शहादत दिवस पर विशेष: बस्तर की जनता के प्यारे राजा थे प्रवीर चंद्र भंजदेव

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(सोनिया की पुस्तक ‘आदिवासी विद्रोह (ओडिशा, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र)’ का पहला संस्करण अगस्त 2022 में नोशन प्रेस से प्रकाशित हुआ है। हिंदी में उक्त राज्यों आदिवासी विद्रोह पर बहुत कम सामग्री देखने को मिलती है। हालांकि पुस्तक प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयार की गयी है लेकिन लेखन शैली बहुत शानदार है। पुस्तक में आदिवासी विद्रोह की बात करते हुए उनके आर्थिक, राजनीतिक जीवन और विद्रोह में अपनाए गये तरीकों पर काफी विस्तर से लिखा है। उक्त पुस्तक को हम श्रृंखला के रूप में जारी रखेंगे। पेश है पुस्तक अंश🙂

सन 1921 में बस्तर के राजा रुद्र प्रताप की मृत्यु हो गई। इसके मरने के बाद जनता, माझी, परगना मुखियाओं ने विचार कर उसकी बेटी प्रफुल्ल कुमारी को रानी स्वीकार कर लिया। जब रानी की उम्र 17 साल हो गयी तो उसकी शादी के लिए अंग्रेजों ने मयूरभंज के राजकुमार से बात की। लेकिन राजकुमार की चाची इस रिश्ते से सहमत नहीं थी, लेकिन अंग्रेजों ने उसकी बात नहीं मानी। 1927 में प्रफुल्ल कुमारी की शादी हो गयी। प्रवीर चंद्र भंजदेव का जन्म प्रफुल्ल कुमारी की कोख से 25 जून 1929 को शिलांग में हुआ था। शादी के कुछ सालों बाद 26 साल की उम्र में ही 1936 में प्रफुल्ल कुमारी की मृत्यु हो गयी। जनता का विश्वास था कि अंग्रेजों द्वारा जान-बूझकर उसको मारा। जनता ने अपने माझियों पर दबाव डाला कि वह लंदन से राजा के बेटे प्रवीर चंद्र को बस्तर लाकर राजा बनाएं।

जब प्रवीर चंद्र को राजा बनाया गया तो उस समय उसकी उम्र मात्र सात साल थी। वह कुल मिलाकर चार भाई थे। चारों में से प्रवीर चंद्र दूसरे नंबर पर आता था। प्रवीर चंद्र भंजदेव रायपुर के राजकुमार कॉलेज में पढ़ते थे लेकिन बीमारी के कारण उसे वहां पढ़ाई छोड़कर इन्दौर के डेली कॉलेज से पूरी करनी पड़ी। वह गणित विषय में कमजोर होते थे लेकिन बाकी विषय में वह ठीक थे। इसके बाद देहरादून के भारतीय सैनिक स्कूल में भर्ती हुए। वह सैनिक विषय में काफी रुचि लेते थे लेकिन स्कूल कमाण्डर ने उनका रिपोर्ट कार्ड देखकर स्कूल से निकाल दिया। रिपोर्ट कार्ड में लिखा था कि वह शारीरिक रूप से कमजोर हैं, स्वभाव से निराशावादी हैं और पढ़ाई में ध्यान नहीं देते। ब्रिटिश सरकार ने लगातार उनके खिलाफ मानसिक रूप से बीमार होने की झूठी खबरें लगातार फैलाई थी। अंत में उसकी पढ़ाई तक छुड़वा दी और कहा कि वह बालिग हो गये है और राज सम्भालने के लिए पढ़ाई बंद कर सकते हैं।

1921 में रूद्र प्रताप राजा की मौत के बाद ब्रिटिश सरकार बस्तर पर प्रत्यक्ष शासन करने लगी थी। जुलाई 1947 में प्रवीर के हाथ मे बस्तर का राज सौंप दिया गया। यह वह समय है जब अंग्रेज भारत को छोड़ कर जाने की योजना बना रहा थे?

