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Monday, September 20, 2021

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मौलाना कल्बे सादिक ने भारतीय सियासत में कभी अपनी दुकान नहीं चलाई

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मौलाना कल्बे सादिक ऐसे समय में भारत के मुसलमानों को छोड़कर गये हैं, जब उनकी सबसे सख्त जरूरत थी। वह करीब एक साल से बीमार थे। मंगलवार रात दस बजे 84 साल के इस शिया धर्म गुरु ने लखनऊ में अंतिम सांस ली। मौलाना कल्बे सादिक अगर न होते तो इस्लाम का वो चेहरा अंग्रेजी, हिन्दी, उर्दू बोलने वाले गैर मुसलमानों के सामने न आ पाता जिस प्रगतिशीलता के लिए इस्लाम जाना जाता है। उनकी पूरी जिन्दगी शिक्षा का प्रसार करने और तमाम ज्वलंत समस्याओं का समाधान पेश करते हुए बीती। मुस्लिम समुदाय के सामने जब-जब गहन समस्या पेश आई, वो खड़े हुए और पूरी निर्भीकता से अपनी बात कही। उन्होंने लखनऊ और अलीगढ़ में स्कूल, कॉलेज खोले। वह तमाम धर्म गुरुओं की तरह अपने परिवार के लिए अथाह संपत्ति छोड़कर नहीं गये हैं लेकिन ऐसे शिक्षण संस्थान छोड़कर जरूर गये जिस पर उनका परिवार गर्व करेगा। वह इस्लामिक स्कॉलर होने के अलावा एक सच्चे समाज सुधारक भी थे।

तमाम मुद्दों पर उनका नजरिया बहुत स्पष्ट था। मौलाना कल्बे सादिक पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है। उनके जीवन पर लिखने के लिए एक किताब भी कम पड़ जायेगी। समय का पाबंदी से पालन करने वाले कल्बे सादिक साहब को जानने वाले, अनुसरण करने वाले भारत के गांव-गांव और कस्बों में बिखरे हुए हैं। हर किसी के पास उनकी यादों का व्यक्तिगत खजाना है।

वो किस तरह के मुसलमान हैं, उसकी सोच का अंदाजा उनकी इस बात से लगाया जा सकता है। वह कहते हैं – मैंने रोजा रखा हुआ है और मैं नमाज पढ़ रहा हूं। इतने में कानों में आवाज आती है, हाय राम बचाओ। वह कहते हैं, इन हालात में क्या मेरा धर्म आड़े आना चाहिए। नहीं… मैं नमाज-रोजा छोड़कर पहले उस शख्स को बचाने के लिए घर से बाहर निकलूंगा और जो कोशिश करनी है वो करूंगा। इस्लाम के लिए किसी इंसान की जान बचाना कीमती है, उसका धर्म क्या है, इसे जानने में उसकी दिलचस्पी नहीं है। वह कहते थे कि जो लोग इंसानों की जान धर्म के नाम पर लेते हैं, मुझे पता नहीं कि उनका धर्म क्या है। लेकिन इतना जरूर है कि वे इंसान नहीं हैं, हैवान जरूर हो सकते हैं।

2008 में आरएसएस ने बड़ी चालाकी से मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में नमाज पढ़ने पर पाबंदी का मामला उठाया। आरएसएस के फंड से संचालित होने वाले कुछ कथित मुल्ला लोगों ने इस पर हायतौबा मचाई। तमाम सुन्नी धर्म गुरु आरएसएस की बिछाई पिच पर खेलने लगे यानी आरएसएस चाहता था कि वे विरोध करें। लेकिन उसी समय मौलाना कल्बे सादिक खड़े हो गये। उन्होंने शहर-शहर जाकर तकरीरें कीं और कहा कि अगर मुस्लिम महिला मस्जिद में नमाज पढ़े तो इसमें हर्ज क्या है। मस्जिद में नमाज पढ़ने के लिए शरीर की स्वच्छता संबंधी जो शर्तें किसी मुसलमान के लिए लागू हैं, वही शर्तें मुस्लिम महिलाओं के लिए हैं।

