Friday, January 27, 2023

बोकारो ग्राउंड जीरो: सेल और सरकार के बीच पिसते ग्रामीणों का अंतहीन संघर्ष

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‘हम लोग खुले में ही शौच के लिए जाते हैं, क्योंकि हमारे घर में शौचालय नहीं है। रोज कमाते हैं, रोज खाते हैं, हम खाएं कि शौचालय बनवाएं? पता नहीं सरकार ने कैसे पूरे जिलों को खुले में शौच मुक्त घोषित कर दिया है? कोई भी आकर हमारे घरों में देख ले, हमारे घर में शौचालय नहीं है।’’ जब ये बात बैद्यमारा गांव की चमेली देवी कह रही थी, तो उनके साथ बैठी दर्जनों महिलाएं भी अपनी सहमति जता रही थीं।

27 सितंबर 2018 को झारखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास ने एक कार्यक्रम में घोषणा किया था कि आज खूंटी, साहेबगंज, धनबाद, बोकारो और पूर्वी सिंहभूम को ओडीएफ (खुले शौच मुक्त) घोषित किया गया है। इस कार्यक्रम में भारत के उप-राष्ट्रपति एम. वैंकेया नायडू व झारखंड की तत्कालीन राज्यपाल द्रोपदी मुर्मू भी शामिल हुई थीं।

बैद्यमारा गांव झारखंड के बोकारो जिला के चास प्रखंड के अंर्तगत आता है, जहां की चमेली देवी रहने वाली है। लेकिन सिर्फ बैद्यमारा गांव के लोग ही नहीं बल्कि बास्तेजी, धनगढ़ी, बेलडीह, आगरडीह, चैताटांड़, महुआर, चिटाही, करमाटांड़, जमुनिया टांड़, बांसगढ़, महेशपुर, पिपराटांड़, कनफट्टा, गंझूडीह, पंचैरा, सरसाडीह, कुण्डोरी, शिबूटांड समेत 19 मौजा/गांव के लोगों की भी यही स्थिति है। बास्तेजी की सायरा बेगम, अकलिमन बीबी, जरीना बीबी, शहनाज बीबी, असीफा बीबी, जैनब बीबी, संतोष मुर्मू आदि तो जोर देकर मुझे अपने घरों में चलकर देखने को बोलते हैं कि उनके घर में शौचालय है कि नहीं? और जब मैं जाकर उनके घरों में देखा , तो उनकी बात सच निकली ।

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बैद्यमारा गांव में एकत्रित महिलाएँ 

बोकारो़ जिला के इन 19 मौजा में रहने वाले लगभग 80-85 हजार आबादी के पास सिर्फ शौचालय का ही नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व का भी संकट है। यह 19 मौजा बोकारो स्टील प्लांट से सटा हुआ है। बोकारो स्टील प्लांट की स्थापना 29 जनवरी 1964 को हुई थी। 25 जनवरी 1965 को भारत और सोवियत संघ के बीच बोकारो स्टील प्लांट में सहयोग करने पर सहमति बनी थी। 6 अप्रैल 1968 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हाथों बोकारो स्टील प्लांट की पहली धमन भट्टी के निर्माण कार्य का उद्घाटन हुआ था। 24 जनवरी 1973 को भारतीय इस्पात प्राधिकरण (स्टील अथाॅरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड-सेल) की स्थापना भारत सरकार के पूर्ण स्वामित्व में होने के बाद 10 मई 1978 को पब्लिक सेक्टर आयरन एंड स्टील कम्पनीज रिस्ट्रक्चरिंग एंड मिस्लेनियस प्रोविजन 1975 के अनुसार बोकारो स्टील लिमिटेड का विलय सेल में हो गया।

बोकारो में स्टील प्लांट लगाने के लिए 1956 में ही जमीन अधिग्रहण का नोटिफिकेशन जारी किया गया था, जिसके तहत 31287.24 एकड़ भूमि अधिग्रहित की गयी, जिसमें 26908.565 एकड़ अर्जित भूमि 3600.215 एकड़ गैर-मजरूआ भूमि एवं 778.46 एकड़ वन भूमि थी। आनन-फानन में कुछ मुआवजा व एक परिवार में एक व्यक्ति को बोकारो स्टील प्लांट में नौकरी देने केे वादे के साथ सारी जमीन खाली करवा ली गयी, लेकिन उचित पुनर्वास व नियोजन पर सहमति नहीं बन पाने के कारण 824.855 एकड़ जमीन खाली नहीं कराया जा सका और इसी जमीन पर बसा है 20 गांव।

