Tuesday, April 16, 2024

खड़गे का नाम पीएम उम्मीदवार के तौर पर घोषित हो जाये तो देश की सियासत बदल जाएगी

राजनीति कब किसके फेवर में चली जाए यह कौन जानता है? लेकिन मौजूदा समय का सच तो यही है कि जो एक साथ दलित और अल्पसंख्यक समाज को साध ले तो उसकी राजनीति बहुत हद तक सामने वालों को डरा तो देगी ही। बीजेपी को यही भय है। बीजेपी को तो यह भी भय है कि उसकी राम राज्य की राजनीति कुलांचे मार नहीं सकती।

देश में अभी जितनी समस्या खड़ी है ऐसे में समाज के अधिकतर वर्गों के लोगों में अब यह बात साफ़ हो गई है कि अगर इस बार समझदारी से वोटिंग नहीं की गई तो इस देश के साथ आगे क्या होगा कोई नहीं जानता।

यहां दो मुद्दों की चर्चा जरूरी है। एक मुद्दा तो झारखंड कांड का है जहां एक आदिवासी समाज के मुख्यमंत्री को पैदल कर दिया गया है। हेमंत सोरेन कोई मामूली आदमी नहीं हैं। वे शिबू सोरेन के बेटे हैं। और शिबू सोरेन की पहचान यही है कि वे देश के आदिवासियों में दिशोम गुरु के नाम से जाने जाते हैं।

यह बात और है कि इस देश के कई राज्यों और इलाकों में आदिवासियों की आबादी है और हर राज्य के आदिवासी अपने तरीके से अलग-अलग पार्टियों को वोट डालते रहे हैं। लेकिन एक बात सच यही है कि देश के सभी राज्यों के आदिवासी शिबू सोरेन को जानते हैं और उनके योगदान के साथ ही उनके संघर्ष की गाथा को भी जानते हैं।

लेकिन जिस तरह से बीजेपी ने झारखंड में अपने दम पर एक चुनी हुई सरकार को आफत में डाला है और आदिवासी नेता हेमंत सोरेन को जेल में बंद किया है इसका असर अब देश के उन तमाम आदिवासी इलाकों पर भी पडेगा जहां के लोग पहले बीजेपी को वोट डाल जाते थे।

सच तो यही है कि झारखंड के आदिवासी समाज ही नहीं, बंगाल, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, यूपी और बिहार के साथ ही ओडिशा, महाराष्ट्र और पूर्वोत्तर के राज्यों में भी हेमंत को लेकर आदिवासी समाज में भारी नराजगी उत्पन्न हो गई है। जानकार तो यह भी कह रहे हैं कि बीजेपी का दांव अब उल्टा ही पद गया है।

बीजेपी को भी लगने लगा है कि जिस पार्टी को तोड़कर वह ऑपरेशन के जरिये सत्ता पर काबिज होना चाह रही थी, कहीं अब लेने को देने न पड़ जाएं। बीजेपी के भीतर भी इस पर गंभीर मंथन चल रहा है। देश के आदिवासी लोगों का चुनावी मूड अब क्या होगा यह तो चुनाव के दौरान ही पडेगा लेकिन देश के 13 करोड़ से ज्यादा आदिवासी अगर हेमंत को मुद्दा बनाकर उठ खड़े हुए तो बीजेपी का रंग का भंग हो सकता है।

लेकिन मामला यहीं तक नहीं है। मामला तो अब बंगाल की कहानी पर जा टिका है। बंगाल में ममता बनर्जी हैं और उनका दावा है कि वह इंडिया गठबंधन में भी रहेंगी और वाम दलों के साथ ही कांग्रेस को कोई सीट भी नहीं देंगी। यह एक अनोखा गठबंधन होगा। लेकिन आखिर ममता ऐसा क्यों कर रही हैं?

ममता की राजनीति को नजदीक से पढ़िए तो साफ़ हो जाएगा कि उनके पास अपना कोई ख़ास वोट बैंक नहीं है। उनका वही वोट बैंक है जो पहले वाम दलों का होता था। कांग्रेस का होता था। ममता की राजनीति ने वाम दलों और कांग्रेस के वोट बैंक को अपने साथ जोड़ने का कमाल किया। यही कमाल आज भी जारी है। लेकिन बड़ा सवाल तो यही है कि ममता के पास आज जो वोटर हैं या जो टीएमसी का वोट बैंक है वह क्या है?

