पूर्वोत्तर के तीन राज्यों का सियासी मंज़र, नतीजों से मिलेगी सियासी मिज़ाज की झलक

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पांच जनवरी को बीजेपी नेता अमित शाह त्रिपुरा में थे और उनके सामने थी एक विशाल जनसभा। इस जनसभा में उन्हें अचानक कुछ याद आया। जनसभा के सामने उंगली घुमाते हुए उन्होंने कहा कि राहुल जी कान खोलकर सुन लीजिए अयोध्या में अगले साल जनवरी की पहली तारीख़ को भव्य राम मंदिर का उद्घाटन किया जायेगा। दरअसल यह त्रिपुरा के साथ-साथ पूरे देश के वोटर के लिए भी यह एक बड़ा ऐलान था।

अमित शाह ने उस जनसभा में कांग्रेस पर हमला करते हुए आगे कहा था कि वह यहां एक बात बताने आये हैं और बात यह है कि 2019 में जब वह बीजेपी के अध्यक्ष थे, उस समय राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष थे। उस समय राहुल गांधी मंदिर को लेकर रोज़ सवाल किया करते थे। वह कहा करते थे कि मंदिर वहीं बनायेंगे, पर तारीख़ नहीं बतायेंगे।

अमित शाह ने कहा कि राहुल गांधी आज कान खोल कर सुन लें कि 1 जनवरी 2024 को अयोध्या में गगनचुंबी राम मंदिर बनकर तैयार मिलेगा। राहुल गांधी का ज़िक़्र करते हुए अमित शाह का यह ऐलान इस बात की अलामत देता है कि राहुल और उनकी भारत जोड़ो यात्रा की कीतनी अहमियत है।

उत्तर-पूर्वी राज्य त्रिपुरा से अमित शाह का यह ऐलान इस बात का भी संकेत है कि पूर्वोत्तर राज्य के चुनाव बीजेपी के लिए कितना मायने रखते हैं। जहां उत्तर भारत में अपनी जड़ जमा चुकी बीजेपी का अगला लक्ष्य देश के उत्तरपूर्वी राज्य हैं, वहीं कांग्रेस मुक्त भारत के अभियान में जुटे बीजेपी की तात्कालिक बड़ी चुनौती कांग्रेस है और देश के स्तर पर उनके सामने चुनावी चुनौती यात्रा के बाद के राहुल गांधी हैं। 

पूर्वोत्तर के तीन राज्यों-त्रिपुरा, मेघालय और नागालैंड के विधानसभा चुनाव इसी महीने होने हैं। हालांकि, 60-60 विधानसभा सीटों वाले इन राज्यों के चुनाव राष्ट्रीय स्तर की सियासत पर चाहे जिस हद तक का असर रखते हों, लेकिन इन चुनाव परिणामों की अहमियत को ख़ारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि इन चुनावों को भारत जोड़ो यात्रा के बाद राहुल गांधी की बढ़े हुए क़द और अडानी प्रकरण के बाद प्रधानमंत्री की साख और लोकप्रियता के आइने में देखा जायेगा।

प्रधानमंत्री को चेहरा बनाकर हिमाचल में चुनाव लड़ चुकी बीजेपी वहां सत्ता से बेदखल हो चुकी है, मगर वहीं गुजरात में ऐतिहासिक जीत भी दर्ज करा चुकी है। ऐसे में इन तीनों राज्यों के परिणाम का अपना एक अलग ही महत्व है। इसी पृष्ठभूमि में राजनीतिक पार्टियां मतदाताओं को समझाने-बुझाने और रिझाने में जुट गयी हैं और ज़ाहिर है कि चौबीसों घंटे और सालभर चुनावी मोड में रहने वाली बीजेपी इन राज्यों में भी अपनी हलचल की दस्तक हर जगह देती हुई दिख रही है। हाल ही में बीजेपी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की आयोजित बैठक में पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने यह ऐलान किया था कि बीजेपी को इस साल होने वाले सभी राज्यों के विधानसभा चुनाव जीतने हैं।

