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भारत-चीन सीमा झड़प: राजनयिक-कूटनीतिक गतिविधियां तेज, रूस के दौरे पर रक्षामंत्री, दो अहम बैठकें आज

नई दिल्ली। आज भारत-चीन सीमा विवाद मामले में दो बेहद अहम प्रगति हो रही है। सीमा पर जारी कमांडर स्तर की बातचीत के अलावा रक्षा मंत्री आज मास्को पहुंच गए हैं जहां उनकी चीन और रूस के रक्षा मंत्रियों से मुलाकात और बातचीत होगी। इसके अलावा विदेश मंत्री एस जयशंकर की भी आज ही चीन और रूस के विदेश मंत्रियों के साथ वर्चुअल बैठक है। अपने चीनी समकक्ष वांगी यी के साथ जयशंकर की गलवान घाटी की घटना के बाद यह पहली आमने-सामने की बैठक होगी। इसके पहले जयशंकर ने उनसे टेलीफोन पर बात की थी जिसमें सारी घटनाओं को लेकर जयशंकर के तेवर बेहद कड़े थे। इस तरह से कहा जा सकता है कि सीमा पर जारी विवाद को हल करने के लिए राजनयिक और कूटनीतिक स्तर पर गतिविधियां तेज हो गयी हैं।

वैसे रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की यह रूस यात्रा तीन दिनों की है। सिंह दूसरे विश्व युद्ध के दौरान सोवियत सेना के नाजी जर्मनी पर विजय के 75वें वर्ष के मौके पर आयोजित समारोह में हिस्सा लेने के लिए वहां गए हैं। इस अवसर पर आयोजित परेड में भारत और चीन दोनों देशों के सेनाओं की टुकड़ियां भी हिस्सा ले रही हैं।

दिल्ली से बाहर निकलते ही राजनाथ सिंह ने ट्विटर पर बताया कि “तीन दिन के दौरे पर मास्को जा रहे हैं। रूस का दौरा मुझे भारत और रूस के बीच रक्षा और सामरिक साझीदारी को और गहरा करने की दिशा में बातचीत का अवसर प्रदान करेगा। मैं मास्को में आयोजित 75वीं विजय परेड में भी हिस्सा ले रहा हूं।”

ऐसी उम्मीद की जा रही है कि 24 जून को दूसरे विश्व युद्ध में नाजी जर्मनी के ऊपर सोवियत जीत को मनाने के लिए आयोजित परेड में चीनी रक्षा मंत्री जनरल वेई फेंगे भी शामिल होंगे।

राजनाथ सिंह रूसी रक्षा मंत्रालय के अफसरों से मिलेंगे और अगले महीने होने वाली रक्षा हथियारों की सप्लाई की समीक्षा करेंगे। रूस के डिप्टी प्रधानमंत्री यूरी बोरिसोव और रक्षामंत्री सरजेई शोइगू के साथ बातचीत में वह एस-400 मिसाइल की सप्लाई के मामले को उठा सकते हैं।

संयोग से आरआईसी यानी रूस, इंडिया और चीन का यह मंच जो आज जयशंकर और वांग यी को आमने-सामने बातचीत के लिए लाएगा, संकटों के दौरान रणनीतिक संचार का प्लेटफार्म बन गया है।

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक 27 फरवरी, 2019 को तब की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज आरआईसी की बैठक में भाग लेने के लिए वुझेन की यात्रा पर थीं। बालाकोट एयरस्ट्राइक के एक घंटे के भीतर उन्होंने वांग यी और रूस विदेश मंत्री सर्जेई लावरोव से मिलकर उन्हें पूरे मामले के बारे में विस्तार से बताया था।

उससे पहले नवंबर, 2018 में आरआईसी के नेता राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की पहली बार 12 साल बाद नेतृत्व के स्तर पर मुलाकात हुई थी। यह बैठक ब्यूनस आयर्स में आयोजित जी-20 की बैठक के किनारे संपन्न हुई थी।

और दिसंबर, 2017 मे वांग यी ने भारत की यात्रा की थी- यह डोकलाम समस्या हल होने के तीन महीने बाद यात्रा हुई थी- सीमा पर झड़प के बाद दोनों देशों के बीच यह पहला उच्चस्तरीय दौरा था। इसी ने वुहान में होने वाली बैठक की जमीन तैयार की।

आज होने वाली आरआईसी की बैठक की अध्यक्षता रूस करेगा। यह नाजी जर्मनी पर रूस के विजय की 75वीं वर्षगांठ के विशेष मौके पर हो रही है।

लेकिन विदेश मंत्रालय ने बताया कि इसके अलावा वैश्विक महामारी की मौजूदा स्थिति, वैश्विक सुरक्षा की चुनौतियों और वित्तीय स्थायित्व तथा आरआईसी के बीच सहयोग भी इसके एजेंडे में शामिल होंगे।

इस बीच, भारत और चीन के बीच जारी तनाव में रूस एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक खिलाड़ी के तौर पर उभर कर सामने आया है। ऊपर की दोनों औपचारिक वार्ताओं के अलावा जिनमें रूस सीधे शामिल है। बताया जा रहा है कि 6 जून को रूस और चीन के बीच लेफ्टिनेंट जनरल के स्तर की बातचीत के पहले इस महीने की शुरुआत में विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला ने एलएसी पर तब की परिस्थितियों के बारे में रूसी राजदूत निकोलय कुदाशेव को अपडेट किया था।

