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सीआरपीएफ़ की मानें तो राह चलते की जाने वाली हत्या भी बतायी जा सकती है मानवीय भूल

झारखंड में 20 मार्च के सुबह तड़के 36 वर्षीय आदिवासी रोशन होरो को नक्सली बताकर सीने और सर में गोली मारकर सीआरपीएफ ने हत्या कर दी। खूंटी जिला के मुरहू थानान्तर्गत रुमुतकेल पंचायत के एदेलबेड़ा उत्क्रमित मध्य विद्यालय के पास यह हत्या की गई। उस वक्त रोशन होरो घटनास्थल से मात्र डेढ़ किलोमीटर दूर अपने गांव कुम्हारडीह (कुम्हारटोली) से सांडी गांव भैंस का चमड़ा लेकर नगाड़ा बनवाने जा रहे थे।

रोशन होरो की मां रानीमय होरो और पत्नी जोसफिना होरो का कहना है कि 20 मार्च की सुबह रोशन होरो खाल लेकर सांडी गांव नगाड़ा बनवाने के लिए निकले थे। वह खेती-बारी कर जीवन यापन करते थे। उनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड भी नहीं है।

डेढ़ साल पहले तक वह सीएनआई चर्च के प्रचारक भी थे। उनका छोटा भाई जुनास फौज में है और सबसे छोटा भाई पढ़ाई कर रहा है। उन्हें तीन छोटी-छोटी बेटियां है, एलिना (12 वर्ष), आकांक्षा (8 वर्ष) और अर्पित (3 वर्ष)।

इस घटना पर खूंटी एसपी आशुतोष शेखर का कहना है, “गुरुवार (19 मार्च) की रात पीएलएफआई (पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट ऑफ इंडिया) के साथ पुलिस और सीआरपीएफ की संयुक्त टीम की मुठभेड़ हुई थी। शुक्रवार (20 मार्च) की सुबह मुरहू थाना क्षेत्र के कुम्हारडीह गांव के आसपास छापामारी के लिए मुरहू थाना, सैट और सीआरपीएफ की टीम निकली थी। इसी क्रम में बाइक सवार रोशन होरो वहां से गुजर रहे थे।

छापामारी दल ने उन्हें रुकने के लिए कहा, लेकिन वह बाइक रोककर भागने लगे। नहीं रुकने पर गोली चला दी गई। इससे उनकी मौत हो गई। मृतक रोशन होरो का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है। झारखंड पुलिस मृतक के परिजनों के साथ है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के दिशा-निर्देश के आलोक में हरसंभव सहयोग करेंगे। घटना की मजिस्ट्रेटी जांच भी कराई जाएगी।”

झारखंड पुलिस के आईजी अभियान साकेत कुमार सिंह का कहना है कि “प्रथम दृष्टया मामला मनवीय भूल का लगता है। गुरुवार रात उग्रवादी दस्ते की मौजूदगी की सूचना पर अभियान शुरू हुआ था। शुक्रवार को दूसरी टुकड़ी अभियान में शामिल हुई, इसी दौरान घटना हुई। पुलिस मामले की स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराएगी।”

रोशन होरो की माँ रानीमय होरो

वहीं इस घटना पर झारखंड के नवनियुक्त डीजीपी एमवी राव कहते हैं, “पुलिस ने गलतफहमी में गोली चलाई है। किसी की हत्या का इरादा नहीं था। दोषी पुलिसकर्मियों पर केस दर्ज करने का निर्देश दे दिया गया है। केस दर्ज कर कार्रवाई की जाएगी। किसी को भी नहीं बख्शा जाएगा।”

उनका कहना है कि पुलिस पूरे मामले में किसी तरह की लीपापोती नहीं कर रही है। पूरे मामले की जांच भी कराई जाएगी और सरकार के नियमानुसार भुक्तभोगी के परिवार वालों को हर संभव सहायता की जाएगी।

पुलिस के अनुसार रोशन होरो के शव का मजिस्ट्रेट की उपस्थिति में डॉक्टरों की एक टीम द्वारा पोस्टमार्टम भी कर दिया गया है और इसकी वीडियोग्राफी भी कराई गई है।

वैसे तो इन पुलिस अधिकारियों के बयान में काफी झोल नजर आता है और पुलिस की कार्यपद्धति पर भी काफी सवाल खड़े होते हैं। नक्सल ऑपरेशन के दौरान ऑपरेटिंग स्टैंडर्ड प्रोसिजर (ओएसपी) कहता है कि बिना हथियार देखे किसी पर गोली नहीं चलानी है, तो फिर इस ओएसपी का पालन वहां पर क्यों नहीं किया गया?

इस अभियान का नेतृत्व सीआरपीएफ की 94वीं बटालियन के टूओसी और खूंटी के एएसपी अनुराग राज कर रहे थे। तो क्या उन्होंने गोली चलाने की अनुमति दी थी? पुलिस रोशन को दौड़कर पकड़ भी सकती थी या फिर पैर पर गोली मारकर घायल कर सकती थी, लेकिन सीधा सर व सीने पर गोली क्यों मारी गई? क्या किसी पर भी नक्सली होने का संदेह होने पर सीधा गोली मारने का अधिकार हमारे पुलिस के पास है?

रोशन होरो के पास भैंस का चमड़ा था, उन्हें लगा होगा कि पुलिस के पास पकड़ाने पर उसे फंसाया जा सकता है, इसीलिए वह बाइक छोड़कर भागने लगे और पुलिस ने उनके सर और सीने को निशाना बनाते हुए तीन गोली चलाई, जिसमें दो गोली उन्हें लगी। तो सवाल उठता है कि क्या पुलिस ने उन्हें पकड़ने के लिए गोली चलाई या मौत की नींद सुलाने के लिए? यह घटना नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में पुलिस द्वारा चलाए जा रहे अभियानों में तमाम कायदे-कानूनों को धता बताने की एक बानगी मात्र है, इसमंक इनकी पोल खुल गई है और पुलिस अधिकारी गलती स्वीकार कर रहे हैं।

(रुपेश कुमार सिंह स्वतंत्र पत्रकार हैं और आजकल झारखंड के रामगढ़ में रहते हैं।)

This post was last modified on March 21, 2020 10:54 am

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