अब वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत टंडन से दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने की 10 घंटे से अधिक पूछताछ

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नई दिल्ली। प्रोफेसर अपूर्वानंद के बाद अब दिल्ली पुलिस ने वरिष्ठ पत्रकार और कई चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके प्रशांत टंडन से पूछताछ की है। कल यानि 10 अगस्त को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल टंडन को तकरीबन दस घंटे लोधी रोड में बैठाकर उनसे पूछताछ करती रही।

बताया जा रहा है कि इस दौरान उनसे तमाम तरह के सवाल किए गए। इनमें ज्यादातर सवाल ऐसे थे जो दिल्ली दंगों या फिर अल्पसंख्यक तबकों से जुड़े हुए थे। हालांकि इस मामले में अभी प्रशांत टंडन ने बिल्कुल चुप्पी साध रखी है। पुलिस ने भी उनसे पूछताछ के विषय में किसी से बात करने से मना किया है। सूत्रों की मानें तो उनसे अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े उनके तमाम मित्रों के बारे में पूछताछ की गयी। और तकरीबन हर मित्र से उनकी मित्रता का कारण पूछा। 

इस तरह से अब पूर्वी-उत्तरी दिल्ली में राज्य प्रायोजित हिंसा के लिए पत्रकारों से सवाल पूछे जा रहे हैं जबकि हर निष्पक्ष इंसान जानता है कि दिल्ली में हिंसा किसके इशारे पर कौन करवा रहा था।

इसी हिंसा की ‘जांच-पड़ताल’ के लिए प्रोफेसर अपूर्वानन्द से 3 अगस्त को पांच घंटे तक पूछताछ की गयी थी। उमर खालिद को तो बुलाती ही रही है, डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर राहुल रॉय से पता नहीं कितनी बार स्पेशल सेल पूछताछ कर चुकी है।

सामान्यतया स्पेशल सेल के लोगों का ऐसे पत्रकारों/ अकादमिक जगत के लोगों/ नागरिक कार्यकर्ताओं (जिनका हिन्दू नाम है) से यह सवाल होता है कि आप फलाने नाम के इस/ उस मुसलमान को कैसे जानते हैं? उसी तरह मुसलमान नाम वाले कार्यकर्ताओं से सवाल होता है कि आप फलाने हिन्दू नाम के व्यक्ति को कैसे जानते हैं?

प्रश्न यह है कि जिस किसी भी व्यक्ति का कोई भी नाम हो, जानना गलत है क्या? किसी लोकतांत्रिक आंदोलन में भाग लेना गलत है क्या? संविधान को बचाने के लिए किसी सभा आयोजन में भाग लेना गलत है क्या? आखिर मोदी और अमित शाह किस तरह का देश बनाना चाहते हैं? किस तरह का घेटोवाइजेशन चाहते हैं? वैसा जिसमें हिन्दू नाम वाले सिर्फ हिन्दू से बात करें और मुसलमान नाम वाले सिर्फ मुसलमान से?

अगर बात आगे बढ़ेगी तो ब्राह्मण सिर्फ ब्राह्मण से बात करेंगे और ठाकुर सिर्फ ठाकुरों से। और आगे चलकर स्थिति बेहतर हुई तो शर्मा ब्राह्मण शर्मा ब्राह्मण से ही बात करेंगे। क्योंकि द्विवेदी ब्राह्मण और शर्मा ब्राह्मण का गोत्र अलग है। फिर सिसोदिया राजपूत सिसोदिया से ही बात करेगा। वैसे कमोबेश स्थिति तो वैसी ही बना दी गई है। समाज इतना ही संकुचित हो गया है। मेरा सवाल है कि क्या जो उनकी श्रेणी के नहीं हैं उन्हें गोली मार दी जाएगी?

फिर मोदी और शाह के बीच भी रिश्ता नहीं रह जाएगा क्योंकि एक घांची तेली है तो दूसरा जैन बनिया है। आखिर देश की एकता में इतना बड़ा कील वे दोनों क्यों ठोकना चाह रहे हैं? और ताली बजाने वाले लोग समझ नहीं रहे हैं कि वे क्यों और क्या कर रहे हैं?

लेकिन शाह साहब, आप जो भी कर लें, जनता आपका खेल देख रही है, यह खेल बहुत लंबा नहीं चलने वाला है। जो लोग लड़ रहे हैं, आपके अत्याचार के खिलाफ- वे आपके चाहने-न चाहने से लोकतंत्र व सामाजिक न्याय के लिए लड़ना नहीं छोड़ेंगे।

(वरिष्ठ पत्रकार जितेंद्र कुमार की टिप्पणी जो उनके फेसबुक वाल से ली गयी है।)

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