अपने ही बुने लॉकडाउन के जाल में फँस गयी है मोदी सरकार!

अभी ताजा समाचारों के अनुसार देश में कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों की कुल तादाद 37262 पहुंच चुकी है। अकेले महाराष्ट्र में रिकॉर्ड 1008 मरीज एक दिन में संक्रमित पाए गए हैं। वहीं गुजरात में यह संख्या 5000 के आंकड़े को पार कर चुकी है। पिछले 24 घंटों में देश में 2200 नए मामले आये हैं, जो बताता है कि कोरोना वायरस ने अब जाकर अपनी रफ़्तार भारत में पकड़ ली है।

दुनिया का सबसे बड़ा लॉकडाउन भारत में 24 मार्च से 21 दिनों के लिए शुरू हुआ था, तब भारत में कुल कोरोना पॉजिटिव लोगों की संख्या 600 के आस-पास थी। आज एक दिन में ही इसके 4 गुना मरीज सामने निकल कर आ रहे हैं, तो सोचना लाजिमी हो जाता है की क्या 40 दिन पहले जो लॉकडाउन बिना देश से आम राय बनाए लागू किया गया था, वह समझदारी भरा कदम था या अविवेकपूर्ण और जल्दबाज़ी में लिया गया फैसला? 

जहां तक सरकारी प्रचार तन्त्र और गोदी मीडिया का प्रश्न है वे लगातार इस प्रश्न पर बड़ी सफाई से देश को यह बताते जा रहे हैं कि भारत ने लॉकडाउन को पहले ही लगाकर भारी मात्रा में संक्रमण से बचा लिया। वरना जो आंकड़े हम आज देख रहे हैं, उसके 8 से 10 गुना संख्या देखने को मिल सकती थी। 

लेकिन बड़ा सवाल ये है कि आखिर हम लॉकडाउन से क्या समझ रहे थे? इसका कुल हासिल क्या था? 

दुनिया भर में लॉकडाउन में जाने से पहले कुछ निश्चित मापदण्ड तैयार किए गए थे और उसके अनुसार रणनीति बनाकर काम किया गया था। जिन देशों में कोरोना वायरस का संक्रमण सबसे पहले सामने आया, उसमें चीन के अलावा यूरोप के जर्मनी, ब्रिटेन, फ़्रांस, इटली के साथ एशिया में ईरान और बाद में जाकर इसमें अमेरिका शामिल हो गया। इससे निपटने के लिए उन देशों में अलग-अलग रणनीति तैयार की गई, लेकिन साथ ही अपने देश की जनसंख्या के विभिन्न तबकों की जरूरतों के हिसाब से राहत पैकेज और बजटीय प्रावधानों को संसद में पास कराकर इसे लागू किया गया। इसके बावजूद इटली और अमेरिका में भारी तबाही देखने को मिली है। ईरान आर्थिक प्रतिबंधों के साथ पहले से ही नाकेबंदी का शिकार देश रहा है, लेकिन वहां भी जब यह विभीषिका अपने चरम पर थी, तो दसियों हजार की संख्या में जेलों में बंद कैदियों तक को रिहा करने के हुक्म दिए गए।

इसमें सबसे कम बात चीन ने जो रणनीति बनाई है उस पर हुई है। जबकि चीन ही वह देश है, जहाँ से कोरोना वायरस पनपा और जिस दौरान वह इससे अकेला जूझ रहा था उस समय बाक़ी विश्व के पास इस महामारी से निपटने के लिए तैयारी का पूरा मौक़ा था। लेकिन उस समय के इस्तेमाल की जगह बाक़ी विश्व या तो उसका मज़ाक़ बना रहा था या फिर उससे पाए मौक़े को अपने आर्थिक हितों को पूरा करने में लगा दिया।

