Tuesday, March 5, 2024

जन विश्वास विधेयक-2023 संसद में पासः नरेंद्र मोदी सरकार की भ्रष्टाचार को संस्थागत स्वीकृति 

पिछले साल, 2022 में मोदी सरकार जन विश्वास बिल लेकर आई थी। तब इसे संयुक्त संसदीय समिति के पास भेज दिया गया था। यह बिल कई सारे मंत्रालयों को अपने घेरे में ले रहा था और अंततः कानून में बदलाव में की मांग कर रहा था जिससे कि कथित छोटे-मोटे आपराधिक मामलों में सजा के प्रावधानों को कम कर दिया जाये और व्यवसाय, व्यापार, पेटेंट माल और नाम की चोरी, प्रशासनिक गड़बड़ी कर कमाई करने वाले अधिकारियों आदि पर जो कानूनी शिकंजा है, उसकी गिरफ्त कम कर दी जाये। इस मसले पर सरकार ने यह भी कहा था कि इससे कोर्ट पर दबाव भी कम हो जायेगा।

संसदीय समिति ने इस बिल पर काम किया और कुल 19 मंत्रालयों से जुड़े 42 अधिनियमों के 183 प्रावधानों में संशोधन का प्रस्ताव दिया था। इसे इस मानसून सत्र में लाया गया और लोक सभा में पास कर दिया गया। इस बिल को प्रस्तावित करते हुए कहा गया कि जेल की सजा को कम तो किया गया है लेकिन जुर्माने की राशि को बढ़ा दिया गया है। प्रेस ब्यूरो ऑफ इंडिया, 27 जुलाई, 2023 की विज्ञप्ति के अनुसारः कुछ प्रावधान में जुर्माना और कारावास हट जायेगा, कुछ में कारावास की जगह जुर्माना रह जायेगा और इसे बढ़ा दिया जाएगा, कुछ में दोनों को हटाकर कुछ अन्य दंड में बदल दिया जाएगा और अपराध के मद्देनजर कुछ और प्रावधान भी जोड़े जा सकेंगे। जो जुर्माना लगाया जाएगा उसे भी व्यवहारिक रूप में बदला जाएगा और इसके लिए अधिकारी नियुक्त किये जाएंगे। इसके लिए नये संस्थानों को गठन किया जाएगा। इस बिल के तहत अपराध की प्रकृति के आधार पर दंड और जुर्माना तय होगा।

पीआईबी अपने जारी वक्तव्य में बताता हैः तकनीकी/ प्रक्रियात्मक गलती और गौण दोषों के लिए निर्धारित आपराधिक परिणाम, न्याय वितरण प्रणाली को अवरूद्ध करते हैं और गंभीर अपराधों पर निर्णय को ठंडे बस्ते में डाल देते हैं। विधेयक में प्रस्तावित कुछ संशोधन जहां भी लागू और व्यवहार्य हो, उपयुक्त प्रशासनिक न्यायनिर्णयन प्रणाली प्रस्तुत करने के लिए है। इसमें न्याय प्रणाली पर भारी दबाव को कम करने, लंबित मामलों को कम करने और अधिक कुशल और प्रभावी न्याय वितरण में मदद मिलेगी। इससे नागरिकों और कुछ श्रेणियों के सरकारी कर्मचारियों को प्रभावित करने वाले प्रावधानों को अपराधमुक्त करने से उन्हें मामूली उल्लघंनों के लिए कारावास से डरे बिना जीवन जीने में मदद मिलेगी।

इस कानून का अधिनियमन कानूनों को तर्क संगत बनाने, बाधाओं को दूर करने और व्यवसायों के विकास को बढ़ावा देने की यात्रा में एक मील का पत्थर साबित होगा। यह कानून विभिन्न कानूनों में भविष्य के संशोधनों के लिए एक मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में काम करेगा। एक समान उद्देश्य के साथ विभिन्न कानूनों में समेकित संशोधन से सरकार और व्यवसायों दोनों के लिए समय और लागत की बचत होगी।

उपरोक्त बिल के बारे में कही जा रही बातों को सरल करने से जो बात समझ में आती है कि जिन अपराधों के बारे में बात किया जा रहा है उनके निर्णय के लिए नये तरह के प्राधिकरण बनेंगे, यहां नागरिक की बजाय व्यवसायी और कर्मचारियों के बारे में बात हो रही है, जाहिरातौर पर वे भी नागरिक है तो इसे नागरिक की आम श्रेणी में डाल दिया गया है; चल रही कानूनी और उससे जुड़े प्राधिकरणों में संशोधन कर उनके अधिकार कम या खत्म किये जाएंगे और जिन संदर्भों में ये बिल लाया गया है उन संदर्भों को खुलकर काम करने की छूट मिलेगी और सरकार की कड़ी निगरानी को खत्म करने की ओर ले जाया जाएगा।

