Friday, March 1, 2024

कॉर्पोरेट घरानों द्वारा बैंकों को चूना लगाना जारी, मोदी के दूसरे कार्यकाल में भी करोड़ों रुपये राइट-ऑफ

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूसरे कार्यकाल में भी बड़े पूंजीपतियों एवं कॉर्पोरेट घरानों द्वारा बैंकों को चूना लगाया गया। औसतन हर साल 2 लाख करोड़ रुपये से भी अधिक के कर्ज को बैंकों द्वारा राइट-ऑफ (बट्टे खाते) किया गया है। 2019 से 2023 के बीच बैंकों ने कुल 10.60 लाख करोड़ रुपये की रकम राइट-ऑफ कर दी है, जिसमें से 52.3% कर्ज बड़े कॉर्पोरेट समूहों द्वारा नहीं चुकता किये गये हैं।)

सुनकर हैरानी होती है। देश में 3 लाख ऐसे परिवार हो चुके हैं, जिनकी सालाना रिटर्न 1 करोड़ रुपये या उससे अधिक हो चुकी है। भारत सबसे तेज अर्थव्यवस्था बन चुका है। भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यस्था बनने से बस चंद वर्ष दूर है। 2047 तक भारत को विकसित भारत और विश्व गुरु बनाने की मुहिम में सरकार और विश्व की सबसे बड़ी पार्टी ने अपने रथों को हरी झंडी देकर देश में प्रचार के लिए रवाना किया। भारत में भी अब एप्पल और मर्सिडीज सहित 1.5 लाख से अधिक मूल्य के रेफ्रीजरेटर की बिक्री में भारी उछाल आया है। 

ये खबरें अब हैरान नहीं करती हैं, क्योंकि आयेदिन हमारे देश के अखबार और टीवी न्यूज़ में ऐसी खबरों को बताकर देशवासियों को गर्व की अनुभूति करने की नसीहत दी जाती है। लेकिन यही अमीर लोग, देश की रीढ़ समझे जाने वाले बैंकों की वित्तीय हालत पर कैसे पलीता लगा रहे हैं, के बारे में देश को शायद ही कोई जानकारी देने की जरूरत समझता है। 

संसद में भी अब सरकार ने राइट-ऑफ को स्वीकारा 

अपने दूसरे कार्यकाल में भी मोदी सरकार में बैंकों ने अपने ऋणों को बड़े पैमाने पर राइट ऑफ करने का सिलसिला खत्म नहीं किया है। यह बात जनचौक ने पिछले माह भी अपने पाठकों के संज्ञान में लाने का काम किया था कि मोदी शासनकाल में करीब 25 लाख करोड़ रुपये राइट-ऑफ किये जा चुके हैं। इसकी पुष्टि सोमवार 4 दिसंबर 2023 को केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री भागवत कराड ने संसद में अपने लिखित जवाब में कर दी है। 

बता दें कि वित्त राज्य मंत्री भागवत कराड ने यह जवाब लोकसभा सांसद अब्दुल खालिक, महेश साहू और एम बदरुद्दीन अजमल के द्वारा बैंकों के ऋण माफ किये जाने को लेकर उठाये गये सवाल के जवाब में दी थी। राज्य मंत्री के अनुसार पिछले 5 वर्षों के दौरान कुल 10.60 लाख करोड़ रुपये राइट ऑफ करने पड़े हैं। इनमें से  52.3% कर्ज बड़े कॉर्पोरेट समूहों का बताया जा रहा है। इस प्रकार पिछले 5 वर्षों के दौरान औसतन हर वर्ष 2 लाख करोड़ रुपये के कर्ज बट्टे खाते में डाल दिए गये।

