2006 के मुंबई लोकल ट्रेन सीरियल ब्लास्ट मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा 12 आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार और महाराष्ट्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल ने मंगलवार को शीर्ष अदालत से इस मामले में तत्काल सुनवाई की मांग की, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लेते हुए गुरुवार को सुनवाई तय की है।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष इस मामले को तत्काल सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का अनुरोध किया। चीफ जस्टिस ने मामले को गुरुवार को सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई।
चीफ जस्टिस बीआर गवई ने कहा कि उन्होंने अखबारों में पढ़ा है कि हाईकोर्ट के फैसले के बाद आठ आरोपियों को जेल से रिहा कर दिया गया। सॉलिसिटर जनरल ने जवाब दिया, “अभी भी कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार किया जाना बाकी है।” बता दें, बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोमवार को स्पेशल मकोका कोर्ट का फैसला रद्द कर दिया, जिसमें 11 जुलाई, 2006 को मुंबई के पश्चिमी रेलवे लोकल लाइन पर बम विस्फोटों की साजिश रचने और उन्हें अंजाम देने के आरोप में 5 आरोपियों को मौत की सज़ा और 7 आरोपियों को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई थी।
17 जुलाई को बॉम्बे हाईकोर्ट की खंडपीठ, न्यायमूर्ति अनिल किलोर और न्यायमूर्ति एस चांडक ने विशेष टाडा अदालत के फैसले को पलटते हुए सभी 12 दोषियों को निर्दोष घोषित कर रिहा करने का आदेश दिया था। हाईकोर्ट के फैसले में कहा गया था कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ ठोस सबूत पेश करने में असफल रहा, इसलिए उन्हें संदेह का लाभ देते हुए बरी किया गया। इस फैसले ने देशभर में न्यायिक व्यवस्था और सुरक्षा एजेंसियों की भूमिका पर बहस छेड़ दी है।
जस्टिस अनिल किलोर और जस्टिस श्याम चांडक की खंडपीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों का अपराध सिद्ध करने में विफल रहा। इस मामले की जांच महाराष्ट्र आतंकवाद निरोधी दस्ते ने की थी। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपियों को ATS अधिकारियों द्वारा प्रताड़ित किया गया था, जो अपराधियों को खोजने के दबाव में थे।
इन 12 में से 5 को ट्रायल कोर्ट ने फांसी और 7 को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। अदालत ने कहा कि प्रस्तुत साक्ष्य पर्याप्त नहीं थे और अभियोजन द्वारा लगाए गए आरोप संदेह से परे सिद्ध नहीं हो सके। बम रखने के जुर्म में जहां दोषियों कमाल अंसारी, मोहम्मद फैसल अताउर रहमान शेख, एहतेशाम कुतुबुद्दीन सिद्दीकी, नवीद हुसैन खान और आसिफ खान को मौत की सजा सुनाई गई, वहीं अन्य दोषियों तनवीर अहमद मोहम्मद इब्राहिम अंसारी, मोहम्मद मजीद मोहम्मद शफी, शेख मोहम्मद अली आलम शेख, मोहम्मद साजिद मरगूब अंसारी, मुजम्मिल अताउर रहमान शेख, सुहैल महमूद शेख और जमीर अहमद लतीउर रहमान शेख को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।
केंद्र सरकार और महाराष्ट्र एटीएस दोनों ने सुप्रीम कोर्ट से हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने की मांग की है। शीर्ष अदालत अब यह तय करेगी कि हाईकोर्ट के आदेश पर अस्थायी रोक लगेगी या नहीं और मामले की आगे की सुनवाई किस दिशा में बढ़ेगी। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की पहली सुनवाई गुरुवार को होगी।
11 जुलाई 2006 को शाम के समय मुंबई की लोकल ट्रेनों में 11 मिनट के भीतर सात जगहों पर बम धमाके हुए थे। इन धमाकों में 189 लोगों की मौत हो गई थी और 827 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। इस आतंकी हमले ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था।
एटीएस ने नवंबर 2006 में चार्जशीट दाखिल की थी, और 2015 में ट्रायल कोर्ट ने 12 लोगों को दोषी करार दिया। दोषियों ने इसके खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की थी, जिस पर 19 साल बाद फैसला आया।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक विशेष मकोका अदालत के फैसले को रद्द कर दिया है, जिसने मुंबई की पश्चिमी रेलवे लोकल लाइन पर बम विस्फोटों की साजिश रचने और उन्हें अंजाम देने के लिए 5 को मौत की सजा और 7 आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। मुंबई में लोकल लाइनों पर 7 बम फटे थे। इन विस्फोटों में कुल 189 नागरिकों की जान चली गई और लगभग 820 निर्दोष गंभीर रूप से घायल हुए, जिन्हें कुख्यात “7/11 मुंबई विस्फोट” के रूप में भी जाना जाता है।
न्यायमूर्ति अनिल किलोर और न्यायमूर्ति श्याम चांडक की एक विशेष पीठ, जिसने छह महीने से अधिक समय तक राज्य और दोषियों की दोषसिद्धि के खिलाफ अपीलों पर सुनवाई की, ने अदालत में अपना फैसला सुनाया। इसने पाया कि अभियोजन पक्ष अपने मामले को उचित संदेह से परे साबित करने में विफल रहा।
2006 के 7/11 ट्रेन विस्फोट मामले में 18 साल से ज़्यादा जेल में बिताने वाले सभी आरोपियों को बरी करते हुए, बॉम्बे हाईकोर्ट ने आतंकवाद निरोधी दस्ते (एटीएस) के मामले में खामियाँ निकालीं और कहा कि वह “हर मामले में आरोपियों के खिलाफ उचित संदेह से परे अपराध साबित करने में पूरी तरह विफल रहा।”
11 जुलाई 2006 को पश्चिमी उपनगरीय रेलवे (मुंबई लोकल) ट्रेन के सात डिब्बों में श्रृंखलाबद्ध बम विस्फोट हुए, जिसमें 189 लोग मारे गए और 824 घायल हुए। इस मामले की जांच राज्य पुलिस के महाराष्ट्र आतंकवाद निरोधक दस्ते (एटीएस) ने की।
2006 के मुंबई ट्रेन विस्फोट मामले में 13 आरोपियों पर मुकदमा चलाया गया था, जिनमें से एक को मकोका के तहत विशेष अदालत ने बरी कर दिया था। इन 12 में से पाँच को मौत की सज़ा और सात को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई थी। एक आरोपी की 2021 में जेल में मृत्यु हो गई।इसके अलावा, एटीएस द्वारा दायर आरोपपत्र में 15 वांछित आरोपियों और दो अन्य मृत आरोपियों, जिनमें दो पाकिस्तानी नागरिक भी शामिल हैं, के नाम शामिल थे।
यह मानते हुए कि यह मामला “दुर्लभतम से भी दुर्लभतम” श्रेणी में आता है, विशेष न्यायाधीश यतिन डी. शिंदे ने कहा कि “आरोपी द्वारा प्रस्तुत की गई कम करने वाली परिस्थितियाँ, उनकी प्रकृति, गंभीर परिस्थितियों को कम करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं” और वे “बेकार” हैं।
(जनचौक की रिपोर्ट)