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प्रवासी श्रमिकों पर सुप्रीम कोर्ट की तन्द्रा टूटी, गुरुवार को विस्तृत सुनवाई

प्रवासी मजदूरों की दुर्दशा पर सरकार की हां में हां मिलाने के लिए हो रही तीखी आलोचना के बाद उच्चतम न्यायालय की तन्द्रा टूटी और उसने मंगलवार को कोरोना वायरस के कारण लॉकडाउन के बीच देश के विभिन्न हिस्सों में फंसे प्रवासी मजदूरों की समस्याओं और दुखों का स्वत:संज्ञान लिया। जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस एमआर शाह की पीठ ने कामगारों की परेशानियों का संज्ञान लेते हुए केन्द्र, राज्य सरकारों और केन्द्र शासित प्रदेशों से 28 मई तक जवाब मांगा है। इन सभी को न्यायालय को बताना है कि इस स्थिति पर काबू पाने के लिये उन्होंने अभी तक क्या कदम उठाये हैं। उच्चतम न्यायालय ने सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता से कहा है कि वह इस मामले में न्यायालय की मदद करें। न्यायालय कामगारों से संबंधित इस मामले में 28 मई को आगे विचार करेगा।

पीठ ने कहा कि भले ही इस मुद्दे को राज्य और केंद्र दोनों स्तरों पर संबोधित किया जा रहा हो, लेकिन प्रभावी और स्थिति को बेहतर बनाने के लिए केंद्रित प्रयासों की आवश्यकता है। पीठ ने भारत सरकार के साथ-साथ सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को अपने जवाब प्रस्तुत करने और मुद्दे की तात्कालिकता पर ध्यान देने के लिए नोटिस जारी किए हैं। पीठ ने कहा है कि हम परसों मुकदमा दायर करने का निर्देश देते हैं और हम सॉलिसीटर जनरल से अनुरोध करते हैं कि वह पीठ की सहायता करें और सुनवाई की अगली तारीख तक न्यायालय के सभी उपायों और कदमों को केंद्र सरकार द्वारा उठाए गए और उठाए जाने के लिए ध्यान में रखें। पीठ ने कहा कि समाज के इस वर्ग को संबंधित सरकारों द्वारा मदद की आवश्यकता है और भारत सरकार, राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा इस कठिन समय में कदम उठाए जाने की आवश्यकता है।

उच्चतम न्यायालय ने मीडिया रिपोर्ट और सुप्रीम कोर्ट को मिली चिट्ठी चिट्ठियों के आधार पर इस मामले का संज्ञान लिया। पीठ ने अपने आदेश में कहा है कि मीडिया लगातार प्रवासी मजदूरों की दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति को दिखा रहा है।लॉकडाउन के दौरान संसाधनों के अभाव में यह लोग सड़कों पर पैदल और साइकिल से लंबी दूरी के लिए निकल पड़े हैं।इन परेशानहाल लोगों को सहानुभूति और मदद की जरूरत है।केंद्र और राज्य सरकारों को इस दिशा में विशेष कदम उठाने होंगे।कोर्ट ने कहा है कि बड़ी संख्या में लोग हाईवे पर रेलवे स्टेशनों पर या राज्य की सीमाओं पर फंसे हुए हैं।ऐसे लोगों को केंद्र और राज्य सरकार तुरंत यातायात के साधन, भोजन, आश्रय जैसी सुविधाएं दे।इसके लिए उनसे कोई पैसे न लिया जाए।

पीठ ने यह माना है कि केंद्र और राज्य सरकारें मजदूरों की मदद के लिए कुछ कदम उठा रही हैं। लेकिन यह कदम पर्याप्त साबित नहीं हो रहे। पीठ ने कहा है कि ‘इस समय जरूरत इस बात की है कि सभी प्रयास एक समन्वित तरीके से चलाए जाएं, ताकि उनका ज्यादा असर हो सके। इसलिए हम इस मसले पर संज्ञान लेकर सुनवाई करना जरूरी समझते हैं। केंद्र और राज्य सरकारों को इस आदेश की कॉपी दी जाए। परसों जब हम इस मामले की दोबारा सुनवाई करें, तो केंद्र की तरफ से सॉलिसीटर जनरल और राज्यों की तरफ से उनके वकील मौजूद रहें।

उच्चतम न्यायालय का आज का यह आदेश 15 मई को इसी मसले पर दाखिल एक याचिका पर उसके रुख से बिल्कुल अलग है। उस दिन कोर्ट ने औरंगाबाद में ट्रेन से कटकर 16 मजदूरों की मौत के मामले में संज्ञान लेने से मना कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि अगर लोग रेल की पटरी पर सो जाएंगे तो उन्हें कोई नहीं बचा सकता।याचिकाकर्ता ने प्रवासी मज़दूरों का हाल कोर्ट के सामने रखते हुए इसी तरह की दूसरी घटनाओं का भी हवाला दिया था, लेकिन कोर्ट ने कहा था कि जो लोग सड़क पर निकल आए हैं, उन्हें हम वापस नहीं भेज सकते। जस्टिस एल नागेश्वर राव, जस्टिस संजय किशन कौल और बीआर गवई की बेंच ने याचिकाकर्ता से कहा था कि आप ने अखबार में छपी खबरों को उठाकर एक याचिका दाखिल कर दी है।कौन सड़क पर चल रहा है और कौन नहीं, इसकी निगरानी कर पाना कोर्ट के लिए संभव नहीं है।