जिन तीन पूर्वोत्तर राज्यों में चुनाव होने हैं, उनमें मेघालय तथा नगालैंड में बीजेपी अपने सहयोगी दलों के साथ सत्ता में है और इन दोनों ही राज्यों में वह जूनियर पार्टनर है। मेघालय में बीजेपी की सहयोगी नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार है। नागालैंड में बीजेपी और एनडीपीपी की सरकार है। हालांकि, कुछ समय बाद ही एनपीएफ़ के ज़्यादातर विधायकों ने एनडीपीपी का दामन थाम लिया था और पिछले विधानसभा चुनावों में 27 सीट जीने वाली एनपीएफ़ के पास महज़ चार विधायक रह गये थे, उन्होंने भी बाद में सरकार का समर्थन कर दिया था। यानी कि 60 सदस्यों वाली नागालैंड विधानसभा में सबके सब विधायक सत्ता के साथ ही हो गये थे।

नगालैंड में उसे पहले के बनिस्पत बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद इसलिए होगी, क्योंकि पिछली बार बीजेपी ने यहां दस से ज़्यादा सीटें जीती थीं, वहीं मेघालय में उसे दो सीटों से ही संतोष करना पड़ा था। इस बार के चुनाव में भी नगालैंड की सत्तारूढ़ पार्टियां इकट्ठे ही चुनाव लड़ने जा रही हैं, लेकिन मेघालय की सत्तारूढ़ पार्टियों की चुनावी रणनीति अलग-अलग चुनाव लड़ने की है। चुनाव नतीजों से पहले यह क़यास लगा पाना मुश्किल है कि ये दोनों अलग-अलग रणनीतियां उन्हें किस हद तक लाभ पहुंचा पायेंगी।

बीजेपी के सामने जीपी नड्डा की उस घोषणा को धरातल पर उतारने की चुनौती है कि उसे इस साल होने वाले सभी चुनाव जीतने हैं। इसमें कोई शक नहीं कि चुनाव को लेकर बीजेपी की दिखती तत्परता और आख़िरी पल तक की उसकी जद्दोहद दूसरी पार्टियों के लिए एक सबक़ है। लेकिन, अबतक तो ऐसा ही लग रहा है कि बाक़ी पार्टियां इस सबक़ से सीख नहीं ले पा रही हैं।

बीजेपी जिस तरह बूथ स्तर तक की तैयारियां करती रही है, उसके परिणाम की एक ज़ोरदार झलक त्रिपुरा में हुए पिछले विधानसभा चुनाव के नतीजे में दिखी थी। त्रिपुरा में बीजेपी को अप्रत्याशित और ऐतिहासिक जीत मिली थी। त्रिपुरा में पूर्ण बहुमत वाली विधानसभा में पहले बीजेपी की उपस्थिति शून्य थी। बीजेपी की पिछली जीत इस मायने में भी महत्वपूर्ण थी कि लगातार 25 सालों तक यहां भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की सरकार थी और 1998 से 2018, यानी 20 सालों के लगातार चार कार्यकाल तक सत्ता में रहे मानिक सरकार को शिकस्त देकर बीजेपी ने अपने दम पर बहुमत का आंकड़ा छूते हुए 35 सीटों पर अपनी जीत दर्ज की थी।

फ़रवरी 2023 में होने जा रहे त्रिपुरा विधानसभा चुनावों में बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी सत्ता को बरक़रार रखने की होगी। हालांकि, ऊपर से आसान दिखती सत्तारूढ़ पार्टी के लिए यह चुनौती मुश्किल भरी इसलिए दिखती है, क्योंकि माकपा और कांग्रेस ने हाथ मिला लिये हैं। त्रिपुरा में इस बार मतदाताओं के बीच सत्ता विरोधी भावना भी देखी जा रही है, जिससे पार पाने के लिए बीजेपी ने नेतृत्व परिवर्तन का प्रचलित रास्ता अपनाया है।

मई, 2022 में मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देब से इस्तीफ़ा ले लिया गया था और कुछ ही घंटों के भीतर पार्टी की राज्य विधायक दल ने माणिक साहा को अपना नया नेता चुन लिया था। बीजेपी चुनाव से ठीक पहले किसी नये चेहरे को सामने लाने की यह तरक़ीब पहले भी अपनाती रही है और इससे उसे कामयाबियां भी मिलती रही हैं।