1947 के बाद बस्तर की परिस्थिति

ब्रिटिश के जाने के बाद कोई राजा भारत में मिलने के लिए तैयार नही था। भारत किसी भी कीमत पर देशीय रियासतों को मिलाना चाहता था। केन्द्र सरकार को प्रवीर पर संदेह था क्योंकि हैदराबाद के नवाब से प्रवीर के अच्छे सम्बंध थे प्रवीर ने नवाब को लौह खदान का ठेका भी दिया हुआ था। इसका कांग्रेस विरोध कर रही थी। नवाब भारत में शामिल होने के लिए तैयार नहीं था।

भारत के गृह मन्त्री सरदार पटेल ने प्रवीर को धमकी व चेतावनी दी कि अगर भारत विरोधी नवाब को लौह खदान का ठेका देता है और भारत में शामिल नहीं होता है तो इसका परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहे। इस धमकी के बाद दिसम्बर 1947 में बस्तर राजा ओडिशा व मध्यप्रदेश के राजाओं के साथ भारतीय संघ में शामिल हो गया।

स्वतन्त्र बस्तर व कांकेर रियासत को बस्तर जिला के नाम से मध्यप्रदेश राज्य में मिला दिया गया। अपने राज के जाने के बाद प्रवीर भारत में मिलने के बाद कभी भारत से संतुष्ट नही रहा। भारत सरकार भी उसकी हरकतों से खुश नहीं थी, क्योंकि सरकार से मिलने वाले दो लाख रुपये भत्ता को वह मनमर्जी से खर्चा करता था। जनता अगर कोई मदद मांगती तो वह तुरंत मदद करता, इससे वह बहुत लोकप्रिय हो रहा था।

1953 में मध्यप्रदेश सरकार ने प्रवीर चन्द्र पर कोर्ट में हलफनामा पेश कर उसकी सारी संपत्ति को हड़प लिया। उस पर आरोप लगाया गया कि राजा की मानसिक स्थिति ठीक नहीं है। वह अपनी संपत्ति की देखभाल ठीक से नहीं कर सकता। सरकार का मकसद प्रवीर को अपने नियंत्रण में रखना था। 1955 को बस्तर में भंयकर अकाल पड़ गया। बस्तर की आदिवासी जनता में विचार फैल गया कि हमारे राजा की संपत्ति पर सरकार ने कब्जा कर लिया है इस कारण से बस्तर में अकाल पड़ गया, देवता नाराज हो गए हैं। राजा जगदलपुर के व्यापारियों, जनता व सरकारी कर्मचारियों की अच्छी देखभाल करता था। वह बहुत लोकप्रिय हो चुका था, सरकार इससे घबराई हुई थी।

सत्ता बदलने के बाद में साधारण मतदान पद्धति शुरू हो गयी थी। उस समय बस्तर में 7 विधानसभा व एक लोक सभा सीट होती थी। बस्तर बहुत बड़ा जिला था, इसलिए सरकार ने उसे कई डिवीजनों में बांटा हुआ था। 1980 तक बस्तर रायपुर डिवीजन का हिस्सा होता था। 1947 के बाद सरकार जन विकास (स्कूल, अस्पताल) के बजाये रोड, थाने व वन संपत्ति के दोहन के लिए ही योजना बना रही थी।

जब से बस्तर भारत संघ का हिस्सा बन और खासतौर से 1960 के बाद यहां पर बड़े पैमाने पर बाहरी लोगों (गैर आदिवासियों) का प्रवेश होने लगा। इसके अलावा बांग्ला देश से आए शरणार्थियों को भी बड़ी संख्या में जंगल के अंदर बसाया गया। दूसरी तरफ 1966 में जापान साम्राज्यवाद के साथ बैलाडिला लौह खदान खोलने का समझौता हुआ जिसने यहां गैर आदिवासियों की बाढ़ सी ला दी। इस प्रकार यहां गैर आदिवासियों की संख्या बढ़ने लगी व आदिवासी अल्पसंख्यक बनते गए।

बैलाडिला से कोत्तावाल्सा (आंध्रप्रदेश) तक रेल लाइन बिछाई गई। इस से हजारों आदिवासी विस्थापन का शिकार हुए। रेल लाइन काम के लिए मजदूरों को आंध्रा, ओडिशा से लाया गया। बस्तरिया आदिवासी को मजदूर काम भी नहीं दिया गया। राजा प्रवीर इस भेदभाव व विनाश से बेहद दुखी थे। उन्होंने रेल लाईन को उखाड़ फेकने व जल-जंगल जमीन की रक्षा – के लिए आम जनता को संगठित करना शुरू किया।

