जनता के साथ जहां गलत होगा, सुप्रीम कोर्ट उसके साथ खड़ा मिलेगा:चीफ जस्टिस रमना

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चीफ जस्टिस एनवी रमना ने वाद-प्रतिवाद प्रणाली पर व्यंग्य करते हुए कहा कि जब एक न्यायाधीश अखबार पढ़ते हुए सुबह की कॉफी चुस्की ले रहे थे तो उनकी पोती उनके पास पहुंची और कहा कि दादा मेरी बड़ी बहन ने मेरा खिलौना ले लिया है। इस पर न्यायाधीश (दादा) ने तुरंत कहा कि क्या तुम्हारे पास कोई सबूत है? इसके बावजूद  लोगों को विश्वास है कि उन्हें न्यायपालिका से राहत और न्याय मिलेगा। वो जानते हैं कि जब चीजें गलत होती हैं, तो न्यायपालिका उनके साथ खड़ी होगी।

चीफ जस्टिस एनवी रमना ने  शनिवार को कहा कि लोगों को भरोसा है कि उन्हें न्यायपालिका से राहत और न्याय मिलेगा। वो यह भी जानते हैं कि जब चीजें गलत होती हैं, तो सुप्रीम कोर्ट सबसे बड़े लोकतंत्र के संरक्षक के रूप में उनके साथ खड़ा रहेगा।

चीफ जस्टिस ने भारत-सिंगापुर मध्यस्थता शिखर सम्मेलन में अपना मुख्य भाषण देते हुए कहा कि भारत कई पहचानों, धर्मों और संस्कृतियों का घर है जो विविधता के माध्यम से इसकी एकता में योगदान करते हैं। और यहीं पर न्याय और निष्पक्षता की सुनिश्चित भावना के साथ कानून का शासन चलन में आता है।

जस्टिस रमना ने कहा कि ‘लोगों को विश्वास है कि उन्हें न्यायपालिका से राहत और न्याय मिलेगा। वो जानते हैं कि जब चीजें गलत होती हैं, तो न्यायपालिका उनके साथ खड़ी होगी। भारत का सुप्रीम कोर्ट लोकतंत्र का सबसे बड़ा संरक्षक है।

चीफ जस्टिस ने कहा कि संविधान, न्याय प्रणाली में लोगों की अपार आस्था के साथ, सर्वोच्च न्यायालय के आदर्श वाक्य, ‘यतो धर्म स्थिरो जय, यानी जहां धर्म है, वहां जीत है’ को जीवन में लाया गया है।

चीफ जस्टिस रमना ने कहा कि राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक विभिन्न कारणों से किसी भी समाज में संघर्ष अपरिहार्य हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि संघर्षों के साथ-साथ संघर्ष समाधान के लिए तंत्र विकसित करने की भी आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि भारत और कई एशियाई देशों में विवादों के सहयोगी और सौहार्दपूर्ण समाधान की लंबी और समृद्ध परंपरा रही है।

उन्होंने कहा कि मध्यस्थता को भारतीय संदर्भ में सामाजिक न्याय के एक उपकरण के रूप में वर्णित किया जा सकता है। इस तरह की पार्टी के अनुकूल तंत्र अंतत: कानून के शासन को बनाए रखता है, पार्टियों को अपनी स्वायत्तता का पूर्ण रूप से उपयोग करने के लिए प्रोत्साहन प्रदान करके न्याय तक पहुंचने के लिए और न्यायसंगत परिणाम पाने के लिए।

उन्होंने कहा कि महाभारत, एक संघर्ष समाधान उपकरण के रूप में मध्यस्थता के शुरुआती प्रयास का एक उदाहरण है, जहां भगवान कृष्ण ने पांडवों और कौरवों के बीच विवाद में मध्यस्थता करने का प्रयास किया था। यह याद करने योग्य है कि महाभारत में मध्यस्थता की विफलता के विनाशकारी परिणाम हुए।

चीफ जस्टिस ने मध्यस्थता पर जोर दिया और कहा कि एक अवधारणा के रूप में, भारत में ब्रिटिश विरोधी प्रणाली के आगमन से बहुत पहले, भारतीय लोकाचार में गहराई से अंतर्निहित है। उन्होंने कहा कि 1775 में ब्रिटिश अदालत प्रणाली की स्थापना ने भारत में समुदाय आधारित स्वदेशी विवाद समाधान तंत्र के क्षरण को चिह्न्ति किया।

चीफ जस्टिस रमना ने  कहा कि भारतीय अदालतों में 4.5 करोड़ मामले लंबित होने का आंकड़ा बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया और और गलत तरीके से किए गए विश्लेषण हैं। उन्होंने यह भी कहा कि मामलों में विलंब के कारणों में से एक ‘समय काटने के लिए’ वाद दायर किया जाना भी है। उन्होंने महाभारत का उदाहरण देकर यह भी बताया कि कैसे ‘मध्यस्थता’ समय की जरूरत है और इससे आसानी से विवाद निपटाए जा सकते हैं।

चीफ जस्टिस ने कहा कि किसी भी समाज में राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक सहित विभिन्न कारणों से संघर्ष होते ही हैं और संघर्ष समाधान के लिए तंत्र विकसित करने की आवश्यकता है। चीफ जस्टिस ने संघर्ष समाधान के लिए मध्यस्थता के प्रयास का उदाहरण देते हुए महाभारत का जिक्र किया। भारतीय मूल्यों में मध्यस्थता गहराई से अंतर्निहित है और यह भारत में ब्रिटिश वाद-प्रतिवाद प्रणाली से पहले भी मौजूद थी। विवाद के समाधान के लिए विभिन्न स्वरूपों में मध्यस्थता का सहारा लिया जाता था। 

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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