लेकिन, इस बार चुनावी मैदान में पार्टियों की बिछी बिसात दर्शाती है कि बीजेपी की राह आसान नहीं है। चुनावी मैदान में टिपरा मोथा का दाखिल होना बेजीपी की चुनावी राह की एक बहुत बड़ी बाधा बन गया है। आदिवासी इलाक़ों में टिपरा मोथा की अच्छी-ख़ासी लोकप्रियता है। टिपरा मोथा ऐलान कर चुकी है कि वह अकेले चुनावी मैदान में उतरेगी और 60 में से 45 सीटों पर चुनाव लड़ेगी।

29 जनवरी को टिपरा मोथा के प्रमुख प्रद्योत किशोर माणिक्य देबबर्मा के ट्वीट से सूबे की सियासत गर्म हो गयी है। प्रद्योत ने अपने उस ट्वीट में सत्ताधारी बीजेपी पर हमला बोला था। उल्लेखनीय है कि जिन आदिवासियों के बीच टिपरा मोथा लोकप्रिय है, त्रिपुरा विधानसभा में उनके लिए 20 सीटें आरक्षित हैं।

त्रिपुरा के चुनावी मैदान में इस बार तृणमूल कांग्रेस भी पूरे जोर-शोर से चुनाव मैदान में है, इसलिए देखना है कि मुख्य मुकाबला किसके बीच होता है? त्रिपुरा विधानसभा के लिए चुनाव 16 फरवरी को वोट डाले जाएंगे और 2 मार्च को मतगणना होगी।

ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को जिन चार राज्यों में एक मान्यताप्राप्त राज्यस्तरीय पार्टी होने का दर्जा हासिल है, उनमें पश्चिम बंगाल, मणिपुर, अरुणाचल के साथ-साथ त्रिपुरा भी है। हालांकि पूर्वोत्तर के उपरोक्त तीन राज्यों में एक राज्यस्तरीय पार्टी का दर्जा हासिल होने के बावजूद इस क्षेत्र में तृणमूल कांग्रेस का प्रदर्शन अबतक कुछ ख़ास नहीं रहा है। त्रिपुरा और मेघालय में हुए 2018 के चुनावों में टीएमसी को महज़ क्रमश: 0.3% और 0.4% वोट मिले थे।

तृणमूल कांग्रेस की सियासी मजबूरी है कि वह त्रिपुरा में अपने प्रतिद्वंद्वी सीपीएम के साथ नज़र नहीं आना चाहती है, क्योंकि सीपीएम के नेतृत्व वाला वाम मोर्चा पश्चिम बंगाल में तृणमूल का प्रतिद्वंद्वी है। तृणमूल को इस बात को लेकर आशंका रही है कि अगर वह त्रिपुरा में वाम मोर्चे के साथ हाथ मिलाती है, तो पश्चिम बंगाल में इसका उल्टा असर पड़ सकता है। यही वजह है कि पिछले पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में साथ रहे लेफ़्ट और कांग्रेस त्रिपुरा में साथ आ गये हैं। यहां सीपीएम और कांग्रेस ने चुनावी गठबंधन कर लिया है।

तृणमूल कांग्रेस का दावा है कि वह त्रिपुरा में बीजेपी को हरा पाने की हालत में है, लिहाज़ा उसे किसी पार्टी के साथ हाथ मिलाने की ज़रूरत नहीं है। हालांकि, राज्य में टीएमसी का पिछला रिकार्ड इस बात की ताईद नहीं करता। त्रिपुरा में पहली बार वह 2003 के चुनावों में शिरकत की थी। 18 सीटों पर चुनाव लड़ी थी और उसे महज़ 0.43 % वोट हासिल हुए थे।

