Saturday, February 24, 2024

शिंदे सरकार तो बच गई लेकिन संविधान और लोकतंत्र पर लग गया दाग

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को महाराष्ट्र की एकनाथ शिंदे सरकार को राहत देते हुए मामले को बड़ी बेंच को भेज दिया है। फिलहाल, एकनाथ शिंदे सरकार का संकट टल गया है। अदालत ने कहा कि हम उद्धव ठाकरे सरकार को फिर से बहाल करने का आदेश नहीं दे सकते, क्योंकि उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। सर्वोच्च अदालत उद्धव ठाकरे के खिलाफ बगावत करने वाले एकनाथ शिंदे सहित शिवसेना के 16 विधायकों की सदस्यता, गवर्नर और स्पीकर की भूमिका जैसे मामलों की याचिका पर सुनवाई कर रही है।

16 बागी विधायकों में सीएम शिंदे, संजय शिरसाट, भरत गोगावाले, संदीपन भुमरे, तानाजी सावंत, अब्दुल सत्तार, लता सोनवणे, यामिनी जाधव, प्रकाश सुर्वे, अनिल बाबर, बालाजी किन्निकर, महेश शिंदे, चिमनराव पाटिल, रमेश बोर्नारे, संजय रायमुलकर और बालाजी कल्याणकर शामिल हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को राज्यपाल और स्पीकर की भूमिका पर सख्त टिप्पणी करते हुए कई सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने कहा कि डिप्टी स्पीकर को फैसले से रोकना सही नहीं है। हम इससे सहमत नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने कहा कि उद्धव ठाकरे ने फ्लोर टेस्ट का सामना नहीं किया। महाराष्ट्र में हम पुरानी स्थिति को बहाल नहीं कर सकते। विधायकों की अयोग्यता पर हम फैसला नहीं ले सकते। इस पर फैसला महाराष्ट्र विधानसभा के स्पीकर लें।

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को बड़ी राहत देते हुए कहा “यथास्थिति को बहाल नहीं किया जा सकता है क्योंकि ठाकरे ने फ्लोर टेस्ट का सामना नहीं किया और अपना इस्तीफा दे दिया। इसलिए सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी के समर्थन से शिंदे को शपथ दिलाना राज्यपाल के लिए न्यायोचित था।”

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि वह उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली एमवीए सरकार की बहाली का आदेश नहीं दे सकता क्योंकि तत्कालीन मुख्यमंत्री ने फ्लोर टेस्ट का सामना किए बिना इस्तीफा दे दिया था।

हालांकि, शीर्ष अदालत ने कहा कि फ्लोर टेस्ट के लिए राज्यपाल का फैसला गलत था और एकनाथ शिंदे समूह का व्हिप नियुक्त करने में स्पीकर भी गलत थे। शीर्ष अदालत ने विधायकों की अयोग्यता पर स्पीकर की शक्ति पर 2016 के नबाम रेबिया के फैसले को एक बड़ी बेंच को भेज दिया।

महाराष्ट्र विधानसभा के डिप्टी स्पीकर नरहरि ज़िरवाला कथित तौर पर गुरुवार सुबह (11 मई) को पांच-न्यायाधीशों की एससी संविधान पीठ के फैसले से पहले पहुंच से बाहर थे।

जून 2022 में मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के विद्रोह के बाद महाराष्ट्र के राजनीतिक संकट के कारण उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली महाविकास अघाड़ी सरकार गिर गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले को बड़ी बेंच में भेजा जाएगा। सीजेआई ने कहा, अरुणाचल के नबाम रेबिया मामले को उठाए सवाल को बड़ी बेंच में भेजना चाहिए, क्योंकि उसमें और स्पष्टता की आवश्यकता है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उद्धव ठाकरे को विधायकों ने अपना नेता माना था। ऐसे में स्पीकर को स्वतंत्र जांच करने के बाद फैसला लेना चाहिए था।

बुधवार को जब पत्रकारों ने शिंदे के डिप्टी देवेंद्र फडणवीस से पूछा कि क्या उनके खेमे के 16 विधायकों की अयोग्यता के संबंध में प्रतिकूल फैसले की स्थिति में मुख्यमंत्री अपने पद से हट जाएंगे, तो भारतीय जनता पार्टी के नेता ने कहा कि इस चर्चा का कोई मतलब नहीं है।

फडणवीस ने पूछा “मुझे इस शब्द का प्रयोग करने के लिए खेद है लेकिन यह बेवकूफी की कल्पना है। मैं आपको बता रहा हूं कि एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री बने रहेंगे और हम अगला चुनाव उन्हीं के नेतृत्व में लड़ेंगे। शिंदे क्यों सौंपेंगे इस्तीफा? किसी तरह के कयास लगाने की जरूरत नहीं है। उन्होंने क्या गलती की थीं ?”

इस बीच, महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर गुरुवार तड़के ब्रिटेन के लिए रवाना हो गए। मीडिया से बात करते हुए उन्होंने भरोसा जताया कि न्यायपालिका विधायिका के अधिकारों का हनन नहीं करेगी।

नार्वेकर का यह बयान तब आया जब डिप्टी स्पीकर नरहरि जिरवाला ने दावा किया कि चूंकि वह 2022 के महाराष्ट्र राजनीतिक संकट के दौरान सत्ता में थे, इसलिए वह इस मामले पर फैसला करेंगे। “मेरी यूके यात्रा पहले से तय थी। विदेश से लौटने के बाद उचित कार्रवाई करेंगे।

2022 महाराष्ट्र राजनीतिक संकट क्या है?

महाराष्ट्र विधानसभा के डिप्टी स्पीकर नरहरि जिरवाल ने पिछले साल शिवसेना के उन 16 विधायकों को नोटिस भेजा था जो सूरत गए थे और बाद में एकनाथ शिंदे के साथ गुवाहाटी पहुंच गए थे। मामला तब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा क्योंकि शिंदे के नेतृत्व वाले गुट ने बातचीत की मेज पर आने से इनकार कर दिया। शिंदे और उद्धव ठाकरे खेमे के वकीलों ने 16 विधायकों की अयोग्यता को लेकर शीर्ष अदालत में दलील दी।

उद्धव ठाकरे समूह ने तख्तापलट के लिए एकनाथ शिंदे और भाजपा को दोषी ठहराया और उन्हें नए सिरे से चुनाव का सामना करने की चुनौती दी। दूसरी ओर, शिंदे समूह ने इस दावे को खारिज कर दिया। शिंदे समूह के वकीलों ने दावा किया कि उन्होंने कुछ भी “पार्टी विरोधी” कृत्य नहीं किया है, लेकिन वे “असली शिवसेना” हैं। और इस तरह शिवसेना के चुनाव चिह्न और बाल ठाकरे की विरासत की लड़ाई लड़ रहे हैं।

चुनाव आयोग ने अक्टूबर, 2022 में शिवसेना के धनुष और बाण के चिन्ह को फ्रीज कर दिया। एक महीने बाद हुए अंधेरी (पूर्व) विधानसभा उपचुनाव के लिए, उद्धव ठाकरे के गुट को मशाल (मशाल) और गुट का नाम दिया गया- शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे)। और एकनाथ शिंदे खेमे का नाम- बालासाहेबंची शिवसेना और दो तलवार और ढाल का चुनाव चिन्ह मिला।

(जनचौक की रिपोर्ट।)

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