देश भर के किसान उतरे सड़कों पर, संसद को चेताया- अध्यादेश वापस नहीं हुए तो सड़क पर होगी जंग

मोदी सरकार की किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ पूरे देश में कृषक सड़कों पर उतर आए हैं। आज सोमवार को मानूसन सत्र के पहले दिन राजधानी दिल्ली समेत, यूपी, बिहार, पंजाब, तेलंगना, पुडुचेरी, भुवेश्वर समेत तमाम दूसरे इलाकों में किसानों ने प्रदर्शन किया। इनमें बड़ी संख्या में महिलाएं भी शामिल हुईं। किसानों ने केंद्र सरकार के तीनों अध्यादेशों को कृषकों के खिलाफ बताते हुए उसे वापस लेने की मांग की। किसान संगठनों ने कहा कि वह आंदोलन को गांवों तक ले जाएंगे, ताकि केंद्र की किसान विरोधी नीतियों से उन्हें भी अवगत कराया जा सके।भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) ने भी कई जगह प्रदर्शन किया। संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष राकेश टिकैत जंतर मंतर पर प्रदर्शन करने जा रहे थे, उन्हें गाजियाबाद में पुलिस ने रोक दिया।

दिल्ली के जंतर मंतर पर किसानों ने जबरदस्त प्रदर्शन किया। मानसून सत्र के पहले सांकेतिक प्रदर्शन करने पहुंचे किसान संगठनों ने संसद सदस्यों से तीनों अध्यादेश को संसद में पास न होने देने की अपील की है। उन्होंने कहा कि इस अध्यादेश के पास हो जाने से किसान कॉरपोरेट का गुलाम हो जाएगा। किसानों ने कहा कि कोरोना काल में भी किसानों ने देश को अन्न के क्षेत्र में आत्म निर्भर बनाए रखने के लिए जी जान से मेहनत की, लेकिन उन्हें मोदी सरकार ने गलत सिला दिया है।

किसानों ने एलान किया है कि तीनों वो अब तीन कृषि अध्यादेशों के खिलाफ गांव-गांव प्रदर्शन करेंगे। अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के संयोजक वीएम सिंह ने कहा कि 30 सितंबर तक देश भर में किसान, सरकार की नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन करेंगे। दिल्ली में किसान संगठनों ने जबरदस्त प्रदर्शन किया। उन्होंने एलान किया है कि मानसून सत्र चलने तक सरकारी नीतियों के खिलाफ ऐसे प्रदर्शन लगातार जारी रहेंगे।

इस बीच अखिल भारतीय किसान सभा (टिकैत) सेे जुड़े तमाम किसानों ने भी कई जगह पर प्रदर्शन किया। उन्होंने केंद्र सरकार ने किसान विरोधी तीनों अध्यादेश वापस लेने की मांग की। राष्ट्रीय अध्यक्ष राकेेश टिकैत तमाम किसानों के साथ दिल्ली के जंतर मंतर पर जाने के लिए निकले थे, लेकिन पुलिस ने उन्हें गाजियाबाद के दिल्ली गेट पर रोक दिया। विरोध में राकेश टिकैत ने तमाम किसानों के साथ वहीं पर डेरा डाल दिया। उन्होंने वहीं पर प्रदर्शन किया।

‘अपनी मंडी अपना दाम, जय जवान, जय किसान’, ‘कॉरपोरेट भगाओ, देश बचाओ’, ‘किसान विरोधी कृषि अध्यादेश वापस लो’ और ‘संयम से आए हैं संयम से जाएंगे’ के नारों के साथ कई दर्जन किसान संगठनों के प्रतिधिनियों ने दिल्ली में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया। मानसून सत्र के पहले दिन किसान संगठनों ने सरकार से तीनों कृषि अध्यादेश वापस लेने, पेट्रोल की कीमतें आधी करने और प्रस्तावित बिजली बिल कानून को वापस लेने की मांग की।

अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (AIKSCC) के संयोजक वीएम सिंह ने कहा, “हमारे देश में नारा है जय जवान जय किसान, लेकिन हमारा किसान बर्बाद हो रहा है, आत्महत्या कर रहा है। सरकार की किसान विरोधी नीतियों के चलते किसान की हालत बद्तर हो रही है। इसलिए आज (14 सितंबर) को हम लोगों ने दिल्ली में सांकेतिक प्रदर्शन किया है, लेकिन अब किसान जब तक संसद चलेगी गांव-गांव में सरकार के विरोध में प्रदर्शन करेंगे।”

अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति ने संसद के चालू सत्र में सभी सांसदों और पार्टियों को पत्र लिखकर अपील की है कि वो किसान विरोधी कदमों की मुखालफ करें और तीनों अध्यादेश वापस कराएं। दिल्ली के साथ ही यूपी के कई जिलों और तहसीलों में किसान मजदूर संगठन के कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किया।

मेरठ और बिजनौर में भी किसानों ने अध्यादेश के खिलाफ विरोध जताया है। राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के आह्वान पर जिला सुल्तानपुर में किसानों ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को संबोधित ज्ञापन दिया। उन्होंने किसानों के हक में नारे भी लगाए। किसानों-मजदूरों ने ललकारा है भारत देश हमारा है, जब तक दुखी किसान मजदूर रहेगा धरती पर तूफान रहेगा, जैसे नारे किसानों ने लगाए।

उत्तराखंड के भिकियासैंण समेत कई और क्षेत्रों में भी किसानों ने सड़कों पर उतर कर किसान विरोधी नीतियों की मुखालफत की। इसके अलावा पटना, वैशाली, बेगूसराय समेत बिहार के तमाम दूसरे इलाकों से भी केंद्र सरकार के किसान विरोधी अध्यादेश के खिलाफ प्रदर्शन की खबरें हैं। पंजाब के बरनाला में किसानों ने जबरदस्त प्रदर्शन किया है। यहां तकरीबन 15 हजार किसानों ने रैली में शिरकत की।

अनियंत्रित ढंग से बढ़ती कोरोना महामारी के प्रकोप और आदिवासी क्षेत्रों में भारी बारिश के बावजूद छत्तीसगढ़ के विभिन्न क्षेत्रों में किसानों ने प्रदर्शन किया। अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति और भूमि अधिकार आंदोलन के आह्वान पर केंद्र सरकार द्वारा जारी किसान विरोधी अध्यादेशों के खिलाफ और ग्रामीण जनता की आजीविका बचाने की मांग पर सैकड़ों गांवों में हजारों किसानों और आदिवासियों ने संसद सत्र के पहले दिन प्रदर्शन किया।

आयोजकों के अनुसार प्रदेश में इस मुद्दे पर 25 से ज्यादा संगठन एकजुट हुए हैं, जिन्होंने 20 से ज्यादा जिलों में विरोध प्रदर्शन के कार्यक्रम आयोजित किए। इन संगठनों में छत्तीसगढ़ किसान सभा, आदिवासी एकता महासभा, छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन, हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति, राजनांदगांव जिला किसान संघ, छग प्रगतिशील किसान संगठन, दलित-आदिवासी मंच, क्रांतिकारी किसान सभा, छग किसान-मजदूर महासंघ, छग प्रदेश किसान सभा, जनजाति अधिकार मंच, छग किसान महासभा, छमुमो (मजदूर कार्यकर्ता समिति), परलकोट किसान संघ, अखिल भारतीय किसान-खेत मजदूर संगठन, वनाधिकार संघर्ष समिति, धमतरी और आंचलिक किसान सभा, सरिया आदि संगठन प्रमुख हैं।

छत्तीसगढ़ में इन संगठनों की साझा कार्यवाहियों से जुड़े छग किसान सभा के नेता संजय पराते ने आरोप लगाया कि इन कृषि विरोधी अध्यादेशों का असली मकसद न्यूनतम समर्थन मूल्य और सार्वजनिक वितरण प्रणाली की व्यवस्था से छुटकारा पाना है।

