Saturday, February 4, 2023

मिर्जापुर से ग्राउंड रिपोर्ट: शौच का पानी पीने को मजबूर हैं चंद्रगढ़ के लोग

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मिर्जापुर। क्या कोई शौच का पानी पी सकता है? उससे भोजन पकाया जा सकता है? या फिर उस पानी को स्नान के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है? सामान्य तौर पर इन तीनों सवालों का उत्तर न है। लेकिन जिंदगी इन सवालों और उसके जवाबों के सीधे रास्ते नहीं चलती। उसका रास्ता बेहद ऊबड़-खाबड़ और पथरीला होता है। शायद इसीलिए मिर्ज़ापुर से तक़रीबन 60 किमी दूर बसे चंद्रगढ़ के लोगों के लिए इन सारे सवालों का उत्तर हां में है। जिंदगी की इस जहालत से उन्हें एक दिन और एक महीना नहीं बल्कि सालों-साल से गुजरना पड़ रहा है। इस हकीकत को इन पंक्तियों के लेखक ने अपनी नंगी आंखों से देखा है। जनचौक का यह संवाददाता जब इलाके से गुजरने वाली नदी के नाम पर उसके गंदले पानी से रूबरू हुआ तो उसका नजारा बेहद परेशान करने वाला था। एक शख्स बर्तन में पानी भर रहा था। उससे कुछ दूर पर दूसरा शख्स शौच के बाद पानी छू रहा था और तीसरा मिट्टी से सने उसी गंदे पानी में स्नान कर रहा था। यह दृश्य 70 साल पुराने भारतीय लोकतंत्र की नाकामी की खुली बयानी था। लेकिन सरकार है कि नल-जल योजना को सफलता के नये शिखर पर पहुंचाने के अपने दावे से बाज नहीं आ रही है।

अगर इसके लोकेशन की बात करें तो यह मिर्जापुर मुख्यालय से तकरीबन 60 किमी दूर चंद्रगढ़ मुडैल के रास्ते बबुरा रघुनाथ सिंह और करनपुर गांव की ओर जाता है। यह रास्ता ड्रमंडगंज वन रेंज की सीमा क्षेत्र से भी गुजरता है। घने जंगलों के साथ पहाड़ी भू-भाग,पहाड़ी नदी-नालों से गुजरता यह इलाका चंबल के बीहड़ों सरीखा एहसास दिलाता है। पाल (गडेरिया), कोल (आदिवासी), मुसलमान सहित अन्य जातियों के लोग यहां रहते हैं। मूलत: यह आदिवासी बाहुल्य है।

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यह मध्य प्रदेश के रीवां जनपद के हनुमाना इलाके से लगता है। हलिया मिर्जापुर जनपद का अंतिम छोर ही नहीं बल्कि अंतिम विकासखंड भी है। हलिया विकासखंड का भैंसोड़ बलाय पहाड़, लहुरियादह, देवहट, चंद्रगढ़ मुंडेल, बबुरा रघुनाथ सिंह, करनपुर इत्यादि कई ऐसे पहाड़ी गांव हैं जो पानी सहित तमाम उन बुनियादी सुविधाओं से महरूम हैं जो सरकार और जनप्रतिनिधियों के एजेंडे में होते तो हैं, लेकिन यहां धरातल पर ऐसा कुछ नहीं है जिसे विकास की कड़ी से जोड़कर देखा जा सके। दूसरे शब्दों में कहें तो सड़क, बिजली, पानी सरीखी बुनियादी सुविधाओं से महरूम यहां के लोग दोयम दर्जे का जीवन जीने के लिए मजबूर हैं।

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मौजूदा समय में सरकार की महत्वाकांक्षी परियोजना “हर घर नल-जल योजना” के तहत घर-घर स्वच्छ निर्मल जल टोटी के जरिए पहुंचाए जाने की कवायद तो चल रही है, लेकिन मिर्जापुर जनपद के हलिया विकासखंड के कई ऐसे गांव हैं जो आज भी पानी की पहुंच से दूर हैं। यहां के लोग नदी नालों एवं चुआड़ (पहाड़ों से रिस कर आने वाला पानी) के जरिए अपनी प्यास बुझाने के लिए विवश हैं। 

