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न्यायपालिका के नीली आँखों वाले लड़के अर्णब ने इधर याचिका डाली उधर सुनवाई

उच्चतम न्यायालय के जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदिरा बनर्जी की खंडपीठ बुधवार 11नवम्बर को यानी आज रिपब्लिक टीवी के एडिटर इन चीफ अर्णब गोस्वामी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करेगी, जिसमें इंटीरियर डिजाइनर अन्वय नाइक और उनकी मां कुमुद नाइक की आत्महत्या के मामले में अंतरिम जमानत की मांग की गयी है। यह याचिका जो 9 नवंबर के बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ एक अपील है । उच्च न्यायालय ने गोस्वामी की याचिका को खारिज कर दिया था, जबकि उन्हें नियमित जमानत के लिए सत्र न्यायालय का रुख करने के लिए कहा था।

इस बीच अर्णब गोस्वामी की याचिका की तत्काल लिस्टिंग पर सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) के अध्यक्ष और वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे ने एससी रजिस्ट्री से सवाल किया कि ऐसा क्या है की अर्णब जब-जब उच्चतम न्यायालय आते हैं उनकी याचिका को तत्काल सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर दिया जाता है, तो ऐसा करने के लिए क्या चीफ जस्टिस और मास्टर ऑफ़ रोस्टर एसए बोबडे की ओर से कोई विशेष निर्देश है?

उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में अर्णब गोस्वामी ने यह अपील अधिवक्ता निर्मिमेष दुबे के माध्यम से दायर की है। अर्णब ने इस याचिका में महाराष्ट्र सरकार के साथ ही अलीबाग थाने के प्रभारी, मुंबई के पुलिस आयुक्त परम बीर सिंह को भी पक्षकार बनाया है। इस बीच, महाराष्ट्र सरकार ने भी अपने अधिवक्ता सचिन पाटिल के माध्यम से न्यायालय में कैविएट दाखिल की है ताकि उनका पक्ष सुने बगैर गोस्वामी की याचिका पर कोई आदेश नहीं दिया जाए।

इस बीच महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले की सत्र अदालत ने पुलिस की याचिका पर अर्णब गोस्वामी और अन्य दो के खिलाफ फैसला सुरक्षित रख लिया है। पुलिस ने अपनी याचिका में मजिस्ट्रेट के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें मजिस्ट्रेट ने अर्णब को पुलिस हिरासत में भेजने से इनकार करते हुए 18 नवंबर तक के लिए न्यायिक हिरासत में भेज दिया था।

एक इंटीरियर डिजायनर और उसकी मां को 2018 में कथित रूप से आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में गिरफ्तार रिपब्लिक टीवी के प्रधान संपादक अर्णब गोस्वामी ने मंगलवार को अंतरिम जमानत के लिए उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की।

बंबई उच्च न्यायालय ने सोमवार को इस मामले में अर्णब गोस्वामी और दो अन्य को अंतरिम जमानत देने से इंकार करते हुए कहा था कि उन्हें राहत के लिए निचली अदालत जाना चाहिए। उच्च न्यायालय ने कहा था कि अगर आरोपी अपनी ‘गैरकानूनी गिरफ्तारी’ को चुनौती देते हैं और जमानत की अर्जी दायर करते हैं, तो संबंधित निचली अदालत चार दिन के भीतर उस पर निर्णय करेगी।

उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा था कि गोस्वामी के पास कानून के तहत एक उपाय है कि वे संबंधित सत्र न्यायालय का दरवाजा खटखटाएं और नियमित जमानत कि मांग करें। उच्च न्यायालय गोस्वामी और दो अन्य आरोपियों फिरोज शेख और नीतीश सरदा द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था जिसमें उन्होंने गिरफ्तारी को चुनौती दी थी और अंतरिम जमानत की मांग कर रहे थे। फिरोज शेख के रिश्तेदार, परवीन शेख ने भी आरोपियों के लिए जमानत की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है।

न्यायमूर्ति एसएस शिंदे और एमएस कार्णिक की खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया था कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 439 के तहत नियमित जमानत के लिए आवेदन करने का उपाय अप्रभावित रहेगा। गोस्वामी 2018 मामले के संबंध में 4 नवंबर से न्यायिक हिरासत में हैं और इस मामले को 2019 में बंद कर दिया गया था। इसे नाइक की बेटी अदन्या नाइक द्वारा राज्य के गृह मंत्री अनिल देशमुख को दिये गए अभ्यावेदन के आधार पर 2020 में फिर से खोला गया।