चीन ने जो सबसे महत्वपूर्ण फैसला उस परिस्थिति में लिया, उसे शायद ही किसी और ने अपने यहाँ लागू किया। उसने आंकड़ों पर नजर डालते हुए पाया की हुबेई प्रान्त ही वह जगह है जहाँ से इस वायरस के संक्रमण की शुरुआत हुई, और उसका मुख्य शहर हुआन इसका केंद्र बिंदु है। चीन ने पाया की यदि इस शहर को पूरी तरह से सीलबंद कर दिया जाए और पूरे हुबेई प्रान्त में लॉकडाउन कर दिया जाए, तो इस महामारी को उस खास भौगौलिक क्षेत्र तक सीमित कर देने मदद मिल सकती है। 

इसके दो फायदे थे। पहला, संक्रमण के देश और दुनिया में विस्तार को रोका जा सकता था। दूसरा जो सबसे महत्वपूर्ण पहलू था, जिसे सारी दुनिया को ध्यानपूर्वक समझना था कि संक्रमण से केन्द्रित तौर पर निपटने के लिए आपके पास कहीं अधिक मात्रा में मेडिकल टीम और संसाधन मुहैय्या हो सकते हैं। चीन ने यही किया। करीब 40 हजार से अधिक संख्या में देश भर से मेडिकल टीम हुबेई प्रान्त में तैनात रही। इस बीच देश में कमोबेश उत्पादन भी जारी रहा। बीजिंग जैसे शहर को पूरी तरह से सील तो किया गया, लेकिन शहर के अंदर कार्यकलाप बदस्तूर जारी रहे। 

भारत सरीखे देशों की भयानक रणनीतिक चूक

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि फरवरी और मार्च के महीनों में जब चीन इस महामारी से जूझ रहा था और विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से भी दुनिया भर में इसको लेकर डेली अपडेट आने लगे थे, तब भारत महाभियोग से उबरने के बाद ट्रम्प के स्वागत के लिए अहमदाबाद के मोटेरा स्टेडियम में 70 लाख लोगों को जुटाने की तैयारी में व्यस्त था। इसके बारे में विस्तार से जाने की जरूरत नहीं है।

भारत के केरल में चीन से आये छात्र के जरिये जनवरी के अंतिम सप्ताह में कोरोना वायरस का संक्रमण प्रवेश कर चुका था, और यह संख्या जनवरी से मार्च के बीच करीब 15 लाख विदेश से आने वाले लोगों के द्वारा किस-किस तरीके से पहुंची, यह अपने आप में शोध का विषय है। लेकिन हमारी सरकार इन सबसे आँखें मूंदे दिल्ली दंगों, और उसके उपरांत करीब तीन हफ़्तों तक मध्य प्रदेश में कांग्रेस की कमलनाथ सरकार को गिराने के प्रयासों में जुटी रही। हम तात्कालिक लाभ के लिए अपने छोटे प्रतिद्वंदी पर फोकस बनाए रखे, मीडिया ने भी दिन-रात खुद को कमलनाथ के दावों और ज्योतिरादित्य सिंधिया की सधी हुई चालों में बड़ी ब्रेकिंग न्यूज़ को ही अहमियत दी।

कोरोना वायरस को लेकर सरकार की नींद तब टूटी जब होली के उपरांत लखनऊ में आयोजित एक पार्टी में विदेश से लौटी गायिका कनिका कपूर के शामिल होने और उनके कोरोना पोजिटिव पाए जाने की ख़बर सामने आयी। यह ख़बर सरकार के लिए वज्रपात से कम नहीं थी। पता चला कि इसमें बीजेपी सहित तमाम पार्टियों के दिग्गज मौजूद थे, जो संसद में भी आये और यहाँ तक कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद तक से मिले थे। एकाएक सत्ता के गलियारों में बैठे लोगों की सांस ऊपर की ऊपर और नीचे की नीचे अटक गई।

