Monday, October 25, 2021

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योगी का फैसला दिल्ली को नहीं, नागपुर को करना है!

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संघ-भाजपा और योगी की तमाम तिकड़मी राजनीति के बावजूद उनके सामने यहीं एक बड़ा अवरोधक आ खड़ा होता है। वह है-कोरोना संक्रमण से बेहाल और तबाह हुए लोगों के प्रति शासन का रवैया। शिक्षक हों या आम लोग, अवर्ण हों या सवर्ण-इस मामले में सभी सरकार से बुरी तरह निराश हैं। उनमें सरकार के प्रति आक्रोश है। इसमें शायद ही किसी को शक हो कि कोरोना से सम्बन्धित यूपी सरकार के आंकड़े वास्तविकता से कोसों दूर हैं। इसके लिए दूरबीन लेकर साक्ष्य खोजने की जरूरत नहीं। गोमती से गंगा के किनारे तक इसके गवाह हैं। क्या यूपी के लोग अपने-अपने निजी दर्द और बेहाली को भुलाकर पिछली बार की तरह सिर्फ जाति, वर्ण और मंदिर-मस्जिद के नाम पर वोट कर देंगे? क्या उन्हें अस्पताल, डाक्टर, क्सीजन, दवाओं, एंबुलेंसों की भारी किल्लत और घर के तमाम कमाऊ लोगों के बेरोजगार होकर घर बैठ जाने की बेबसी की याद नहीं आयेगी? यूपी के चुनाव को लेकर अभी बहुत सारे अगर-मगर हैं। संघ-भाजपा कुछ महीने पहले तक जितना आश्वस्त लगते थे, कोरोना की दूसरी लहर के बाद उनमें वैसी आश्वस्ति नहीं है। पिछले सप्ताह नेतृत्व-परिवर्तन की जो नाकाम कोशिश हुई और अब भी केंद्रीय और प्रांतीय नेतृत्व के बीच जो तनातनी दिख रही है, उसके पीछे सन् 2024 की सियासी बेचैनी एक बड़ा कारण है। पर फैसला तो नागपुर ही करेगा! दिल्ली के वश में कुछ भी नहीं है।

भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेता चाहे जो समझें पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अब भी अपनी भावी राजनीति के लिए जरूरी चेहरा मानता है। अगर ऐसा नहीं होता तो पिछले सप्ताह ही योगी की कुर्सी उलट गई होती। प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने उन्हें सत्ता से बेदखल कर दिया होता और उऩकी जगह पिछड़े वर्ग के किसी नेता को मुख्यमंत्री बनाया होता। नये नेता के ‘डिप्युटी’ के रूप में अपने पसंदीदा अफसर से एमएलसी बने अरविन्द शर्मा को स्थापित कर दिया होता। शर्मा के कैबिनेट में शामिल होने का विकल्प अब भी खुला हुआ है। फिलहाल, संघ-कृपा से योगी ने फिलहाल एक बड़ा संकट पार कर लिया है। हालांकि पाचवें साल के इन सियासी थपेड़ों से अब वह थोड़े सुस्त दिख रहे हैं।

हम इस लेख में कोरोना-मोर्चे पर योगी सरकार की कुख्यात विफलताओं की चर्चा करने से पहले उनकी कुछ राजनीतिक सफलताओं की चर्चा से बात शुरू करते हैं। बीते चार सालों के दौरान सरकार एक मोर्चे पर काफी ‘सफल’ रही। ये सफलता है-उसका बेजोड़ ‘मीडिया-प्रबंधन!’ यूपी के प्रमुख अखबारों-न्यूज चैनलों आदि में कोई भी पत्रकार अब यूपी सरकार की आलोचना नहीं करता। उस पर सवाल नहीं उठाता या उसकी कमियां नहीं गिनाता। यह चार वर्षों से लगभग ‘मीडिया-उसूल’ बना हुआ है। लेकिन उसी मीडिया को पूरी आजादी है कि वह मरियल हो चुके विपक्षी दलों और उनके नेताओं की चाहे जितनी आलोचना कर ले! इच्छा हो तो उनके विरुद्ध अपशब्दों का भी इस्तेमाल करे!

