फ्रांसेस स्टोनर सॉन्डर्स के बहाने ‘कल्चरल नाटो’ की पड़ताल 

पिछले माह 31 अगस्त को ब्रिटिश लेखिका फ्रांसेस स्टोनर सॉन्डर्स [Frances Stonor Saunders] की ब्रेन ट्यूमर से मौत हो गयी। वे महज 60 वर्ष की थी। 1999 में आई उनकी किताब ‘हू पेड द पाइपर: द सीआईए एंड द कल्चरल कोल्ड वार’ [Who Paid the Piper: The CIA and the Cultural Cold War] ने उस वक़्त अकादमिक/कला जगत में तहलका मचा दिया था। तुरंत ही इसका करीब 17 भाषाओं में अनुवाद हो गया।

इस किताब में फ्रांसेस स्टोनर ने स्थापित किया था कि शीत युद्ध के दौरान साम्राज्यवाद-विरोधी व समाजवादी कला/साहित्य/विचारों के बढ़ते प्रभाव को रोकने और उसका मुकाबला करने के लिए सीआईए ने गुप्त रूप से किस तरह अनेकों फ्रंट बनाकर कला/साहित्य/संस्कृति को प्रोपेगंडा की तरह इस्तेमाल किया। मशहूर राजनीतिक विश्लेषक जेम्स पेत्रास ने मंथली रिव्यू में इस किताब की शानदार समीक्षा करते हुए लिखा था- ‘’सीआईए और उससे जुड़े सांस्कृतिक संगठनों ने द्वितीय विश्व-युद्ध के बाद कला के प्रति लोगों की सोच को गहराई से प्रभावित करने में काफी हद तक सफलता पाई। कई प्रतिष्ठित लेखक, कवि, कलाकार और संगीतकारों ने राजनीति से अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की और “कला कला के लिए” के विचार में अपना विश्वास जताया…… और इस विचार का इस्तेमाल यूरोप में राजनीति से जुड़े और राजनीतिक विचारों के प्रति प्रतिबद्ध लेखकों-कलाकारों पर हमला करने के लिए किया गया।‘’ 

फ्रांसेस स्टोनर ने इसका एक ठोस उदाहरण देते हुए इसी किताब में बताया कि किस तरह से सीआईए ने ‘म्यूज़ियम ऑफ़ मॉडर्न आर्ट’, राकफेलर, कार्नेगी व अन्य संस्थाओं की मदद से समाजवादी यथार्थवाद/आलोचनात्मक यथार्थवाद के मुकाबले अमूर्त अभिव्यक्तिवादी (Abstract Expressionist) चित्रकला और चित्रकारों को बढ़ावा देने में अपनी विशाल धनराशि झोंक दी थी। इस धारा के प्रमुख कलाकार जैक्सन पोलॉक (Jackson Pollock) तो सीधे तौर पर सीआईए से जुड़े हुए थे। 

दरअसल यह किताब लिखने से पहले 1995 में फ्रांसेस स्टोनर ने चैनल 4 के लिए एक मशहूर दस्तावेजी फिल्म Hidden Hands: A Different History of Modernism बनाई थी [इसे आप आज भी यूट्यूब पर देख सकते हैं] 4 भागों की इस सीरीज का पहला हिस्सा ‘आर्ट एंड द सीआईए’ पर था। वास्तव में इसी को उन्होंने 4 साल बाद अपनी किताब में विस्तार दिया। और ‘इन्वेस्टिगेटिव हिस्ट्री’ [Investigative history] के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की। इसी डॉक्यूमेंट्री में आप मशहूर अमूर्त अभिव्यक्तिवादी (Abstract Expressionist) जैक्सन पोलॉक को जमीन पर बिछे कैनवास पर बेतरतीब ढंग से केन से रंग छिड़कते देख सकते हैं। जिसे बाद में मशहूर कला बीथिकाओं [Art Gallery] में प्रदर्शित करके, इसकी प्रशंसा में समीक्षाए लिखवा कर, इस कला-क्षेत्र में तमाम अनुदान [Grant] देकर यथार्थवादी/समाजवादी शैली के बरक्स इसे कला जगत में मजबूती से स्थापित किया गया। 

कला के क्षेत्र में इस प्रोपेगंडा को जिस कौशल के साथ सीआईए ने अंजाम दिया उस पर टिप्पणी करते हुए लेखिका अपनी उसी किताब में लिखती हैं- ‘’शीतयुद्ध जब चरम पर था, उस दौरान, अमेरिकी सरकार ने सीआईए के माध्यम से पश्चिमी यूरोप में सांस्कृतिक प्रचार के इस गुप्त कार्यक्रम पर विशाल धनराशि खर्च की। इस कार्यक्रम की एक केंद्रीय विशेषता यह दावा करना था कि ऐसा कोई कार्यक्रम अस्तित्व में ही नहीं है।“ 

