‘मैं बर्बाद होना चाहती हूँ’ के माध्यम से स्त्री प्रश्न और दलित प्रश्न पर कुछ नोट्स 

“मैं किस लिए इतनी विवश हूँ? उससे पिटकर, प्रताड़ित होकर, उसकी गालियां खाकर भी दुबारा उसी को गले लगाना…..उससे बात करना। शायद सच में उससे प्रेम करती हूँ।” ( ‘मैं बरबाद होना चाहती हूँ’-मलिका अमर शेख) 

क्या यह प्रेम की व्याप्ति इतनी सशक्त होती है कि वह औरतों को निरीह बना कर छोड़ देता है कि वह ताउम्र पिट कर भी उसके सोहबत में रहने को तरसती रहे। या फिर स्वयं औरत ही पितृसत्ता की उसी सशक्त मानसिकता की ग़ुलाम होती है, जिसके तहत मानसिक रूप से स्वतंत्र होने के बावजूद वह पितृ सत्ता के अन्याय झेलती रहती है। उसी पितृ सत्ता के तहत पुरुष हिंसक हो अपनी पत्नी (जो कभी प्रेमिका थी) पर हाथ उठाता है। 

किसी भी किताब को पढ़ते हुए अक्सर हम बिटवीन द लाइन्स भी बहुत कुछ पढ़ते, समझते, गुनते रहते हैं। मलिका अमर शेख की हाल ही में हिंदी में प्रकाशित आत्मकथा ‘मैं बरबाद होना चाहती हूँ’ पर काफ़ी कुछ लिखा गया है। महिला आलोचक उनकी दैनंदिन की पीड़ा से एकात्म होती हैं तो पुरुष आलोचक हतप्रभ हैं। उसकी बेबाकी से जिसने अपने जीवन को उघाड़ कर रख दिया है। जिसकी हिम्मत बहुत कम लोग ही कर पाते हैं। 

कुछ इस बात से अचंभित हैं कि नामदेव ढसाल 70 के दशक के दलित आन्दोलन का शिखर पुरुष! अपनी पत्नी को पीटता था? कुछ विरोधी खेमे के लोग इस तरह से भी देख रहे हैं ‘हुंह ये लोग ऐसे ही होते हैं’…

मैं इस किताब की समीक्षात्मक आलोचना बिलकुल नहीं करने जा रही। मैं इस किताब के माध्यम से स्त्री प्रश्न और दलित आन्दोलन और उसके भीतर पितृसत्ता के सवाल पर जो विचार मेरे दिमाग में उठ रहे हैं उन्हें ही बिन्दुवार रखने की कोशिश करूंगी। ज़ाहिर है उसी में किताब की आलोचना भी शामिल होगी। 

