Thu. Aug 22nd, 2019

“कॉरपोरेट को रिर्टन गिफ्ट है मोदी सरकार का बजट”

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बजट पर सीपीआई (एमएल) महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य की प्रतिक्रिया:

महंगाई को बढ़ाने वाला

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बजट में पहले से महंगे पेट्रोल-डीजल पर 1 रुपया प्रति लीटर एक्साइज ड्यूटी और 1 रुपया प्रति लीटर सेस बढ़ाया गया है। इससे माल ढुलाई व यात्री किराए पर असर पड़ेगा और आम आदमी की रोजमर्रा के उपभोग की वस्तुओं सहित हर ओर महंगाई बढ़ेगी। इसके साथ ही सोने के आयात सहित कुछ अन्य धातुओं पर भी एक्साइज ड्यूटी 2.5% तक बढ़ाई गई है। आयातित किताबों और मुद्रण सामग्री पर भी 5% एक्साइज ड्यूटी लगाई गई है। इससे लगभग हर क्षेत्र में महंगाई बढ़ेगी।

मध्य वर्ग के लिए निराशाजनक

बजट में देश के मध्य वर्ग को कोई रियायत नहीं दी गई है। नौकरी पेशा तबका इस बात की उम्मीद कर रहा था कि 5 लाख तक की आय पर उसे पूर्ण टैक्स माफी मिले। अभी अगर पांच लाख से आपकी इनकम कुछ भी बढ़ी तो फिर 2.5 लाख से ऊपर पर पूरा टैक्स देना होता है। पर सरकार ने इसमें कोई बदलाव नहीं किया। रियल इस्टेट के कारोबार को कुछ गति देने के उद्देश्य से 45 लाख तक के आवास ऋण में जरूर टैक्स छूट को 2 लाख से 3.5लाख किया गया है।

सरकारी व सार्वजनिक क्षेत्र में निजीकरण को बढ़ाने वाला

सरकार ने बजट में एयर इंडिया सहित अन्य कंपनियों में विनिवेश की दीर्घकालिक योजना की घोषणा की है। रेलवे में 50 हजार करोड़ के विनिवेश की घोषणा की है। बीमा क्षेत्र की कंपनियों में भी 100% विदेशी निवेश की घोषणा की है। इस तरह यह बजट सरकारी व सार्वजनिक क्षेत्र के निजीकरण को और भी तेज गति देने वाला है। एक देश एक पावर ग्रिड और पानी व गैस के लिए भी एक अलग ग्रिड बनाने की मोदी सरकार की घोषणा बिजली, पानी और गैस पर भविष्य में पूरी तरह से कारपोरेट कंपनियों के नियंत्रण के लिए रास्ता खोलने के अलावा और कुछ नहीं है।

बेरोजगारी और असमानता को बढ़ाने वाला

बजट श्रम कानूनों में बदलाव लाने की बात करता है। ताकि उससे मजदूरों की संगठित होने और पूजीपतियों से मोलभाव की उनकी ताकत को कम किया जा सके। बजट में नए रोजगार सृजन के बारे में एक शब्द भी नहीं है। न्यूनतम मजदूरी में बढ़ोत्तरी, ग्रामीण रोजगार के लिए मनरेगा के बजट में बढ़ोत्तरी और सामाजिक सुरक्षा के सवाल पर बजट में कुछ नहीं है। यह बजट बेरोजगारी, असमानता को बढ़ाने वाला है और मजदूरों, असंगठित क्षेत्र के कामगारों के लिए पूर्णतः निराशाजनक है।