फ्रांसेस स्टोनर बताती हैं कि कला/साहित्य में समाजवादी/यथार्थवादी अंतर्वस्तु तथा कलाकारों की राजनीतिक प्रतिबद्धता को बदनाम करने के लिए सीआईए ने भारत समेत 35 देशों में ‘कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम’ [Congress for Cultural Freedom] की स्थापना की थी और इसके साथ प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से जोर्ज ओरवेल, डैनिएल बेल, हाना अरेंट, मेलविन लास्की, सिडनी हुक और बर्ट्रेंड रसेल जैसे दिग्गजों को जोड़ने में सफलता पाई। फ्रांसेस स्टोनर ने इस संस्था यानि ‘कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम’ को उचित ही ‘कल्चरल नाटो’ [cultural NATO] की संज्ञा दी थी। उनकी इस किताब में एक चैप्टर का नाम ही ‘कल्चरल नाटो’ है। और इसी ‘कल्चरल नाटो’ ने ‘एनकाउंटर’ [Encounter], और भारत से निकलने वाली क्वेस्ट [Quest] जैसी तमाम पत्रिकाओं, किताबों, सेमिनारों, कला-प्रदर्शनियों, पुरस्कारों, कंसर्ट्स, और तमाम तरह के अनुदानों का इस्तेमाल ‘सांस्कृतिक मिसाइल’ के रूप में करते हुए साम्राज्यवाद विरोधी, समाजवादी और प्रतिबद्ध कला पर अंधाधुंध हमला करने के लिए किया गया। और सबसे दिलचस्प व आश्चर्यजनक बात यह थी कि कला/साहित्य जगत के आम लोगों को लग रहा था कि यह सब स्वतःस्फूर्त और स्वतंत्र इच्छा [free will] के तहत हो रहा है। 

पूरी दुनिया में इसका असर पड़ रहा था। भारत भी इससे अछूता नहीं था। बल्कि भारत तो इसमें हिस्सेदार ही था। 

‘कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम’ की स्थापना 1950 में बर्लिन में हुई और ठीक 1 साल बाद जयप्रकाश नारायण और मीनू मसानी के नेतृत्व में इसका एक सम्मेलन आज के मुंबई में हुआ। इस आयोजन में हिंदी के मशहूर साहित्यकार अज्ञेय ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। ‘परिमल’ नामक लेखक संगठन में भी अज्ञेय की भूमिका लगभग एक संरक्षक जैसी थी। ‘परिमल’ को ‘प्रगतिशील लेखक संगठन’ के सामानांतर इस विचार पर खड़ा किया गया था कि रचना को विचारधारा के बंधन से मुक्त होना चाहिए या उन्हीं के शब्दों में कहें तो रचना को विचारधारा की सूली पर नहीं चढ़ाया जाना चाहिए। यह विचार पूरी तरह से ‘कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम’ के घोषणापत्र से मेल खाता है। 

‘कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम’ के जरिये सीआईए ने किस तरह हिंदी साहित्य को प्रभावित किया, इसे ठोस तरीके से बताने के लिए तो फिलहाल हिंदी में किसी ‘फ्रांसेस स्टोनर सॉन्डर्स का इंतजार है। लेकिन गाहे-बगाहे हमें इसकी झलक जरूर मिल जाती है, जिससे यह तो कहा ही जा सकता है कि हिंदी साहित्यकारों के एक बड़े हिस्से पर इस ‘कल्चरल नाटो’ का प्रभाव बहुत गहरा था/है। ऐसी ही एक झलक तब देखने को मिली जब हिन्दी के वरिष्ठ कवि कमलेश ने ‘समास’ पत्रिका को दिये अपने साक्षात्कार में कहा कि मानवता को सीआईए का ऋणी होना चाहिए। कमलेश का बचाव करते हुए ओम थानवी ने इसे भी साफ कर दिया कि मानवता को सीआईए का ऋणी क्यों होना चाहिए। उनका तर्क था कि सीआईए ने बहुत सस्ते में मानवता को किताबें मुहैया करायी हैं। लेकिन वे सस्ती किताबें कौन सी हैं, इसके बारे में थानवी जी ने कुछ नहीं बताया।

सीआईए के पैसे से यानी ‘कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम’ के पैसे से छपी एक किताब का नाम है- ‘क्लासलेस कैपिटलिज्म’। यह किताब 60 के दशक में कभी छपी थी और उस वक्त इसका मूल्य महज 25 पैसे था। इसमें बताया गया था कि वर्गविहीन समाज बनाने के लिए किसी समाजवाद की ज़रूरत नहीं है। कठिन मेहनत से पूंजीवाद में ही अपना वर्ग बदला जा सकता है। इसके समर्थन में कुछ उदाहरण दिये गये थे कि कैसे अपनी कठिन मेहनत से फलां फलां व्यक्ति गरीब वर्ग से अमीर वर्ग में चला गया और कैसे फलां फलां व्यक्ति अपनी काहिली से अमीर वर्ग से गरीब वर्ग में आ गया। इसका सन्देश साफ था कि पूंजीवाद कोई कठोर व्यवस्था नहीं है। यह बहुत ही लचीली व्यवस्था है, जिसमें सभी के आगे बढ़ने की पर्याप्त गुंजाइश है। हालाँकि सीआईए की सस्ती किताबों वाले तर्क पर सबसे सटीक टिप्पणी इब्ने इंसा की है- ‘अफीम सस्ता है तो क्या चाट कर पड़े रहें? जहर सस्ता है तो क्या खा कर ख़ुदकुशी कर लें?’