विलफुल डिफॉल्टर्स (इरादतन कर्ज चुकाने में चूक करने वाले) लोगों का किस्सा

केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री कराड साहब ने विलफुल डिफॉल्टर्स के बारे में पूछे गये सवाल के जवाब में, कहा है कि सेंट्रल रिपोजिटरी ऑफ इंफॉर्मेशन ऑन लार्ज क्रेडिट्स (सीआरआईएलसी) डेटाबेस के मुताबिक, 31 मार्च 2023 तक कुल 2,623 कर्जदारों को विलफुल डिफॉल्टर्स के रूप में वर्गीकृत किया गया है। इस प्रकार देश के शेड्यूल कमर्शियल बैंकों (एससीबी) द्वारा कुल 1,96,049 करोड़ रुपये का बकाया विलफुल डिफ़ॉल्ट की श्रेणी में चला गया है।

वित्त राज्य मंत्री ने संसद में यह जानकारी भी दी कि यह सब रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया (आरबीआई) के दिशानिर्देश एवं अनुमोदित नीति के मुताबिक किया जाता है। इसमें अन्य चीजों के साथ-साथ, एनपीए के तहत यदि चार वर्ष पूरे हो जाते हैं तो ऐसी रकम को बैंकों की बैलेंस शीट से हटाने का प्रावधान है।  कराड ने यही भी जानकारी दी है कि बैंक अपनी बैलेंस शीट को क्लीन करने, टैक्स लाभ प्राप्त करने एवं आरबीआई के दिशानिर्देशों एवं अपने बोर्डों द्वारा अनुमोदित नीति के अनुसार पूंजी को अनुकूलित करने के अपने नियमित प्रयोग के हिस्से के तौर पर राइट-ऑफ से पड़ने वाले प्रभावों का मूल्यांकन करते रहते हैं।

ऐसा माना जा रहा है कि बैंकों एवं अखिल भारतीय वित्तीय संस्थानों के द्वारा 5 करोड़ रुपये और उससे अधिक रकम के कर्जदारों की कुछ क्रेडिट जानकारी को सीआरआईएलसी डेटाबेस में रिपोर्ट किया जाता है। इस बारे में वित्त राज्य मंत्री से जब लोकसभा सांसदों अपरूपा पोद्दार एवं पीआर नटराजन ने स्पष्टीकरण मांगा तो मंत्री का जवाब था, “…जानबूझकर कर्ज न चुकाने वालों को समझौता निपटान की अनुमति दिए जाने के पीछे प्राथमिक विनियामक उद्देश्य यह होता है कि ऋणदाताओं को बिना किसी देरी के पैसा वसूलने के लिए कई रास्ते अपनाने के लिए सक्षम बनाना। इसमें समय के नुकसान के अलावा, अत्यधिक देरी की वजह से परिसंपत्ति मूल्य में गिरावट का खतरा बना रहता है, और नतीजतन अंतिम वसूली में बाधाएं उत्पन्न होने लगती हैं।”

इसलिए कुलमिलाकर, सरकार के जवाब से यही समझा जा सकता है कि बैंकों के ऋणों को कॉर्पोरेट और उद्योगपतियों द्वारा राइट ऑफ किया जाना और विलफुल डिफाल्ट करना एक सामान्य नियम का हिस्सा हैं, और ये दाग अच्छे हैं।  

राइट-ऑफ आखिर होता क्या है?

इसे साधारण भाषा में कहें तो ऐसी रकम जिसे कर्जदार या खरीदार न चुका पाए, और निकट भविष्य में ऐसी रकम मिलने की संभावना नहीं रहो तो ऐसी रकम को आमतौर पर bad-debt कहा जाता है, और इसे बट्टे खाते में डाल दिया जाता है, ताकि बैलेंस शीट में ऐसी रकम को डालकर इसे भूल-चूक लेनी-देनी मानकर भुला दिया जाये। बैंकों के लिए ऐसी रकम को राइट-ऑफ कहे जाने की परंपरा है। बैंकों के लिए जिन ऋणों की वसूली करना संभव नहीं रह जाता है, उन्हें वे समय-समय पर राइट-ऑफ कर अपनी बैलेंस-शीट से हटा देते हैं। ऐसी रकम को अपनी बैलेंस शीट से हटा देने से पहले ये बैंक इन रकम के लिए प्रावधान कर देते हैं। तकनीकी तौर पर बैंक मान लेते हैं कि उनकी इतनी रकम डूब गई है, और अपने रिजर्व या इक्विटी से इतनी रकम का प्रोविजन कर दिया जाता है। 

