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जासूसों की ‘गिरफ्त’ में थे माननीय, महामहिम और मंत्री से लेकर विपक्षी नेता, सूची में 40 पत्रकार भी शामिल

उच्चतम न्यायालय के माननीय चीफ जस्टिस और संविधान के कस्टोडियन अन्य जज साहबान, महामहिम राष्ट्रपति जी ,लोकसभा के स्पीकर,संसद में देश भर से चुने सांसद साहबान सभी से सवाल है कि क्या देश में गैरकानूनी सरकारी सर्विलांस की इजाजत है? क्या हम लोकतंत्र में रह रहे हैं या देश हिटलर के नाजी कैम्पों में बदल गया है हमारा भारतवर्ष? मोदी सरकार में क्या इजरायल से भारत की प्रगाढ़ मित्रता का यह राज है जो इजराइल की एक सर्विलांस तकनीक कंपनी पेगासस स्पायवेयर के जरिये यहाँ के शीर्ष स्तर के न्यायाधीशों, मंत्रियों, विपक्षी नेताओं, पत्रकारों, , कारोबारियों, सरकारी अधिकारियों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गैरकानूनी जासूसी कराये जाने के रूप में सामने आया है?

तैयार रहें द वायर उन नामों को अगले कुछ दिनों में अपने सहयोगियों के साथ एक-एक करके उजागर करने जा रहा है, जिसकी पुष्टि यह विभिन्न श्रेणियों के तहत कर पाने में कामयाब रहा है। निशाना बनाने के लिए चुने गए नामों में 40 से ज्यादा पत्रकार, तीन प्रमुख विपक्षी नेताओं, एक संवैधानिक प्राधिकारी, नरेंद्र मोदी सरकार में दो पदासीन मंत्री, सुरक्षा संगठनों के वर्तमान और पूर्व प्रमुख एवं अधिकारी और बड़ी संख्या में कारोबारियों के नाम शामिल हैं।

वॉशिंगटन पोस्ट ने माइक्रोसॉफ्ट की एक रिपोर्ट के हवाले से बताया कि कैंडिरू नाम की फर्म ने ये जासूसी की है। यह फर्म उस इंडस्ट्री का हिस्सा है, जो सरकारों, इंटेलिजेंस और ऐसी ही दूसरी एजेंसियों को जासूसी की तकनीक और उपकरण बेचती है। इजराइल की एक हैकिंग फर्म ने दुनियाभर में सरकारों को जासूसी में मदद की है। दुनियाभर में 100 से ज्यादा लीडर्स, मानवाधिकार कार्यकर्ता, दूतावासों में काम करने वाले, पत्रकार और असहमति जताने वाले लोगों की जासूसी की गई है। सूत्रों के मुताबिक, इन देशों में भारत भी शामिल है।

साइबर सिक्योरिटी रिसर्च ग्रुप सिटिजन लैब की रिपोर्ट के मुताबिक, इसकी संभावना है कि कैंडिरू ने मिडिल ईस्ट और एशिया के देशों को जासूसी के उपकरण बेचे हैं। सिटिजन लैब ने ऐसे लोगों की पहचान की है, जो कैंडिरू के सॉफ्टवेयर का शिकार हुए और इसी आधार पर माइक्रोसॉफ्ट ने अपनी रिपोर्ट भी बनाई है। सरकारों ने इन जासूसी उपकरणों का इस्तेमाल स्वतंत्र रूप से जासूसी के लिए किया।

ये रिपोर्ट उस वक्त सामने आई है, जब उन साइबर हथियारों को लेकर चिंता जाहिर की जा रही है जो कि पहले कुछ देशों तक ही सीमित थे। अब ये तेजी से बढ़ते जा रहे हैं। असहमति जाहिर करने वालों और विरोधियों की इस तरह की जासूसी से क्रिमिनल हैकिंग का खतरा भी बढ़ता जा रहा है। इनमें वसूली के लिए की जाने वाले कैंपेन भी शामिल हैं, जिसने हाल ही में अमेरिका में ऑयल सप्लाई और मीट प्रोडक्शन को बाधित कर दिया था।