बहरहाल 2013 में हुई इस दिलचस्प बहस को आप आज भी उस वक़्त की चर्चित वेबसाइट ‘जनपक्ष’ पर जाकर पढ़ सकते हैं। 

जब अमेरिका की नारीवादी ‘ग्लोरिया स्टाइनम’ (Gloria Steinem) की इसी माह 2 सितम्बर को हुई मृत्यु के बाद उनके सीआईए के साथ सक्रिय रूप से जुड़े रहने की खबर, उन पर लिखे गए तमाम लेखों में आयी, तब भी ज्यादातर हिंदी साहित्यकारों/ बुद्धिजीवियों का रुझान इस तथ्य को नज़रअंदाज करने का ही था। 

कहने का मतलब यह है कि ‘कल्चरल नाटो’ की सांस्कृतिक मिसाइलें भारत पर भी गिरी हैं, लेकिन ‘बर्बादी’ का ठोस आकलन अभी तक नहीं हो पाया है। 

फ्रांसेस स्टोनर पिछले काफी समय से बीमार चल रही थीं, इसलिए शायद उन्हें यह खबर नहीं मिल पाई होगी कि इसी साल की शुरुआत में उन्हीं की किताब से प्रभावित होकर और वही नाम उधार लेकर एक और महत्वपूर्ण किताब ‘मंथली रिव्यू’ से छपकर आई- ‘‘हू पेड द पाइपर ऑफ़ वेस्टर्न मार्क्सिज्म’ [Who Paid the Pipers of Western Marxism?]  इसके लेखक ‘गैब्रिएल रॉकहिल’ [Gabriel Rockhill] ने फ्रांसेस स्टोनर को पूरा श्रेय देते हुए लिखा- ‘’मेरी किताब ‘हू पेड द पाइपर्स ऑफ़ वेस्टर्न मार्क्सिज़्म?’  फ्रांसेस स्टोनर सॉन्डर्स की अभूतपूर्व कृति ‘हू पेड द पाइपर? द सीआईए एंड द कल्चरल कोल्ड वॉर’ की एक प्रतिध्वनि है।” 

फ्रांसेस स्टोनर ने जहाँ सीआईए और कला/साहित्य जगत के नापाक रिश्तों की पड़ताल की है, वहीँ गैब्रिएल रॉकहिल ने सीआईए और वेस्टर्न मार्क्सिज़्म के बीच के संबंधों की गहन पड़ताल करते हुए यह स्थापित किया है कि अकादमिक जगत में सीआईए की मदद से जिस वेस्टर्न मार्क्सिज़्म/पोस्ट मॉडर्निज़्म को स्थापित किया गया, उसका असल मकसद दरअसल क्रांतिकारी और साम्राज्यवाद-विरोधी मार्क्सवाद को हाशिये पर धकेलना और क्रांति के कार्यभार को हमेशा के लिए ठन्डे बस्ते में डालना था। वेस्टर्न मार्क्सिस्ट स्लावोज जिजेक [Slavoj Žižek]  ने तो मार्क्स के नारे को उलटते हुए यह नारा दे दिया- ‘’दुनिया को बदलने का काम बहुत हुआ, असल सवाल उसे समझने का है।’’

फ्रांसेस स्टोनर की ही तर्ज पर गैब्रिएल रॉकहिल ने भी अपनी इस किताब में सीआईए के डीक्लासीफाई [declassify] हुए दस्तावेजों व अन्य स्रोतों की गहन पड़ताल करते हुए देरिदा, एडोर्नो, होर्खाइमर, मार्क्युज़, हैबरमास आदि की सीआईए के ‘इम्पीरियल थ्योरी इंडस्ट्री’ [Imperial Theory Industry] के साथ प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रिश्तों की पड़ताल करते हुए उस कोहासे को हटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिस कोहासे के कारण अकादमिक जगत में ‘वर्ग-संघर्ष’ या ‘वर्ग-विश्लेषण’ जैसे शब्द लगभग गायब हो गए हैं। 

एक समय बच्चे ने राजा को नंगा देख लिया था। लेकिन उसके बाद राजा संभल गया था। आज वह ‘खूबसूरत कपड़ों’ के भीतर लगभग छिप सा गया है। लेकिन उपरोक्त दोनों किताबें इन ‘खूबसूरत कपड़ों’ को तार तार करके राजा को एक बार फिर हमारे सामने नंगा कर देती हैं। हालाँकि यह और बात है कि हमारे पास उस बच्चे की तरह राजा को नंगा कहने का साहस है या नहीं।

(मनीष आज़ाद लेखक और एक्टिविस्ट हैं।)

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