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इसे 20 गांव कहना भी ठीक नहीं होगा क्योंकि यह 20 मौजा है, इसमें से एक मौजा/गांव के लोगों को कुछ अधिकार हासिल है। बाकी 19 मौजा में रहने वालों को कुछ भी अधिकार नहीं है। सेल कहती है कि यह 824.855 एकड़ जमीन हमारी है और मैंने इसके लिए पैसा व नियोजन दोनों दिया है, जबकि ग्रामीणों का कहना है कि उस समय कुछ लोगों ने पैसा जरूर लिया था और कुछ लोगों को नौकरियां भी मिली थी, लेकिन हमारी पूरी मांगों को नहीं माना गया था, इसलिए हमने जमीन कभी खाली ही नहीं की। अब राज्य सरकार व सेल के बीच में स्वामित्व को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा चल रहा है।

चमेली देवी जिस बैद्यमारा गांव में रहती है, वह गांव भी इन्हीं 19 मौजा क्षेत्र का एक मौजा है। बैद्यमारा गांव में लगभग 300 परिवार रहते हैं, जिसमें संथाल आदिवासी, घटवार, तुरी, प्रमाणिक, महतो आदि दलित-पिछड़ी जातियां रहती है। इस गांव में पहले 8वीं कक्षा तक का एक स्कूल भी था, लेकिन पिछली राज्य सरकार ने इस स्कूल को बगल के गांव बास्तेजी के स्कूल में विलय कर दिया। अब इस गांव के सभी बच्चे बास्तेजी गांव के स्कूल में जाते हैं। वहां भी 8वीं तक पढ़ाई होती है। अब उस स्कूल में लगभग 600 बच्चे हैं और शिक्षक मात्र 5 हैं।

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बास्तेजी गांव में एकत्रित महिलाएँ 

बैद्यमारा गांव मैं जब पहुंचा, तो गांव के एक चौक पर कुछ लोग बैठे थे। जैसे ही मैंने अपना परिचय दिया, तुरंत ही वहां काफी लोग जमा हो गये। उन लोगों ने सही-सही जानकारी देने के लिए अपने गांव के कुछ युवाओं को फोन करके भी बुला लिया। मैंने वहां बैठे एक व्यक्ति से उनका नाम पूछा तो उन्होंने सरकार पर तंज कसते हुए अपना नाम ‘विनोद लावारिस’ बताया, हालांकि उनका नाम विनोद राय था।

वहां मौजूद विनोद राय, संतोष सिंह, दीपक कुमार, अरविंद साव, चमेली देवी आदि सभी ने एक स्वर में अपने गांव की वर्तमान स्थिति के लिए उनके गांव का किसी पंचायत क्षेत्र में शामिल नहीं होने को बताया।

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि बैद्यमारा, बास्तेजी, पंचैरा, कुण्डोरी, शिबूटांड़ समेत 19 मौजा क्षेत्र के निवासी लोकसभा व विधानसभा क्षेत्र में तो हैं, लेकिन ये गांव किसी पंचायत में नहीं है। फलतः लोकसभा चुनाव व विधानसभा चुनाव में मतदान भी करते हैं, लेकिन पंचायत चुनाव में नहीं। इसी कारण पंचायत की तरफ से मिलने वाली सरकारी योजनाओं का इनको लाभ भी नहीं मिलता है। ना तो इन गांवों में लोगों को वृद्धावस्था पेंशन मिलती है और ना ही प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ। ये अपनी जमीन पर लोन भी नहीं ले सकते हैं।

बैद्यमारा के ही एक बुजुर्ग बताते हैं कि जब बोकारो स्टील प्लांट बन रहा था, तो हम लोगों ने इसमें जमकर मेहनत की। हमें लगा था कि प्लांट लगने के बाद हमारे बच्चों का भविष्य उज्ज्वल होगा। पता नहीं क्या-क्या सपने देखे थे, लेकिन एक भी सपना पूरा नहीं हुआ। हमारे बच्चे आज भी दैनिक मजदूरी ही करते हैं। जब बोकारो स्टील सिटी जाता था, तो रौशनी से आंखें चैंधियां जाती थी, लेकिन हमारे गांवों में बिजली तक नहीं थी। हम लोगों ने आपस में चंदा कर और ना जाने कौन-कौन सा जतन करके 2003-04 में अपने गांवों में बिजली लाने में सफल हुआ था।