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रोजी-रोजगार के साथ ही मेहनत-मजदूरी, खेती किसानी एवं मवेशी पालन यहां के लोगों का मुख्य जीविका का साधन है। कुछ लोगों के पास सिंचाई के लिए निजी साधन है वरना बहुमत हिस्से के लिए कुदरती बरसात ही सिंचाई का मुख्य साधन बनी हुई है। स्थानीय क्षेत्र निवासी एवं युवा पत्रकार अभिनेश प्रताप सिंह बताते हैं कि चंबल के बीहड़ों से कम नहीं है हलिया के सुदूर अंचलों में बसे ग्रामीणों का जीवन। वह इस प्रतिनिधि को इस पूरे इलाके के कुछ गांवों का, कुछ मार्गों का बाकायदा भ्रमण कराते हुए स्थानीय समस्याओं से रूबरू कराते हैं।

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चंद्रगढ़ मुड़ैल होते हुए जैसे ही बबुरा रघुनाथसिंह, करनपुर की ओर बढ़ा जाता है कि बीच में ही कठहा नदी पड़ती है। यह पहाड़ी नदी है स्थानीय लोगों की मानें तो इस नदी के पानी से ही लोगों की प्यास भी बुझती है, इस नदी और पथरीली राहों को किसी प्रकार पार करते हुए जैसे ही कदम आगे बढ़ने को हुए कि सहसा एक दृश्य को देखकर कदम वहीं के वहीं ठिठक गए, दरअसल कुछ दूर पर एक व्यक्ति शौच कर रहा होता है और उसके समीप ही एक कुत्ता भी उसी पहाड़ी नदी के जल को पी रहा था। तभी एक बच्चे के साथ आयी एक बुजुर्ग महिला हाथों के चुल्लू से उस पानी को ग्रहण करने के बाद उसे प्लास्टिक के बॉटल में भरने लगती है। एक तरफ जहां स्वच्छ व निर्मल जल पीने की बात कही जा रही है वहीं दूसरी तरफ प्यास बुझाने के लिए लोग किस जद्दोजहद से गुजर रहे हैं। यह तस्वीर उसकी खुली बयानी थी। नंगी आंखों से देखी गयी यह तस्वीर सभ्य समाज के किसी भी शख्स को हांट करने वाली है।

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सड़क की समस्या के साथ-साथ इस पहाड़ी नदी पर पुल ना होने के कारण बरसात के दिनों में आवागमन पूरी तरह से बाधित हो जाता है। यह समस्या कोई दो-चार, 10 वर्षों की नहीं बल्कि देश की आज़ादी के बाद से चली आ रही है। लोगों का कहना है कि चुनाव के दौरान जनप्रतिनिधि इस तरफ झांकने तक नहीं आते हैं। कई ग्रामीणों को तो अपने जनप्रतिनिधियों का भी नाम नहीं पता है। खैर, इस स्थान से थोड़ा और आगे बढ़ने पर वन रेंज ड्रमंडगंज की सीमा प्रारंभ हो जाती हैं।

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वैसे तो वन और पौधों की सुरक्षा के लिए व्यापक इंतजाम किए जाने का दावा किया जाता है लेकिन यहां कुछ ऐसा दूर-दूर तक नजर नहीं आया। वन क्षेत्र में धड़ल्ले से पेड़ों की कटाई का दृश्य नजर आया। नदी को पार कर ऊपर जाने पर कुछ-कुछ दूर पर दो-चार घर नजर आते हैं। शेष जंगल और कटीली झाड़ियां, पथरीले रास्ते हैं। बिजली, पानी और सड़क की समस्या से जूझते यहां के बाशिंदों का कहना है कि बिजली के नाम पर कुछ स्थानों पर सोलर लाइट तो लगवाए गए हैं पंचायत की तरफ से लेकिन अधिकांश सोलर लाइट की बैटरी गायब है। जिससे आज भी यहां के लोगों को लालटेन युग में जीवन जीना पड़ रहा है।