उसके बाद गलवान घाटी में 15 जून की झड़प के बाद रूस में भारत के राजदूत डी बाला वेंकटेश वर्मा ने 17 जून को रूस के डिप्टी विदेश मंत्री इगोर मार्गुलोव से बात की थी। इस मौके पर रूसी विदेश मंत्रालय की तरफ से आए एक छोटे बयान में कहा गया था कि अधिकारियों ने क्षेत्रीय सुरक्षा जिसमें हिमालय इलाके में भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा पर जारी प्रगति भी शामिल थी, पर बातचीत की। भारत सरकार की तरफ से इस मसले पर कोई बयान नहीं जारी किया गया।

जबकि भारत और चीन एक दूसरे पर बात कर रहे हैं न कि एक दूसरे से तब मास्को का यह इन्गेजमेंट महत्वपूर्ण हो जाता है।

यह सर्वविदित है कि रूस और चीन के बीच पिछले कुछ सालों में घनिष्ठता बढ़ी है। मास्को-बीजिंग धुरी बेहद महत्वपूर्ण हो गयी है खास कर जब से वाशिंगटन हाल के महीनों में चीन के पीछे पड़ा है और रूस इस पूरे मामले में नाप-तोल कर कदम बढ़ा रहा है। खास कर कोविड19 के जवाब के मामले में।

नई दिल्ली का मानना है कि वाशिंगटन के रूस और चीन के प्रति रवैये ने दोनों को करीब ला दिया है।

वैसे रूस और चीन के बीच रिश्तों की डोर इतनी सीधी और सरल नहीं रही है। उसमें ढेर सारे उतार-चढ़ाव रहे हैं। लेकिन मौजूदा दौर के वैश्विक संकट ने एक बार फिर दोनों को एक दूसरे के करीब ला दिया है।

हालांकि इस बीच भारत और रूस के रिश्तों में वो पुरानी गर्मी नहीं रही। क्योंकि भारत ने रक्षा से लेकर तमाम सामानों की खरीद के मामले में दूसरे देशों का रुख करना शुरू कर दिया था। जिसका नतीजा यह रहा कि रूस ने दूसरे विकल्प तलाशने शुरू कर दिए। इसी कड़ी में पिछले दिनों पाकिस्तान के साथ उसकी नजदीकी दिखाई दी। दोनों देशों के बीच संयुक्त सैन्य अभ्यास भी हुए।

अब जबकि भारत को चीन के मामले में एक बार फिर मदद की जरूरत पड़ी है तो उसने रूस का रुख किया है। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि रूस का चीन पर अच्छा खासा प्रभाव है। और वह सीमा पर जारी इस तनाव को कम करने में मदद कर सकता है।

2017 के डोकलाम संकट के दौरान चीनी सरकार ने जिन कुछ राजनयिकों को उसके बारे में जानकारी दी थी उसमें रूसी राजनयिक भी शामिल थे। हालांकि उस समय उसे छुपा लिया गया था।

हालांकि 1962 के युद्ध में रूस ने भारत को समर्थन नहीं दिया था लेकिन 1971 के युद्ध में मास्को पूरी तरह से भारत के साथ खड़ा था। आज होने वाली आरआईसी विदेश मंत्रियों की बैठक में जयशंकर और वांग यी के पास एक दूसरे के सामने बैठने का पहला अवसर होगा।

बैठक में भारत-चीन के बीच तनाव का मुद्दा शामिल होने के सवाल पर रूस के विदेश मंत्री लावरोव ने पिछले हफ्ते कहा था कि ऐसा कोई एजेंडा नहीं शामिल है जो एक देश का दूसरे देश के साथ द्विपक्षीय स्तर पर हो। यह इस प्लेटफार्म का फार्मेट ही नहीं है।

गलवान घाटी में पिछले हफ्ते हुई घटना पर रूस ने बेहद तोल-मोल कर प्रतिक्रिया दी थी। 17 जून को रूसी राजदूत कुदाशेव ने ट्वीट कर कहा था कि एलएसी पर सेना के पीछे हटने के हम सभी कदमों का स्वागत करते हैं जिसमें दोनों विदेश मंत्रियों की बातचीत भी शामिल है। साथ ही पूरे मामले को लेकर आशावादी हैं।

रूसी न्यूज एजेंसी तास के मुताबिक राष्ट्रपति के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा कि भारत और चीन की सीमा पर हुए दोनों देशों के बीच सैन्य झड़प को लेकर क्रेमनिल निश्चित तौर पर चिंतित है। लेकिन इसके साथ ही इस बात में विश्वास करता है कि दोनों देश विवाद को आपस में हल कर लेंगे।

पेस्कोव ने कहा कि चीन और भारत की सीमा पर जो हो रहा है निश्चित तौर पर उस पर हमारा पूरा ध्यान है। लेकिन हमारा मानना है कि दोनों देश भविष्य में इस तरह की परिस्थितियों को रोकने के लिए जरूरी उपाय करने में सक्षम हैं। इसके साथ ही वह इलाके में स्थायित्व को भी सुनिश्चित करने में पूरी तरह से सक्षम हैं। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि राष्ट्रों के लिए यह बिल्कुल सुरक्षित इलाका है और उसमें सबसे पहले चीन और भारत शामिल हैं।

इसके साथ ही उन्होंने इस बात पर जोर देकर कहा कि चीन और भारत रूस के घनिष्ठ साझीदार और सहयोगी हैं। उन्होंने कहा कि आपसी सम्मान और लाभ पर निर्मित हमारा यह रिश्ता बेहद घनिष्ठ है।

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This post was last modified on June 23, 2020 12:36 pm

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