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जवाहरलाल नेहरू: मन, कर्म और वचन से समाजवादी

27 मई 1964 को पंडित जवाहरलाल नेहरू का निधन हुआ। नेहरू के निधन के बाद एक दशक तक तो सब ठीक ठाक चला, परंतु 1974 में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले संपूर्ण क्रांति के आंदोलन से परिस्थितियां बदल गईं। हाशिए पर चल रहा भारतीय जनसंघ दिल्ली सरकार में साझेदार हो गया। वहीं से उन्होंने आगे की तैयारी तेज की तथा नेहरू के चित्र पर एक-एक चुटकी धूल डालकर नेहरू की छवि को धूमिल करने की शुरुआत कर दी थी।

नेहरू मुक्त भारत

नेहरू को जानना हो तो शहीद भगत सिंह, आचार्य नरेंद्र देव, डॉक्टर राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर जैसे उनके आलोचकों को अवश्य पढ़ें। नेहरू के दिल के आकार को देखना हो तो उनका प्रथम मंत्रिमंडल देखें, जिसमें सार्वजनिक रूप से कांग्रेस विरोधी तथा नेहरू के कटु आलोचक षणमुखम चेट्टी, डॉक्टर भीमराव आंबेडकर व श्यामा प्रसाद मुखर्जी मंत्री थे। जो नेहरू का चट्टान जैसा सीना देखना हो तो उस प्रस्ताव को ठुकराने में देखें जिसमें ब्रिटेन की ओर से ताज के अधीन स्वतंत्रता देने की शर्त को उन्होंने पलक झपकते ठुकरा दिया था और कहा था  “चाहे कितना ही और संघर्ष करना पड़े, पूर्ण स्वतंत्रता व सार्वभौमिकता से कम कुछ न लेंगे।”

मैं नेहरू विरोध के परिवार में जन्मा। कांग्रेस का शाश्वत विरोध मेरे परिवार में तीन पीढ़ियों से चल रहा है तथा परिवार के प्रेरणा स्रोत महात्मा गांधी, शहीद भगत सिंह व डॉ. राम मनोहर लोहिया रहे हैं। जयप्रकाश जी का सानिध्य मेरे लिए रोमांचित करने वाला ही माना जाएगा, जिसके सूत्रधार प्रोफेसर अजय कुमार सिंह हैं। इसके बावजूद जब पंडित जवाहरलाल नेहरू को पढ़ा, तो आकर्षण पैदा होता गया। दिलचस्पी नेहरू के ग्लैमर के कारण नहीं, बल्कि वे देश के ऐसे प्रधानमंत्री रहे, जिसने अपना विरोध पसंद किया। यहां तक कि अपने विरुद्ध की गई टीका-टिप्पणी पर अपने दल के सदस्यों के प्रति और भी अधिक आसक्त हो जाते थे। आज हैसियत नहीं किसी नेता की जो अपने दल की तथ्यात्मक आलोचना कर दे। नेता के विरुद्ध एक शब्द पर उसे दल के बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है।

आचार्य नरेंद्र देव

21 अप्रैल 1934 को कांग्रेस पार्टी के अंदर कांग्रेस-सोशलिस्ट दल की बुनियाद पड़ी। उस सम्मेलन की अध्यक्षता आचार्य नरेंद्र देव ने की थी। आचार्य जी समाजवादी पार्टी के संस्थापक नेताओं में से थे। वे स्वतंत्रता संग्राम के नेताओं में गंभीर बौद्धिक तथा समाजवादी फिलॉसफी के मूल चिंतकों में जाने जाते रहे। 1948 में सोशलिस्ट पार्टी के कांग्रेस से अलग होने पर पहले अध्यक्ष आचार्य जी ही थे। पंडित जवाहरलाल नेहरु आचार्य नरेंद्र देव को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे। आचार्य जी ने मना कर दिया। बाद में एक दौर ऐसा आया जब आचार्य जी समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा नेहरू प्रधानमंत्री के रूप में आमने-सामने थे।