आजादी के बाद भी आदिवासियों की मुख्य समस्या जंगल व जमीन ही बनी हुई थी। जंगल पर उनको कोई अधिकार नहीं रह गया था। पूंजीपतियों के फायदे के लिए वनों का दोहन किया जा रहा था। जनजाति सुरक्षा कानून 1956 जैसे कानूनों से आम आदिवासी को कोई फायदा नही मिल रहा था। प्रवीर ने सरकार की आदिवासी विरोधी नीतियों का कड़ा विरोध किया। बस्तर की जनता खेती व वनोपज पर जीवनयापन करती है लेकिन सरकार उनके लिए सिंचाई आदि की कोई व्यवस्था नहीं करती थी। पूरे बस्तर में मात्र 27.5 प्रतिशत भूमि पर खेती होती थी, लेकिन उसके लिए भी सिंचाई मात्र 2.9 प्रतिशत ही थी। 2610 लकड़ी के हलों पर मात्र एक हल लोहे का होता था। इतनी दरिद्रता में बस्तर के आदिवासी जीवन यापन करते थे।

गैर आदिवासियों के बढ़ते जाने से जंगल बर्बाद हो रहा था। इसका विरोध करते हुए अपनी जनता को गोलबंद करने के लिए 1955 में राजा ने आदिवासी किसान मजदूर संगठन (AKMS) बनाया उसने संगठन सदस्यों के लिए नियम बनाया कि कोई जंगल की जमीन को नहीं छोड़ेगा, राजा की सम्पति राजा को देने के लिए लड़ेगा आदि। गांव-गांव में किसान मजदूर संगठन की इकाईयां गठित की गई, सदस्यता रसीद के साथ-साथ, महिला-पुरुष सदस्यों को संगठन की वर्दी भी बांटी गई। राजा ने अपने मांझियों, चालाकियों, कोतवारों की नियुक्तियां शुरू कर सरकार के समानांतर अपना राज्ययंत्र खड़ा करना शुरू कर दिया था। उनको राजा के माझी कहा जाता था। इनको नीले रंग की पगड़ी दी जाती थी वहीं सरकार अपने माझियों को दशहरा के दिन लाल पगड़ी देती थी।

संगठन की महिलाओं को लाल साड़ी दी जाती थी। संगठन के सदस्य राजा के विचारों का प्रचार साप्ताहिक हाट बाजारों में करते थे। इसके अलावा नियमित पर्चा, पोस्टर छापते थे, वाले रैलियां करते थे। जनता रैलियों में अपने-अपने खाने-पीने का सामान लेकर जाती और राज महल के लिए चावल खत्म होने तक काम करके आती थी। जनता अपने राजा को दिल से प्यार व विश्वास करती थी, राजा भी ऐसा करता था।

जनता के अंदर राजा की लोकप्रियता को देखते हुए सरकार ने राजा को अपनी तरफ खीचने के लिए बहुत कोशिश की। 1957 में उसे विधानसभा चुनाव लड़ने का लालच देकर जिला कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष का पद दिया गया। राजा भी अपना लक्ष्य पूरा करने के मकसद से चुनाव में खड़ा होने के लिए तैयार हो गया। जनता ने राजा के मुताबिक कांग्रेस पार्टी को भारी मतों से जीत दिलवाई।

राजा विधानसभा का सदस्य बन गया। इसके बाद भी उसे अपनी सम्पत्ति नहीं मिली। राजा इससे नाराज होकर विधान सभा सदस्यता से इस्तीफा देकर बाहर आ गया। उसका विचार था कि अगर मेरी सम्पत्ति मेरे हाथ में होती तो मैं मेरे हिसाब से जनता के लिए खर्च करता। मैं दूसरे कांग्रेस एमएलए की तरह भ्रष्टाचार से पैसा नहीं कमा सकता। इसके बाद राजा ने अपनी अलग से पार्टी आदिवासी सेवा दल का गठन किया। इसने कांग्रेस के भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी लड़ाई तेज की।