यह तो एक कनिका कपूर थीं, जिनका खुलासा हुआ था। न जाने कितनी कनिका कपूरों की पार्टियों और बिजनेस मीटिंग सहित इन सांसदों, कॉर्पोरेट घरानों के लोगों, उनके परिवारों और बेटे बेटियों ने शामें गुजार रखीं थीं। एक झटके में हमें पता चलता है कि मोदी जी राष्ट्र के नाम सम्बोधन करेंगे। जिसमें शुरुआती 14 घंटे के कर्फ्यू का आह्वान जनता से किया गया। इस स्वघोषित जनता कर्फ्यू को पूरे देश में हर्षोल्लास से मनाया गया, क्योंकि जनता को लगा कि यह एक छोटा सा टास्क है जो रविवार के दिन दिया गया है। 

घर बैठे टीवी देखते हुए शाम 5 बजे इसे ताली थाली शंख घड़ियाल बजाकर स्वास्थ्यकर्मियों के उत्साह वर्धन के लिए बजाना है। लेकिन सत्ता में बैठे लोगों के लिए यह संयोग नहीं एक प्रयोग था। क्योंकि 4 बजे से ही 75 जिलों में लॉकडाउन की सूचना एक फिलर की तरह आने लगी थी। लेकिन जनता तो रात तक झूमती रही। और दो दिन बाद ही ट्रेन बंद और फिर 21 दिन के लॉकडाउन के लिए मिले 4 घंटे के समय ने लोगों को सोचने समझने का कोई समय ही नहीं दिया।

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जो बिलों में फंसे चूहे थे, और उन्होंने देख लिया कि अगले 21 दिन जिन्दा रहने के लिए महानगरों में उनके पास कोई जरिया नहीं है, वे पहले बसों का रुख किये और उसके बाद लाखों की संख्या में पैदल ही निकल पड़े।

40 दिन बाद आज हम कहाँ हैं?

आज हम 600 की संक्रमण संख्या से 50 गुना ज्यादा की संख्या पर खड़े हैं। आंकड़ों की हेराफेरी तो कहीं से भी की जा सकती है। लेकिन हमारे पास बेस संख्या तो वही रहनी चाहिए, जब लॉकडाउन की घोषणा की गई थी। उस संख्या से अगर हम तुलना करते हैं तो पाते हैं कि पहले दो महीनों में जो संख्या 600 पहुँच सकी थी वह एक भयानक संख्या तक पहुँच गई है, और अब अगले दो हफ़्तों में विस्फोट के मुहाने पर खड़ी है। जब हम इस संख्या को लाख से ऊपर देखेंगे।

लेकिन क्या इससे घबराने की जरूरत थी?

शायद नहीं, बल्कि मूल सवाल यही था कि लॉकडाउन के लिए कम से कम 10 दिन का समय देश को भी देना था। जो ट्रेनें आज चलाई जा रही हैं, उन्हें तब चलाए जाने की जरूरत थी। बिना संक्रमण के करोड़ों लोग तब थे। एक ही दिशा में बाकी सभी ट्रेनों को रद्द कर, सबसे गरीब लोगों को उनके गंतव्य पर मुफ्त में पहुँचाने की व्यवस्था करना तब आज के बनिस्बत बेहद आसान था। हो सकता है, तब सरकार चाहती तो रेल भाड़े को चार्ज भी करती, तो भी कोई आपत्ति नहीं होती। लेकिन आज 40 दिन बाद, जब बिना किसी काम के लॉकडाउन के पहले हफ्ते में ही अपने पास रखी जमा पूंजी को फूंक कर एक दिन में एक बार किसी तरह से खा के या फांकाकशी कर मरणासन्न हालत में पड़े इन मजदूरों, फंसे हुए आम लोगों से रेल किराए की माँग कोई हृदय और संवेदनहीन सरकार ही कर सकती है। जैसा की शेक्सपियर के नाटक में शाइलॉक को हम पाते हैं, जो बदले में मांस का टुकड़ा माँगता है। 