गोस्वामी को शुरू में एक स्थानीय स्कूल में रखा गया था जिसे अलीबाग जेल के लिए एक कोविड -19 केंद्र के रूप में नामित किया गया था। 8 नवंबर को उन्हें रायगढ़ जिले की तलोजा जेल में स्थानांतरित कर दिया गया था, जब उन्हें न्यायिक हिरासत में रहते हुए मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते पाया गया था।

इस बीच, रिपब्लिक टीवी के कंसल्टिंग संपादक प्रदीप भंडारी ने रविवार को प्रधान न्यायाधीश एस ए बोबडे को एक पत्र लिखकर गोस्वामी को तलोजा जेल स्थानांतरित किए जाने और खतरनाक अपराधियों के बीच रखे जाने का संज्ञान लेने और उन्हें सुरक्षा प्रदान करने का आग्रह किया था। उनका कहना था कि गोस्वामी की जान को खतरा है और उन्हें रविवार की सुबह पीटा गया है।

वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने उच्चतम न्यायालय के सेक्रेटरी जनरल को एक कड़ा पत्र लिखकर सवाल उठाया है कि है रिपब्लिक टीवी के संपादक, अर्णब गोस्वामी की जमानत याचिका दाखिल किये जाने के अगले दिन कैसे सूचीबद्ध किया गया। दवे ने सेक्रेटरी जनरल से “कड़ा विरोध” दर्ज किया है, जिसमें कहा गया है कि उच्चतम न्यायालय के समक्ष गोस्वामी की याचिकाओं को तत्काल सूचीबद्ध किया गया है जबकि अन्य समान रूप से रखी गई याचिकाओं को प्रतीक्षा में रखा गया है।

दुष्यंत दवे ने रजिस्ट्री से सवाल किया है कि क्या सीजेआई से गोस्वामी की याचिका की तत्काल सूचीबद्ध करने का विशेष निर्देश प्राप्त हुआ है? अपने पत्र के विषय को ” अर्णब गोस्वामी की ओर से दायर विशेष अवकाश याचिका की असाधारण तत्काल सूची” के रूप में करार देते हुए दवे ने सवाल किया है कि क्या भारत के मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे ने पत्र द्वारा याचिकाओं को तत्काल सूचीबद्ध करने के लिए विशेष निर्देश दिया था?

दवे ने कहा है कि जबकि हजारों नागरिक लंबे समय तक जेलों में रहते हैं, जबकि उच्चतम न्यायालय के समक्ष उनके मामलों को हफ्तों और महीनों के लिए सूचीबद्ध नहीं किया जा रहा है, यह कम से कम, गहन रूप से परेशान करने वाला है कि गोस्वामी जब उच्चतम न्यायालय में गुहार लगाते हैं हर बार कैसे और क्यों उनकी याचिका तुरंत सूचीबद्ध हो जाती है। क्या भारत के मुख्य न्यायाधीश और मास्टर ऑफ रोस्टर की ओर से ऐसा करने का कोई विशेष आदेश या निर्देश है?

एक वकील ने24 अप्रैल 2020 को उच्चतम न्यायालय के सेकेट्ररी जनरल को पत्र लिखकर रजिस्ट्री के कामकाज खासतौर से मामलों को सूचीबद्ध करने और मामलों की “तात्कालिकता” के आधार पर भेदभाव करने का आरोप लगाते हुए शिकायत की थी। वकील रीपक कंसल ने अर्णब गोस्वामी की याचिका को तत्काल सूचीबद्ध करने को इंगित करते हुए अपनी शिकायत में उदाहरण दिया था कि जो गुरुवार रात दायर की गई और शुक्रवार सुबह 10.30 बजे के लिए सूचीबद्ध कर दी गई। वकील ने कहा था कि ये लंबित मामलों की पूर्व सूची को अनदेखी करके किसी भी दोष/तात्कालिक पत्र आदि को इंगित किए बिना” की सूचीबद्ध की गई।

पत्र में कहा गया था कि लिस्टिंग के मामलों में इस असमान अवसर के बारे में मजबूत असंतोष व्यक्त करते हुए, वकील ने अपने पत्र में आगे कहा कि रजिस्ट्री द्वारा इसी तरह का रवैया अपनाया जाता है। यह रजिस्ट्री की दिनचर्या है जहां कुछ कानून फर्मों / प्रभावी वकीलों को अनुभाग अधिकारियों / रजिस्ट्री द्वारा वरीयता दी जाती है। यह भेदभाव है और समान अवसर के खिलाफ है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on November 11, 2020 8:51 am

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