उत्तर प्रदेश में प्रयागराज में चल रहे महाकुंभ में उत्तर प्रदेश सरकार ने अभूतपूर्व फैसला लेते हुए इसी बुद्धवार 22 जनवरी को कुंभ में यूपी कैबिनेट की मीटिंग की, जिसमें सभी 54 मंत्रियों को बुलाया गया। उसमें राज्य के लिए महत्वपूर्ण प्रस्तावों और योजनाओं को मंजूरी दी।
बैठक के बाद पूरी कैबिनेट ने एक साथ गंगा में डुबकी लगाई और गंगा पूजन किया। बैठक के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा, ”मैं पूरे मंत्रिपरिषद की ओर से महाकुंभ में आए तमाम संतों और श्रद्धालुओं का स्वागत करता हूं।”
पहली बार महाकुंभ में पूरा मंत्रिपरिषद मौजूद है, इसमें प्रदेश के विकास से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई है। देखने पर यह घटना बहुत महत्वपूर्ण नहीं लगती, परन्तु इसमें कुछ गहरे संदेश निहित हैं।
कल्पना करें कि सउदी अरब में; जो कि एक मुस्लिम देश है, वहां के शासक हज़ यात्रा के दौरान अपने कैबिनेट की बैठक मक्का मदीना में करें, परन्तु सउदी अरब और अन्य मुस्लिम धार्मिक देशों तक से ऐसी ख़बर अभी तक नहीं आई, परन्तु भारत जैसे घोषित धर्मनिरपेक्ष देश में एक धर्म-विशेष के पर्व में इस तरह की राजनीतिक बैठक का क्या औचित्य हो सकता है?
महाकुंभ में कैबिनेट मीटिंग को लेकर सपा के महासचिव अखिलेश यादव ने बीजेपी पर तंज किया और उन्होंने कहा,“कुंभ में राजनीति नहीं होनी चाहिए। कुंभ में राजनीतिक कार्यक्रम नहीं होने चाहिए।
कैबिनेट ही राजनीतिक है, कुंभ में मीटिंग रखकर बीजेपी एक सियासी मैसेज देना चाहती है। हमारे समाजवादी पार्टी के लोगों में भी बहुत आस्था है। हमारी पार्टी के लोग डुबकी लगाकर आ गए होंगे, लेकिन तस्वीर नहीं डाली।”
हमारे देश में कुंभ स्नान की परम्परा सैकड़ों साल पुरानी है। यह भी सही है कि बिना सरकारी सहयोग के इस तरह का आयोजन सम्भव नहीं होता। अंग्रेजी शासनकाल में भी अंग्रेज सरकार कुंभ मेले के प्रबंध में सहयोग करती थी, परन्तु इस बार जिस तरह उत्तर प्रदेश में कुंभ मेले के बहाने धर्म, राजनीति और पूंजी का गठजोड़ देखने में आ रहा है वह अपने में अभूतपूर्व है।
वास्तव में सरकार इस मेले के बहाने अपने हिंदुत्व के एजेंडे को ही आगे बढ़ा रही है।
उत्तर प्रदेश सरकार ने इस बार महाकुंभ के आयोजन के लिए पूरी ताक़त और पैसा क़रीब सात हज़ार करोड़ झोंक दिया है। एक ओर स्कूलों और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए सरकार के पास पैसा नहीं है, दूसरी ओर महाकुंभ में इतनी धनराशि खर्च करने से सरकार की प्राथमिकताओं को समझा जा सकता है।
इस बार के 45 दिनों के महाकुंभ में 45 करोड़ लोगों के अर्थात प्रतिदिन एक करोड़ लोगों के आने की बात कही जा रही है। 2013 और 2019 के आंकड़ों के आधार पर ये दावे किए जा रहे हैं।
अब ये आंकड़े भले ही अतिशयोक्तिपूर्ण हों, लेकिन ये भी सच है कि सरकार द्वारा आयोजित-प्रायोजित इन आयोजनों में भाग लेने वालों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। इस बार सरकार द्वारा कुंभ मेले का जबरदस्त प्रचार किया जा रहा है।
बसों-ट्रेनों तक में कुंभ मेले में भाग लेने के लिए पोस्टर लगाए जा रहे हैं। इस महाकुंभ के आयोजन से उत्तर प्रदेश सरकार को 25 से 30 करोड़ की कमाई की उम्मीद है।
उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने पर्यटन मंत्रालय को जहां लग्जरी टेंट ; जिसका किराया 40 हज़ार रुपए प्रति रात तक है बनाने की अनुमति दी है, वहीं निजी पूंजीपतियों ने ऐसे टेंट बनाए, जिनका किराया 1 लाख से भी ज़्यादा है, वहीं उत्तर प्रदेश सरकार ने मेले में लगने वाले स्टालों जैसे चाय-नाश्ते और प्रसाद आदि से भारी रकम वसूल की है, जो कोई कुंभ मेले में रोज़गार के लिए आया है, सरकार उन सभी पर कर लगाकर अपना खजाना भर रही है।
वास्तव में बीजेपी सरकार कुंभ जैसे आयोजन करके अपने को हिन्दुओं का एकमात्र रहनुमा सिद्ध कर रही है, दूसरी ओर वह इस बहाने अपने साम्प्रदायिक एजेंडे को भी आगे बढ़ा रही है।
मुसलमानों को दुकान न लगाने से लेकर उनको ड्राइवर के रूप में न आने तक के फ़रमान संघ भाजपा के संगठनों और अखाड़ों ने सुनाकर यह साबित कर दिया कि बिना मुसलमान से घृणा का माहौल बनाए इनके धार्मिक आयोजन पूरे नहीं हो सकते।
वास्तव में महाकुंभ जैसी पुरानी परम्परा को; जिसमें देश भर से लोग अपनी स्वेच्छा से स्नान करने आते थे, उसे भी संघ परिवार अपने हिन्दुत्व के फासीवादी एजेंडे को पूरा करने का एक उपकरण बना रही है,जो कि एक ख़तरनाक संकेत है।
(स्वदेश कुमार सिन्हा लेखक और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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