अगर वो शर्तें पूरी कर रही हैं तो उन्हें मस्जिद में नमाज पढ़ने का पूरा अधिकार है। उन्होंने पैगम्बर की हदीसों के जरिये साबित किया कि पैगम्बर के समय में भी मुस्लिम महिलाओं ने मस्जिदों में नमाज पढ़ी है। उसके बाद सुन्नी धर्म गुरुओं ने भी इस तथ्य को स्वीकार कर लिया। आरएसएस ने इसके बाद दरगाहों में मुस्लिम महिलाओं के प्रवेश के मामले को भड़काया। फिर कल्बे सादिक सामने आये। उन्होंने कहा कि मुस्लिम महिलाएं किसी भी धार्मिक स्थल में जाने का समान अधिकार पुरुषों जैसा ही रखती हैं।

महिला अधिकारों को लेकर वह हमेशा सचेत रहे। जब एक बार में तीन तलाक के मुद्दे को भाजपा और संघ ने हवा दी तो वह फिर सामने आये। उन्होंने कहा कि एक बार में बोला गया तलाक-तलाक-तलाक इस्लाम विरुद्ध है। तलाक इस तरह नहीं दिया जा सकता। इस्लाम ने विवाह और तलाक दोनों को बहुत सख्त बनाया है। उन्होंने सवाल किया कि इस्लाम के अलावा क्या किसी और धर्म में लड़कियों से विवाह के पूर्व अनुमति ली जाती है। यह बहुत सख्त नियम है। इसका पालन मुसलमानों के सभी मसलक करते हैं। बिना लड़की की अनुमति मिले, उसके अभिभावक उसकी शादी नहीं कर सकते। इसी तरह तलाक के नियम भी बहुत सख्त हैं। कुरान में यह कहीं नहीं लिखा है कि एक बार में बोला गया तीन तलाक, तलाक होता है। मौलाना कल्बे सादिक ने कहा कि बाकी समुदाय के लोग बी आर चोपड़ा की फिल्म निकाह देखकर इस मुद्दे पर अपनी राय न बनायें।

वह विदेशों में तमाम हाई प्रोफाइल कॉन्फ्रेंस में शामिल होते थे। वहां उनकी तकरीरें उस भारत का परिचय कराती थीं, जो सहनशील है। जिसने हर धर्म को खुद में समाहित कर लिया है। जिसकी तहजीब गंगा-जमुनी है। वह बताते थे कि कैसे भारत की आजादी को असंख्य हिन्दू-मुसलमानों ने एकजुट होकर हासिल किया है। उनकी जबान पर शहीद-ए-आजम भगत सिंह के साथ-साथ अशफाकउल्लाह खान और चंद्रशेखर आजाद भी होते थे।

अब जबकि 2020 बीतने जा रहा है लेकिन यह साल मुस्लिम महिलाओं का सीएए-एनआरसी के विरुद्ध खड़े होने के लिए जाना जाएगा। मुझे याद आ रहा है लखनऊ का वो मंजर, जब रूमी गेट पर मुस्लिम महिलाएं नया शाहीनबाग लेकर धरने पर बैठ गईं। इतना बड़ा धर्म गुरु एक सुबह अपनी व्हील चेयर से वहां धरना दे रही महिलाओं के बीच जा पहुंचा। बीमार होने के कारण उन्हें व्हील चेयर पर आना पड़ा था। उनकी मौजूदगी का नोटिस सरकार ने लिया। उनको चेतावनी दी गई लेकिन वह झुके नहीं। उन्होंने इस आंदोलन को मुस्लिम महिलाओं का टर्निंग प्वाइंट बताया और कहा कि हमारी बच्चियां अब समझदार हो चुकी हैं और वो जमाने से टकराने को तैयार हैं। अब मैं चैन से मर सकूंगा।