आचार्य जी की प्रतिभा के नेहरू जी कायल थे। वे बहुत प्रयास करते रहे कि आचार्य जी राष्ट्रीय राजनीति में सीधे सरकार से जुड़ें, परंतु विपक्ष के नेता आचार्य जी को यह स्वीकार नहीं था। बाद में नेहरू जी के आग्रह पर तथा शिक्षा क्षेत्र में योगदान देने के लिए उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय का उपकुलपति होना स्वीकार किया। वे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर भी रहे। नेहरू विरोधी को शत्रु नहीं मानते थे। हृदय की ऐसी विशालता वर्तमान में  मुश्किल है। संघी मानसिकता नेहरू के विरुद्ध झूठा प्रचार करने की रही है।

शहीद भगत सिंह

1928 में भगत सिंह ने “किरती” नामक समाचार पत्र में लिखा था कि नेहरू परंपराओं से बगावत करने वाले दूर दृष्टि के नेता हैं। लेख में उन्होंने नेहरू को बौद्धिक रूप से ज्यादा चुनौतीपूर्ण और तृप्तिदायक बताया। धर्म के विषय में नेहरू और भगत सिंह के विचार लगभग समान थे। जनता के बीच कितना झूठ बोला गया कि नेहरू भगत सिंह से नहीं मिले। जवाहरलाल नेहरू देश के उन चुनिंदा नेताओं में से थे, जो भगत सिंह से मिलने जेल गए। नेहरू ने भगत सिंह के देश प्रेम व बहादुरी की सार्वजनिक रूप से प्रशंसा की थी। जब भगत सिंह लाहौर जेल में भारतीय और यूरोपीय कैदियों के साथ समान बर्ताव की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर थे, तब 5 जुलाई 1929 को नेहरू ने दिल्ली में दिए बयान में कहा “भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की भूख हड़ताल की खबर मैंने गहरी तकलीफ के साथ सुनी है।

बीस या और भी ज्यादा दिनों से इन्होंने कुछ भी नहीं खाया है। मुझे बताया गया है कि ज़बर्दस्ती खाना खिलाया जा रहा है।” नेहरू ने खुले शब्दों में दोनों की प्रशंसा की थी। उन्होंने यहां तक कहा था कि “उनके कठोर इम्तिहान की तरफ हमारी आंखें लगी हैं।” तथा कामयाबी की उम्मीद भी की थी। नेहरू का यह बयान अंग्रेजी सरकार के लिए तमाचा था। इस संबंध में स्वतंत्र भारत के नागरिक भी तकलीफ के साथ भाजपा से पूछते हैं कि तुम्हारे उस जमाने के किस नेता ने भगत सिंह का साथ दिया? मिलने जाना तो दूर, समर्थन में बयान तक नहीं दिया। भाजपा बताए कि किसकी गवाही से भगत सिंह को फांसी हुई?

डॉ. राम मनोहर लोहिया

1962 के तीसरे लोकसभा चुनाव में डॉ. राम मनोहर लोहिया ने इलाहाबाद की फूलपुर सीट से जवाहरलाल नेहरू के विरुद्ध चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी। समाचार पत्रों से जब नेहरू को ज्ञात हुआ तो उन्होंने डॉ. लोहिया को वात्सल्य भरा पत्र लिखकर शुभकामनाएं दीं, साथ में लिखा कि डॉ. लोहिया की मदद के लिए वे चुनाव क्षेत्र में सक्रियता नहीं दिखाएंगे। क्या भाजपा के पास ऐसी सोच है? मई 1948 में कनॉट प्लेस पर धारा 144 तोड़ने के आरोप में डॉक्टर लोहिया की गिरफ्तारी हुई। इस मामूली सी बात पर डॉक्टर लोहिया को लंबे समय के लिए तिहाड़ जेल भेज दिया गया। जब एक महीने तक लोहिया नहीं छूट पाए, तो नेहरू ने तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल को पत्र लिखकर कहा कि धारा 144 का मामला सांकेतिक दंड का ही होता है।