ममता के पास आज करीब 15 फीसदी भद्र जानों का वोट बैंक है। ये भद्र जन लिबरल हैं और किसी भी सूरत में कट्टरता को स्वीकार नहीं करते। याद कीजिये बंगाल के सामाजिक पुनर्जागरण के दौर को। देश में कहीं भी जो पहला सामाजिक परिवर्तन हुआ है उसमें बंगाल ही सबसे पहला राज्य रहा है। एक से बढ़कर एक सामाजिक परिवर्तन वहां हुए हैं। समाज की कुरीतियों को ख़त्म करने के लिए एक से बढ़कर एक नेता सामने आये हैं।

यह बात और है कि आज के हालत कुछ और ही हैं लेकिन बंगाल में आज भी अधिकतर परिवार ऐसे हैं जो सबको साथ लेकर चलने में यकीन करते हैं। इसलिए ममता के साथ जो लिबरल भद्र जन जुड़े हुये हैं एक सीमा के बाद उनका मोह ममता से भी जा सकता है।

ममता के पास दूसरा बड़ा वोट बैंक करीब 35 फीसदी मुसलमानों का है। यह तबका पहले वाम दलों के साथ था और कुछ कांग्रेस के साथ भी खड़ा था। लेकिन बदली परिस्थिति में आज यह तबका ममता के साथ है। बंगाल के मुसलमानों को लगता है कि ममता में ही वह शक्ति है जो बीजेपी को रोक सकती है। और ममता ऐसा करके दिखा भी रही हैं।

लेकिन ममता इस खेल में राजनीति भी करती हैं। ममता हमेशा इन वोटरों को यह एहसास भी दिलाती हैं कि अगर हमें वोट नहीं डालोगे तो बीजेपी आ जाएगी और बीजेपी आती है तो मुसलमानो के साथ क्या कुछ करेगी यह सब जानते हैं।

कह सकते हैं कि आज बंगाल में टीएमसी को जो मुसलमान थोक के भाव में वोट डालते हैं वे इस बात को जानते हैं कि ममता दबाव की राजनीति कर रही हैं। लेकिन मुसलमानो के पास कोई चारा भी तो नहीं है।

अब बड़ा सवाल यही है कि ममता आखिर इंडिया गठबंधन में होने का नाटक करते हुए भी कांग्रेस और वाम दलों को सीट क्यों नहीं देना चाहतीं। कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि ममता कभी भी पलट सकती हैं। जिस तरह से नीतीश कुमार पलट गए उसी तरह से ममता भी पलट जाएंगी। ऐसा हो भी सकता है और नहीं भी।

एक बात तो तय है कि चुनाव से पहले ममता ऐसा कुछ भी नहीं कर सकतीं। ऐसा वह करती हैं तो मुसलमानों का वोट उससे अलग हो जाएगा। बंगाल के सारे मुसलमान फिर या तो वाम दलों के साथ सिमट जायेंगे या फिर कांग्रेस के खेमे में जा मिलेंगे। और ऐसा हुआ तो ममता की पूरी राजनीति ही ख़त्म हो जाएगी।

ममता के कहने से वह 15 फीसदी भद्र जन अलग हो सकते हैं जो समाज को बांटते नहीं देखना चाहते। जो हमेशा कट्टरवादी राजनीति के खिलाफ ही रहे हैं। फिर ममता इतना बड़ा रिष्क क्यों लेना चाहेगी?

मौजूदा समय में ममता दो राह पर खड़ी हैं। वह बीजेपी के खिलाफ होने का नाटक भी कर रही हैं और ईडी और जांच एजेंसियों के भय से बीजेपी को सहला भी रही हैं। बीजेपी को भी यह भरोसा दे रही हैं कि कुछ सीटों पर आपकी जीत संभव हो जाए। उधर बीजेपी की कहानी तो यही है कि बंगाल में इस बार उसकी राजनीति नहीं चल पाएगी। अधिक से अधिक पांच से छह सीट बीजेपी जीत पायेगी और वह भी तब जब ममता उन सीटों पर अपना कमजोर उम्मीदवार खड़ा करेंगी।