विनोद राय कहते हैं कि यह जमीन हमारे पूर्वजों की थी और आज हमारी है। 1956 में भूमि अधिग्रहण कानून 1894 के तहत हमारी जमीन के अधिग्रहण की बात सेल करती है, लेकिन हमने तो कभी अपनी जमीन खाली ही नहीं की। 1894 के भूमि  अधिग्रहण कानून में भी तो यही है कि जिस उद्देश्य के लिए जमीन ली गयी है और अगर उस पर 10 साल तक काम नहीं हो पाता है, तो रैयतों की जमीन वापस दे दी जाएगी। भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक, 2013 में तो इसे घटाकर 5 साल कर दिया गया है, तो फिर हमारी जमीन पर उनका आधिपत्य कैसे है?

संतोष सिंह बताते हैं कि अभी हमारे गांव में मात्र 5-6 लोग सेल में कार्यरत हैं। 4-5 युवाओं को अप्रेंटिस की ट्रेनिंग भी दी गयी है, लेकिन नौकरी किसी को नहीं मिली। हम लोगों के पास राशन कार्ड है, लेकिन उसमें बोकारो शहरी क्षेत्र वार्ड संख्या-1 दर्ज है। इन 19 गांवों में सिर्फ एक गांव में हाई स्कूल है और अस्पताल तो एक भी है ही नहीं। हमें सब कुछ के लिए बोकारो स्टील सिटी जाना पड़ता है।

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बैद्यमारा गांव के चौक पर बैठे ग्रामीण 

वे बताते हैं कि गेल के द्वारा पाइप लाईन बिछाने का काम इस क्षेत्र में हो रहा था। उन्होंने जमीन लेने के लिए ग्रामीणों से संपर्क किया, लेकिन सेल ने कहा कि हमारी जमीन है, हमसे समझौता करो। जब हम लोगों ने इसका विरोध किया, तो हम लोगों पर मुकदमा दर्ज कर दिया गया। हम लोग हमारी जमीन पर जब भी कोई सरकारी कार्य बगैर हमारी मर्जी के होता है, तो उसका विरोध करते हैं, लेकिन जबरन हमसे हमारी जमीन छीन ली जाती है और अगुवा लोगों को जेल में बंद कर दिया जाता है।

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बिछाई जा रही पाइपलाइन

मुझे यहां पता चला कि पंचैरा व कुण्डोरी के पास 7 फरवरी 2022 से ही ग्रामीणों का धरना लगातार चल रहा है। मैं वहां से बास्तेजी के ग्रामीणों से बात करते हुए दामोदर नदी के किनारे पंचैरा गांव के पास पहुंचा। वहां पर एक टेंट के अंदर लगभग 100 लोग ‘‘विस्थापित रैयत समिति, पंचैरा’’ के बैनर तले धरना पर बैठे हुए थे। बगल में ही एक पेड़ के नीचे खिचड़ी पक रही थी और वहां से लगभग 100 मीटर दूरी पर पुलिस की एक गाड़ी खड़ी थी।

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पंचौरी में धरने पर बैठे ग्रामीण

धरना पर बैठे सचिन सोरेन, युनुस अंसारी, सिराजुद्दीन अंसारी, लक्ष्मी प्रसाद मंडल, गोपी केवट, उत्तम गोस्वामी आदि बताते हैं कि दामोदर नदी के बरवाघाट से लेकर पंचैरा, मोहनपुर, कुण्डोरी, शिबूटांड़ होते हुए बोकारो स्टील प्लांट के कूलिंग पौंड नंबर-1 तक लगभग 4 किलोमीटर तक पाईप बिछाने का कार्य एचएन कन्सट्रक्शन को मिला है। हमारी जमीन पर पाईप बिछाया जाएगा, तो हमें सेल को नौकरी देनी होगी। बिना मुआवजा एवं नौकरी के हम पाईप नहीं बिछाने देंगे।

