पीएम मोदी की फ्रांस यात्रा और यूरोपीय संसद में भारतीय लोकतंत्र पर चिंता के मायने

Estimated read time 1 min read

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 13 जुलाई से फ्रांस की यात्रा पर रहेंगे। 13-15 जुलाई की इस राजकीय यात्रा में पीएम मोदी फ्रांस के राष्ट्रपति इमान्युएल मैक्रॉन के साथ वार्ता के अलावा फ्रांसीसी राष्ट्रीय दिवस “बैसिल दिवस समारोह” में विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल होने वाले चुनिंदा राष्ट्र प्रमुखों में से एक होंगे। फ्रांस यदा-कदा ही विदेशी राष्ट्राध्यक्षों को इस आयोजन में आमंत्रित करता है। पिछली बार 2017 में अमेरिकी राष्ट्रपति को यह सम्मान हासिल हुआ था। राष्ट्रपति मैक्रॉन के निमंत्रण पर पीएम मोदी 14 जुलाई के ‘बैसिल डे समारोह’ के मुख्य अतिथि बनने जा रहे हैं। अपने दो दिन के प्रवास के बाद वापसी में 15 जुलाई को पीएम मोदी संयुक्त अरब अमीरात का भी दौरा करेंगे।

फ्रांस में ‘बैसिल दिवस समारोह’ में भारतीय सेना की तीनों टुकडियां भी शामिल होंगी। पीएम मोदी की यह यात्रा ऐसे समय हो रही है जब भारत-फ्रांस के बीच की रणनीतिक साझेदारी अपने 25वें वर्ष में पहुंच गई है। हाल के वर्षों में रक्षा क्षेत्र में भारत ने फ्रांस से कई महत्वपूर्ण रक्षा सौदे किये हैं। भारत की सामरिक सुरक्षा के लिहाज से अमेरिका के बाद फ्रांस दूसरे प्रमुख भागीदार के रूप में सामने आया है।

भारत ने हथियारों के आयात के लिए पिछले 7 दशक तक सोवियत संघ और विघटन के बाद रूस को ही अपना सबसे बड़ा भरोसेमंद देश बना रखा था। लेकिन कोविड-19 महामारी और रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते पिछले कुछ वर्षों से रूस, भारत को उसकी जरूरत के उपकरणों को आसानी से मुहैया करा पाने में असमर्थ दिख रहा था। यही नहीं बल्कि स्पेयर पार्ट्स और मरम्मत के लिए जरूरी उपकरण तक समय से नहीं मिल पा रहे हैं।

ऐसे में पीएम मोदी की फ्रांस यात्रा के दौरान इस बात की भी संभावना जताई जा रही है कि फ्रांस से 26 राफेल विमान और स्कॉर्पियन सबमरीन के सौदे पर भी अंतिम मुहर लग सकती है। अमेरिका की तरह फ्रांस में भी पीएम मोदी का बेहद गर्मजोशी से स्वागत तय बताया जा रहा है। इसमें राष्ट्रपति मैक्रॉन के साथ बातचीत के अलावा पीएम मोदी की मुलाकात फ्रांस के प्रधानमंत्री, सीनेट और नेशनल असेंबली के अध्यक्ष के साथ-साथ भारत-फ्रांस के कॉर्पोरेट समूह के साथ बातचीत होनी है। फ्रांस में भारतीय अप्रवासियों के साथ भी पीएम मोदी की मुलाक़ात का कार्यक्रम तय है।

लेकिन इसके साथ एक खबर यह भी है कि इसी दौरान यूरोपीय संघ की संसद में भारत के आंतरिक स्थिति पर भी चर्चा रखी गई है, जो इस यात्रा में रंग में भंग डालने जैसा साबित हो सकता है। पिछले माह अमेरिका में भी ऐसा ही कुछ देखने को मिला था। बताया जा रहा है कि यूरोपीय संसद 12 जुलाई को स्ट्रासबर्ग में चल रहे अपने पूर्ण सत्र के दौरान मणिपुर में जारी जातीय हिंसा पर एक प्रस्ताव पर विचार-विमर्श करेगी।