ये संदर्भ यानी मंत्रालय और विभाग कौन-कौन से हैं! पीआईबी ने इसमें कुल 42 मंत्रालय और विभागों का हवाला दिया है। इसमें रेलवे, राजस्व, पेटेंट, ट्रेड, उद्योग, माल, काॅपीराइट, उद्योग और आंतरिक व्यापार, जल परिवहन और पत्तन, केबल नेटवर्क, मेट्रो, आवास और शहरी कार्य, फार्मेसी, खाद्यसुरक्षा और उसका मानक और सार्वजनिक वितरण, खाद्यनिगम और भंडारण, भुगतान निष्पादन, कृषि और ग्रामीण विकास बैंक, वित्त सेवाएं, भारतीय वन और पर्यावरण, पर्यावरण और जलवायु, इलेक्ट्राॅनिक्स प्रौद्योगिकी और आधार जैसी सेवाएं, सार्वजनिक ऋण और प्रतिभूमि, स्टैंडर्ड माप और उपभोक्ता, छावनी अधिनियम, मसाला और रबड़, समुद्री उत्पाद और निर्यात विकास आदि, कृषि और उपज का व्यापार आदि।

ये सारे मंत्रालय और उसके विभाग हमारी रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े हुए हैं और इसमें होने वाले अपराध हमारे जीवन को गहरे प्रभावित करते हैं, कई बार वे हमारी जान पर बन जाते हैं। और, ये कई बारे तो व्यक्तिगत हमले की तरह आते हैं लेकिन ज्यादातर मामलों में तो यह सार्वजनिक जीवन को प्रभवित करते हैं। भ्रष्टाचार विरोधी लहर पर आने वाली सरकार आज भी रोज, खासकर प्रधानमंत्री मोदी भ्रष्टाचार पर लंबे-लंबे भाषण देते हैं। भ्रष्टाचार मिटाने के नाम पर इन्फोर्समेंट डिपार्टमेंट पूरी ताकत से विपक्ष पर हमला कर रही है और यहां तक कि सरकारों को गिरा देने में एक माध्यम बनती हुई दिख रही है। लेकिन, यहां तो भ्रष्टाचार को एक पूरी व्यवस्था में बदल देने वाला प्रावधान बन रहा है। यह भ्रष्टाचारियों को खत्म करने के बजाय उसे व्यवसाय करने, प्रशासनिक लूट करने और पेटेंट की चोरी कर बाजार बनाने की छूट दी जा रही है। इसके लिए प्रावधान बनाया जा रहा है। यह दरअसल पर्यावरण, कृषि, मीडिया, उद्योग और व्यापार, प्रकाशन और अन्य परिक्षेत्र को कथित नियंत्रणकारी 42 कानूनों में वर्णित 180 तरह के अपराधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने वाला कदम है और कथित उद्यम और व्यापार के परिस्थितिकी तंत्र को बनाने की ओर ले जाना है।

इस बिल में सबसे खतरनाक मसला ‘दवा और सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम, 1940’ में प्रस्तावित संशोधन है। इसमें दवा का प्रयोग जीवन से जुड़ा हुआ है। कोई आदमी बीमार होने के बाद दवा खरीदने जाता है और यह दवा मानक का पालन नहीं करती है तब यह दवा उस इंसान के लिए घातक हो जाएगी। भारत की एक कंपनी ने जाम्बिया में कफ सीरप दवा की आपूर्ति की थी जिससे वहां 19 बच्चों की मौत हो गई। इसी तरह श्रीलंका में भारत की एक दवा कंपनी ने आंख की दवा भेज रखी थी। इसके असर से वहां 50 लोगों को आंख की समस्या ठीक होने की बजाय बढ़ गई। दवा एक गंभीर मसला है और इसका प्रयोग लोग बीमारी से ठीक होने के लिए करते हैं।