वे लोग बताते हैं कि हम लोग प्रतिदिन 8 बजे सुबह से शाम के 6 बजे तक धरना पर बैठते हैं। बीच में एक-दो बार ठेकेदार ने दलालों व पुलिस के सहयोग से काम कराना चाहा, लेकिन हमने रोक दिया। हमारे कई लोगों पर धारा 107 के तहत मुकदमा भी दर्ज हुआ है। लेकिन हम डरेंगे नहीं, जब तक हमारी मांगों को नहीं माना जाता है, तब तक हम पाईप लाईन का काम नहीं होने देंगे।

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कुंडोरी में धरना पर बैठे ग्रामीण

वहां से लगभग 200 मीटर दूरी पर ‘‘एकीकृत कुण्डोरी पंचायत’’ के बैनर तले एक और धरना पाईप लाईन के खिलाफ चल रहा है। यहां पर मौजूद झरी महतो, हरि प्रसाद, प्रदीप कुमार, चैहान महतो, सुबोध मंडल आदि कहते हैं कि मुआवजा व नौकरी की मांगों के साथ-साथ हम अपने गांव को पंचायत में शामिल करने की मांग भी अपने धरना के माध्यम से कर रहे हैं। वे लोग कहते हैं कि सरकार ने हमें रिफ्यूजी बना दिया है।

विस्थापित नेता दीपक कुमार कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि इन 19 गांवों को पंचायत में शामिल करने की मांग आज ही उठायी जा रही है, यह मांग काफी पुरानी है। हर सरकार चुनाव के समय हमसे पंचायत में शामिल करने का वादा करके वोट ले लेती है, लेकिन सरकार बनते ही वे भूल जाते हैं। इस सरकार ने इस मामले में कुछ गंभीरता दिखायी है और इस इलाके का सर्वे कराया गया है। चास बीडीओ के जरिये 6 पंचायत (कुण्डोरी, पंचैरा, महेशपुर, महुआर दक्षिणी, महुआर उत्तरी एवं बैद्यमारा) का प्रस्ताव भेजा गया है, लेकिन सेल एनओसी देने से इंकार कर रहा है।

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बास्तेजी के बुजुर्ग असिरूद्दीन कहते हैं कि बोकारो स्टील के विस्थापित गांव के प्रमुख सभी लोगों की बैठक में 17 फरवरी 1968 को बोकारो स्टील के तत्कालीन मैंनेजिंग डायरेक्टर के. एन. जाॅर्ज ने कहा कि प्लांट की नियुक्तियों में विस्थापितों को प्राथमिकता दी जाएगी। विस्थापितों की शिकायत दूर करने के लिए एक अलग कार्यालय खोला जाएगा। परंतु बोकारो स्टील प्लांट के प्रबंधन ने एक भी वादा पूरा नहीं किया। बिहार सरकार के विशेष सचिव ने 15 सितंबर 1983 को बोकारो स्टील प्लांट के प्रबंध निदेशक को खत लिखकर वर्ग चार के पदों पर विस्थापितों की नियुक्ति का आग्रह किया था, लेकिन प्रबंधन के कानों में जूं तक नहीं रेंगी। वर्तमान में वर्ग चार के पदों पर ठेके पर मजदूर रखे जा रहे हैं।

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बास्तेजी गांव के बुजुर्ग असिरूद्दीन

उनकी बात सुनकर एक मजदूर कहते हैं कि लेकिन ठेके पर भी इन गांवों के लोगों को नहीं रखा जाता है, इन गांवों का नाम सुनते ही उन्हें भगा दिया जाता है। क्योंकि वहां पर सीएलसी की दर से मजदूरी नहीं मिलती है। पहले तो सीएलसी की दर से मजदूरों के अकाउंट में पैसा भेज दिया जाता है, फिर 200-250 रूपये प्रतिदिन के हिसाब से पैसा रखकर मजदूरों को ठेकेदार को लौटाना पड़ता है। जो भी इसका विरोध करते हैं, अगली बार उनका गेट पास ही नहीं बनने दिया जाता है।

