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नागपुर और वाराणसी की करारी शिकस्त को हैदराबाद से ढंकने की कोशिश

प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गढ़ नागपुर में भाजपा के पराभव से पूरे संघ परिवार को सांप सूंघ गया है लेकिन हैदराबाद के स्थानीय निकाय चुनाव में भाजपा के दूसरे स्थान पर रहने का ढोल पीट कर पराजय की शर्मिंदगी को ढंकने का भोंड़ा प्रयास चल रहा है।

गौरतलब है कि नागपुर में ही आरएसएस का मुख्यालय है। साथ ही केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, महाराष्ट्र के पूर्व सीएम देवेंद्र फडनवीस और पूर्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले का गृह क्षेत्र नागपुर ही है। यहां भाजपा की हार से इन तीनों बड़े नेताओं के पैरों तले से जमीन खिसक गयी है।

उत्तर प्रदेश में विधान परिषद के शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र और स्नातक निर्वाचन क्षेत्र की 11 सीटों पर हुए चुनावों में भाजपा को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनाव क्षेत्र वाराणसी में मुंह की खानी पड़ी है। वाराणसी में शिक्षक व स्नातक दोनों सीटों पर बीजेपी के प्रत्याशी हार गए हैं। भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का गढ़ कहे जाने वाले नागपुर में बीजेपी को बड़ा झटका लगा है। भाजपा नागपुर में जिला परिषद चुनाव हार गई है। फडनवीस के क्षेत्र में भाजपा हार गयी है। लेकिन गोदी मीडिया हैदराबाद के स्थानीय निकाय चुनाव में भाजपा के 48 सीटें पाकर टीआरएस के बाद दूसरे स्थान पर रहने और ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के तीसरे स्थान पर रहने से ही भाजपा की विरदावली गाने में व्यस्त हो गयी है कि तेलंगाना में टीआरएस का विकल्प भाजपा है।

भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का गढ़ कहे जाने वाले नागपुर में भाजपा को बड़ा झटका लगा है। भाजपा नागपुर में जिला परिषद चुनाव हार गई है। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के गांव धापेवाड़ा में भी भाजपा उम्मीदवार की हार हुई है। कांग्रेस इस चुनाव में 31 सीटों पर जीत के साथ अकेली सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है। अब तक के नतीजों में 58 में से 31 सीटें कांग्रेस जीत चुकी है वहीं, बीजेपी के पास सिर्फ 14 सीटें आईं हैं। राकांपा को 10, शिवसेना को 1 और अन्य को 2 सीटों पर जीत मिली है।

उत्तर प्रदेश में विधान परिषद के शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र और स्नातक निर्वाचन क्षेत्र की 11 सीटों पर हुए चुनावों में भाजपा को प्रधानमंत्री मोदी के चुनाव क्षेत्र वाराणसी में मुँह की खानी पड़ी है। वाराणसी में शिक्षक व स्नातक दोनों सीटों पर बीजेपी के प्रत्याशी हार गए हैं। वाराणसी में शिक्षक विधान परिषद सीट पर तो भाजपा समर्थित प्रत्याशी तीसरे स्थान पर रहा है। पहली बार समाजवादी पार्टी ने शिक्षक सीटों पर अपना खाता खोला है और वाराणसी में उसके प्रत्याशी लालबिहारी यादव ने जीत हासिल की है।

कहा जा रहा है कि ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम चुनाव के नतीजों से साफ है कि भाजपा ने तेलंगाना में भी अपनी राजनीतिक ज़मीन मज़बूत करनी शुरू कर दी है। दरअसल असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम यानी मजलिस की आक्रामक सम्प्रदायिक राजनीति से भाजपा को  फायदा  हो रहा है। ओवैसी बंधुओं के भड़काऊ भाषणों और तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के कथित मुस्लिम तुष्टीकरण को राजनीतिक मुद्दा बनाकर भाजपा हिन्दू मतदाताओं का ध्रुवीकरण करने में जुटी है। वैसे भी वर्ष 2016 से तेलंगाना में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने बहुत बड़े पैमाने पर अपनी गतिविधियाँ शुरू की हैं।

