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औंधे मुंह गिर गया था एनडीए सरकार का बनाया हुआ नागरिकता संबंधी पायलट प्रोजेक्ट

नई दिल्ली। वाजपेयी सरकार द्वारा 2003 में एक बहुउद्देशीय राष्ट्रीय पहचान पत्र (एमएनआईसी) बनाने का फैसला किया गया था। और इसके लिए उसने एक पायलट प्रोजेक्ट की शुरुआत की थी। हालांकि इस प्रोजेक्ट को 2009 में बंद कर दिया गया। क्योंकि इसमें तय इलाके की आबादी के आधे हिस्से को ही नागरिकता के काबिल पाया गया। बाकी को इसलिए नहीं दिया जा सकता था क्योंकि उनके पास कोई कागजात ही नहीं थे। लिहाजा इस पूरे प्रोजेक्ट को बंद करना पड़ा। और आखिर में यह निष्कर्ष निकला कि नागरिकता को तय कर पाना बेहद जटिल है। और इसमें ढेर सारे मसले सामने आते हैं जिनको हल कर पाना बहुत ही मुश्किल है। इसके नाकाम होने की जो प्रमुख वजह बतायी गयी वह थी लोगों के पास जरूरी दस्तावेजों का न होना।

12 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में रहने वाली 30.95 लाख की आबादी में इसका प्रयोग किया गया। नवंबर 2003 में इस पर मुहर लगी और बाद में 2006 में इसे गृहमंत्रालय द्वारा जमीनी स्तर पर लागू किया गया। आधिकारिक तौर पर पायलट प्रोजेक्ट 31 मार्च 2008 को पूरा हुआ। इस प्रोजेक्ट के तहत तकरीबन 12 लाख एमएनआईसी कार्ड जारी किए गए। जिसे मई 2007 से आखिरी तौर पर बंद किए जाने वाली तिथि 31 मार्च 2009 के बीच जारी किया गया था।

इस पूरे पायलट प्रोेजेक्ट पर निगरानी रखने वाले सचिवों की टीम के एक सदस्य से इंडियन एक्सप्रेस ने बात की। उसका कहना था कि नागरिकता एक बेहद जटिल मुद्दा है। कमेटी ने यह पाया कि पायलट प्रोजेक्ट के दौरान दस्तावेजों का अभाव सबसे बड़े मसले के तौर पर सामने आया। जिसके जरिये किसी की नागरिकता को निर्धारित किया जाना था। गांवों में यह सबसे बड़ी समस्या के तौर पर सामने आया। खास कर खेतों में काम करने वाले मजदूरों के पास इस तरह के कोई दस्तावेज नहीं थे जिसकी मदद से उनकी नागरिकता को तय किया जा सके। और उनमें भी शादीशुदा महिलाएं इसका सबसे ज्यादा शिकार रहीं। बहुत जगहों पर तो इस तरह की समस्या सामने आयी कि जब टीम के लोग घरों पर पहुंचे तो ज्यादातर लोग अपने घरों से नदारद मिले।

इस प्रोजेक्ट के लिए कुल 44.36 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे। लेकिन पूरे प्रोजेक्ट को बगैर किसी सार्वजनिक सूचना के बंद कर दिया गया। इसके साथ ही इसका कोई डेटा भी सुरक्षित नहीं रखा गया। सूत्रों के मुताबिक पायलट प्रोेजेक्ट की सफलता का दर 45 फीसदी से भी कम था।

प्रोजेक्ट से जुड़े एक शख्स ने बताया कि इस पूरे प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी उपलब्धि यह सीख है कि नागरिकता को सुनिश्चित कर पाना बेहद जटिल है। यूपीए सरकार ने भी इस बात को आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया जब 2011 में संसद में तब के गृहराज्य मंत्री गुरुदास कामत ने बताया कि पायलट प्रोजेक्ट का अनुभव यह बताता है कि नागरिकता निश्चित करने की प्रक्रिया बेहद कठिन है। साथ ही समय खर्च करने वाली है। और प्रकृति में बेहद जटिल है। दस्तावेज का आधार बहुत कमजोर है। खासकर ग्रामीण इलाकों में।

उसके बाद 2014 में एनडीए सरकार ने इसको एक दूसरे तरीके से आगे बढ़ाया। जब उसने संसद को बताया कि उसने भारतीय नागरिकों का एक रजिस्टर बनाने का फैसला लिया है। जिसकी जांच एनपीआर (नेशनल पापुलेशन रजिस्टर) के जरिये होगी। और उसके बाद भारत के सभी नागरिकों को राष्ट्रीय पहचान पत्र जारी किया जाएगा। इस सिलसिले में एक बार फिर 2003 के अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के उसी कानून का हवाला दिया गया। बताया गया कि एनआरसी की सारी चीजें 2003 में बने इस कानून के प्रावधानों के तहत ही आगे बढ़ायी जाएंगी।

हालांकि पिछले सोमवार को इसने संसद को बताया कि राष्ट्रीय स्तर पर एनआरसी तैयार करने का कोई फैसला नहीं लिया गया है।

एमएनआईसी प्रोजेक्ट में काम करने वाले एक पूर्व नौकरशाह ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि ‘असम समझौते के तहत सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चलने वाली एनआरसी के चलते हमने असम में होने वाली अफरातफरी को देखी है।असम में कोर्ट द्वारा दिए गए नागरिकता निर्धारण के नियमों से एमएनआईसी पायलट प्रोजेक्ट के नियम बिल्कुल अलग थे। वे असम के नियमों से भी ज्यादा उदार थे। बावजूद इसके नतीजे उतने उत्साहवर्द्धक नहीं रहे।’

बताया जाता है कि एमएनआईसी पायलट प्रोजेक्ट के नतीजों के चलते ही यूपीए सरकार ने इसे प्राथमिकता की श्रेणी में नहीं रखा।देश के सभी नागरिकों का एनपीआर तैयार करने का फैसला 2010 में लिया गया। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर किसी भी तरह का एनआरसी नहीं संचालित किया गया। असम और मेघालय को छोड़कर एनपीआर से जुड़े डाटा को 2015 में अपडेट किया गया। इस तरह से देश के 119 करोड़ लोगों का डाटा बेस सरकार के पास सुरक्षित है। जिसे कुछ और सूचनाओं के साथ इस साल फिर अपडेट किया जाएगा।

2003 के इस एक्ट में नागरिकता तय करने के लिए गाइड लाइन सुझायी गयी है। और इसी का पायलट प्रोजेक्ट में परीक्षण किया जाना था। पायलट प्रोजेक्ट में 24 जिले शामिल थे। जिसमें आंध्र का मेढक, असम का करीमगंज, उत्तर-पश्चिम दिल्ली, उत्तरी गोवा, गुजरात में कच्छ, जम्मू-कश्मीर में कठुआ, पुंदुचेरी में कराईकल, राजस्थान में जैसलमेर, त्रिपुरा में पश्चिमी त्रिपुरा, यूपी में महाराजगंज, उत्तराखंड में पिथौरागढ़, तमिलनाडु में रामचंद्र पुरम, पश्चिमी बंगाल में मुर्शिदाबाद जिले आते हैं। इसमें बहुत सारे सीमा पर स्थित जिलों को इसलिए चुना गया जिससे प्रोजेक्ट की प्रामाणिकता स्थापित हो सके। 

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This post was last modified on February 9, 2020 4:58 pm

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