Wednesday, February 21, 2024

ग्राउंड स्टोरी: सूखे में मुआवजे की घोषणा कागजी साबित होने के बाद अब बिहार में बाढ़ के हालात

बिहार के कई जिलों में अक्टूबर महीने में जल संसाधन विभाग और आपदा प्रबंधन विभाग के द्वारा बाढ़ के लिए राहत पर काम किया जा रहा है। वहीं 13 अक्टूबर 2022 के जनरल कैबिनेट बैठक में आपदा प्रबंधन विभाग के द्वारा लिए गए निर्णय के आलोक में राज्य के 11 जिले के 96 प्रखंड के 937 पंचायतों के 7841 राजस्व ग्राम को सूखाग्रस्त घोषित किया गया है।

एक तरफ पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण, सीवान और गोपालगंज जिले के कई गांवों में बाढ़ का पानी घुस गया है। वहीं जहानाबाद, शेखपुरा, नालंदा, मुंगेर, लखीसराय, भागलपुर, बांका, जमुई, औरंगाबाद, गया और नवादा जिले के अधिकांश गांवों को सूखा घोषित कर मुआवजा दिया गया है। 

सुखाड़ का नहीं शायद बाढ़ का मुआवजा मिल जाए  

बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के किसान अगस्त महीने तक सुखाड़ से लड़ रहे थे। भारत मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार अगस्त महीने में मुजफ्फरपुर में 40.86 प्रतिशत कम बारिश हुई थी। वहीं अभी 19 अक्टूबर, 2022 तक के आंकड़े के मुताबिक सामान्य से सात मिलीमीटर ज्यादा बारिश हो चुकी है। 

“पहले कमजोर मानसून की वजह से धान की खेती निर्धारित लक्ष्य के अनुरूप नहीं हो सकी। कई किसानों ने तो खेती भी नहीं की। खासकर बटाईदार किसान तो दिल्ली और पंजाब कमाने चले गए। फिर लेट-लतीफ बारीश होने के बाद किसानों ने चैन की सांस ली थी कि अब बाढ़ के पानी ने पूरे पंचायत के कई सौ एकड़ में लगी फसल को बर्बाद कर दिया। सुखाड़ के मुआवजे से तो हम लोगों को वंचित रखा गया है। बाढ़ का मुआवजा पता नहीं कब मिलेगा। हम तो बस यही सोचकर मरे जा रहे हैं कि परिवार का क्या होगा।” मुजफ्फरपुर के सरिया प्रखंड के भटोलिया गांव के सुरेंद्र मंडल बताते हैं। 

सरकार के दावे पर सवाल 

किसानों के हक के लिए लड़ रहे सुपौल जिला के अमित कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े हुए है। वह बताते हैं कि, “सरकार के द्वारा बिहार में सूखाग्रस्त इलाके की पहचान का  मापदंड यह था कि जहां 30 फीसदी से कम बारिश और 70 फीसदी से काम रोपनी हुई है। दूसरे आंकड़े के मुताबिक भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार इस साल के मॉनसून की समाप्ति यानी 30 सितंबर तक बिहार के 38 में से 33 जिले ऐसे रहे जहां वर्षा में सामान्य से 20 फीसद से अधिक की कमी दर्ज गई है। मतलब 33 ऐसे जिले हैं जहां 20% से ज्यादा की कमी दर्ज की गई तो सिर्फ 11 जिलों में 30% से ज्यादा की कमी पर मुआवजा कैसे दिया गया?”

सूखे की एक तस्वीर

सरकार के द्वारा सुखाड़ पर जब से मुआवजे का ऐलान किया गया है। तभी से बिहार के कई गांवों और इलाकों से इसका विरोध किया जा रहा है। सहरसा के दक्षिणी महिषी के रहने वाले नितिन ठाकुर फोन पर बताते हैं कि, “दक्षिणी सहरसा जिले में छोटे किसान शायद ही रोपनी कर पायें। बड़े किसान पंपिंग सेट का सहारा लेकर पानी पटा भी लिये तो कई किसानों को यूरिया ही नहीं मिली। इसके बावजूद समझ में नहीं आ रहा कि सरकार ने इस जिले को सूखाग्रस्त की श्रेणी में क्यों नहीं रखा है। आप खुद आकर गांव में देखिए कितने खेत में अनाज उपज रहा है। उपज भी रहा है तो कितनी खराब स्थिति है।” मौसम विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक सहरसा जिले में 40 फीसदी से अधिक की कमी दर्ज की गई है।

पूर्व कृषि मंत्री के आरोप कितना हद तक सही?

कुछ दिनों पहले ही बिहार के पूर्व कृषि मंत्री सुधाकर सिंह ने बिहार के कृषि विभाग और उनके अधिकारियों पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था। जिसके कुछ दिनों बाद उन्होंने अपने पद से इस्तीफा भी दे दिया। इस आंकड़े के आने के बाद सुधाकर सिंह ने मीडिया को दिए गए बयान में बताया कि, ” बिहार कृषि विभाग और भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के आंकड़े एक दूसरे से मेल नहीं खाते हैं। क्योंकि जमीनी सच्चाई इससे अलग है। इस वजह से मैंने इन आंकड़ों की जांच के आदेश दिए थे।”

इस आंकड़े से तो यही पता चलता है कि सुधाकर सिंह ने अपने कार्यकाल में बिहार कृषि विभाग पर जो सवाल उठाए थे, सरकार उसके प्रति बिल्कुल भी गंभीर नजर नहीं आती। 

सरकार की आर्थिक मदद क्या किसानों के लिए पर्याप्त है?

जल विशेषज्ञ दिनेश मिश्र बताते हैं कि, “आधुनिक सिंचाई तकनीकों जैसे नहरों और बोरिंग के माध्यम से सरकार कोशिश कर रही है। इसके बावजूद हर खेत तक सिंचाई की व्यवस्था नहीं पहुंचाना सरकार की नाकामी को दर्शाता है। इस महंगाई की दुनिया में सरकार के द्वारा 3500 रुपये दी जा रही आर्थिक सहायता और अनुदान मजाक लगता है।”

वहीं सुपौल के किसान शंभू मंडल बताते हैं कि, “आसान भाषा में समझिए कि कम से कम एक हेक्टेयर जमीन पर प्रति साल 50 हजार रुपए की फसल नष्ट होगी। अगर बटाईदार हुआ तो कम से कम 25 हजार रुपए का नुक़सान होगा। इसमें 3500 रुपए की आर्थिक मदद से क्या होगा?”

(बिहार से राहुल कुमार गौरव की रिपोर्ट।)

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