गुजरात में समय से पहले चुनाव की आहट!

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महेंद्र मिश्र

गुजरात में समय से पहले चुनावों की आहट दिख रही है। सत्तारूढ़ बीजेपी की कई गतिविधियां इसी तरफ इशारा करती हैं। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का 29 मार्च को गुजरात में प्रवेश पर बड़े स्तर पर स्वागत का फैसला हो या फिर बैठक में प्रधानमंत्री का गुजरात के सांसदों से चुनाव के लिए तैयार रहने की अपील। साथ ही पीएम का सांसदों को अपने-अपने क्षेत्रों में जाकर अपने और सरकार के कामकाज के प्रचार का निर्देश। ये सारी चीजें समय से पहले चुनाव की तरफ ही इशारा करती हैं। इसके अलावा सामान्य प्रशासन का सरकारी अमले को चुनाव से जुड़ी तैयारियों के निर्देश को इसी कड़ी का हिस्सा माना जा रहा है। इतना ही नहीं कांग्रेस नेताओं का चुनाव के लिए तैयार रहने का बयान हो या फिर संभावित प्रत्याशियों की सूची को आखिरी रूप देने की कवायद को सबकुछ इसी नजरिये से देखा-समझा जा रहा है।

दरअसल बीजेपी इस गुणा-गणित में लगी है कि दिसंबर17 में चुनाव होने पर क्या नुकसान हो सकता है और क्या-क्या फायदा? उससे पहले होने पर चुनाव की तस्वीर क्या होगी? इस मामले में दोनों के अगर अपने-अपने फायदे हैं तो नुकसान की आशंका भी कम नहीं है। मसलन पाटीदार आंदोलन की गर्मी अभी शांत नहीं हुई है। साथ ही सरकार की तरफ से ऐसी कोई पहल नहीं हुयी जो उनके गुस्से पर पानी डाल सके। यहां तक कि आजकल उनके नेताओं की सभाओं की इजाजत न देकर सरकार ने इस गुस्से को और भड़का दिया है। हालांकि केंद्र सरकार ने पिछड़ा आयोग रद्द कर नये आयोग के गठन का फैसला किया है। सरकार की इस पहल को इन्हीं आंदोलनों के मद्देनजर बताया जा रहा है। सरकार का कहना है कि नये गठित आयोग को संवैधानिक दर्जा हासिल होगा जो पिछले आयोग के पास नहीं था। ऐसा माना जा रहा है कि सरकार ने ये फैसला आरक्षण के लिए चलने वाले मराठों, जाटों और पाटीदारों के आंदोलन को ध्यान में रखते हुए लिया है। जिसमें सरकार ये कह सकती है कि पिछड़ा वर्ग आयोग की संस्तुति पर इन वर्गों के बारे में फैसला लिया जाएगा। बाद में जरूरत पड़ने पर उसकी संस्तुतियों पर संसद की मुहर भी लगवायी जा सकती है। फिर मामला अगर कोर्ट में फंसता है तो सरकार के पास कहने के लिए होगा कि उसने अपने पक्ष पर कोई कसर बाकी नहीं रखी लेकिन अब अगर संविधान और कोर्ट ही उसके रास्ते में आ जा रहे हैं तो वो क्या कर सकती है। इस तरह से बीजेपी द्वारा देश के इन नाराज तबकों के गुस्से को ठंडा करने की कोशिश की जा सकती है। बहरहाल अभी तत्काल सब कुछ करने के बावजूद कम से कम गुजरात में पाटीदारों की नाराजगी तो दूर होती नहीं दिख रही है। उनमें अब आरक्षण की सुविधा से ज्यादा आंदोलनकारियों का बर्बर उत्पीड़न एजेंडा बन गया है। तकरीबन 12 युवाओं की पुलिस की गोलियों से हत्या एक बड़ा मुद्दा है। जिसके कम से कम इस चुनाव तक तो भूले जाने की उम्मीद कम ही है। लिहाजा इस मामले में सूबे की सरकार और अमित शाह चाहकर भी बहुत ज्यादा कुछ फेर-बदल करने की स्थिति में नहीं हैं।

दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी के गुजरात में चुनाव लड़ने के फैसले ने बीजेपी को अपनी रणनीति पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है। हालांकि पार्टी का काम-काज अभी शुरुआती दौर में है। और ढांचा भी पूरा मजबूत नहीं हुआ है। बावजूद इसके अगर उसे दिसंबर तक की तैयारी का समय मिल जाता है तो संगठन से लेकर आंदोलन के मोर्चे पर पार्टी न केवल मजबूत उपस्थिति दर्ज कराएगी बल्कि सूबे के चुनाव को त्रिकोणीय आकार देने में भी कामयाब हो सकती है। आमतौर पर देखने में किसी को लग सकता है कि इससे बीजेपी विरोधी खेमे को नुकसान होगा। लेकिन सच ये है कि बीजेपी के खिलाफ अगर आंदोलन शुरू हो गया तो फिर सरकार विरोधी रूझान एक व्यापक स्वरूप ग्रहण कर सकता है। आखिरी तौर पर जिसका खामियाजा बीजेपी को भुगतना पड़ेगा। आम आदमी पार्टी न केवल खुद सड़क पर उतर रही है बल्कि इस कड़ी में वो कांग्रेस को भी आंदोलन करने के लिए मजबूर कर दे रही है। बीजेपी के खिलाफ पहले से ही कई तबके गोलबंद हैं ऊपर से राजनीतिक दलों का अभियान उसे हाशिये पर जाने के लिए मजबूर कर सकता है। पंजाब जैसी एक दूसरी तस्वीर यहां बनने की पूरी गुंजाइश है।

ऐसा नहीं है कि जल्द चुनाव में जाने पर बीजेपी को फायदा ही फायदा है। ये बात सही है कि उसके पास पैसे की कोई दिक्कत नहीं है। तुलनात्मक रूप से मानव संसाधन की भी कमी नहीं है। साथ ही दूसरे सूबों और खासकर यूपी में उसकी जीत ने पार्टी के मनोबल को बढ़ाने का ही काम किया है। बावजूद इसके कई ऐसे कारक भी हैं जो उसके लिए घाटे का सौदा साबित हो सकते हैं। मसलन गर्मी में चुनाव होने पर सबसे बड़ा संकट पानी का होगा। आमतौर पर पूरे गुजरात में ये संकट होता है लेकिन गर्मी के दौरान सौराष्ट्र और कच्छ वाले इलाके में पानी को लेकर हाहाकार मच जाता है। पटेलों के नाराज होने के बाद पार्टी की पूरी उम्मीद इन्हीं इलाकों पर टिकी है। दरअसल ये पिछड़े तबकों की बहुलता वाले इलाके हैं। पार्टी अबकी बार उन पर ही भरोसा करके चल रही है। ऐसे में अगर पानी के संकट या फिर किन्हीं दूसरी वजहों से ये हिस्सा नाराज हो गया तो फिर बीजेपी को लेने के देने पड़ सकते हैं। ऐसे में ये बात भी सही है कि किस समय चुनाव कराने पर सबसे ज्यादा फायदा होगा इसको लेकर पार्टी अभी किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पा रही है। यही वजह है कि कोई भी नेता डंके की चोट पर कुछ भी कहने के लिए तैयार नहीं है।

इसके अलावा सूबे में 22 सालों का सत्ता विरोधी रुझान है। जिसका पूरा खामियाजा सरकार को भुगतना पड़ सकता है। हाल के विधानसभा चुनावों में सत्ता विरोधी रुझान प्रमुख कारक था। विपक्ष में होने के नाते इस मामले में बीजेपी सबसे ज्यादा फायदे में रही। लेकिन अगर सत्ता विरोधी वही रुझान गुजरात में भी बरकरार रहा तो उसका सबसे ज्यादा घाटा भी बीजेपी को ही उठाना पड़ेगा।

31 मार्च को गुजरात असेंबली का बजट सत्र समाप्त हो रहा है। ऐसा माना जा रहा है कि तब तक तस्वीर काफी कुछ साफ हो जाएगी। साथ ही राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के चारों तरफ से फुरसत पाने के बाद अहमदाबाद पहुंचने पर सत्ता पक्ष के लिए फैसला लेना भी आसान हो जाएगा।

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