  • पहली बात मैं इस किताब को पढ़कर बिलकुल भी हतप्रभ नहीं हूँ। सालों से महिला आन्दोलन की कार्यकर्ता होने के कारण मैं इन सब बातों से बिलकुल अछूती नहीं हूँ। इससे भी ज़्यादा दुश्वारियां मैंने औरतों के जीवन में क़रीब से देखी है। मलिका की दास्तान उनसे बिलकुल भी अलग नहीं है। फ़रक बस इतना है कि तमाम सारी औरतों ने अपने हालात से लड़ाई लड़ी और बहुत सी उससे निकलने में भी सफ़ल हुईं। 
  • मलिका अमर शेख एक मुस्लिम लोक शाईर अमर शेख और ब्राह्मण माँ (दोनों ही कम्युनिस्ट कार्यकर्ता थे) की छोटी बेटी थीं। घर का माहौल राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से बेहद उन्नत था। घर में राजनीतिक-साहित्यिक चर्चाएं, गीत-नृत्य-संगीत का माहौल। एक बेहद सभ्य पिता और सुसंस्कृत माँ के दुलार में पलने वाली नाज़ुक सी मलिका 19 वर्ष की आयु में उस दौर के दलित सितारे और आग उगलती कवितायें लिखने वाले कवि नामदेव ढसाल से प्रेम कर बैठीं। अपनी बहन और माँ के विरोध के बावजूद अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ कर उसने कवि नामदेव ढसाल से शादी कर ली। 
  • नामदेव ढसाल, 70 के दशक के दलित पैंथर आन्दोलन का शिखर नायक! वह मराठी के एक क्रांतिकारी कवि, लेखक और सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता थे। वे भारतीय साहित्य में दलित चेतना की सबसे तीखी और प्रभावशाली आवाज़ों में से एक माने जाते हैं। उनकी कवितायें प्रतिरोध का जीवंत दस्तावेज थीं। उनका जन्म महाराष्ट्र के पुणे ज़िले के पास एक दलित परिवार में हुआ था। बचपन का बड़ा हिस्सा उन्होंने मुंबई के कामाठीपुरा इलाके में बिताया, जो उस समय वेश्यावृत्ति और हाशिये के जीवन के लिए प्रसिद्ध था। इसी माहौल ने उनकी संवेदना और लेखन को गहराई से प्रभावित किया। उनकी कविताओं में शहर की गरीबी, हिंसा, यौन शोषण, जातिगत अपमान और विद्रोह का बहुत तीखा चित्रण मिलता है। इस पृष्ठभूमि ने नामदेव के व्यक्तिगत और राजनीतिक व्यक्तित्व को गढ़ा था।
  • नामदेव ढसाल ने जे वी पंवार के साथ मिलकर 1972 में दलित पैंथर की नींव रखी। यह संगठन मुख्यतः दलित युवाओं का एक उग्र और प्रतिरोधी आंदोलन था, जो दलितों पर बढ़ती हिंसा, सामाजिक भेदभाव और राजनीतिक उपेक्षा के खिलाफ खड़ा हुआ। हम दलित पैंथर संगठन का घोषणापत्र पढ़ें तो पाएंगे कि यह बेहद क्रान्तिकारी विचारधारा से ओतप्रोत था। इसमें दलित की बहुत व्यापक व्याख्या की गई। समस्त शोषित उत्पीड़ित लोगों को शामिल किया गया। उत्पीड़ित दलित महिलाओं को भी जगह दी गई। इसने दलित महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों का भी मुखर विरोध किया। इसने समाज में सुधारवादी नहीं बल्कि क्रांतिकारी बदलाव की बात कही। इसने कृषि में भूमि सुधार को लागू करने जैसी क्रांतिकारी वकालत की। 
  • लेकिन हक़ीक़त यह है कि अपने तमाम क्रांतिकारी विचारों के बावजूद पितृसत्ता के ख़िलाफ़ इसकी समझ साफ़ नहीं थी। बल्कि कहें तो तमाम दलित आन्दोलन में पितृसत्ता के ख़िलाफ़ लड़ाई को कोई ख़ास महत्व नहीं दिया गया। उनको लगता था कि पितृसत्ता के ख़िलाफ़ लड़ाई को तवज्जो देने से दलित आन्दोलन कमज़ोर होगा। हालाँकि अब आन्दोलन जिस दौर में पहुँच गया है उसमें महिला सवाल को नज़रंदाज़ करना नामुमकिन है। ऐसे में दलित आन्दोलन में दलित नारीवाद का विमर्श भी शामिल है। 