राष्ट्रीय कहे जाने वाले मीडिया में भी इससे ज्यादा अलग परिदृश्य नहीं है। हाथरस जैसे कुछेक मामलों पर सरकार की थोड़ी-बहुत आलोचना जरूर हुई थी पर उसमें भी ज्यादा जोर पुलिस के एडीजी, डीआईजी, एसपी-कलक्टर आदि की भूमिका पर था। मुख्यधारा के मीडिया ने आमतौर पर सरकार के नेतृत्व पर सवाल नहीं उठाये। स्वतंत्र मीडिया यानी न्यूज़ पोर्टल्स और वेबसाइटों आदि ने सरकार की आलोचना की तो उनमें कुछ को सबक भी सिखाया गया!  कुछ पर मामले ठोके गये तो कुछ को रास्ते में ही गिरफ्तार कर लिया गया। एक मलयालम वेबसाइट के लिए काम करने वाले सिद्दीक कप्पन आज तक जेल में बंद हैं। उन पर UAPA सहित अनेक संगीन धाराएं लगाई गई हैं। 

अपने चार साल के कार्यकाल के दौरान योगी सरकार के खाते में ऐसी कुछ और भी ‘उपलब्धियां’ हैं। पारंपरिक संसदीय विपक्ष को सूबाई राजनीति में अभूतपूर्व ढंग से निष्क्रिय कर देना उनकी दूसरी बड़ी कामयाबी है। इसे ‘विपक्षी-खेमे का प्रबंधन’ कहा जा सकता है। हालांकि इसमें मुख्य योगदान केंद्र का है। सीबीआई और ईडी जैसी एजेंसियां केंद्र के अधीनस्थ हैं। पर यूपी सरकार ने भी अपनी एजेंसियों के जरिये विपक्षी नेताओं को खासा डरा रखा है। सूबे की राजनीति में ऐसा पहले कभी नहीं देखा गया। यह नयी भाजपा की नयी शैली है! नतीजा सामने है- जो सरकार हर दिन कोई न कोई विवादास्पद कदम उठाती है, वह विपक्ष की तरफ से लगभग चुनौती विहीन है। सन् 2017 के बाद कुछेक ही मौके आये होंगे, जब मुख्य विपक्षी समाजवादी पार्टी ने  सड़क पर उतर कर सरकार के विरुद्ध आवाज उठाया हो!

अगर पार्टी के कार्यकर्ता सड़क पर आ भी गये तो नेता अपने आलीशान बंगले से बाहर नहीं निकले। किसी जन-सभा या अभियान में भी उन्हें नहीं देखा गया। सुश्री मायावती की बहुजन समाज पार्टी तो वैसे भी सड़क की लड़ाई लड़ने में विश्वास नहीं करती। वह यदा-यदा सिर्फ ट्वीट करती है या कभी-कभी प्रेस बयान जारी कर देती है। सपा के अध्यक्ष अखिलेश यादव भी ट्वीट पर काफी भरोसा करते हैं। पता नहीं, मायावती और अखिलेश के सामाजिक-आधार के अपेक्षाकृत गरीब हिस्सों पर उसका क्या असर होता हो! संसदीय-राजनीति की दोनों प्रमुख पार्टियों की ‘सुसुप्ता-अवस्था’ में अगर थोड़ी बहुत सत्ता-विरोधी राजनीतिक हलचल होती है तो वह जमीनी स्तर पर काम करने वाले तरक्कीपसंद राजनीतिक समूहों या मोर्चों के कार्यकर्ताओं के स्तर पर ही होती है। शायद इसलिए कि इन समूहों के नेता कभी सरकार में नहीं रहे। उनके खिलाफ सीबीआई-ईडी या ऐसी एजेंसियों को नहीं लगाया जा सकता।