यूरोपीय संसद में मणिपुर मामले का विषय “मानवाधिकार, लोकतंत्र एवं कानून के शासन के उल्लंघन के मामले” के तहत चर्चा के लिए निर्धारित किया गया है। अगले दिन 13 जुलाई को इस प्रस्ताव पर मतदान किया जायेगा। पिछले दो महीने से मणिपुर में जारी हिंसा से निपटने में नाकाम मोदी सरकार पर तीखे आरोप को यूरोपीय संघ की संसद में छह संसदीय समूहों द्वारा एक प्रस्ताव के माध्यम से पेश किया गया है। प्रस्ताव में मोदी सरकार पर मानवाधिकारों के हनन, मौलिक स्वतंत्रता का गला घोंटने, असहमति पर निषेधाज्ञा सहित नागरिक समाज और मीडिया पर नकेल कसने का आरोप लगाया गया है।

इन सांसदों के समूह में वामपंथी, यूरोपीय समाजवादी और ग्रीन समर्थकों से लेकर विभिन्न क्षेत्रीय दल ही नहीं बल्कि रुढ़िवादी एवं दक्षिणपंथी राजनीतिक एवं ईसाई समूह तक शामिल हैं। दक्षिणपंथी ईसीआर समूह की चिंता मणिपुर में राज्य सुरक्षा बलों की भूमिका को लेकर है, जिसमें भीड़ प्रत्यक्ष रूप से लक्षित स्थानों को अपना निशाना बनाती दिखी है और सेना की मौजूदगी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की यात्रा के बावजूद आज भी झड़पें रुकने का नाम नहीं ले रही हैं।

क्रिश्चियन डेमोक्रेट्स के पीपीई समूह के प्रस्ताव में हिंदू मैतेई और ईसाई कुकियों के बीच के संघर्ष के रूप में देखा गया है, जिसमें 250 चर्च, ईसाई स्कूल, अस्पताल और कुछ मंदिरों को जलाए जाने की घटना को एक बड़े धार्मिक हमले के तौर पर रेखांकित किया गया है।

कुछ समूह यूरोपीय संघ से मणिपुर को निर्बाध सहायता एवं राहत पहुंचाने की भी बात कर रहे हैं। एस एंड डी समूह भाजपा के प्रमुख नेताओं द्वारा की गई राष्ट्रवादी बयानबाजी की कड़ी निंदा के साथ जांच के लिए स्वतंत्र निगरानी की मांग कर रहा है इसके साथ ही समूह राज्य में अफस्पा कानून के तहत सशस्त्र बलों की मौजूदगी को रद्द किये जाने की मांग कर रहा है।

इसी तरह ग्रीन-यूरो गठबंधन समूह भी राज्य में इंटरनेट ब्लैकआउट हटाने एवं अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों और पत्रकारों की पहुंच की अनुमति की मांग कर रहा है। उसकी ओर से भारत में एफसीआरए और यूएपीए के तहत मौलिक स्वतंत्रता के हनन पर भी अपनी चिंता जताई गई है।

सूत्रों के अनुसार मोदी सरकार इस घटनाक्रम से परिचित है, और उसके द्वारा यूरोप की एक प्रमुख लॉबिंग फर्म को नियुक्त किया गया है। अल्बर्ट एंड गीगर नामक एक प्रमुख लॉबीइंग फर्म रखकर किसी भी प्रकार की राजनयिक शर्मिंदगी को न्यून करने पर काम चल रहा है। बताया जा रहा है कि इससे पहले भी ब्रुसेल्स के साथ मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) को सुचारू बनाने के लिए लॉबीइंग फर्म अल्बर्ट एंड गीगर को काम पर रखा गया था।

देखना होगा पेरिस की इस ऐतिहासिक यात्रा के दौरान इस नए भारत पर यूरोपीय संघ की संसद अपने प्रस्ताव में किन नतीजों पर पहुंचती है। सहित यूरोपीय संघ के लिए भारत का बाजार और निवेश के अवसर पर नजर टिकी हुई है, वहीं दूसरी तरफ देश में सिकुड़ते लोकतंत्र और विशेषकर अल्पसंख्यकों पर बढ़ते हमले उत्तरोत्तर बढ़ते व्यापार की वैधता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करते हैं।

अमेरिकी यात्रा के बाद यह लगातार दूसरा अवसर है जब भारतीय प्रधानमंत्री को राजकीय सम्मान के साथ-साथ भारतीय लोकतंत्र के मौजूदा हालात के बारे में सफाई पेश करने के लिए बाध्य होना पड़ रहा है।

(रविंद्र पटवाल जनचौक की संपादकीय टीम के सदस्य हैं।)

You May Also Like

More From Author

5 2 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Inline Feedbacks
View all comments