  • जिस वक्त उनका राजनीतिक सितारा बुलंदी पर था, उसी वक्त मल्लिका से उन्होंने विवाह कर लिया। जबकि सच ये था कि उनके पास वैवाहिक जीवन के लिए जो अनिवार्य अनुशासन चाहिए, वह नहीं था। वस्तुतः नामदेव ढसाल बेहद अराजक, शराबी, वेश्यागामी और व्यसनी व्यक्ति थे। बेशक अपनी राजनीति को वह अपने जीवन का सर्वोपरि लक्ष्य समझते थे। ऐसे में, उन्होंने नई-नई शादीशुदा प्रेमिका जो अब पत्नी बन गई थी, उसकी उन्होंने पर्याप्त उपेक्षा की। ज़ाहिर है प्रेमिका और पत्नी में बहुत फ़रक होता है। नामदेव ने अपनी पत्नी के साथ अक्षम्य व्यवहार किया। एक दो बार नहीं बल्कि अनेकों बार उन्होंने अपनी पत्नी पर हाथ उठाया। यह उनके जीवन की रोज़मर्रा की बात बन गई थी। वह भी तब जब मलिका ने कभी उनकी राजनीति का विरोध नहीं किया। बल्कि समय-समय पर अपने गहनों को बेच कर उसकी मदद ही की। 
  • लेकिन मलिका की आत्मकथा को पढ़ने से यह साफ़ ज़ाहिर होता है कि दोनों के सोचने के तरीके में बहुत फ़र्क था। यह अंतराल लगातार बढ़ता ही गया। जिससे उनका जीवन एकदम विषाक्त हो गया। 
  • जाने अनजाने मलिका एक मध्यवर्गीय जीवन जीने की अभिलाषी थी। जबकि नामदेव दिन रात अपनी राजनीति में ही आकंठ डूबा हुआ था। लम्पट सर्वहारा दोस्तों की अपनी फ़ौज को वह क्रान्तिकारी ताकत समझता था। दिन रात वह अपने मित्र और राजनीतिक कार्यकर्ताओं से घिरा रहता था। इसके कारण वह मलिका और अपने बेटे की ओर भी ध्यान नहीं देता था। 
  • मेरा मानना है कि उपेक्षा औरतों के जीवन की एक बड़ी त्रासदी है जिसे पितृसत्ता ने हर युग में पोषित किया है। मलिका भी इसका गहराई से शिकार थी। उसपर नामदेव की शराब और नशे की लत और अन्य व्यभिचारों ने उसके समूचे जीवन को तरह-तरह के विरोधाभासों से भर दिया। एक तरफ़ उनका आग उगलता साहित्य, और उनकी प्रतिरोधी राजनीति, और दूसरी ओर उनका भ्रष्ट व्यक्तिगत जीवन। उनके व्यक्तिगत जीवन का पतन उनके सिद्धांतों से बिलकुल अलग था।  
  • कोई लेखक राजनीतिक रूप से प्रगतिशील हो सकता है, लेकिन निजी जीवन में वही आदर्श पूरी तरह नहीं जी पाता। ढसाल भी इसी तरह की ऐतिहासिक परिघटना का उदाहरण हैं। उनकी कविता जाति-व्यवस्था, सत्ता और सामाजिक अन्याय के खिलाफ तीखा प्रतिरोध करती है, लेकिन निजी जीवन में उनके संबंधों में तनाव, हिंसा और अस्थिरता की बातें सामने आती हैं। किसी लेखक को केवल उसके सार्वजनिक विचारों से नहीं, बल्कि उसके पूरे जीवन की जटिलता के साथ पढ़ना चाहिए। लेकिन इस द्वन्द में किसी को देखने का आग्रह करने का यह मतलब नहीं कि इससे नामदेव ढसाल के व्यक्तिगत जीवन में किये गए अपराध क्षम्य हो जाते हैं। उनका पुरज़ोर विरोध होना ही चाहिए। किसी लेखक की महानता उसके निजी व्यवहार को नैतिक छूट नहीं देती। अगर किसी संबंध में हिंसा या दमन है तो उसे आलोचनात्मक रूप से देखना जरूरी है।
  • मलिका ने अपनी आत्मकथा में बेबाकी से अपने व्यक्तिगत जीवन को उधेड़ कर रख दिया। संभवतः, एक तरह से यह नामदेव से बदला लेने का उनका अपना तरीका था। और वह उसमें सफल भी हुई। 1984 में जब मलिका की आत्मकथा मराठी में छपी तो नामदेव काफ़ी आहत हुए। उन्होंने इसे एक व्यक्तिगत हमला माना। खुद दलित आन्दोलन के लोगों ने कहा कि इससे दलित आन्दोलन की बदनामी हुई। 
  • यह सही है कि न सिर्फ दलित आन्दोलन बल्कि वाम आंदोलन के विभिन्न हलकों में भी जब भी कोई महिला मुद्दा उठ खड़ा होता है तो आन्दोलन की साख का हवाला दे कर उसे चुप करा दिया जाता है। 
  • मेरा अपना मानना यह है कि अगर कोई भी आन्दोलन महिला सवाल पर शार्प समझ नहीं रखता और पितृसत्ता के ख़िलाफ़ लड़ाई को क्रांति की एजेंडे में शामिल नहीं करता तो वह सम्पूर्णता में अपना लक्ष्य कभी हासिल नहीं कर सकता। देर सवेर उसके भटकने की पूरी सम्भावना रहती है। दलित पैंथर आन्दोलन के नामदेव ढसाल वाला धड़ा इसका जीता जागता उदाहरण है। इसने आगे चलकर न केवल इमरजेंसी का समर्थन किया बल्कि वह शिवसेना की गोद में जाकर बैठ गया और अपने उद्देश्यों से भटक गया। उसकी सारी क्रांतिकारिता महज उसके घोषणापत्र में ही रह गई। 1974 तक आते-आते यह आन्दोलन बिखर गया और अपने उद्देश्यों से भटक गया।
