को दिए जा रहे पैसे की अपेक्षा बेहद कम खर्च आएगा।

उन्होंने आरोप लगाया कि जनता का पैसा प्राइवेट कंपनी को लुटाने के पीछ नेताओं की बंदरबांट भी है। गौरतलब है कि प्राइवेट कंपनियों पर निकायों के संसाधनों के इस्तेमाल का आरोप भी है। कर्मचारी नेताओं के मुताबिक, निकायों के कर्मचारियों को कंपनी को दिए गए ठेके का काम करने के लिए मजबूर किया जाता है। शास्त्री के मुताबिक, कम कूड़ा उठाकर ज्यादा वज़न दिखाने के लिए ट्रोली में कूड़े के नीचे मिट्टी भरने जैसी कारगुजारियां भी मिलीभगत के जरिए अंजाम दी जा रही हैं।सफाई कर्मचारियों की हड़ताल के असर को कम करने के लिए सरकार की कोशिश ठेकेदारों के जरिये कूड़े के ढेर उठवा देने की है।

कर्मचारी नेता अशोक थोरिया के मुताबिक-

ठेकेदारों के गुंडों और पुलिस के जरिये हड़ताली कर्मचारियों को भयभीत करने की कोशिश भी की जा रही है। नरेश शास्त्री कहते हैं कि ठेकेदार खुलेआम बाउंसर लिए घूम रहे हैं और कई जगह सफ़ाई कर्मचारियों के साथ बदतमीज़ी की गई है। कैथल में कर्मचारियों के साथ मारपीट की गई।

कैथल के ही निवासी नगर पालिका कर्मचारी नेता शिवचरण ने कहा कि इसके बावजूद कर्मचारियों की एकजुटता और मनोबल में कोई कमी नहीं है। उचाना में एक महिला कर्मचारी को दलित जातियों के लिए घृणा से इस्तेमाल किए जाने वाले संबोधन से अपमानित किया गया। पुलिस ने एफआईआर तक दर्ज नहीं की। नरेश शास्त्री ने कहा कि इस तरह की घटनाओं को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अशोक थोरिया ने कहा कि सफाई के काम में प्राय: दलित जातियों के लोग हैं। सभी जानते हैं कि दलितों के घरों में खाने-सोने के ड्रामे करने वाले भाजपा नेता और उनका पितृ संगठन आरएसएस दलित विरोधी है। इसलिए भी सफाई कर्मचारियों को लेकर हद दर्जे की संवेदनहीनता बरती जा रही है। उन्हें डराया-धमाकाया जा रहा है और जातिगत घृणा का प्रदर्शन भी किया जा रहा है। थोरिया ने कहा कि कम से कम लोगों से कम से कम पैसा देकर ज्यादा से ज्यादा काम लेने और मशीनों पर निर्भर रहने वाली कंपनियों के हाथों में सफाई का काम चले जाने के बाद तो लोगों के हाथों से यह रोजगार भी जाता रहेगा। सरकार में बैठे लोग अपनी मानसिकता के कारण भी ऐसा चाहते हैं।

सर्व कर्मचारी संघ, हरियाणा के अध्यक्ष धर्मवीर फौगाट व महासचिव सुभाष लांबा का कहना है कि-

सफाई कर्मचारियों की मांगों को लेकर प्रदेश के कर्मचारी पूरी तरह एकजुट हैं। पुलिस और बाउंसरों की मदद से आंदोलन की दमन की कोशिशें सरकार को उलटी पड़ेंगी। कर्मचारियों की एकजुटता के दावों के बीच आरएसएस के कर्मचारी संगठन `भारतीय मज़दूर संघ` की भूमिका का जिक्र भी जरूरी है। कल बुधवार को कर्मचारियों का प्रतिनिधिमंडल चंडीगढ़ में मुख्यमंत्री से बातचीत के लिए पहुंचा तो वहां पहले ही भारतीय मज़दूर संघ के नेता मौजूद थे। नगर पालिका कर्मचारी संघ का प्रतिनिधिमंडल इस पर एतराज जताया और बीएमएस नेताओं पर कर्मचारियों के आंदोलनों के साथ भितरघात का आरोप लगाते हुए उनकी मौजूदगी में बातचीत से इंकार कर दिया। सीएम को आखिरकार बीएमएस नेताओं को वहां से हटाना पड़ा।

नगर पालिका कर्मचारी संघ के प्रतिनिधिमंडल ने तो सीएम के कोरे आश्वासन के आधार पर हड़ताल वापस लेने से इंकार कर दिया पर नरेश शास्त्री के मुताबिक, बाद में बीएमएस नेताओं ने आंदोलन वापसी की घोषणा कर डाली। राज्य में सफाई कर्मचारियों की हड़ताल को लेकर भाजपा सरकार के उपेक्षापूर्ण रवैये की वजह से प्रधानमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट की तरह प्रचारित `स्वच्छ भारत अभियान` पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। सोशल मीडिया पर लोग पूछ रहे हैं कि साफ जगहों पर नयी झाड़ुएं लेकर फोटो खिंचवाने वाले भाजपा के मंत्री, पदाधिकारी, कार्यकर्ता और स्वयंसेवक गंदगी के ढेर उठाने के लिए क्यों नहीं निकल रहे हैं। यूं भी सोशल एक्टिविस्ट ध्यान दिलाते रहे हैं कि सफाई कर्मचारियों की अपेक्षित संख्या में नियुक्ति, उन्हें समुचित वेतन और संसाधन दिए बिना इस अभियान को लेकर बड़े-बड़े दावे क्रूर मज़ाक के सिवा कुछ नहीं हैं। साध्वी यौन शोषण के केस में फिलहाल जेल में बंद डेरा सच्चा सौदा के गुरमीत राम-रहीम को हरियाणा में इस अभियान का अंबेसडर बनाए जाने की भाजपा सरकार की कारगुजारी की भी याद दिलाई जा रही है।

(धीरेश सैनी पत्रकार हैं।)

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This post was last modified on December 3, 2018 5:40 am

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