किसानों के साथ धोखा

बजट में आत्महत्या को मजबूर और सूखे से परेशान किसानों के लिए कुछ भी नहीं है। खेती के कारपोरेटीकरण और 85% बीज बाजार पर बहुराष्ट्रीय निगमों का कब्जा हो जाने के बाद बजट में मोदी सरकार का 0 प्रतिशत लागत खेती का नारा एक हास्यास्पद जुमले के सिवाय कुछ नहीं है। किसानों के 10 हजार उत्पादक समूहों का गठन करने की मोदी सरकार की घोषणा भी किसानों के साथ मात्र छलावा है। जब देश का किसान कर्ज मुक्ति, स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के आधार पर फसलों का मूल्य और सूखे से निपटने के ठोस उपायों की आशा सरकार से कर रहा था ऐसे में सरकार ने किसानों को और निराश ही किया है। सरकार का 1592 विकास खंडों में जल शक्ति अभियान और 2022 तक हर घर में जल जीवन के तहत स्वच्छ पानी उपलब्ध कराने की घोषणा भी कोरी लफ्फाजी ही है।

मध्यम दर्जे के उद्योगों और व्यवसाय को हतोत्साहित कर कारपोरेट व विदेशी पूंजी के दखल को बढ़ाने वाला

बजट में देश में ज्यादा रोजगार सृजन करने वाले मध्यम उद्योगों और बड़े व्यवसाय को टैक्स में भारी बढ़ोतरी कर हतोत्साहित किया गया है। अब 2.5 से 5 करोड़ तक की आय पर 3% अतिरिक्त टैक्स और 5 करोड़ से अधिक आय पर 7% अतिरिक्त टैक्स लगाया गया है। इससे इन मध्यम उद्योगों से वसूले जाने वाले टैक्स की मात्रा 22 प्रतिशत तक पहुंच गई है। जबकि मोदी सरकार कारपोरेट टैक्स में हर साल छूट देते उसे 30% से पूरी तरह 25% पर ले आई है। इससे कारपोरेट पूंजी द्वारा इन्हें निगलने का रास्ता ही बनेगा।

बैकिंग क्षेत्र की कमी को छुपाने वाला

एक तरफ सरकार बैंकों के एनपीए में भारी कमी आने की बात कर रही है। बजट के अनुसार 6 सरकारी बैंक कर्ज से भी उबर गए हैं। इस बजट में भी बैंकों से ट्रांजैक्शन पर और टैक्स बढ़ाया गया है। फिर भी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को 70 हजार करोड़ रुपए देने का बजट में किया गया प्रावधान उक्त रिपोर्टों की असलियत को उजागर कर दे रहा है। दरअसल इसके जरिये सरकार कारपोरेट कंपनियों द्वारा हड़पी गई बैंकों की पूंजी का जनता के टैक्स से चुपचाप भुगतान कर रही है। और एनपीए को नए कर्ज में बदलने की बैंकों और कारपोरेट के खेल को छुपा रही है।

आर्थिक सर्वे की असलियत को ढकता बजट

मोदी सरकार का वर्तमान बजट पूर्व के आर्थिक सर्वे और मोदी सरकार पार्ट 1 में आर्थिक सलाहकार रहे अरविन्द सुब्रमण्यम द्वारा देश की अर्थव्यवस्था पर किए गए खुलासे को ढकने की चालाकी भरी कोशिश है। मोदी सरकार पार्ट 1 के समय के आर्थिक सर्वे बताते हैं कि देश में विदेशी निवेश, रोजगार और उत्पादन लगातार घट रहा है। पूर्व आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने बताया था कि मोदी सरकार के द्वारा जारी देश की जीडीपी ग्रोथ के आंकड़े वास्तविकता से 2.5 प्रतिशत ज्यादा हैं। उनके अनुसार सरकार द्वारा जारी 7 प्रतिशत जीडीपी ग्रोथ वास्तव में 4.5 प्रतिशत ही है। मोदी सरकार पार्ट 2 के नए आर्थिक सलाहकार सुब्रमण्यम का बजट पूर्व आर्थिक सर्वे पर दिया गया वक्तव्य और मोदी सरकार द्वारा बजट में देश की कुल जीडीपी को 260 लाख करोड़ बताना तथा पांच साल में इसे 500 लाख करोड़ तक पहुंचाने की घोषणा भी देशवासियों को धोखे में रखना ही है।

वर्कर्स फ्रंट की प्रतिक्रिया:

बजट मजदूर-किसान विरोधी है, इससे देश कमजोर होगा 

मोदी सरकार की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन द्वारा संसद में पेश किया गया बजट देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों द्वारा चुनाव में भाजपा को भरपूर मदद देने के एवज में दिया रिर्टन गिफ्ट है। वित्तमंत्री भले ही कहें कि यह ‘मजबूत देश-मजबूत नागरिक‘ का बजट है। सच यह है कि इस बजट से भीषण मंदी के दौर से गुजर रही भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में कोई मदद नहीं मिलेगी और इससे आम नागरिक, मजदूर, किसान, महिलाओं, नौजवानों की हालत और भी बदतर होगी। बजट पर यह प्रतिक्रिया स्वराज इंडिया की राज्य कार्यसमिति के सदस्य और वर्कर्स फ्रंट के प्रदेश अध्यक्ष दिनकर कपूर ने प्रेस को जारी अपनी विज्ञप्ति में दी। 

उन्होंने कहा कि पूरा बजट सिर्फ और सिर्फ कारपोरेट घरानों के मुनाफे के लिए ही बनाया गया है। कारपोरेट पर टैक्स लगाने की बात भी झूठ है। सच्चाई यह है कि देश के बड़े कारपोरेट घरानों पर लग रहे एक मात्र कारपोरेट टैक्स के दायरे को उसकी सीमा 250 करोड़ से बढ़ाकर 400 करोड़ कर देने से घटा दिया गया है। देश में सर्वाधिक मुनाफा कमाने वाले और देश की सम्पत्ति का पचास प्रतिशत जिन बड़े कारपोरेट घरानों के पास है उन पर तो उत्तराधिकार कर और सम्पत्ति कर लगाने की न्यूनतम मांग को भी पूरा नहीं किया गया।

उन्होंने कहा कि यह बजट मजदूरों व कर्मचारियों पर कहर बन कर आया है। देश की महत्वपूर्ण सम्पत्ति सार्वजनिक क्षेत्र के रेलवे में निजीकरण और ऊर्जा, एयर इंडिया, तेल, कोयला, इस्पात जैसे क्षेत्रों में विनिवेशीकरण इसे बर्बाद करने का काम करेगा। बीमा और मीडिया में सौ फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति दी गयी है। ‘मीनिमम गर्वमेंट-मैक्सिमम गवर्नेंस‘ जैसी घोषणाएं सरकारी विभागों को बड़ी संख्या में खत्म करेगी और सरकारी नौकरियों को घटायेगी। आजादी से पहले संघर्षों से हासिल मजदूरों के अधिकारों पर हमला करते हुए 44 श्रम कानूनों को खत्म कर चार श्रम संहिता बनाने का प्रस्ताव कारपोरेट को मजदूरों के शोषण की खुली छूट देना है। भीषण संकट और सूखे की हालत में गुजर रही खेती किसानी के सम्बंध में किसी योजना का उल्लेख तक करना सरकार ने बजट में जरूरी नहीं समझा। ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार के लिए बनी मनरेगा में एक हजार करोड़ का बजट घटा दिया गया। 

बजट के जरिए देश के इतिहास, संस्कृति और सभ्यता को बदलने के आरएसएस के सपने को नई शिक्षा नीति के जरिए आकार दिया गया है। ज्ञान विरोधी, विज्ञान विरोधी आरएसएस की मोदी सरकार में पहली बार देश में किताबों पर कस्टम ड्यूटी लगाई गई है। पेट्रोल और डीजल पर लगी एक्साइज डृयूटी के कारण महंगाई और बढ़ेगी। एक करोड़ कैश निकालने पर दो लाख रूपए टैक्स देने जैसे निर्णयों से छोटे-मझोले व्यापारियों पर बोझ बढ़ेगा। व्यापारियों के लिए भी शुरू की गयी प्रधानमंत्री कर्मयोगी मानधन पेंशन योजना पेंशन धारकों के साथ धोखाधड़ी के सिवा और कुछ नहीं है।

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