इधर किसान आंदोलन में शामिल संगठन और समुदाय भी पश्चिम यूपी के कुछ जिलों में सरकार के विरुद्ध महापंचायत और अन्य गतिविधियां चला रहे हैं। सपा-बसपा के मुकाबले कांग्रेस ज्यादा सक्रिय दिखती है। पर कांग्रेस के पास यूपी में उल्लेखनीय जनाधार नहीं बचा है। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व और रणनीतिकारों में ज्यादातर लोग अब भी उच्चवर्णीय हिन्दू या कुलीन मुस्लिम समुदाय से आये हैं। बताने की जरूरत नहीं कि हिंदी-भाषी क्षेत्र के उच्च वर्णीय हिन्दू समुदाय का बड़ा हिस्सा काफी समय से भाजपा के साथ खड़ा है। तीन प्रमुख कारणों से वह भाजपा-संघ के नजदीक गया है। ये कारण हैं-भाजपा-संघ की मंदिर-मस्जिद राजनीति, आरक्षण पर उसकी नीति-रणनीति और वर्चस्व के समूहों का जबर्दस्त तुष्टीकरण! सवर्णों को लगता है कि उनके पारंपरिक आरक्षण-विरोध को सिर्फ भाजपा-संघ ने राजनीतिक-स्वर और अमलीजामा पहनाया। उन्हें इस बात से मतलब नहीं कि बेरोजगारी के इस तूफानी अंधड़ में कहां और कितना बचा है रोजगार! इसके बावजूद संघ-भाजपा ने यूपी के शूद्रों(पिछड़ों) में भी अपनी पैठ बहुत बढ़ाई है। इस विस्मयकारी परिघटना के कई दिलचस्प कारण हैं। सबसे बड़ा कारण तो है-विपक्षी खेमे में ऐसे किसी संगठन या दल का सख्त अभाव जो हाशिये के इन समुदायों को मुद्दों पर गोलबंद कर सके!

इस तरह संघ-सहयोग से योगी सरकार ने जो दो ‘सफलताएं’ दर्ज कराई हैं, उन्हें चुनावी दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जबर्दस्त मीडिया-प्रबंधन और पारंपरिक विपक्षी खेमे का प्रबंधन-इन दो सफलताओं से उसमें संघ को अब भी संभावना नजर आती है। मोदी-शाह भले योगी से नाराज हों पर इस मायने में यूपी की योगी सरकार के काम करने के तरीके और केंद्र की मोदी सरकार के तरीके में बहुत साम्य है। मीडिया-प्रबंधन और विपक्ष-प्रबंधन के मामले में मोदी सरकार को काफी कामयाब माना जाता रहा है। हालांकि बंगाल, केरल और तमिलनाडु के चुनावी नतीजों के बाद विपक्ष-प्रबंधन में इन दिनों वह कुछ कमजोर पड़ती नजर आ रही है। मोदी सरकार की तरह ही योगी सरकार ने गैर-पारंपरिक मीडिया मंचों यानी न्यूज पोर्टल्स आदि पर जो स्वतंत्र मिजाज के पत्रकार और संपादक योगी सरकार की आलोचना या उनकी कमियां गिनाते हैं, उनकी गिरफ्तारी तक करा लेती है। कइयों पर मुकदमे चल रहे हैं। कुछ दलों-संगठनों के राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर भी खूब मुकदमे दर्ज कराये गये हैं। कांग्रेस, सपा, पीपुल्स फ्रंट, भाकपा(माले) और अन्य वाम संगठनों के कार्यकर्ता इससे सर्वाधिक प्रभावित हैं। इस मामले में सरकार का रिकार्ड़ इमरजेंसी के दौर की इंदिरा सरकार को भी पीछे छोड़ चुका है। स्वतंत्र पत्रकारों को डराने-धमकाने और मुख्यधारा के मीडिया को पटाने के पीछे मुख्य कारण यही है कि वे सरकार की खामियां न दिखायें।

यह बात सही है कि आजादी के बाद से ही प्रदेश की आई-गई तमाम सरकारों के कामकाज का रिकार्ड कोई बहुत अच्छा नहीं रहा। पर मौजूदा सरकार का रिकार्ड क्या है? यूपी आज भी मानव विकास के सूचकांक (एचडीआई) में अपनी दयनीय स्थिति के साथ मौजूद है। देश के कई अन्य राज्यों के सामने वह बहुत नीचे है। वह सिर्फ अपनी इस ‘कामयाबी’ से खुश हो सकता है कि सूचकांक के सबसे फिसड्डी राज्य बिहार से वह थोड़ा ऊपर है। मानव विकास सूचकांक में प्रति व्यक्ति आमदनी के अलावा शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र को लिया जाता है। आम अपराध और महिलाओं के विरुद्ध अपराध के मामले में भी यूपी का ‘दबदबा’ बना हुआ है। दलितों पर अपराध के मामले में वह पाचवें नंबर पर है। सन् 2020 के शुरू में जारी एनसीआरबी (गृह मंत्रालय) आंकड़े इसकी तस्दीक करते हैं।