उन्होंने कहा कि देश का जनतांत्रिक विपक्ष और किसान और आदिवासी इन कानूनों का इसलिए विरोध कर रहे हैं, क्योंकि इससे खेती की लागत महंगी हो जाएगी, फसल के दाम गिर जाएंगे, कालाबाजारी और मुनाफाखोरी बढ़ जाएगी और कॉरपोरेटों का हमारी कृषि व्यवस्था पर कब्जा हो जाने से खाद्यान्न आत्मनिर्भरता भी खत्म जो जाएगी। यह किसानों और ग्रामीण गरीबों की बर्बादी का कानून है।

छत्तीसगढ़ में किसान संगठनों के साझे मोर्चे की ओर से विजय भाई, ऋषि गुप्ता, बालसिंह, आलोक शुक्ल, सुदेश टीकम, आई के वर्मा, राजिम केतवास, तेजराम विद्रोही, पारसनाथ साहू, अनिल शर्मा, केशव शोरी, नरोत्तम शर्मा, रमाकांत बंजारे, आत्माराम साहू, नंदकिशोर बिस्वाल, संतोष यादव, सुखरंजन नंदी, राकेश चौहान, विशाल वाकरे, कृष्णा कुमार लकड़ा, बिफन यादव, वनमाली प्रधान, लंबोदर साव, सुरेन्द्रलाल सिंह, पवित्र घोष आदि ने अपने क्षेत्रों में किसानों के प्रदर्शन की अगुवाई की।

पुडुचेरी में भी किसान सड़कों पर उतरे। उन्होंने सीधे आरोप लगाते हुए कहा कि नरेंद्र मोदी गरीबों के खिलाफ काम कर रहे हैं। तेलंगाना के हिस्सों के साथ ही और भुवनेश्वर में भी किसानों ने मोदी सरकार की नीतियों के खिलाफ मुखालफत की है।

तकरीबन सभी जगह किसानों ने राष्ट्रपति को संबोधित ज्ञापन भेजा है। इसमें कहा गया है कि हम भारत के किसान, अपने संगठन ‘अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति’, जिसके 250 से अधिक किसान तथा कृषि मजदूर संगठन घटक हैं, आपको यह पत्र लिखकर यह उम्मीद कर रहे हैं कि भारत की सरकार ने कोरोना लॉकडाउन के दौरान जो तेज हमला देश भर के किसानों पर किया है, उसका विरोध करने में और किसानों को बचाने में आप हमारा साथ देने की कृपा करेंगे।

कई सालों से हम इन समस्याओं को उठाते रहे हैं और उम्मीद करते रहे हैं कि सरकार इन्हें हल करेगी और अगर नहीं हल करेगी तो कम से कम विपक्षी दल इन सवालों पर किसानों का साथ देंगे। हम बताना चाहते हैं कि इस बीच जैसे-जैसे कोविड-19 महामारी आगे बढ़ती गई है, हमने कड़ी मेहनत करके यह सुनिश्चित किया है कि देश के खाद्यान्न भंडार भरे रहें तथा इतना पर्याप्त अनाज देश में मौजूद रहे कि किसी भी नागरिक को भूखा रहने की जरूरत नहीं पड़े।

यही वह आधार है जिस पर हम खड़े होकर उम्मीद करते हैं कि आप सब एक आवाज में सुनिश्चित करेंगे कि देश के कड़ी मेहनत करने वाले किसान और मजदूर, जो देश की कुल श्रमशक्ति का आधे से ज्यादा हिस्सा हैं, इस वजह से संकट का सामना न करें कि उनकी समस्याओं को किसी ने सुना ही नहीं।

ज्ञापन में कहा गया है कि हमें इस बात से बहुत निराशा हुई कि जब आपकी सरकार ने अपने कृषि सुधार पैकेज की घोषणा की तो उसमें न केवल हमारी समस्याओं को संबोधित नहीं किया गया, बल्कि उन्हें बढ़ा दिया गया है।

सरकार ने एक ओर तीन नये अध्यादेश पारित किए हैं जो ग्रामांचल में तमाम किसानी की व्यवस्था को, खाद्यान्न की खरीद, परिवहन, भण्डारण, प्रसंस्करण, बिक्री को, यानी तमाम खाने की श्रंखला को ही बड़ी कंपनियों के हवाले कर देगी और किसानों के साथ छोटे दुकानदारों तथा छोटे व्यवससियों को बरबाद कर देगी। इससे विदेशी और घरेलू कॉरपोरेट तो मालामाल हो जाएंगे, पर देश के सभी मेहनतकश, विशेषकर किसान नष्ट हो जाएंगे।