औपचारिक तौर पर आधिकारिक जानकारी देते समय बैंकों और सरकार की ओर से यही दोहराया जाता है कि ये रकम अभी पूरी तरह से डूब गई नहीं समझा जाये। बैंकों द्वारा इनकी वसूली की प्रकिया जारी रहेगी। लेकिन देखने में यही आया है कि बैंकों के द्वारा अंततः इन ऋणों को डेट रिकवरी ट्रिब्यूनल के भरोसे छोड़ दिया जाता है ताकि वे इन ऋणों की वसूली के प्रयास को जारी रखें। 

लेकिन वित्तीय मामलों के जानकारों का मानना है कि भारत में आमतौर पर राइट-ऑफ किये जा चुके ऋणों की वसूली का प्रतिशत 5-6% से अधिक नहीं रहा है। लेकिन सबसे हैरानी की बात यह है कि भारत में हाल के वर्षों में अब हर तिमाही ऐसे ऋणों को राइट-ऑफ करने में तेजी आई है, जो बताता है कि अब भारतीय बैंकों के लिए आवश्यक नैतिक दबाव भी नहीं रहा। बैंकों के लिए भी अब सपनी स्लेट को साफ़-सुथरी रखना पहली प्राथमिकता बन गया है। संभवतः साफ़-सुथरी बैलेंस शीट से भारतीय वित्तीय सेहत की इमेज विदेशी निवेश के साथ-साथ सरकार की इमेज को भी सुधारने के काम आ रही हो। 

तो इस प्रकार पिछले 5 वर्षों के दौरान शेड्यूल कामर्शियल बैंकों ने वित्तीय वर्ष 2018-19 से 2022-23 के बीच 10.60 लाख करोड़ रुपये के ऋण माफ कर दिए हैं। इनमें से, बड़े उद्योगों एवं सेवाओं के लिए बट्टे खाते में डाले गए ऋणों की राशि 5.55 लाख करोड़ रुपये थी जो ऐसे सभी बट्टे खाते में डाले गए ऋणों का 52.5% आंकी गई है। हालांकि वित्तीय वर्ष 2022-23 के दौरान अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों ने दंडात्मक शुल्क के रूप में 5,309.80 करोड़ रुपये एकत्र किए हैं, जिसमें ऋण के भुगतान में देरी के खिलाफ जुर्माना शुल्क भी शामिल है। 

लेकिन मोदी सरकार और नीति आयोग तो सबकुछ हरा बता रहे हैं

उधर देश में सार्वजनिक बैंकों एवं शेड्यूल बैंकों की बैलेंस शीट को धो-पोंछ कर भारी मुनाफे में दिखाया जा रहा है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल भारत को 30 ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी बनाने की हुंकार भर रहे हैं, पूरे देश में भाजपा ने हर प्रदेश में विकसित भारत बनाने के नारों के साथ प्रचार अभियान को बड़े पैमाने पर शुरु कर दिया है। जबकि भारत सरकार के उपर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। मोदी सरकार के 9 वर्षों का लेखा-जोखा करें तो इस दौरान सरकार ने 155 लाख करोड़ रुपये का कर्ज खड़ाकर एक नया कीर्तिमान स्थापित कर दिया है। यह कर्ज 2014 से 2022 के बीच लिया गया है। 2014 से पहले सभी सरकारों के द्वारा 55 लाख करोड़ रुपये कर्ज का बोझ लादा गया था। 

आज देश में पेट्रोल, डीजल और घरेलू गैस पर सरकार ने सब्सिडी बंद कर दी है। इसी प्रकार देश में किसानों को सब्सिडी पर यूरिया खाद में भी भारी कटौती कर दी गई है। देश में सभी प्रमुख राजमार्गों पर टोल टैक्स भी जमकर वसूला जा रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर यह पैसा जा कहां रहा है, जो सरकार को इतने बड़े पैमाने पर नए-नए कर्ज की जरूरत पड़ती रहती है?