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मिर्जापुर जिला मुख्यालय से 65 किमी दूर पहाड़ पर बसे लहुरिया दह गांव भी पानी की घोर समस्या से जूझ रहा है। यहां पानी की आपूर्ति टैंकर के जरिए होती है। यह गांव मिर्जापुर जनपद का अंतिम गांव है। इस गांव से लगने वाला भैंसोड़बलाय पहाड़ इसके बाद मध्य प्रदेश के हनुमना क्षेत्र की सीमा प्रारंभ हो जाती है। पहाड़ पर बसे लहुरिया दह गांव की कुल आबादी तकरीबन 3 हजार बताई जाती है। हलिया विकासखंड अंतर्गत यह गांव कई मूलभूत सुविधाओं से वंचित है।

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हालांकि जब से मिर्जापुर जिले के जिलाधिकारी के तौर पर दिव्या मित्तल ने कार्यभार संभाला है। स्थितियां कुछ बदली हैं। उन्होंने न केवल इलाकों के दौरे किए हैं बल्कि पानी की समस्या को हल करने के लिए उन्होंने विशेष प्रयासों पर जोर दिया है। नतीजतन 70 सालों बाद इलाके के बाशिंदों में स्वच्छ पानी हासिल करने की उम्मीद जगी है।

पानी के लिए यहां की बहन-बेटियों को पहाड़ के नीचे तकरीबन एक से डेढ़ किलोमीटर पैदल जाना होता है तब जाकर उनकी प्यास बुझती है। दिलचस्प बात यह है कि नहाने से लेकर भोजन पकाने और शौच तक में इसी पानी का इस्तेमाल किया जाता है।

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पानी के लिए लगती है कतार होते रहते हैं झगड़े

पानी की घोर समस्या से जूझ रहे लहुरिया दह के ग्रामीण पानी के लिए कतार लगाते हैं। पानी के लिए पहाड़ के नीचे जाकर पानी के पात्र को कतार में लगा देते हैं और फिर अपनी बारी का इंतजार करते हैं।और फिर घंटों की इंतजारी के बाद पानी मिल पाता है। अक्सर ग्रामीण पानी को लेकर आपस में उलझ जाते हैं। इस काम में अक्सर महिलाओं एवं बच्चियों को लगाया जाता है जिससे हमेशा उनकी सुरक्षा का खतरा बना रहता है।

गांव में नहीं करते लोग शादियां

गांव निवासी लल्लन की मानें तो “पानी की किल्लत को देखते हुए यहां कोई अपनी बेटियों का ब्याह नहीं करना चाहता है। पहाड़ के नीचे उतर कर पानी लाना पड़ता है गर्मी के दिनों में यह समस्या और भी विकट हो जाती है। बरसात में जंगली जीव जंतुओं से लेकर पहाड़ से गिरने का भी भय बना रहता है, लेकिन मरता क्या न करता प्यास बुझाने से लेकर अन्य काम को पूरा करने के लिए जान जोखिम में डालकर पानी लाना मजबूरी बन जाता है।” 

पानी की होती है राशनिंग

ग्रामीण बताते हैं कि पानी की गंभीर समस्या को देखते हुए यहां टैंकर से पानी की आपूर्ति की जाती है जो पर्याप्त तो नहीं कहा जा सकता है। लेकिन एक हद तक लोगों को कुछ राहत ज़रूर मिली है। 6 टैंकरों से पहाड़ पर बसे ग्रामीणों को पानी की आपूर्ति की जाती है। यह कोई भी जानकर हैरान हो जाएगा कि लोगों को पानी लेने के लिए राशन कार्ड की तर्ज पर बाकयदा एक पर्चा दिया गया है। उसी के हिसाब से हर परिवार को पानी की आपूर्ति की जाती है।

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शिक्षा और चिकित्सा का घोर अभाव