पब्लिक अफेयर्स इंडेक्स-2020 में यूपी को सबसे बुरे ढंग से प्रशासित राज्यों में ऊपर रखा गया है। सूचकांक में सर्वोत्तम राज्य का खिताब केरल का है। वह लंबे समय से नंबर-वन राज्य बना रहता है। इस सूचकांक का निर्धारण ग्रोथ, इक्विटी और सस्टेनिबिलिटी के कुछ 50 संकेतकों (इंडिकेटर्स) के आधार पर किया जाता है। तमिलनाडु की स्थिति भी बेहतर राज्यों में शुमार है। बंगाल भी ज्यादातर सूचकांकों में यूपी से बेहतर स्थिति में है। कितने मजे की बात है कि मुख्यमंत्री योगी सहित भारतीय जनता पार्टी के तमाम शीर्ष नेता पिछले दिनों केरल, तमिलनाडु और बंगाल के विधानसभा चुनाव के दौरान अपने हर रोड-शो या रैली में दावा करते रहे कि यहां उनकी सरकार बनी तो वे इन राज्यों को ‘सोने जैसा’(आमार सोनार) बना देंगे। योगी जी तो कई जगह अपने भाषणों में यह भी कहते रहे कि इन राज्यों में भाजपा सरकार बनी तो वे यहां भी यूपी की तरह ‘रामराज्य’ लायेंगे!

ऐसा ‘राज’ कायम करेंगे कि अपराध करने वाला जेल या सीधे ‘यमराज’ के पास जायेगा। योगी जी से भला कौन पूछे कि जेल या यमराज के यहां भेजने के उनके दावे के बावजूद अपराध के मामले में यूपी की हालत इतनी खराब क्यों है? महिलाओं के विरूद्ध 59445 दर्ज मामलों के साथ पूरे देश में वह सर्वाधिक आपराधिक मामलों वाला राज्य क्यों बना हुआ है? केंद्र सरकार की अपनी एनसीआरबी रिपोर्ट ये क्यों कह रही कि यूपी में हर दिन 11 बलात्कार हो रहे हैं? सन् 2016 से 2019 के बीच महिलाओं के विरूद्ध अपराध में 20 फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज हुई है। यूपी शासन ने केंद्रीय गृह मंत्रालय पर ‘फेक न्यूज’ फैलाने के आरोप में उन संगीन धाराओं के मामले क्यों नहीं ठोंके जो अक्सर वह दिल्ली, लखनऊ या मिर्जापुर के पत्रकारों पर सही खबर छापने के लिए ठोकता रहता है? यूपी शासन ने सिर्फ इतना भर कहकर शांत हो गया कि राज्य में बलात्कार के 4322 मामले नहीं, सिर्फ 3946 ही रहे हैं! थोड़ी देर के लिए यूपी शासन के आंकड़े को ही सही मान लें तो भी क्या ये अच्छे शासन या ‘आमार सोनार राज’ की तस्वीर है?

यूपी शासन ने अपने चार साल की सबसे बड़ी उपलब्धि का 18 मार्च को जो इश्तेहार जारी किया, उसमें सबसे ऊपर है—‘ईज आफ डूइंग बिजनेस रैंकिग में यूपी का पूरे देश में दूसरे स्थान’ पर आना!  इसका जनता के सरोकारों, समाज की बुनियादी जरूरतों और प्रदेश की चौतरफा प्रगति के आंकड़ों से क्या लेना-देना? भाजपा देश की एक मात्र ऐसी पार्टी है, जो आज से नहीं, लंबे समय से कहती आ रही है कि ‘गवर्नमेंट हैज नो बिजनेस टू डू बिजनेस!’ फिर बिजनेस करने वालों के लिए हर रास्ता आसान करने के बिजनेस में यूपी शासन को लगने की क्या जरूरत? वह सिर्फ बिजनेस करने वाले कारपोरेट के लिए ही रेड-कार्पेट क्यों बिछाय़े रहती है? क्या अपने ‘श्रीराम’ को ये कारपोरेट ही ज्यादा प्रिय हैं?