वास्तव में देखें तो अब हम उस स्थिति में पहुँचते जा रहे हैं, जब लॉकडाउन की जरूरत आन पड़ी है। लेकिन अब हालत यह है कि 24 मार्च को जो स्थिति महानगरों में फंसे सबसे कमजोर वर्ग की थी, वही अब अधिकाधिक निम्न मध्य वर्ग की हो चुकी है। मध्य और उच्च मध्य वर्ग की हालत भी पतली होती जा रही है। घर बैठे तनख्वाह में कटौती, ईएम्आई की मार में छीजता बैंक बैलेंस, और नौकरी से मुक्त किये जाने की खबरें उनके पास किसी वज्रपात से कम नहीं। यह हाल करोड़ों लोगों का है। 

देश के तमाम अर्थशास्त्रियों ही नहीं बल्कि कॉरपोरेट में भी बेचैनी साफ़ नजर आ रही है। आनन्द महिंद्रा से लेकर इन्फोसिस के संस्थापक नारायण मूर्ति तक ने आगाह करना शुरू कर दिया है, कि लॉकडाउन को आधा अधूरा खोलना, फिर लागू करना किसी काम का नहीं है। नारायण मूर्ति ने चेतावनी दी है कि अगर भारत भर में एक और लॉकडाउन थोपा जाता है तो कोविड-19 जैसी महामारी से जितने लोग भारत में मारे जायेंगे, उससे कहीं भारी संख्या में मौतें भूख से होंगी।

अब देखना यह है कि आखिर कब जाकर भारतीय मीडिया देश को सही तस्वीर दिखाने के लिए खुद को तैयार करेगा। फिलहाल तो उसका सारा ध्यान इस समय तीनों सेनाओं द्वारा देश के स्वास्थ्यकर्मियों के वारियर के रूप में बखान करने पर ही टिका रहने वाला है। इस समय जबकि उनके लिए आवश्यक किट, उनके काम के घंटों के बाद विश्राम की व्यवस्था, और सबसे बड़ी बात वे क्या देश से माँग रहे हैं, और क्या कहना चाह रहे हैं आदि पर ध्यान देने की जरूरत है। तब उनके ऊपर पुष्प वर्षा की बौछार कर उन्हें सारे देश के अहसान तले चुप कराने की कवायद में शामिल कर देने में लग रहा है। लेकिन यह तात्कालिक उत्साह वर्धन कुछ घंटों के लिए तो हो सकता है, लेकिन जिस तरह से संख्या दिन-दूनी रात चौगुनी होती जायेगी, उसके लिए यह बेहद नाकाफी होने जा रहा है। 

इसके लिए देश के सभी अंगों को समवेत स्वर में सम्पूर्णता में स्थिति की गंभीरता को देखते हुए कदम उठाना चाहिए, जिसमें सबसे पहले भारत की अधिसंख्य जनता के आँखों से आंसू पोंछना, फिर किसान के काम-काज को दुरुस्त करना और साथ ही शहरों में काम-काज किसी तरह शुरू करना सर्वप्रथम है। जान है तो जहान है के मायने अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग है। किसी खाए अघाए व्यक्ति के लिए जिसके पास बैंक बैलेंस है और उसकी ओर उसे ध्यान नहीं देना है, इसका मतलब करोना से खुद को बचाना हो सकता है, लेकिन देश में 80 करोड़ जनसंख्या ऐसी है जिसके लिए इसका मतलब है क्या उसके पास अगले 2 हफ्ते तक जीने के लिए राशन है?

इन दोनों के अंतरसंबंधों को यदि नहीं समझा गया तो पिरामिड के निचले तले पर मौजूद इन भूखे पेट वालों के गायब हो जाने पर ऊपर बैठे लोगों के महल भी हवा हवाई साबित हो सकते हैं, और वे भी आने वाले समय में आसमान से ज़मीन पर धड़ाम होने के लिए अभिशप्त हैं।  

(रविंद्र सिंह पटवाल स्वतंत्र लेखक हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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