नेशनल हाइवे से गुजरने वाले मार्ग के दोनों किनारों पर बसा लहुरिया दह पहाड़ का गांव स्वास्थ्य सेवाओं से पूरी तरह से महरूम है। यहां के लोग बीमार पड़ने पर या अन्य स्थितियों में ड्रमंडगंज स्वास्थ्य केंद्र, मिर्जापुर या मध्य प्रदेश में स्थित हनुमना स्वास्थ्य केंद्र की शरण में जाते हैं। पहाड़ पर बसे ग्रामीणों के लिए कोई भी उच्चकृत उप स्वास्थ्य केंद्र न होने के चलते लोगों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। शिक्षा-व्यवस्था के नाम पर गांव में प्राथमिक पाठशाला है, लेकिन मिडिल स्कूल के बाद यहां के बच्चों को आगे की पढ़ाई करने के लिए तकरीबन 8 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है।

इसकी पूरी मार बच्चियों पर पड़ती है और असुरक्षा के भय और साधनों के अभाव के चलते काफी अभिभावक अपनी बच्चियों को भेजना नहीं चाहते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यदि गांव में इंटर तक की शिक्षा उपलब्ध हो जाए तो पहाड़ पर बसे ग्रामीणों को अपने बेटे एवं बेटियों को आगे की शिक्षा के लिए कहीं दूर ना जाना पड़े।

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यहां के ग्रामीण बताते हैं कि आज तक किसी सांसद, विधायक ने भी यहां के लोगों की पुकार नहीं सुनी है। एक दौर में स्वर्गीय फूलन देवी के सांसद रहते यहां के लोगों की समस्याएं सुनी गई थीं। यहां आकर लोगों के बीच बैठकर उनकी समस्याओं को करीब से जानने के साथ ही साथ पानी की समस्या को दूर करने का आश्वासन फूलन देवी दे गई थीं। तब लोगों को काफी उम्मीद जगी थी लेकिन उनकी उम्मीदें परवान चढ़ने से पहले ही धूमिल हो गईं। 

एक बार फिर लोगों को मिर्जापुर की महिला जिलाधिकारी दिव्या मित्तल से काफी उम्मीदें जगी हैं। जिलाधिकारी दिव्या मित्तल यहां का दौरा कर लोगों की समस्याओं को शीघ्र दूर करने का न केवल आश्वासन दे गई हैं बल्कि उन्होंने पानी की समस्या को दूर करने के लिए समुचित ढंग से टैंकर से पानी आपूर्ति करने एवं बंद पड़े नलों को फिर से चालू कराने का कार्य प्रारंभ करवा दिया है। 

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जिलाधिकारी दिव्या मित्तल।

जिलाधिकारी दिव्या मित्तल बताती है कि “उन्होंने पहाड़ पर बसे लहुरिया दह गांव का निरीक्षण करने के साथ ही साथ पानी की समस्या को दूर करने की दिशा में कार्य प्रारंभ करवा दिया है। इसके लिए सबसे पहले टैंकर से समुचित मात्रा में पानी की आपूर्ति करने के निर्देश दिए गए हैं, साथ ही भूगर्भ जल विभाग के लोग सर्वे करने में जुटे हुए हैं। वहां पर एक बहुत पुराना कूप मिला है जो पूरी तरह से पट गया था उसकी खुदाई भी चालू है, संभव है कि वहां से भी पानी की व्यवस्था हो जाए।

इसी के साथ ही काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) से तकनीकी राय लेते हुए एक प्रस्ताव भी बनाया गया है, ताकि जल्द से जल्द पहाड़ पर बसे ग्रामीणों को पानी की समस्या से राहत दिलाई जा सके। जिलाधिकारी का मानना है कि गर्मी से पहले लहुरियादह गांव में पानी पहुंचाया जा सके। इसके लिए वह लगातार प्रयासरत हैं।

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बहरहाल, लहुरियादह गांव के बाशिंदों को जिलाधिकारी दिव्या मित्तल के इस पहल पर न केवल काफी भरोसा है, बल्कि उनसे उम्मीदें भी जगी हैं।

(मिर्जापुर के चंद्रगढ़ से संतोष देव गिरि की रिपोर्ट।)

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