रिसर्च में कहा गया है कि कैंडिरू ने सरकारों को अपने टूल्स इस्तेमाल करने के लिए दिए और सरकारें इनका इस्तेमाल नागरिकों और देश की सीमाओं से बाहर रह रहे आलोचकों को चुप करने के लिए कर रही हैं। इन टूल्स का इस्तेमाल फिलिस्तीन, ईरान, लेबनान, यमन, स्पेन, ब्रिटेन, तुर्की, अरमेनिया और सिंगापुर में किया गया।

इस तरह के रैनसमवेयर को लेकर हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन को चेतावनी भी दी थी। उन्होंने कहा था कि वो अपने देश में बैठे क्रिमिनल ग्रुपों की पहचान करें, वरना नतीजे भुगतने होंगे। हालांकि, जासूसी उपकरणों की इंडस्ट्री को लेकर अमेरिका उतना ज्यादा आक्रामक नहीं दिखाई देता।

माइक्रोसॉफ्ट की डिजिटल सिक्योरिटी यूनिट के जनरल मैनेजर क्रिश्चियन गुडविन ने कहा कि प्राइवेट सेक्टर की कंपनियां साइबर वेपन बना रही हैं और उन्हें बेच रही हैं, ये उपभोक्ताओं, व्यापार और हर तरह की सरकार के लिए खतरनाक है।

देश के चोटी के 40 पत्रकारों की जासूसी पेगासस सॉफ़्टवेअर के ज़रिए की गई है। इसमें ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’, ‘द हिन्दू’, ‘इंडियन एक्सप्रेस’, ‘इंडिया टुडे’, ‘न्यूज़ 18’ और ‘द वायर’ के पत्रकार शामिल हैं।’द वायर’ ने एक ख़बर में यह दावा किया है। ‘एनडीटीवी’ ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा है कि इसके अलावा ‘संवैधानिक पद पर बैठे एक व्यक्ति’ और विपक्ष के तीन नेताओं की जासूसी भी स्पाइवेयर से की गई है।लीक हुई लिस्ट में हिंदुस्तान टाइम्स के शिशिर गुप्ता, द वायर के फाउंडिंग एडिटर सिद्धार्थ वरदराजन और एमके वेणु। लिस्ट में एक मेक्सिको के पत्रकार सिसिलियो पिनेडा बिर्तो का भी नाम है जिनकी हत्या हो गई। एक अन्य पत्रकार सुशांत सिंह, जो इंडियन एक्सप्रेस में डिप्टी एडिटर हैं, को जुलाई 2018 में तब निशाना बनाया गया, जब वे अन्य रिपोर्ट्स के साथ फ्रांस के साथ हुई विवादित रफ़ाल सौदे को लेकर पड़ताल कर रहे थे।

इसमें हिंदुस्तान टाइम्स समूह के संपादकीय पेज के संपादक और पूर्व ब्यूरो चीफ प्रशांत झा, रक्षा संवाददाता राहुल सिंह, कांग्रेस कवर करने वाले पूर्व राजनीतिक संवाददाता औरंगजेब नक्शबंदी और इसी समूह के अख़बार मिंट के एक रिपोर्टर शामिल हैं।अन्य प्रमुख मीडिया घरानों में भी कम से कम एक पत्रकार तो ऐसा था, जिसका फोन नंबर लीक हुए रिकॉर्ड में दिखाई देता है। इनमें इंडियन एक्सप्रेस की ऋतिका चोपड़ा (जो शिक्षा और चुनाव आयोग कवर करती हैं), इंडिया टुडे के संदीप उन्नीथन (जो रक्षा और सेना संबंधी रिपोर्टिंग करते हैं), टीवी 18 के मनोज गुप्ता (जो इन्वेस्टिगेशन और सुरक्षा मामलों के संपादक हैं), द हिंदू की विजेता सिंह (गृह मंत्रालय कवर करती हैं) शामिल हैं, और इनके फोन में पेगासस डालने की कोशिशों के प्रमाण मिले हैं।