अमल किए गए यह तीनों किसान विरोधी अध्यादेश दिनांक 05.06.2020 को जारी किए गए थे और अब इन्हें संसद में पारित कराकर कानून की सूरत देने की योजना है। इन तीनों अध्यादेशों, (क) कृषि उपज, वाणिज्य एवं व्यापार (संवर्धन और सुविधा) अध्यादेश 2020; (ख) मूल्य आश्वासन पर (बंदोबस्ती और सुरक्षा) समझौता कृषि सेवा अध्यादेश 2020; (ग) आवश्यक वस्तु अधिनियम (संशोधन) 2020 को वापस लिया जाना चाहिए और इन्हें कानून नहीं बनने देना चाहिए।

ये अध्यादेश अलोकतांत्रिक हैं और कोविड-19 तथा राष्ट्रीय लॉकडाउन के आवरण में अमल में लाए गए हैं। ये किसान विरोधी हैं। इनसे फसल के दाम घट जाएंगे और बीज सुरक्षा समाप्त हो जाएगी। इससे उपभोक्ताओं के खाने के दाम बढ़ जाएंगे। खाद्य सुरक्षा तथा सरकारी हस्तक्षेप की संभावना समाप्त हो जाएगी। ये अध्यादेश पूरी तरह भारत में खाने तथा खेती व्यवस्था में कॉरपोरेट नियंत्रण को बढ़ावा देते हैं और उनके जमाखोरी और कालाबाजारी को बढ़ावा देंगे तथा किसानों का शोषण बढ़ाएंगे। किसानों को वन नेशन वन मार्केट नहीं वन नेशन वन एमएसपी चाहिए।

राष्ट्रपति को भेजे ज्ञापन में कहा गया है कि दूसरा बड़ा खतरनाक कदम है बिजली बिल 2020। इस नए कानून में गरीबों, किसानों तथा छोटे लोगों के लिए अब तक दी जा रही बिजली की तमाम सब्सिडी समाप्त हो जाएगी, क्योंकि सरकार का कहना है कि अब बड़ी व विदेशी कंपनियों को निवेश करने के लिए प्रोहत्साहन देना है और एक कदम उसमें उन्हें सस्ती बिजली देना भी है। इसलिए अब सभी लोगों को एक ही दर पर, बिना स्लेब के लगभग 10 रुपये प्रति यूनिट बिजली दी जाएगी।

राष्ट्रपति को भेजे ज्ञापन में कहा गया है कि किसानों की सब्सिडी बाद में नकद हस्तांतरित की जाएगी। केंद्र सरकार को यह बिल वापस लेना चाहिए। कोरोना दौर का किसानों, छोटे दुकानदारों, छोटे और सूक्ष्म उद्यमियों तथा आमजन का बिजली का बिल माफ करना चाहिए। डीबीटी योजना को नहीं अमल करना चाहिए।

जब भाजपा की सरकार 2014 में बनी थी, उस समय से अब तक डीजल पर एक्साइज ड्यूटी 28 रुपये लीटर और पेट्रोल पर 24 रुपये लीटर बढ़ा दी गई है, जिसके कारण वैट ड्यूटी भी बढ़ गई है, हालांकि तब अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर तेल के दाम 106 डालर प्रति बैरल थे और आज 40 डालर प्रति बैरल हैं और इसके बावजूद डीजल पेट्रोल के दाम आप की सरकार ने बढ़ा रखे हैं। आपकी सरकार देश के गरीबों से, खासतौर से किसानों से 52 रुपये प्रति लीटर डीजल और पेट्रोल के वसूल रही है और उनका जीना मुश्किल किया हुआ है।

इस परिस्थिति में हम आपको यह पत्र लिख रहे हैं, इस उम्मीद के साथ कि आप इन तीनों अध्यादेशों का तथा बिजली बिल 2020 और डीजल के दाम में टैक्स घटाकर उसका दाम आधा कराएंगे।

This post was last modified on September 14, 2020 10:24 pm

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