1960 में बस्तर कांग्रेस पार्टी का जिला अध्यक्ष रहे सूर्यपाल तिवारी के खिलाफ आन्दोलन किया। उसके तालाब पर हमला कर जनता ने सारी मछलियां जब्त कर ली। दरअसल तालाब सरकारी था जिस पर तिवारी अवैध कब्जा किए हुए था। इसके बाद आदिवासी सेवा दल की कार्रवाई तेज हो गई उन्होंने जंगल काटकर जमीनों को बांटना, सरकारी, साहूकारों, जमींदारों की जमीनों पर कब्जा करना शुरू किया।

उसी समय बस्तर में सीपीआई ने भी अपने संगठन का निर्माण किया था। उन्होंने भी जमीन जप्ती संघर्ष का समर्थन करते हुए दारू न पीने का प्रचार किया। सेवा दल के जंगल काट कर जमीन बांटने की कार्रवाई को रोकने के लिए सरकार ने 22000 एकड़ जमीन को आदिवासियों को देने का निर्णय लिया। सेवा दल ने गांव-गांव व जगदलपुर में कांग्रेस के खिलाफ बड़े पैमाने पर सभाओं का आयोजन किया। हजारों संख्या में आदिवासी रैलियों में आते थे। इसका फायदा उठाने के लिए कांग्रेस विरोधी प्रजा सोशलिस्ट व रामराज्य दल जैसी पार्टियां भी राजा के पक्ष में खड़ी हो गई थी।

बस्तर का राजमहल, जगदलपुर

सेवा दल व राजा के आंदोलन से सरकार में हड़कंप मच गया। सरकार को डर लगने लगा कि यह आंदोलन अब अलग बस्तर राज्य की मांग करने लगेगा और हिंसक रूप धारण करेगा। सरकार ने बस्तर के कई हिस्सों व जगदलपुर में विशेष सशस्त्र बल को तैनात कर दिया।

सरकार ने प्रवीर चन्द्र का दो लाख भत्ता रद्द कर दिया और राजा की उपाधि भी छीन ली। जनता में इसके खिलाफ आक्रोश फैलने लगा। सेवा दल को दबाने के लिए राजा प्रवीर चन्द्र को फरवरी 1961 को गिरफ्तार कर लिया गया। उसे गिरफ्तार कर नरसिंह गढ़ जेल में बंद कर दिया गया। परिवार में फूट डालने के लिए प्रवीर के भाई विजय चन्द्र को सरकार ने राजा घोषित कर उसे दो लाख भत्ता देना शुरू कर दिया। सरकार ने प्रचार किया कि प्रवीर एक और भूमकाल की तैयारी कर रहा था इसलिए उसे पकड़ कर जेल में रखा गया।

एक और भूमकाल

प्रवीर का भाई विजय चन्द्र भंजदेव सरकार के पाले में जा खड़ा हो गया। लेकिन जनता ने विजय को राजा के तौर पर स्वीकार नहीं किया था। जनता ने प्रवीर की रिहाई के लिए एक बड़े आंदोलन की शुरूआत कर दी। मार्च 1961 गांव-गांव में सभाएं, रैलियां व अन्य जन कार्रवाईयां तेज हो गई।

लोहण्डी, तोकेपाल, देवरा, करंजी सहित कई गांव सरकार को पूरी तरह से टैक्स बंद कर दिया। बाहरी व्यापारियों के हाट बाजार में आने पर रोक लगा दिया गया। व्यापारियों का भी गुस्सा पुलिस पर बढ़ गया क्योंकि यह सब पुलिस के कारण हो रहा था। जब पुलिस लाठी चार्ज करती तो जनता भी उसका जवाब उसी रूप में देती थी।

जनता ने नारायणपाल के सूर्यपाल तिवारी का सफाया करने की चेतावनी दी। इसके बाद सूर्यपाल तिवारी पुलिस सुरक्षा में घूमने लगा। संघर्षरत जनता ने शराब की भट्टियों, स्कूल भवन आदि को जला डाला। पारंपरिक सूचना पाकर दूर-दूर से आदिवासी लोंहडीगुड़ा में जमा होना शुरू हुआ। 1910 भूमकाल विद्रोह जैसा माहौल बन गया। इस डर से सारे बाहरी व्यक्ति डर कर जगदलपुर भाग खड़े हुए।