गौरतलब है की कोरोना संकट के कारण पूरे देश में लॉकडाउन लागू है। इसके चौथे चरण में कुछ कामों को छूट दी गई है। लॉकडाउन से सबसे ज्यादा प्रवासी मजदूर प्रभावित हुए हैं। काम-धंधे बंद होने और खाने-पीने का सामान खत्म होने पर परिस्थितियों से मजबूर होकर जब ये मजदूर सड़कों पर पैदल घरों की तरफ जाने लगे, तब सरकारों को उनकी घर वापसी की सुध आई। श्रमिक ट्रेनें चलाई गईं जो पांच दिन से नौ दिन के बीच गंतव्य पर पहुंच रही हैं। लॉकडाउन के कारण वे ट्रेनों तक पहुंचेंगे कैसे, इस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया।

मजदूरों की ऐसी दयनीय हालत पर कई राज्यों के उच्च न्यायालयों ने केंद्र और राज्य सरकारों पर सवाल उठाए हैं। इनमें मद्रास से आंध्र प्रदेश और कर्नाटक से गुजरात तक के उच्च न्यायालय शामिल हैं। 15 मई को महाराष्ट्र के बॉर्डर पर पहुंचे 400 प्रवासी मजदूरों की सुरक्षित घर वापसी के लिए दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान मद्रास हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने राज्य और केंद्र सरकार से 12 सवाल पूछे कि लॉकडाउन के कारण पैदा हुए इस संकट से निपटने के लिए सरकार ने क्या किया?

कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रवासी मजदूरों की पिछले एक महीने से ऐसी दयनीय स्थिति देखकर कोई अपने आंसू नहीं रोक पाएगा। यह एक मानवीय दुखांत है। बेंच ने सवाल पूछा है कि इस संकट के कारण कितने प्रवासी मजदूर फंसे हुए हैं और कितने हाईवे पर पैदल चल रहे हैं और उन्हें सुरक्षित घरों तक पहुंचाने के लिए अभी तक सरकार ने क्या कदम उठाए हैं?

इसी दिन आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने भी राज्य में फंसे प्रवासी मजदूरों के मामले का संज्ञान लेने के लिए दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई के दौरान कहा कि सरकार अपने कर्तव्य पालन में पूरी तरह फेल होगी, अगर वह प्रवासी मजदूरों की दशा पर कोई ठोस कदम नहीं उठाती। अदालत ने राज्य सरकार को प्रवासी मजदूरों के लिए खाने-पीने, यात्रा और रहने की तुरंत व्यवस्था करने के निर्देश दिए।

इसी सप्ताह महाराष्ट्र हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि निजी सुरक्षा उपकरण (पीपीई) फ्रंटलाइन पर लगे लोगों तक जरूर पहुंचे। जबकि मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को निर्देश दिए हैं कि वे प्रवासी मजदूरों को रेलवे स्टेशनों तक पहुंचाना सुनिश्चित करे। इस पर अदालत ने स्टेटस रिपोर्ट भी मांगी है। उधर, कलकत्ता हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार से पूछा है कि सरकार ने इस संकट की घड़ी से निपटने के लिए क्या कदम उठाए हैं।

सरकार ने प्रवासी मजदूरों को श्रमिक स्पेशल ट्रेनों के माध्यम से घर भेजने की शुरुआत की, तो इस पर भी राजनीति होने लगी। पहले से ही परेशानियों से जूझ रहे मजदूरों से रेल का किराया तक वसूला गया। यह मामला कर्नाटक हाईकोर्ट में है। मामले की सुनवाई कर रही बेंच की अध्यक्षता कर रहे चीफ जस्टिस अभय ओका ने 18 मई को राज्य सरकार से स्पष्टीकरण मांगा है कि आखिर मजदूरों के लिए किराया कौन दे रहा है? इस पर केंद्र सरकार ने कहा कि कुछ राज्य मजदूरों का किराया देने पर सहमत हैं। 20 मई को बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने अखबारों के वितरण के मामले का संज्ञान लिया। जबकि गुजरात हाईकोर्ट ने प्राइवेट अस्पतालों की ओर से कोरोना मरीजों से वसूली जा रही मनमानी फीस पर खुद संज्ञान लिया।

(वरिष्ठ पत्रकार होने के साथ जेपी सिंह कानूनी मामलों के जानकार भी हैं।)

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This post was last modified on May 26, 2020 11:23 pm

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