नगर निगम में पार्टियों की स्थिति बदली है। भाजपा अब दूसरे नंबर पर आ गई है और एआईएमआईएम तीसरे नंबर पर। चुनाव में भाजपा ने शानदार प्रदर्शन किया है और पिछली बार मिलीं 4 सीटों के मुक़ाबले इस बार उसे 47 सीटें मिली हैं। दूसरी ओर, तेलंगाना में सत्तारूढ़ टीआरएस को ख़ासा नुक़सान हुआ है और पिछली बार मिलीं 99 सीटों के मुक़ाबले वह 58 पर आकर टिक गई है। ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम यानी मजलिस पिछली बार की 44 सीटों के मुक़ाबले 43 सीटें लाई है। 150 सदस्यों वाले नगर निगम में मेयर बनाने के लिए 76 सीटें जीतना ज़रूरी है। ऐसे में टीआरएस को 18 जीते हुए उम्मीदवारों का साथ चाहिए।

इस बार नगर निगम के चुनाव में भाजपा ने अपनी सारी ताकत झोंक दी थी। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, गृह मंत्री अमित शाह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हैदराबाद की गलियों में प्रचार किया। चुनावों के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी हैदराबाद आये, लेकिन प्रचार में हिस्सा नहीं लिया। नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने अपने सबसे भरोसेमंद नेता भूपेंद्र यादव को प्रचार की कमान थमायी थी। भाजपा के नेताओं ने हैदराबाद का नाम बदलने, सर्जिकल स्ट्राइक, मुस्लिम तुष्टीकरण, ओवैसी बंधुओं के भड़काऊ भाषणों जैसे मुद्दों को केंद्र में रखकर प्रचार किया।

ग्रेटर हैदराबाद तेलंगाना का शहरी क्षेत्र है, जहाँ भाजपा की परम्परागत पकड़ मानी जाती है और इसमें प्रवासी यानि हिंदी बेल्ट के नौकरी पेशा लोगों का भी बहुत योगदान है। यह सफलता विधानसभा और लोकसभा में भाजपा दोहरा पायेगी इस पर गम्भीर संदेह है।

गौरतलब है कि तेलंगाना राज्य के अस्तित्व में आने के बाद हुए दो विधानसभा चुनावों में टीआरएस की जीत हुई। दोनों चुनावों में टीआरएस को ओवैसी की मजलिस पार्टी का कहीं प्रत्यक्ष तो कहीं अप्रत्यक्ष समर्थन मिला। भाजपा को ओवैसी और टीआरएस पर इस वजह से भी हमला करने का मौका मिला क्योंकि मजलिस ने नगर निगम की कुल 150 सीटों में से सिर्फ़ 51 सीटों पर उम्मीदवार उतारे। खुद अमित शाह ने आरोप लगाया कि मजलिस और टीआरएस में गुप्त समझौता है। भाजपा ने पिछले दिनों मुख्यमंत्री केसीआर के गृह ज़िले में हुए उपचुनाव में जीत हासिल की थी। इसी के बाद से बीजेपी ने तेलंगाना में आक्रामक तेवर अपना लिये और जमकर ध्रुवीकरण की राजनीति शुरू की।

चुनाव में कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों का बुरा हाल रहा। एक समय नगर निगम में कांग्रेस की सत्ता थी, लेकिन तेलंगाना बनने के बाद कांग्रेस लगातार कमज़ोर होती चली गयी। नतीजे साफ बयान करते हैं कि कांग्रेस को अपना जनाधार वापस हासिल करने के लिए खूब मेहनत करनी होगी।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह का लेख।)

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This post was last modified on December 5, 2020 9:10 am

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