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राजनीति में आवश्यक है नेताओं का निरंतर जन संवाद

राहुल गांधी सहित सभी राष्ट्रीय दलों के नेताओं को इस प्रकार की नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस करनी चाहिये। ज़ूम तो सरकार कह रही है कि आज से असुरक्षित हो गया। उसमें कोई असुरक्षित करने वाला वायरस आ गया है। अभी तो यही कोविड 19 ही बवाले जान था अब पता नहीं यह कौन सा वायरस आ गया। अब यह तो कम्प्यूटर और आईटी विशेषज्ञ ही यह ढूंढ सकते हैं और उसका समाधान सुझा सकते हैं। ज़ूम नहीं तो और क्या विकल्प है यह भी तकनीकी मित्र सुझाएँ।

हालांकि उसी जूम एप्प के माध्यम से रक्षामंत्री जी ने 1 अप्रैल 2020 को, सभी सेना प्रमुखों और अन्य जनरलों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से मीटिंग की थी। और आज 16 अप्रैल को सरकार द्वारा ज़ूम असुरक्षित बताया जाने लगा। यहां फिर सरकार की अक्षमता पर सवाल उठता है कि जब सुरक्षा सिस्टम से जुड़ी खामियां इस एप्लिकेशन में थीं तो रक्षा मंत्रालय द्वारा रक्षामंत्री और सेना के जनरलों की वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग कैसे करने दी गयी ? देश का साइबर तंत्र क्या इतना भी नहीं सोच पाता?

आमने सामने की लाइव प्रेस कॉन्फ्रेंस किसी भी नेता के आत्मविश्वास को दिखाती है। उसके ज्ञान और उसके प्रत्यातुपन्नमति क्षमता, जो एक तार्किक प्रतिभा का प्रमाण होती है, को बताती है। जब सभी दलों के नेता, हम सबसे आभासी प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी, रूबरू आएंगे और पत्रकारों के सहज और असहज करने वाले सवालों का उत्तर देंगे तो, हमें यह भी आभास होगा कि, वे हमारी समस्याओं को लेकर कितने सजग और सतर्क हैं। उनकी तैयारी कितनी है और उन्हें हमारी समस्याओं की जानकारी कितनी है। जानकारी है भी या नहीं, या वे जानकारी रखने का इरादा भी रखते हैं या नहीं।

कभी कभी लगता है आने वाला समय बड़ी बड़ी जन सभाएं या मेगा रैली जिसे अखबार वाले और अन्य लोग कहते हैं,  कम होने लगेंगी। खबर तो यह भी मिलती है कि, बड़ी-बड़ी सरकारी रैलियों में अधिकतर लोग, 500, 500 रुपये देकर ले जाये जाते हैं। यह एक प्रकार का रैली टूरिज्म या पर्यटन भी आप कह सकते हैं। इन रैलियों में, जाने वाली भीड़ न तो वैचारिक प्रतिबद्धता से प्रेरित होती है और न ही उन्हें यह पता होता है कि, वहां जाकर उन्हें क्या करना है। इस प्रकार की रैलियां अक्सर नेताओं के शक्ति प्रदर्शन के अवसर के रूप में होती हैं।

दुनिया भर के नेता इस कोरोना आपदा में अपनी अपनी जनता को नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस द्वारा संबोधित कर रहे हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प तो रोज ही माइक और स्टैंड के पीछे पत्रकारों को झेलते नज़र आते हैं। कभी वे दांत पीसते हैं, कभी किसी से उलझ जाते हैं पर मैदान वे कभी नहीं छोड़ते हैं। प्रेस वार्ता वे नियमित करते हैं। आम खाने के तरीके और एनर्जी लेवल के अनुसंधान और जिज्ञासा काल में, हम शायद उतने आक्रामक प्रेस कॉन्फ्रेंस की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।

हमारे पीएम ने पिछले 6 साल में एक बार भी खुली और लाइव प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की। इसका क्या कारण है यह तो मैं नहीं बता पाऊंगा पर यह आश्चर्यजनक ज़रूर है। प्रधानमंत्री जी एक बहुत अच्छे वक्ता हैं और बेहतर कम्युनिकेटर भी। जो वे चाहते हैं अपने लोगों के मन में प्रतिष्ठित कर देते हैं। उनके लोगों में उनके प्रति दीवानगी भी कम नहीं है। भले ही उनके लोग उस प्रभा मंडल से इतने अधिक चुंधिया जाएं कि उन्हें सरकार की उपलब्धियां और अन्य बातें, उस मायावी प्रभा के कारण दिख ही न सकें। यह सब एक प्रवचन और श्रोता के बीच जो केमिस्ट्री बन जाती है वैसा ही हो जाता है।

फिर भी यह सब, हर नेता की अपनी अपनी शैली है। अलग अलग हाकिम का, अलग अलग अंदाज़ ए हुकूमत है। हर व्यक्ति जुदा जुदा व्यक्तित्व का होता है और सबकी फ़ितरत, सूरत और सीरत सब अलग अलग ही होती है। हमारे पीएम साहब भी कोई अपवाद नहीं हैं। वे हमसे रूबरू होते हैं, अपने मन की बात कहते हैं, सुंदर और कर्णप्रिय प्रवचन देते हैं, नयनाभिराम बन कर भी आते हैं पर आज तक सरकार के एक प्रमुख के रूप में, हमारे लिये वे या उनकी सरकार, कर क्या रही हैं यह वे कभी नहीं बताते हैं ।  यही सब जानने के लिये जरूरी है कि प्रधानमंत्री कम से कम छह महीने में अगर सामान्य स्थिति है तो, और नहीं तो कोई आफत विपत्ति का काल है, जैसा कि आजकल है तो, नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस, समय और अंतराल वे स्वयं तय कर लें, कर लिया करें।