यूपी शासन ने अपने आलोचकों या अपने से असहमति रखने वालों और अल्पसंख्यकों के प्रति निरंकुश रवैया अख्तियार करने के मामले में देश की शायद ही किसी प्रांतीय सरकार को अपने से आगे छोड़ा हो! राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) और यूएपीए के इस्तेमाल के अलावा यूपी प्रायोजित मुठभेड़ जैसे निरंकुश हथकंडों के लिए कुख्यात हो गया है। मुख्यमंत्री योगी और उनके समर्थक इसे सरकार की ‘कड़ाई’ कहते हैं। क्या कोई कल्पना कर सकता है कि एक लोकतांत्रिक देश में निर्वाचित सरकार का नेता समाज को इस तरह धमकायेगा कि ‘जो अपराध करेंगे वे ठोंक दिये जायेंगे।’ अपराध के लिए सीआरपीसी है, आईपीसी है, कानून के रास्ते हैं, न्यायालय हैं पर ‘सीधे ठोंकने’ की धमकियां यूपी में सुनी गईं। धमकी ही नहीं, इन्हें घटित होते हुए देखा भी गया।

सन् 2018-2020 में कई स्थानों पर ‘मुठभेड़’ में कथित अपराधियों को मारा गया। सितम्बर, 2018 में अलीगढ़ के एक ‘लाइव मुठभेड कांड’ को लेकर गंभीर सवाल उठे थे। असहमति की तनिक आवाज उठते ही योगी सरकार ने पिछले साल प्रदेश के पूर्व पुलिस महा-निरीक्षक एसआर दारापुरी को जिस तरह गिरफ्तार कर उन पर संगीन धाराओं के तहत मुकदमे ठोके, उनसे फाइन वसूलने का आदेश तक जारी किया गया। स्वतंत्र भारत में अपने ढंग की बेहद भयावह घटनाओं का गवाह बना यूपी। दारापुरी ही नहीं, सदफ जफर जैसी कलाकार और राजनीतिक कार्यकर्ता सहित कई अन्य लोगों पर ऐसे मामले ठोके गये। सीएए-एनआरसी विरोधी आंदोलन में इन लोगों की हिस्सेदारी या सहानुभूति के कारण यह कार्रवाई की बताई गई। इससे पहले सन् 2017 में गोरखपुर के डॉक्टर कफील की गिरफ्तारी का मामला सामने आया था। बाद के दिनों में भी उन्हें गिरफ्तार किया गया। उनके विरुद्ध एनएसए का इस्तेमाल किया गया।

मैं इमरजेंसी के दौरान इलाहाबाद विश्वविद्यालय का छात्र था और इमरजेंसी-विरोधी आंदोलनों का समर्थक भी। उस दौरान बहुतों पर झूठे मामले ठोंके गये, गिरफ्तारियां हुईं। पर दारापुरी, कफील या सदफ जैसे लोगों के विरूद्ध जिस तरह के सनकी-आदेश पिछले दिनों जारी किये गये, वैसे मामले इमरजेंसी में भी नहीं देखे-सुने गये। इस मामले में माननीय हाईकोर्ट ने संवैधानिकता के पक्ष में हस्तक्षेप नहीं किया होता तो इन प्रबुद्ध और सामाजिक रूप से जागरुक लोगों पर क्या बीती होती, उसका अंदाज लगाना कठिन नहीं है। मिर्जापुर के पत्रकार पवन जायसवाल को सिर्फ इसलिए गिरफ्तार कर लिया गया कि उन्होंने बच्चों के स्कूल में दोपहर के भोजन में निर्धारित मिड-डे-मील की घटिया क्वालिटी की तथ्यों को सामने लाने में सहयोग किया था। इसी तरह  दिल्ली के कई वरिष्ठ संपादकों के विरूद्ध मुकदमे दर्ज कराये गये। हाल ही में राबर्ट्सगंज में माले के कार्यकर्ता कलीम और उनकी बेटी चारू को किसान आंदोलन के पक्ष में ज्ञापन तैयार करने के लिए गिरफ्तार किया गया। हमारे लोकतंत्र की माया देखिये, इन सबके बावजूद योगी सरकार को इस वक्त किसी तरह की बड़ी राजनैतिक चुनौती नहीं है। क्योंकि उनके विरूद्ध कोई ताकतवर विपक्ष ही नहीं है।