संतोष मुर्मू बताते हैं कि बोकारो इस्पात संयंत्र के लिए कुल अधिगृहित उपयोग की गयी भूमि मात्र 17751.275 एकड़ है, जिसमें बोकारो इस्पात संयंत्र की चारदीवारी के अंदर का भू-क्षेत्र मात्र 3000 एकड़ है। बाकी भूमि कई बड़ी-बड़ी कम्पनियों को बोकारो इस्पात संयंत्र ने लीज पर दे दी है। जिसमें डालमिया सीमेंट जैसे बड़ी कम्पनी भी है और बियाडा के तहत सैकड़ों छोटी-बड़ी कम्पनियां। जबकि सब लीज देना कानून का भी उल्लंघन है।

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धरनास्थल पर खाना खाते लोग

एक बात आपको जानकर आश्चर्य होगा कि जिनकी जमीन पर प्लांट बना है, उन्हें तो साफ पानी तक नहीं मिलता, लेकिन बोकारो जिला के तमाम प्रशासनिक अधिकारी, बोकारो व इसके इर्द-गिर्द तमाम जिले के विधायकों व सांसदों को बोकारो इस्पात संयंत्र ने क्वार्टर उपलब्ध कराया है। अपने पिट्ठू मजदूर संगठनों को भी कई क्वार्टर दिये हैं। उदाहरणस्वरूप बोकारो इस्पात कामगार यूनियन को छः क्वार्टर, बोकारो स्टील वर्कर्स यूनियन को 14 क्वार्टर दिये गये हैं। साथ ही तमाम राजनीतिक दलोें को कार्यालय के लिए क्वार्टर मिले हैं। इन लोगों को क्यों क्वार्टर दिये गये हैं, आप समझ सकते हैं।

विस्थापित नेता अरविंद साव कहते हैं कि एक तरफ राज्य सरकार पंचायत बनाने की बात कहती है तो दूसरी तरफ इनके मंत्री मिथिलेश ठाकुर इन गांवों को अवैध बताते हैं। पंचायत में शामिल कराने के लिए इन गांवों को लेकर अब बड़ा आंदोलन खड़ा करना होगा, तभी मई-जून में होने वाले पंचायत चुनाव से पहले इसे पंचायत में शामिल किया जा सकेगा।

meal eating
खाना खाते धरनार्थी

वे कहते हैं कि कहां तो हमारे घर में खुशहाली आने वाली थी, लेकिन आया क्या? सिर्फ और सिर्फ बोकारो इस्पात संयंत्र के चिमनियों से उठते हुए धुंओं का गुब्बार और वहां का डस्ट, जो ग्रामीणों में फेफड़े से संबंधित बीमारी, कैंसर, चर्म रोग, टीबी आदि खतरनाक बीमारी के वाहक हैं। पूरे गांव में एक भी चापाकल नहीं है। मजबूरन सभी को कुंए का पानी पीना पड़ता है, जिसमें बोकारो स्टील प्लांट का डस्ट भरा होता है। भले ही अब तक हमें अपने घरों और खेतों से नहीं खदेड़ा गया है, लेकिन बोकारो स्टील प्लांट से सटे होने के कारण यहां का सारा डस्ट तो हमारे ही घर व खेत में आता है, जिसके कारण न तो अच्छे से कोई फसल होती है और न ही कोई भी व्यक्ति स्वस्थ रह पाता है।

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बैद्यमारा गांव में खराब पड़ा सरकारी चापाकल

हमारे बगल में न जाने कितने शहरों के लोग आकर काम करते हैं, लेकिन हमारे ही बच्चे बेरोजगार है। हमें तो स्वच्छ पानी भी नसीब नहीं है। यहां तक कि किसी भी पंचायत में शामिल न होने के कारण न तो हमें वृद्धापेंशन, इंदिरा आवास, मनरेगा, लालकार्ड आदि राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिल पाता है। जबकि बिजली बिल भी हम जमा करते हैं। विधायक कोष से सड़कों का निर्माण भी हमारे क्षेत्र में हुआ है। फिर भी हम बीच में फंसे हुए हैं, एक तरफ हमें सेल प्रबंधन अतिक्रमणकारी मानता है, तो दूसरी तरफ राज्य सरकार हमारे गांव को अपने स्वामित्व में मानते हुए भी कल्याणकारी योजनाओं से महरूम रखती है।

(बोकारो से स्वतंत्र पत्रकार रूपेश कुमार सिंह की रिपोर्ट।)

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