जानकार भी इस बात को मानते हैं कि ममता अभी बीजेपी के साथ यही सब खेल रही हैं। लेकिन मजे की बात तो यह है कि इस खेल को कांग्रेस भी समझ रही है और वाम दल भी। ममता मुसलमानों को बीजेपी का भय दिखाकर जो वोट पाती रही हैं इसका भान अब मुसलमानों को भी होने लगा है। और इस बात की सम्भावना अब बढ़ती जा रही है कि ममता ने अपनी जिद को नहीं छोड़ा तो ममता के बड़े वोट बैंक में टूट हो सकती है और वह वोट बैंक कांग्रेस और वाम दलों के साथ जा सकता है।

लेकिन अब आगे जो होना है अगर वह सफलीभूत हो जाए तो ममता की राजनीति ही फंस सकती है। याद कीजिए दिल्ली में जब इंडिया गठबंधन की बैठक हुई थी तब ममता ने ही खड़गे को पीएम उम्मीदवार बनाने की बात की थी। ममता की बातों का समर्थन केजरीवाल ने किया था। इसके पीछे भी ममता का बड़ा दाव था।

ममता यह कहकर दलितों के भीतर भी अपनी पैठ बनाने की कोशिश की थी। ममता को लग रहा था कि खड़गे का नाम उछलकर एक तरफ नीतीश कुमार के खेल को ख़त्म किया जा सकता है और दूसरी तरफ खड़गे के नाम पर दलित वोट को भी पकड़ा जा सकता है। लेकिन अब जब नीतीश कुमार जा चुके हैं, ममता का यह दाव कहीं ममता पर ही भारी पड़ जाए।

जानकारी मिल रही है कि खड़गे इंडिया गठबंधन के स्वाभाविक उम्मीदवार हो सकते हैं। इस बारे में गठबंधन के सभी दलों की राय भी एक ही है। ऐसे में इस बात की सम्भावना अब बढ़ती जा रही है कि अगर खड़गे का नाम पीएम उम्मीदवार के रूप में घोषित होता है तो देश में एक नया नैरेटिव शुरू हो जाएगा। देश के करीब 18 से 20 फीसदी दलित समाज के लोग एक छतरी के नीचे आ सकते हैं और इस बात का नारा बुलंद हो सकता है कि पहली बार देश में कोई दलित नेता पीएम उम्मीदवार के रूप में खड़ा है और उसे पद पर बैठाना है।

कांग्रेस के साथ ही इंडिया गठबंधन के तमाम दल इस पर बहस भी कर रहे हैं। और ऐसा हुआ तो ममता की दो धारी राजनीति तो ध्वस्त होगी ही इसके साथ ही बड़ी संख्या में मुसलमान, दलित और आदिवासी समाज के लोग एक साथ खड़े हो सकते हैं।

खड़गे के साथ बंगाल के वे भद्र जन भी खड़े हो सकते हैं जो हमेशा से सामाजिक परिवर्तन की बात करते रहे हैं। लेकिन अगर ऐसा होता है तो ममता एक क्रेडिट तो ले ही सकती हैं कि खड़गे का नाम उन्होंने ही सुझाया था। इसका लाभ भी ममता को मिल सकता है।

खड़गे का नाम जैसे ही पीएम उम्मीदवार के रूप में सामने आएगा इस देश का मिजाज बदल सकता है। बीजेपी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। बीजेपी की मुश्किलें तो अभी से ही बढ़ी हुई हैं। बीजेपी एक तरफ एनडीए के भीतर नीतीश को लाने के साथ ही नवीन पटनायक को भी जोड़ने को तैयार है। उधर छगन रेड्डी पर भी दाव खेल जा रहा है।

लेकिन नविन और जगन ने ऐसा किया तो उसके पाले का मुस्लिम वोट कहां जाएगा यह भी उन्हें पता है। और ऐसा हुआ तो उनकी राजनीति जमींदोज हो सकती है। ऐसे में साफ है कि असली मुश्किलें बीजेपी की बढ़ी हुई हैं। खड़गे का नाम सामने आने दीजिये देश की राजनीति भी बदलेगी और समाज का मिजाज भी बदल जायेगा।

(अखिलेश अखिल पत्रकार हैं।)

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