योगी को संघ भविष्य के बड़े नेता के तौर पर देख रहा है। गुजरात में नरेंद्र मोदी की कट्टर हिन्दुत्ववादी राजनीति को सक्रिय कारपोरेट-समर्थन ने और ताकत दी थी। यूपी में गुजरात की तरह स्थानीय स्तर पर बड़े ‘कारपोरेट-‘कप्तान’ नहीं हैं। संघ-भाजपा के नेतृत्व ने यहां ‘सोशल इंजीनियरिंग’ का सहारा लिया है। सोशल इंजीनियरिंग की जरूरत यहां गुजरात से ज्यादा थी। इसलिए यूपी की संघी-प्रयोगशाला में कुछ अलग ढंग का प्रयोग चला है। दिल्ली, मुंबई, बंगलुरू या कोलकाता स्थित अंग्रेजी में पढ़े-लिखे उदार बुद्धिजीवी और अन्य मध्यवर्गीय लोग आमतौर पर सोचते हैं कि ‘कट्टर हिन्दुत्वा’ के नये दूत योगी आदित्यनाथ की सरकार दमन-उत्पीड़न और संवैधानिक मूल्यों की खुलेआम अवहेलना के चलते एक दिन स्वयं ही बेहद अलोकप्रिय होकर सत्ता से बाहर हो जायेगी। पर विपक्ष की दोनों प्रमुख पार्टियों-सपा और बसपा को ‘शांति-पाठ’ पढ़ाकर संघ-भाजपा नेतृत्व अपना काम आसान करना चाहता है।

सपा-बसपा का जनाधार अपने नेतृत्व के इस घुटनाटेकू रवैये से बेहद क्षुब्ध है। संघ-भाजपा अपने ‘प्रयोग’ की आंशिक सफलता से गदगद हैं। वे यूपी को बिल्कुल अलग रंग-ढंग के साथ ‘गुजरात के रास्ते’ ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। पर संघ-भाजपा और योगी की तमाम तिकड़मी राजनीति के बावजूद उनके सामने यहीं एक बड़ा अवरोधक आ खड़ा होता है। वह है-कोरोना संक्रमण से बेहाल और तबाह हुए लोगों के प्रति शासन का रवैया। शिक्षक हों या आम लोग, अवर्ण हों या सवर्ण-इस मामले में सभी सरकार से बुरी तरह निराश हैं। उनमें सरकार के प्रति आक्रोश है। इसमें शायद ही किसी को शक हो कि कोरोना से सम्बन्धित यूपी सरकार के आंकड़े वास्तविकता से कोसों दूर हैं। इसके लिए दूरबीन लेकर साक्ष्य खोजने की जरूरत नहीं। गोमती से गंगा के किनारे तक इसके गवाह हैं। क्या यूपी के लोग अपने-अपने निजी दर्द और बेहाली को भुलाकर पिछली बार की तरह सिर्फ जाति, वर्ण और मंदिर-मस्जिद के नाम पर वोट कर देंगे? क्या उन्हें अस्पताल, डाक्टर, आॉक्सीजन, दवाओं, एंबुलेंसों की भारी किल्लत और घर के तमाम कमाऊ लोगों के बेरोजगार होकर घर बैठ जाने की बेबसी की याद नहीं आयेगी?

यूपी के चुनाव को लेकर अभी बहुत सारे अगर-मगर हैं। संघ-भाजपा कुछ महीने पहले तक जितना आश्वस्त लगते थे, कोरोना की दूसरी लहर के बाद उनमें वैसी आश्वस्ति नहीं है। पिछले सप्ताह नेतृत्व-परिवर्तन की जो नाकाम कोशिश हुई और अब भी केंद्रीय और प्रांतीय नेतृत्व के बीच जो तनातनी दिख रही है, उसके पीछे सन् 2024 की सियासी बेचैनी एक बड़ा कारण है। भाजपा के केंद्रीय नेताओं को लगता है कि यूपी के चुनावी नतीजे अगर निराशाजनक रहे तो 2024 के संसदीय चुनाव का गणित भी टेढ़ा हो जायेगा। पर फैसला तो ‘नागपुर’ ही करेगा! दिल्ली के वश में कुछ भी नहीं है।

(उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार और कई किताबों के लेखक हैं आप आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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