इसी तरह स्वतंत्र पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी को भी तब निशाना बनाया गया था, जब वे वायर के लिए लिख रही थीं। सूची में द पायनियर के इनवेस्टिगेटिव रिपोर्टर जे. गोपीकृष्णन का भी नाम है, जिन्होंने 2जी टेलीकॉम घोटाला का खुलासा किया था।

कई ऐसे वरिष्ठ पत्रकार, जिन्होंने मुख्यधारा के संगठनों को छोड़ दिया है, वे भी लीक हुए डेटा में संभावित लक्ष्य के रूप में दिखाई देते हैं।ऐसे लोगों में पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा रिपोर्टर सैकत दत्ता, ईपीडब्ल्यू के पूर्व संपादक परंजॉय गुहा ठाकुरता, जो अब नियमित तौर पर न्यूज़क्लिक वेबसाइट के लिए लिखते हैं, टीवी 18 की पूर्व एंकर और द ट्रिब्यून की डिप्लोमैटिक रिपोर्टर स्मिता शर्मा, आउटलुक के पूर्व पत्रकार एसएनएम आब्दी और पूर्व डीएनए रिपोर्टर इफ्तिखार गिलानी का नाम शामिल है।द वायर द्वारा किए डेटा विश्लेषण से पता चलता है कि ऊपर उल्लिखित अधिकांश नामों को 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले 2018-2019 के बीच निशाना बनाया गया था। झारखंड के स्वतंत्र पत्रकार रूपेश कुमार सिंह का भी नाम इस सूची में शामिल है। जनचौक से बातचीत में उन्होंने कहा कि ‘हाँ, इसमें मेरा भी नाम है और मेरा भी फोन टेप हुआ है। इस पर मेरा यही कहना है कि फोन सर्विलांस पर रखो या जेल में डाल दो। जब तक जिंदा रहूँगा, जनपक्षीय लेखन जारी रहेगा।’

व्हाट्सअप ने साल 2019 में NSO पर आरोप लगाया था कि इसके स्पाइवेयर पेगासस का इस्तेमाल मई 2019 में दुनियाभर में व्हाट्सअप के 1400 यूजर्स को टारगेट करने के लिए किया गया। इन लोगों में भारत के कई मानवाधिकार कार्यकर्त्ता, वकील और एक्टिविस्ट शामिल थे।जिन 121 भारतीय नागरिकों की सर्विलांस हुई थी, उनमें भीमा कोरेगांव मामले के वकील निहाल सिंह राठौड़, एल्गार परिषद केस के आरोपी आनंद तेलतुंबडे, बस्तर की मानवाधिकार वकील बेला भाटिया, एक्टिविस्ट सुधा भारद्वाज की वकील शालिनी गेरा जैसे लोग शामिल हैं।दिसंबर 2020 में अल जजीरा के कई पत्रकारों पर पेगासस के जरिये जासूसी करने की खबर सामने आई थी।

फ्रांस की ग़ैरसरकारी संस्था ‘फ़ोरबिडेन स्टोरीज़’ और ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल’ ने लीक हुए दस्तावेज़ का पता लगाया और ‘द वायर’ और 15 दूसरी समाचार संस्थाओं के साथ साझा किया। इसका नाम रखा गया पेगासस प्रोजेक्ट। ‘द गार्जियन’, ‘वाशिंगटन पोस्ट’, ‘ला मोंद’ ने 10 देशों के 1,571 टेलीफ़ोन नंबरों के मालिकों का पता लगाया और उनकी छानबीन की। उसमें से कुछ की फ़ोरेंसिक जाँच करने से यह निष्कर्ष निकला कि उनके साथ पेगासस स्पाइवेअर का इस्तेमाल किया गया था।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

This post was last modified on July 19, 2021 12:10 am

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