ऐसे में लोहिया जैसे व्यक्ति को जिसने आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो, लंबे समय तक जेल में नहीं रखना चाहिए। ध्यान देने योग्य बात है कि नेहरू के प्रधानमंत्री काल में उनके दो ही विरोधी ऐसे थे, जो उनकी नीतियों की बाल की खाल निकाल दिया करते थे। एक उनके अपने दामाद फ़िरोज़ गांधी दूसरे डॉक्टर राम मनोहर लोहिया। जवाहरलाल नेहरू ने शिष्टाचार, लोकतंत्र व सामूहिक नेतृत्व के सिद्धांतों को आदर्श मानते हुए कभी अपने मंत्रियों के विभागों के मामले में सीधी टांग नहीं अड़ाई। वहीं आज का घटनाक्रम देखा जाए, तो परिस्थितियां बिल्कुल विपरीत हैं।

नेहरू-पटेल का जिक्र हुआ तो लगे हाथ बता दें कि सरदार पटेल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को पसंद नहीं करते थे। उन्होंने गांधी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया था। परंतु, कुछ माह पश्चात नेहरू ने लोकतंत्र में विरोध को पूरा अवसर देने के सिद्धांत के आधार पर पटेल से आरएसएस का प्रतिबंध समाप्त करने का अनुरोध किया।

संघी भाई गौर करें कि जिस नेहरू की छवि धूमिल कर अपनी कटी फटी तस्वीर को दुरुस्त करने के फेर में हैं, उसी नेहरू ने उन्हें महात्मा गांधी की हत्या के बाद भी कदम रखने की जगह दी थी।

जनकवि रामधारी सिंह दिनकर को नेहरू जी ने तीन बार राज्यसभा भेजा, परंतु दिनकर जी ने हर जगह उनका विरोध उन्हीं के सामने सदन में एवं सदन के बाहर, दोनों जगह किया। विपक्ष के नेता की प्रशंसा से नेहरू जी का स्नेह दिनकर जी के प्रति कभी कम न हुआ। पांचवें से सातवें दशक में साहित्य व कला के विद्वान समाजवादियों के बहुत निकट होते थे। दिनकर जी व्यक्तिगत रूप से आचार्य नरेंद्र देव, डॉ राम मनोहर लोहिया व जयप्रकाश जी के प्रति बहुत श्रद्धा भाव रखते थे। डॉक्टर लोहिया नेहरू जी के कठोर विरोधी थे। दिनकर जी कांग्रेस पार्टी से राज्यसभा में थे, किंतु नेहरू के सामने डॉक्टर लोहिया की प्रशंसा में उन्होंने 2 लाइनें पढ़ीं :

तब कहो लोहिया महान हैं,

एक ही तो है वीर, यहां सीना रहा तान है।

नेहरू प्रमुख साहित्यकारों को राजनीति में साथ लेकर चलते थे। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त 10 वर्ष राज्य सभा में रहे।

पढ़ने लिखने, शिक्षा-ज्ञान के दुश्मनों को साहित्यकारों से क्या लेना? उल्टे साहित्य कला की उच्च कोटि की संस्थाओं का तो वे सब मिलकर बंटाधार करने में लगे हैं।

जिन लोगों ने अंग्रेजी राज का, हिटलर का, मुसोलिनी का समर्थन किया, भारत में तानाशाही राज की प्रस्तावना लिखी, वे स्वतंत्रता संघर्ष में नेहरू को अक्सर आरोपित करते दिखाई दे जाते हैं। यदि कांग्रेस के वर्तमान नेतृत्व में नेहरू परिवार से कोई नहीं होता, तो भाजपा सरदार बल्लभ भाई पटेल की तरह पंडित जवाहरलाल नेहरू पर भी अपना दावा करते हुए उनकी मूर्तियां लगवा देती। दरअसल ये चोट नेहरू पर ना होकर, उनकी ओट में सोनिया गांधी, राहुल गांधी, और प्रियंका गांधी के ऊपर है। वे यह नहीं समझ पा रहे कि नेहरू की आलोचना से सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी का नेतृत्व और भी पुख्ता होता है। इनके कार्यकर्ता जब पंडित जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी व राजीव गांधी पर धर्म या संप्रदाय के अनर्गल आरोप लगाते हैं, तो यह भूल जाते हैं कि उस परिवार का एक अंश इनके साथ भी है।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी

1941-42 में हिंदू महासभा के नेता डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बंगाल में में मुस्लिम लीग के साथ मिलकर सरकार बनाई। सत्ता मिलने पर धुर विरोधी भी जब सिंहासन की ओर लपके, तो यही तो समझा जाएगा कि सारा खेल सत्ता प्राप्त करने के लिए ही है। मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा की सरकार में उस समय प्रधानमंत्री मुस्लिम लीग के एके फजलुल हक तथा उपप्रधानमंत्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी बने। हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग, दोनों के अंग्रेजी सरकार के साथ अच्छे रिश्ते थे। हिंदू महासभा ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध भी किया। द्वितीय विश्व युद्ध में कांग्रेस ने भारतीय युवकों को ब्रिटिश फौज में भर्ती होने से रोका, वहीं इन लोगों ने नौजवानों को फौज के लिए प्रेरित किया। अंग्रेजी सरकार से अच्छे संबंधों के रहते ब्रिटिश गवर्नमेंट ने 1934 से 1938 तक डा. मुखर्जी को कलकत्ता विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया। यह नेहरु का ही हृदय था, जिसने आजादी मिलने पर अपने विरोधियों तक को अपने मंत्रिमंडल में स्थान दिया। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी स्वतंत्र भारत के नेहरू मंत्रिमंडल में उद्योग मंत्री के रुप में सम्मिलित किए गए।

नेहरू के कटु आलोचक आरके षणमुखम शेट्टी वित्त मंत्री बने। डॉक्टर भीमराव आंबेडकर कानून मंत्री बनाए गए। यह तीनों महानुभाव कांग्रेस के सदस्य नहीं थे। अब भारतीय जनता पार्टी आत्ममंथन करके देखे, क्या उनके यहां इतने विशाल ह्रदय का कभी कोई व्यक्ति हुआ? क्या वर्तमान में है? इस वक्त कोरोना की महामारी ने हम सबको जकड़ रखा है, विशेषज्ञ कह रहे हैं कि सिर्फ पीएमओ से सब कुछ नहीं हो पाएगा, लेकिन महज एक ऑल पार्टी मीटिंग के बाद मोदी जी ने किसी को पूछा तक नहीं है। संसदीय कमेटियां तो लापता हैं।

यह बात कही जा सकती है कि कांग्रेस का व्यवहार उदारवादी रहा है। पंडित जवाहरलाल नेहरू के बाद श्री लाल बहादुर शास्त्री उदार, सरल व सहज थे। एक इंदिरा गांधी का आपातकाल निकाल दिया जाए तो वे भी नेतृत्व में खरी उतरी थीं। पीवी नरसिंहराव राजनीति के चतुर खिलाड़ी थे, लोकतांत्रिक परंपराओं के निर्वहन में भी खरे थे। उन्होंने विपक्ष को साथ लेकर चलना सीखा था। संयुक्त राष्ट्र संघ की बैठक में अपने किसी मंत्री को ना भेज उन्होंने विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी को भारत के प्रतिनिधित्व का अवसर दिया। भाजपा सरकार में ऐसी उदारता की बात सपने में भी सोचना बेकार है। पंडित जवाहरलाल नेहरु की शख्सियत, काबिलियत, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीजों को संभालने का हुनर तथा अपने विरोधियों के लिए स्वयं छतरी लेकर खड़े होने की महानता विश्व इतिहास से नेहरू को न तो मुक्त होने देगी, न ही ओझल होने देगी।

(लेखक गोपाल अग्रवाल समाजवादी पार्टी व्यापार प्रकोष्ठ के उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष हैं।)

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This post was last modified on May 27, 2020 7:05 am

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