राजा प्रवीर चन्द्र की रिहाई के लिए जनता ने 28 मार्च को जगदलपुर में रैली आयोजित करने का फैसला लिया। 28 मार्च को हजारों की संख्या में लोग जगदलपुर के पशु मण्डी में जमा हो गए। अगले दिन जनता और पुलिस के बीच हाथा पाई शुरू हो गई। पुलिस वालों ने 500 लोगों को हिरासत में ले लिया। 31 तारीख को इसके विरोध में लोहंडीगुड़ा में 10,000 जनता रैली में भाग लिया था, उस दिन बाजार भी था। इस को रोकने के लिए विजय चन्द्र आगे आया। लेकिन लोगों ने उसकी एक न सुनी, पुलिस ने जनता पर आसू गैस के गोले दागे और अन्धाधुंध गोली बारी शुरू कर दी। इस गोलीबारी में 13 आदिवासी शहीद हो गए। सैकड़ों लोग फायरिंग से घायल हुए।

राजा की रिहाई की आंदोलन ने इसके बाद और जोर पकड़ लिया। हर गांव में पुलिस की गश्ती ने माहौल को और तनाव पूर्ण बना दिया था। पुलिस ने 11 अप्रैल तक जगदलपुर में धारा 144 लगा दिया। पूरे जिले में विस्फोटक परिस्थितियां बनी हुई थी। प्रजा सोशलिस्ट पार्टी सीपीआई व जनसंघ ने लोहंडीगुड़ा फायरिंग की न्यायिक जांच करने की मांग की। सरकार ने फायरिंग में शहीद लोगों के परिजनों का 10-10 हजार रुपये देने की घोषणा की। लेकिन जनता ने पैसे लेने से मना कर दिया। जान लेने व पैसे देने की सरकारी नीति का जनता ने कड़ा विरोध किया।

अप्रैल 1961 में सरकार को हार कर राजा प्रवीर को रिहा करना पड़ा था। अगस्त में उसका बस्तर आगमन हुआ, राजा के आने से जनता में और जोश बढ़ गया। सरकारी कर्मचारियों में बदली के लिए भागदौड़ शुरू हो गई। चुनावी फायदे के लिए विपक्षी पार्टियां राजा के आसपास मंडरानें लगी। कांग्रेस पार्टी से भी वह लोग बाहर आ गये जो राजा के खिलाफ नहीं थे। जेल से आने के बाद प्रवीर ने एक नई पार्टी अखिल भारतीय महाराजा पार्टी का गठन किया। उसका उद्देश्य उन देशी रियासतों में राजाओं का अधिकार कायम करना था।

1962 के विधान सभा चुनाव में राजा ने गांव-गांव घूमकर प्रचार किया। लोहंडीगुड़ा फायरिंग का विरोध करने वालों की राजा ने खूब मदद की। जिस-जिस को राजा का सर्मथन मिला उनकी जीत हुई। राजा ने खुद कांकेर लोकसभा से एमपी का चुनाव लड़ा लेकिन हार गये।

1961 जुलाई में प्रवीर की शादी पाटन रियासत की सुभराज कुमारी वेदवती से हो गई थी। राजा का सरकार की तरफ से पैसा आना बंद हो गया था। रानी को बस्तर लाने में वह असमर्थ था लेकिन रानी को देखने के लिए जनता बेहद उतावली व उत्सुक थी, इसलिए जनता से चंदा जमा करके रानी को लाया गया और एक बड़े उत्सव का आयोजन किया गया। बस्तर में रानी के आगमन से पूरे आंदोलन को जोश मिला। बड़ी संख्या में रानी के नेतृत्व के कारण महिलाएं आंदोलन में कूद पड़ी। इस बार के दशहरा में राजा को रथ पर सवार किया गया। लोगों की मांग थी कि प्रवीर को पुनः राजधानी प्रदान की जाए और राज सम्पति को सौंपा जाए।

तीन अगस्त 1962 को जगदलपुर में बड़ी रैली का आयोजन किया गया। इस सभा में एमपी लखमू भवानी को तलब किया गया था। जनता द्वारा चेतावनी दिया गया कि अगर वह राजा का समर्थन नही करता तो इस्तीफा दें। राजा की पार्टी लगातार फायरिंग की जांच करने की मांग कर रही थी। सरकार कभी न्याय नहीं करेगी इस पर उसने ‘लोहंडीगुड़ा’ नाम से एक पुस्तक प्रकाशित की थी।