  • मलिका की राजनीतिक समझ ठीक ठाक थी, ऐसा उन्होंने अपनी आत्मकथा में भी लिखा है। मलिका ने नामदेव ढसाल के इन दोनों क़दमों का विरोध किया। वह एक जगह लिखती हैं – “मैंने दलित आन्दोलन को ऊँचाइयों पर जाते हुए देखा। फिर उसका पतन होते, उसे बिकते देखा। मैंने इन सब में रुचि ली, बावजूद इसके मैं उदासीन भी रही।” वह आगे लिखती हैं – “नामदेव का बिक जाना और उसकी सियासत भले ही मुझे स्वीकार नहीं थी और मैंने उसके विचारों से हमेशा दूरी बनाये रखी”। लेकिन मलिका को यह बात हमेशा सालती थी कि दुनिया उन्हें नामदेव की पत्नी के रूप में ही देखती है। विडम्बना यह है कि 2014 में नामदेव की मौत के बाद खुद मलिका शेख को दलित पैंथर का अध्यक्ष बनाया गया। वह पत्नी की भूमिका से बाहर निकली और राजनीतिक नेतृत्व की कमान संभाली। उन्होंने महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय में भी भूमिका निभाई। 
  • खुद मलिका ने नामदेव की साहित्यिक और राजनीतिक विरासत को संभाला और आगे बढ़ाया। 2014 में ही मौत के बाद नामदेव ढसाल को साहित्य अकादमी अवार्ड दिया गया। 
  • अब लाख टके का सवाल यह है कि इतनी विचार संपन्न मलिका अपने पति की मार कैसे खा लेती थी? उसे पहली ही बार उसका जम कर प्रतिरोध करना चाहिए था। पहले थप्पड़ पर प्रतिकार करने से दूसरी बार हाथ उठाने की नौबत नहीं आती। आखिर इतनी जागरूक महिला इतने दिनों तक मार कैसे खा सकती है? दूसरी तरफ इतने दिनों तक इतनी तबाही का सामना करने के बाद भी वह शुरू से ही आत्मनिर्भर क्यों नहीं बनी। उसने नौकरी की लेकिन बहुत बाद में। कोई जागरूक महिला इतना समझौता कैसे कर सकती है। वैसे भी राजनीतिक रूप से संपन्न एक स्वतंत्र महिला का ‘विक्टिम कार्ड’ खेलना बिलकुल भी स्वीकार्य बात नहीं है। क्यों मलिका आखिर इतने दिनों तक मार खाती रही। क्या यह केवल प्रेम था?
  • यह प्रेम हो ही नहीं सकता। जैसा कि मलिका लिखती हैं। आत्मसम्मान का सौदा करके एकतरफ़ा समझौता करना प्रेम कतई नहीं हो सकता। यह विशुद्ध समझौता परस्ती है। बेशक किसी भी आम महिला के लिए इन स्थितियों का सामना करना बहुत मुश्किल होता है, और उससे निकलना भी बहुत कठिन होता है। लेकिन एक जागरूक चेतना संपन्न महिला का उसे प्रेम का नाम देना अपनी कमज़ोरियों पर पर्दा डालने जैसा है। पितृसत्ता जो औरतों के प्रति एक क्रूर अन्यायी व्यवस्था है, उससे लड़ना भी उतने ही क्रूर तरीके से पड़ता है। उससे न्याय की उम्मीद करना बेमानी है। 
  • मलिका इस किताब में अपने ऊपर गुजरी पितृसत्ता की मार को बहुत विस्तृत रूप से रखा। लेकिन उससे उन्होंने कैसे लड़ाई की और उसकी परिणति क्या हुई यह भी इस किताब से नहीं पता चलता। हालाँकि, महज 28 साल की उम्र में उन्होंने अपनी यह आपबीती मराठी में (1984 में) दुनिया के सामने रखी। यह किताब बात करते-करते अचानक ख़त्म हो जाती है। पाठक यह सोचता ही रह जाता है कि उसने अपनी यह लड़ाई कैसे लड़ी। हिंदी में यह किताब अभी 2026 में आई है। हिंदी पट्टी में आम औरतें अभी भी क्रूर पितृसत्ता का चौतरफ़ा शिकार हैं। 
  • इन तमाम बातों में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि यह एक ज़रूरी किताब है और इसे सभी को पढ़ना चाहिए। जिससे पितृसत्ता की चालों को समझने में मदद मिलेगी और यह भी कि प्रगतिशीलता की आड़ में अपनी कुंठा औरत पर निकालने का पुरज़ोर विरोध किया जाना चाहिए। 
  • चलते-चलते यह भी कह दूं कि सुनीता डागा का अनुवाद बेहद सहज और प्रवाहपूर्ण है। राधाकृष्ण ने एक अच्छे गेटअप में इसे 299/ में प्रकाशित किया है। 
  • इसे ज़रूर पढ़ें…

(अमिता शीरीं लेखिका और महिला एक्टिविस्ट हैं।)

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