जब इंटरव्यू की बात चलती है तो मुझे करन थापर का वह इंटरव्यू कभी नहीं भूलता जिसमें गुजरात के दंगों के बारे में करन ने नरेंद्र मोदी जी से कुछ असहज सवाल पूछ लिये। कोई जवाब वे दे नहीं पाए। समय कम था उनके पास या वे गुजरात दंगों पर बोलना नहीं चाहते थे, जैसे तैसे पानी पिया और चलते बने। फिर वे प्रसून जोशी, अक्षय कुमार और दीपक चौरसिया द्वारा लिये गए इंटरव्यू में तो आये लेकिन असहज सवाल पूछने वाले पत्रकारों से बचते रहे। कुछ तो करन थापर के बोलने की शैली, दांतों से शब्द चबा चबा कर सवाल पूछने की उनक़ी आदत भी है, जो कभी कभी इंटरव्यू कम इंट्रोगेशन अधिक लग सकती है, दूसरे गुजरात दंगों से मोदी जी की सामान्य छवि पर बहुत प्रभाव पड़ा था, तो वे कहते भी क्या ?

वह विषय थोड़ा असहज करने वाला था भी। पर पत्रकार तो ऐसा ही होना चाहिए कि पेशानी पर पसीना ला दे । यह बात अलग है कि उनके कट्टर समर्थक प्रधानमंत्री जी को उनकी गुजरात दंगों वाली उसी छवि में देखना चाहते हैं, जिसके कारण वे उनके आराध्य बन गए हैं। अब जब मोदी जी, जैसे ही यदा कदा उस छवि से निकलना भी चाहते हैं तो उनके समर्थक उन्हें उसी पंक में ठेल कर खड़ा कर देते हैं ।

हालांकि नरेन्द्र मोदी जी को यह पता है कि, दुनिया में उदार और सर्व धर्म समभाव की छवि ही संसार का मान्य स्थायी भाव है। आज भी दुनिया के इतिहास में उन्हीं शासकों का नाम सम्मान से लिया जाता है जिसने अपने कार्यकाल या शासनकाल में जनता के बीच, जनता की आस्था और जातिगत भेदभाव से ऊपर उठ कर काम किया या शासन किया है । हमारे प्राचीन राज शास्त्रों में भी राजा की प्रजावत्सलता के बहुत से किस्से विद्यमान हैं।

2014 के चुनाव के समय, ‘सबका साथ, सबका विकास’ प्रधानमंत्री जी का मुख्य नारा था। जनता ने साथ भी खूब दिया। पर अब जब विकास के बारे में सवाल पूछे जा रहे हैं तो प्रधानमंत्री कुछ कहें उनके पहले उनके लोग ही ट्रॉल करने लगते हैं। 2014 के बाद यह एक नयी संस्कृति का विकास हुआ है। फिर प्रधानमंत्री इस नारे में एक नारा और जोड़ देते हैं, सबका विश्वास। लेकिन जब चुनाव आता है तो, सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास भूल कर वे, श्मशान और कब्रिस्तान के अपने पुराने और आजमाए नुस्खे पर लौट जाते हैं। क्योंकि कम से कम उन्हें पता है कि न तो उनके पास सबका विश्वास है और न ही सबका विश्वास लेने की कोई गंभीर कोशिश भी उनकी तरफ से की गयी है। और शायद वे भी यह जानते हैं कि विकास भी बहुत कुछ ऐसा नहीं है जिसे गिनाया जा सके।

कोविड 19 के बारे में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बार बार दुनिया को इस आपदा से निपटने के लिये एकजुट रहने की बात की है। आज दुनिया भर के सारे हथियार जिनपर उनके संग्रह कर्ताओं को नाज़ था, जो दुनिया को अपनी बपौती समझ बैठे थे, आज अपने नागरिकों को तड़प तड़प कर मरते देख रहे हैं। वे भी कुछ कर नहीं पा रहे हैं। एक अनदेखे, अबूझे दुश्मन, जो नंगी आंखों से देखा भी नहीं जा सकता है, से डर कर हम खुद को घरों में कैद कर बैठे हैं।

यह बंदी कब तक चलेगी यह सिवाय उस जालिम वायरस के अभी तक तो किसी को भी नहीं पता है। बंदी खुलेगी, तो बाहर क्या हालात होंगे, देश की आर्थिकी, विकास, राजनीति और सामाजिक ताने-बाने पर इन सब का क्या असर पड़ेगा यह, दुनिया भर के इन विषयों के विशेषज्ञ, सोच रहे हैं। सरकार को भी इस विषय में सोचना चाहिए। हो सकता है सोच भी रही हो। इतिहास का लेखन और अध्ययन भी शायद कोरोना पूर्व और कोरोनोत्तर काल खंड में बंट जाय। पर अभी सब कुछ लॉकडाउन है। यह इतिहास का एक टर्निंग प्वाइंट है।

( विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफ़सर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

This post was last modified on April 17, 2020 10:52 am

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