दवाओं का निर्माण एक बेहतर शोध और लंबे प्रयोगों के बाद ही बाजार में लाया जाता है। इसमें शामिल रसायनिक तत्व का शरीर में उचित मात्रा में घुलनशील होना जरूरी होता है। ऐसा न होने पर यह सबसे पहले आंत, लीवर को प्रभावित करता है। यदि इसमें घुलनशील तत्व शरीर के अनुकूल नहीं है तो किडनी और तंत्रिका तंत्र को सीधे प्रभावित करता है। दोनों ही परिस्थियों में मरीज को मौत की ओर ले जा सकता है। सरकार इन मसलों पर कड़ा रुख लेने की बजाय व्यवसाय बढ़ाने के नाम पर इन्हें ही छूट देने के प्रावधान ला रही है। इसी तरह से पेटेंट से जुड़े कुछ मसले हैं, जिनमें पेटेंट, जिसमें ब्रांड भी शामिल है का झूठा प्रयोग कर माल बेचने वालों की सजा को कम करने का प्रावधान भी पेश किया गया है।

लेकिन, कुछ ऐसे भी प्रावधान लाये गये हैं जिनका व्यवसाय और व्यापार आदि से कोई लेना देना नहीं है। ये एक नागरिक और इंसान की निजता से जुड़ा हुआ मसला है। यदि आप किसी को पत्र लिखते हैं और उसे डाक विभाग का कर्मचारी और अधिकारी उसकी चोरी करता है या उसे खोलकर पढ़ता है, तो यह निजता और उसकी गोपनियता का उल्लंघन है। यह नागरिक कानून की अवज्ञा है। इसे पढ़ने या चोरी करने वाला इस संदर्भ को सार्वजनिक कर सकता है, इससे उस इंसान और इस पत्र की पहुंच वाले इंसान दोनों को ही मानसिक यातना और कई बार दूसरे तरह के खतरों से जूझना पड़ सकता है। इसमें निजता का मसला सिर्फ प्यार का इजहार या टूटन से जुड़े हुए पत्रों का आदान-प्रदान ही नहीं है। बीमा, क्रेटिड कार्ड, बैंकिंग, परिवहन आदि बहुत से कार्य ऐसे हैं जिनमें डाक विभाग और उससे जुड़े अन्य विभाग की भूमिका होती है। यह एक नागरिक की जीवनचर्या से जुड़ी गोपनीयता है जिसका उल्लंघन करने की गंभीर सजा होती थी। अब जो बिल पेश किया है, उसमें इस तरह के अपराध करने वाले लोगों की सजा को कम या खत्म कर देने का प्रावधान पेश किया गया है। 

ऐसा ही एक प्रावधान पर्यावरण से जुड़े प्रावधानों में प्रस्तावित संशोधन है। इन संशोधनों को इसी सत्र में लोकसभा में पास किये गये जैव-विविधता बिल और ‘वन संरक्षण और संवर्धन बिल’ के संदर्भ में रखकर देखने की जरूरत है। इसी से यह साफ होगा कि ये बिल वन, जीव विविधता और जीव संरक्षण को वास्तव में बढ़ावा दे रही है या इसे नष्ट करने वाले अपराधी व्यवसायियों और उद्यमियों को संरक्षण दे रही है। पहली नजर में तो यह न सिर्फ इस क्षेत्र को निजी हाथों में सौंपने की ओर ले जा रही है, साथ ही यह इसकी लूट और बर्बादी की ओर ले जाने वालों को अपराध की श्रेणी से बाहर ले जा रही है। 

यह प्रावधान देश की जनता, उसके संसाधन और कुल उत्पादित माल, वितरण, खेती और जीवन, बाजार और कार्यालयों, जीवन के लगभग सभी रोजमर्रा के क्षेत्रों पर असर डालेगा। देशद्रोह के नाम पर देशद्रोह कानून बनाये रखा गया है, लाॅ कमीशन उसे और भी मजबूत करने का आग्रह पेश करता है और यूएपीए जैसे कानून को और ‘बेहतर’ करने की बात की जाती है जिससे कि यदि किसी नागरिक के ‘मन’ में भी राज्य के प्रति कोई गलत विचार हो, सार्वजनिक जीवन को प्रभावित कर सकने का ‘चिंतन’ हो तो उसे कैद कर लिया जाय और उसे मौत की सजा तक पहुंचा दिया जाये।

इसके लिए लेखन, बोलना और संगठन करना, गीत गाना, कविता करना, साक्षात्कार में कुछ कह जाना आदि तक तक अपराध की श्रेणी में डाल दिया गया है, पढ़ना तक गुनाह बना दिया गया हो, …उस समय में लोगों की जान ले लेने वाले अपराधी व्यवसाईयों को खुली छूट देने वाला जनता के नाम पर ‘जनविश्वास’ जैसा प्रावधान दिखाता है कि सत्ता की पक्षधरता किस ओर है और वर्ग का सही अर्थ क्या है।

(अंजनी कुमार पत्रकार हैं।)

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