Tue. Oct 15th, 2019

कर्नाटक में सत्ता हासिल करने के साथ संविधान को जमींदोज करना चाहती है बीजेपी

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बीजेपी ने पूरे देश की राजनीति को घोड़ामंडी में तब्दील कर दिया है। वह राजनीति में कारपोरेट के दखल, चुने गए प्रतिनिधियों की खरीद-फरोख्त और उनके दल-बदल के तौर पर सामने आ रहा है। भारतीय समाज को पहले ही अराजकता की आग में धकेल चुकी पार्टी ने अब राजनीति को भी उसी रास्ते पर लाकर खड़ा कर दिया है। जहां न तो कोई नियम है और न ही कानून। संविधान नाम की भी देश में कोई चीज है वह खुद भी भूल जाना चाहती है और दूसरों को भी भुलवा देना चाहती है। लिहाजा अब कदम-कदम पर उसकी धज्जियां उड़ाना उसका बुनियादी कार्यभार हो गया है। देश की राजनीति एक ऐसे जंगल राज में तब्दील गयी है जिसमें यह बात अब पूरी तरह से स्पष्ट हो गयी है कि देश में किसी ताकतवर का ही राज चलेगा। एक दौर में यह ताकत मशल पावर यानी भौतिक शक्ति से तय होती थी। लेकिन आज के दौर में उस शक्ति का पैमाना बदल गया है अब उसका स्थान पैसा, सत्ता समेत दूसरे हथियारों ने ले लिया है। जिसके पास ये सारी चीजें मौजूद होंगी देश की सत्ता पर वही राज करेगा।

कर्नाटक में बीजेपी का कहना है कि कांग्रेस और जेडीएस सरकार के संकट में उसका कोई हाथ नहीं है। जबकि येदुरप्पा के पीए का फोटो, जिसमें वह मुंबई जाने के लिए विधायकों को विमान में बैठाता दिख रहा है, बता चुका है कि दक्षिण के इस भ्रष्टाचार शिरोमणि ने सत्ता हासिल करने के लिए एक बार फिर अपने सारे घोड़े छोड़ दिए हैं। जेडीएस के एक विधायक का बीजेपी द्वारा 40 करोड़ रुपये दिए जाने के प्रस्ताव का खुलासा इस बात की पुष्टि करता है। बावजूद इसके देश की सर्वोच्च पंचायत में रक्षामंत्री राजनाथ सिंह का यह कहना कि बीजेपी का कर्नाटक संकट से कुछ लेना-देना नहीं है। किसी चुटकुले से कम नहीं है। जिस पर सिर्फ हंसा जा सकता है। एक साल के भीतर यह छठी घटना है जब कर्नाटक में एक संवैधानिक रूप से गठित सरकार को गिराने की कोशिश हो रही है।

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लोकतंत्र की अपनी कुछ मान्यताएं, परंपराएं और नैतिकता होती है जिसके तहत वह चलता है। उसके अपने नियम और कानून होते हैं। उसके संचालन के लिए देश में संविधान जैसा एक लिखित दस्तावेज मौजूद है। जिसके तहत पूरा देश चल रहा है। नागरिक से लेकर संस्थाएं सब उसके तहत काम करते हैं। केंद्र में सत्ता संभालते ही बीजेपी का एक सूत्रीय कार्यक्रम किसी भी तरीके से अपनी सत्ता का विस्तार हो गया है। और उसको हासिल करने के लिए उसने कोई सीमा नहीं बांधी है। वह हर नियम, कानून और संविधान की धज्जी उड़ाने के लिए तैयार है। गोवा से लेकर मणिपुर और अरुणाचल से लेकर बिहार तक उसने यही किया। बिहार में तो उसने पूरे जनादेश को ही पलट दिया। आरजेडी और जेडीयू सरकार को उसने न केवल पदच्युत किया बल्कि जेडीयू के साथ मिलकर बाकायदा अपनी सरकार गठित की। इसमें न कहीं कोई जनता थी और न ही उसका जनादेश शामिल था। यानि जिसके लिए और जिसके द्वारा सब कुछ होना चाहिए वही पूरी सीन से नदारद है।

दरअसल बीजेपी ने देश की राजनीति को 14वीं सदी में ले जाकर खड़ा कर दिया है। जिसमें अपने साम्राज्य का विस्तार राजाओं का प्राथमिक उद्देश्य हुआ करता था। और उसके लिए उनके पास सैन्य ताकत का होना उसकी प्राथमिक शर्त हुआ करती थी। और युद्ध में किसी भी तरीके से विजय हासिल करना उसका बुनियादी लक्ष्य हुआ करता था। न उससे जनता का कुछ लेना-देना था न ही उसमें उसकी कोई इच्छा शामिल थी। वह तो केवल शासित होने के लिए अभिशप्त थी। 21वीं सदी में पहुंचकर बीजेपी ठीक वही काम कर रही है। अंतर सिर्फ शक्ति के साधनों का है। पहले यह लड़ाई फौज और फाटक के जरिये होती थी लेकिन अब उसका स्थान पैसा, ताकत और सीबीआई, ईडी तथा एनआईए जैसी एजेंसियों ने ले लिया है। और इनके सहारे बीजेपी अपने साम्राज्य विस्तार में लगी है।

बीजेपी देश को एक बार फिर उसी पुरातनपंथी दकियानूसी हिंदू समाज व्यवस्था की तरफ ले जाना चाहती है। लेकिन उसकी इस राह में सबसे बड़ा रोड़ा देश का संविधान है। लिहाजा वह ऐन केन प्रकारेण उसकी धज्जियां उड़ाने में लगी है। वह चाहती है कि देश में संविधान का कोई नामलेवा न बचे। ऐसा हो जाने पर हिंदू राष्ट्र के लक्ष्य को हासिल करना उसके लिए आसान हो जाएगा। क्योंकि सबको बराबरी का दर्जा देने वाला संविधान उसकी गैरबराबरी पर आधारित समाज व्यवस्था को अप्रासंगिक बना देता है। लिहाजा उस लक्ष्य को हासिल करने की पहली शर्त उस दस्तावेज को निष्क्रिय करना है जिससे पूरा देश चलता है। कर्नाटक से लेकर गोवा और मणिपुर से लेकर बिहार की घटनाएं इसमें मददगार साबित होती हैं। और यह सब कुछ इसलिए संभव हो पा रहा है क्योंकि उसके साथ एकताबद्ध जनता जो अभी धर्म के नशे में चूर है सिर्फ और सिर्फ उसकी जीत देखना चाहती है। भले ही यह उसके भविष्य की कीमत पर ही क्यों न हो।

(लेखक महेंद्र मिश्र जनचौक के संस्थापक संपादक हैं।)

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