तृणमूल कांग्रेस ने साल 2008 में 22 निर्वाचन क्षेत्रों में अपने प्रत्याशी उतारे थे और इस बार भी महज़ 0.92 % मत हासिल हुआ था। 2013 के चुनाव मैदान से टीएमसी बाहर रही, लेकिन 2018 में फिर चुनावी मैदान में उतरी, और अपने 24 उम्मीदवारों को चुनाव लड़ाया। मगर इस बार उसे पहले के मुक़ाबले कम यानी 0.3 % मत ही मिले। मेघालय में भी तृणमूल कांग्रेस की स्थिति त्रिपुरा से अलग नहीं है, क्योंकि 2018 के चुनाव में उसे सिर्फ़ 0.4 % वोट हासिल हुए थे।

हालांकि त्रिपुरा में बंगालियों की आबादी और बीजेपी का पिछला प्रदर्शन टीएमसी को एक नयी उम्मीद थमाती है। इस राज्य में कुल आबादी (36.74 लाख) की दो-तिहाई (24.14 लाख) आबादी बांग्ला भाषियों की है। वहीं बीजेपी को जहां 2013 में बिना एक सीट जीते महज़ 1.54 % वोट मिले थे। लेकिन, पांच साल बाद ही 2018 में उसे 43.59% वोट हासिल हुए और 36 सीटों पर जीत दर्ज करते हुए बीजेपी ने त्रिपुरा में पूर्ण बहुमत की सरकार का गठन कर लिया था।

हालांकि, प्रेक्षक ऐसा मानते हैं कि तृणमूल कांग्रेस को उसी हिस्से के वोट मिलेंगे,जो कि सीपीएम-कांग्रेस के वोट हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि इसका सीधा लाभ भाजपा को मिल सकता है।

टीएमसी ने मेघालय की तमाम सीटों पर भी चुनाव लड़ने की घोषणा की है। यहां पार्टी की कमान पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री मुकुल संगमा के हाथों में है। मुख्यमंत्री कोनरेड संगमा ने सहयोगी पार्टी भाजपा के साथ चुनाव नहीं लड़ने का ऐलान कर दिया है और एनपीपी और भाजपा दोनों सभी सीटों पर अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं। कांग्रेस भी सभी सीटों पर चुनावी मैदान में है। ऐसे में माना जा रहा है कि इन चार पार्टियों के बीच होने वाले मुक़ाबले में बीजेपी फ़ायदे में रह सकती है।

संक्षेप में कहा जाए, तो 60-60 विधानसभा सीटों वाले उपरोक्त तीनों पूर्वोत्तर राज्यों में अच्छी ख़ासी सीटें अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं। इन आरक्षित सीटों की संख्या नागालैंड में 59, मेघालय में 55 और त्रिपुरा में 20 हैं। इन तीनों राज्यों में बीजेपी सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा है। बीजेपी का मातृ संगठन सालों से अनुसूचित जनजातियों के बीच काम करता रहा है। इससे यहां बीजेपी की पहचान ज़रूर बनी है। लेकिन, यहां की राजनीति में पकड़ स्थानीय पार्टी की रही है।

दूसरी तरफ़ इन पूर्वोत्तर राज्यों की अर्थव्यवस्था सामान्यतया केंद्र सरकार के रहम-ओ-करम पर निर्भर रही है, लिहाज़ा इस बात की संभावना ज़्यादा है कि क्षेत्रीय पार्टियां अच्छी ख़ासी सीट हासिल करने के बावजूद या तो बीजेपी के साथ हो लें या इनके विधायक टूटकर बीजेपी में शामिल हो जायें या बीजेपी अपने पुराने खेल को दोहराते हुए विधायकों के अच्छी ख़ासी संख्या को हड़प ले।

आख़िरकार यह चुनाव जहां राहुल गांधी के उस भारत जोड़ो यात्रा की भी सियासी कसौटी बनेंगे, जिससे गुज़रते हुए राहुल की इमेज को मज़बूती मिलने की बात की जा रही है, वहीं अडानी प्रकरण के बाद प्रधानमंत्री की इमेज को किस हद तक चोट आई है, इसका इम्तिहान भी इस चुनाव के परिणाम के रूप में आंका जाएगा। माना जा रहा है कि बदले हुए सियासी हालात में इन चुनावों के नतीजे 2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों की झलक को भी भांपने की एक अदद कसौटी बनेंगे।

(उपेंद्र चौधरी वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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