लोहंडीगुड़ा फायरिंग के खिलाफ जनता ने भूख हड़ताल, हस्ताक्षर अभियान, रैली जुलूस से लेकर तिरंगा झण्डा जलाने तक कई रूपों में संघर्ष किया। राजमहल में सरकार द्वारा लगाए गए तालों को तोड़ कर जनता राजमहाल में घुस गई, कब्जा कर लिया। पुलिस ने लोगों के कब्जे से महल छुड़वाने के लिए बल का प्रयोग किया। जनता के तीर से एक पुलिस वाला घायल हो गया। बाद में पुलिस ने इस जुर्म में 61 लोगों को गिरफ्तार किया और नौ लोगों को कोर्ट में 5-5 साल कि सजा सुनाई।

पुलिस के दमन से जनता में कोई खौफ नहीं था। सितम्बर 1963 में बेजिरपदर गांव के नेता हिड़मा को जब पुलिस पकड़ने आई तो दो पुलिस वालों को लोगों ने मौत के घाट उतार दिया। इसके बाद पुलिस और कर्मचारियों में खौफ फैल गया। पुलिस ने दमन तेज करते हुए गश्त व महिलाओं पर अत्याचार बढ़ा दिया। 25 जुलाई 1963 को राजा की संपत्ति सरकार ने राजा को सौंप दिया। लेकिन विजय चन्द्र ने कोर्ट में केस कर दिया कि मैं बस्तर का राजा हूं और सम्पत्ति पर अधिकार मेरा है। दो साल कोर्ट में केस चलता रहा। एक दिन जब प्रवीर नहीं था तो विजय सोना चोरी करके ले गया। इसके विरोध में पारम्परिक रिवाज से हजारों जनता जमा हुई। लोगों ने देवता को आह्वान किया, सोना वापिस दिलाने की मांग की।

लगातार बारिश न होने के कारण 1965 में बस्तर में अकाल पड़ गया। सरकार ने इलाके को अकाल ग्रस्त घोषित कर दिया। लेकिन टैक्स वसूल करना बंद नहीं किया। सरकार की नीति से आक्रोशित जनता ने टैक्स देना बंद कर दिया। गांव में पटवारी आने से उसे पीट कर भगा दिया जाता था। उसके कागज पत्र छीन कर जलाया जाने लगा। उस समय प्रति हल आठ प्याली (लगभग डेढ़ किलो) चावल व आठ रुपये देने पड़ते थे। 1965-66 में सरायपाल, सोनागुड़ा, नगरनार के बाजारों में कई रैलियां निकाली गई। नवंबर 1965 में जगदलपुर में बड़ी रैली की आयोजन करने का निर्णय लिया गया। पुलिस ने रैली को विफल करने के लिए धारा 144 लागू कर 19 महिला व 59 पुरुष नेताओं को गिरफ्तार कर लिया।

राजा की शहादत

25 मार्च 1966 को राजमहल के सामने भारी संख्या में पुलिस बल कि तैनाती की गई। राजमहाल के सामने हजारों लोग जमा थे, उनके हाथ में भी तीर धनुष थे। उस दिन पुलिस व जनता के बीच भीषण मुठभेड़ हुई। कई पुलिस वाले घायल हुए, कुछ मारे गए। यह देखने और इस सब को रोकने के लिए राजा महल से बाहर निकाला। तभी पुलिस ने राजा प्रवीर चंद भंजदेव को गोलियों का निशाना बना दिया। राजा प्रवीरचन्द्र भंजदेव सहित 11 आदिवासी लोग शहीद हुए।

अपने जल जंगल जमीन व तमाम संपत्ति पर अपने अधिकार के लिए अपने राजा के नेतृत्व में लड़ाई करने वाली जनता अपने प्राणों का बलिदान दिया, लेकिन यह लड़ाई रुकी नहीं है। 1825 में वीर गेंद सिंह की शहादत से लेकर 1966 प्रवीर चंद्र की शहादत तक चली लड़ाइयों के दौरान हजारों आदिवासियों ने अपने भूमकाल विद्रोह में शहादतें दी।

कुल मिलाकर देखें तो 1825 से जो लड़ाई गेंद सिंह विदेशी अंग्रेजों स्थानीय मराठा शासकों के खिलाफ शुरू किया था वह निरंतर जारी रहा। आज तक बस्तर के आदिवासियों की जल-जंगल-जमीन का मुद्दा हल नहीं हो पाया है।

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