मुझे 2015 में एएमयू अलीगढ़ में वो कॉन्फ्रेंस याद है जब उन्होंने अपने नौ मिनट के भाषण से यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स को हिला दिया था। वहां आयोजित कॉन्फ्रेंस का विषय था इस्लाम क्या है। उन्हें वहां बोलने के लिए दस मिनट दिये गये थे। उन्होंने कुरान की आयतों को कोट करते हुए कहा कि इस्लाम क्या है, ये कोई नहीं बता सकता है। ये सिर्फ कुरान बता सकता है। कुरान कहता है या तो मुसलमान हो जाओ या अपराधी बन जाओ यानी कोई अपराधी मुसलमान नहीं हो सकता। अगर मुसलमान है तो अपराधी नहीं हो सकता। यानी अपराध करने वाला अगर मुसलमान है तो वह अपने धर्म से खारिज है।

यह बात कुरान में लिखी हुई है। उन्होंने कुरान के हवाले से बताया कि तुम वो बेहतरीन समुदाय हो जिसे अल्लाह ने दुनिया में सभी इंसानों की समस्याओं का बेहतरीन हल निकालने के लिए भेजा है। यानी पूरी दुनिया इंसानियत के लिए है। धर्म का फर्क कोई चीज नहीं है। उन्होंने कहा कि एक मुल्ला चाहे वो शिया हो या सुन्नी हो, वो एक दूसरे के बारे में बतायेगा तो गलत बतायेगा। इसलिए हमारे युवकों के बीच डॉयलॉग (संवाद) होना चाहिए। मुल्लों को भूल जाइए।

ईसाईयों के पोप सिस्टम की तरह शिया इस्लाम भी मरजा सिस्टम से चलता है। पूरी दुनिया में शिया मुसलमान अपने मरजा (Supreme Legal System) के आदेशों-निर्देशों पर अमल करते हैं। मौलाना कल्बे सादिक विश्व के सबसे बड़े मरजा आयतुल्लाह सिस्तानी साहब के भारत में वकील थे। भारत और पाकिस्तान में शिया मुसलमान धार्मिक मामलों में या तो सिस्तानी साहब या फिर आयतुल्लाह खामनेई (ईरान के सुप्रीम लीडर) के दिशा निर्देशों का पालन करते हैं। कल्बे सादिक साहब इराक में सिस्तानी साहब से मिलने पहुंचे।

बता दें कि सिस्तानी साहब इराक के नजफ नामक शहर में एक बहुत मामूली घर में रहते हैं, और बहुत साधारण जिन्दगी जीते हैं। मुलाकात के दौरान मौलाना कल्बे सादिक ने आयतुल्लाह से पूछा कि भारत के मुसलमानों के लिए वो क्या संदेश देना चाहेंगे। उन्होंने कहा कि उनसे कहो कि आधुनिक शिक्षा की बुनियाद पर अपना भविष्य बनायें। आयतुल्लाह का कहना है कि शिक्षा एक पावर है, एक हथियार है। लेकिन उनका यह भी कहना है कि शिक्षा में नीयत का बहुत महत्व है। लेकिन अगर कोई साइंस या टेक्नॉलजी लोगों का शोषण करती है या भेदभाव करती है तो वह बेकार है। वह ज्ञान बेकार है। वह प्रयोग गलत है।

मौलाना कल्बे सादिक चाहते तो भारत की सियासत में अपनी दुकान चला सकते थे। अपनी पार्टी खड़ी कर सकते थे। लेकिन वह उस रास्ते की तरफ कभी नहीं बढ़े। उनके पास सफलता का कोई शॉर्टकट फॉर्म्युला नहीं था। उन्होंने किसी भी पार्टी के शासनकाल में हर पार्टी और हर तरह के नेताओं से बराबर दूरी बनाये रखी। अलबत्ता उन्होंने श्री श्री रविशंकर, पंडित राम किंकर उपाध्याय, शंकराचार्य स्वरुपानंद सरस्वती, आचार्य प्रमोद कृष्ण के बुलावे पर उनके मंच पर जाने और संबोधित करने से कभी परहेज नहीं किया। चूंकि वह चमक दमक और प्रचार से बहुत दूर थे, अन्यथा जिन ओवैसी के नाम से आज मुसलमानों की पहचान बन रही है, उनकी जगह कल्बे सादिक होते।

मौलाना कल्बे सादिक के रिक्त स्थान को भरने के लिए फिलहाल भारतीय मुसलमानों के पास कोई रहबर नहीं है।

(यूसुफ किरमानी वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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