जीएसटी के मामले में भी देखें तो सरकार हर माह नए रिकॉर्ड वसूली के आंकड़े जारी करती है। इसी प्रकार आयकर वसूली में भी सरकार लगातार दावा करती है कि पहले की तुलना में रिकॉर्ड कलेक्शन हो रहा है। लेकिन जीएसटी और आईटी कलेक्शन के इन आंकड़ों को दिखाने का मकसद सिर्फ यह बताना होता है कि देश में तेज विकास की लहर है। 

यदि यह सही है और सरकार के पास भरपूर आय आ रही है तो सरकार को लगातार ज्यादा से ज्यादा कर्ज लेने की जरूरत क्यों पड़ रही है? कोविड-19 महामारी के दौरान जब दुनिया में पेट्रोल डीजल के दामों में तेज गिरावट का दौर चल रहा था, तब भारत में भी पेट्रोल-डीजल के दाम घटने चाहिए थे। लेकिन केंद्र सरकार ने तब बार-बार एक्साइज ड्यूटी में बढ़ोत्तरी कर दामों को स्थिर रखा, और उस दौरान भी उद्योग-धंधों को अचानक से ठप कर भी अपनी आय को बनाये रखने के लिए ये उपाय अपनाए। आज भी एक्साइज ड्यूटी कम नहीं की गई है। ये बचत फिर कहां छू मंतर हो गई? 

फिर सबसे बड़ा सवाल यह भी बनता है कि क्या देश में बड़े पूंजीपति और कॉर्पोरेट घराने वास्तव में इतने गरीब और असहाय हैं कि उन्हें बैंक कर्ज माफ़ी दे दें? वे तो 5 राज्यों में चुनावों के परिणाम देखकर इतने खुश हैं कि पिछले 7 दिनों से देश का शेयर बाजार हर दिन नई-नई ऊंचाइयां छू रहा है। हर दिन लाखों करोड़ रुपये की कमाई बता रही है कि भारतीय कंपनियों की एसेट में दिन-दूनी रात चौगुनी तरक्की हो रही है। लेकिन देश की जनता की गाढ़ी कमाई को कर्ज पर लेकर बाद में खुद को दिवालिया बताकर सारी रकम राइट ऑफ कराने वाले ये कॉर्पोरेट घराने आखिर ऐसा कर पाने की हिम्मत कैसे जुटा रहे हैं?

मार्च 2020 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोविड महामारी के दौरान जब देश में अचानक से लॉकडाउन की घोषणा की तो पूरे देश में नोटबंदी के बाद एक बार फिर से उससे भी भयानक आर्थिक तालाबंदी शुरू हो चुकी थी। रेल, यातायात के साधन और कल-कारखाने अचानक से बंद होने की वजह से देश के करोड़ों असंगठित मजदूरों और गरीबों के लिए शहरों एवं महानगरों से भागकर गांवों में जाने के अलावा कोई चारा नहीं रह गया था।

देश में भयानक भुखमरी न आ जाये, उसके लिए मोदी सरकार ने मनरेगा योजना के साथ-साथ 80 करोड़ गरीबों के लिए मुफ्त राशन योजना चलानी पड़ी। आज उस त्रासदी को खत्म हुए 2 वर्ष बीत चुके हैं। करोड़ों लोग रोजी-रोटी के लिए वापस शहरों की ओर रुख कर चुके हैं। लेकिन मोदी सरकार भी इस बात को भलीभांति जानती है कि हालात आज भी सामान्य नहीं हो पाए हैं, और संभवतः आगे भी इसमें सुधार की गुंजाइश नहीं है। वरना 5 विधानसभा चुनावों के ऐन वक्त पीएम मोदी को 5 किलो मुफ्त राशन को अगले 5 वर्षों तक आगे बढ़ाने की घोषणा करने की जरूरत नहीं पड़ती।

(रविंद्र पटवाल जनचौक की संपादकीय टीम के सदस्य हैं।)

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