RBI के तत्कालीन गवर्नर उर्जित पटेल ने इलेक्टोरल बांड्स पर दर्ज की थी गंभीर आपत्तियां

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नई दिल्ली। अभी तक देश में कुल 30 चरणों में इलेक्टोरल बांड्स की बिक्री की गई है। इसके लिए स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया के कुल 29 शाखाओं को अधिकृत किया गया था, जिसमें से सिर्फ 19 शखाओं से बांड्स की बिक्री हुई है, और 14 एसबीआई शाखाओं से ही इन बांड्स को भुनाया गया है। 

इलेक्टोरल बांड्स को लेकर शुरू से ही विपक्ष सरकार के विरोध में रहा है, और आम भारतीयों को भी अपारदर्शी लेनदेन की पूरी प्रकिया पर संदेह रहा है। लेकिन इस मामले पर जबसे सरकार की ओर से सर्वोच्च न्यायालय में यह दलील दी गई कि इलेक्टोरल बांड्स में दानदाताओं की जानकारी देश के मतदाता को नहीं दी जा सकती, और इसे सूचना के अधिकार के तहत (आरटीआई) के दायरे में नहीं रखा जा सकता, उसके बाद से सारा माजारा ही गहरे अविश्वास में तब्दील हो चुका है। 

लेकिन शायद ही देश में कुछ लोग इस बात से वाकिफ रहे हों कि मोदी सरकार के द्वारा इलेक्टोरल बांड्स को प्रस्तावित करने को लेकर कई संवैधानिक संस्थाओं ने तब भी घोर आपत्तियां दर्ज की थीं। उनमें से एक थी आरबीआई और दूसरी थी चुनाव आयोग। जी हां, इन संस्थाओं ने तब के वित्त मंत्री के समक्ष अपनी आपत्तियां दर्ज करते हुए, इसके दुष्प्रभावों और अपनी संस्थाओं की छवि धूल-धूसरित होने की आशंका तक व्यक्त की थी। आइये एक नजर उन तथ्यों की ओर डालते हैं:-

नोटबंदी के बाद देश के जागरूक नागरिक समाज में एक आम समझ बन गई थी कि देश को गहरे आर्थिक संकट में धकेलने के लिए अकेले मोदी सरकार ही जिम्मेदार नहीं है, बल्कि इस काम में रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया भी बराबर की जिम्मेदार है। इसकी वजह यह भी थी कि नोटबंदी को लागू करने से पहले सरकार ने तेजतर्रार और निडर माने जाने वाले पूर्व गवर्नर रघुराम राजन के कार्यकाल को बढ़ाने में कोई रूचि नहीं दिखाई थी। उनके स्थान पर उर्जित पटेल को यह जिम्मेदारी सौंपी गई, जिनके बारे में हर जगह यही चर्चा थी कि वे रिलायंस इंडस्ट्री में अपनी सेवाएं देकर अब आरबीआई की कमान संभालने वाले हैं। 

इस बात का खुलासा तो काफी बाद में जाकर हो पाया कि देश में 500 और 1000 रुपये के नोट को तत्काल प्रभाव से अमान्य घोषित करते वक्त आरबीआई ही नहीं बल्कि केंद्रीय मंत्रिमंडल तक को विश्वास में नहीं लिया गया था। उस समय आम लोगों में यही गया कि मौजूदा आरबीआई गवर्नर सरकार के सामने दृढ़ता से खड़े होने का साहस नहीं रखते, और रखे भी क्यों, उन्हें तो कॉर्पोरेट से ही चयनित इसी काम के लिए किया गया है।

हालांकि उर्जित पटेल ने जब बीच में ही आरबीआई गवर्नर पद से इस्तीफे का फैसला सुनाया तो देश हैरत में था। लेकिन उन्होंने कोई शोर-शराबा नहीं मचाया, इसलिए सरकार और आरबीआई के बीच की तनातनी के बारे में विशेष जानकारियां निकलकर नहीं आ सकीं। लेकिन हाल ही में वित्त मंत्रालय से अवकाशप्राप्त एक पूर्व वित्त सचिव ने अपनी किताब में ऐसी कई घटनाओं का जिक्र किया है, जिससे पता चलता है कि पीएम मोदी बाद में उर्जित पटेल की भूमिका से बेहद असंतुष्ट थे, और एक बार तो बैठक में उन्होंने आरबीआई गवर्नर की तुलना सांप से कर दी थी। ये बेहद सनसनीखेज सूचना थी, और उस दौरान आरबीआई ने भारत सरकार के खजाने में मोटा धन जमा कराकर सरकार के सामने आये संकट को कम करने में बड़ी भूमिका निभाई थी। पीएम मोदी ने उस मीटिंग में लाभांश के बड़े हिस्से को देने से ना-नुकुर करने पर ही उनकी तुलना सांप से की थी, जिसने खजाने पर कुंडली मार ली है।  

लेकिन यहां हम बात कर रहे हैं, इलेक्टोरल बांड्स को लेकर आरबीआई के पक्ष की, जिसने वित्त मंत्रालय को अपने जवाबी पत्र में साफ़-साफ़ इंगित किया था कि इलेक्टोरल बांड्स स्कीम न सिर्फ अपारदर्शिता को बढ़ावा देगा, बल्कि इससे आरबीआई और सरकार की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा हो सकता है, जो सही नहीं होगा।  

इसलिए जब केंद्र सरकार इलेक्टोरल बांड्स स्कीम लेकर आई तो 27 सितंबर 2017 को भारतीय रिजर्व बैंक के तत्कालीन गवर्नर, उर्जित पटेल ने तबके वित्त मंत्री स्वर्गीय अरुण जेटली के नाम 3 पेज का पत्र लिख, इलेक्टोरल बांड्स को लेकर अपनी चिंताएं जाहिर करते हुए सरकार से इस बारे में पुनर्विचार करने की अपील की थी। 

निश्चित रूप से सरकार और आरबीआई के बीच में इस खींचतान के बारे में देश की नौकरशाही अवगत रही होगी, और मीडिया के हलके में भी चोटी पर स्थापित पत्रकार इससे बाखबर होंगे, लेकिन इनमें से किसी को भी देश की चिंता नहीं थी। यह कितनी अजीब बात है कि इस मामले का खुलासा करने वाले सज्जन भारतीय नौसेना के रिटायर्ड कमोडोर लोकेश बत्रा हैं, जिनकी उम्र अब 77 वर्ष हो चुकी है और पिछले 7 वर्षों से अमेरिका में रह रहे हैं। इस बीच उन्होंने सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत अब तक 100 से अधिक अर्जियां दाखिल कर भारत सरकार से कई महत्वपूर्ण दस्तावेज और सूचनाएं हासिल की हैं, जो लोकतंत्र और संविधान को मजबूत करने के लिए बेहद कारगर साबित हो सकती हैं।

इलेक्टोरल बांड्स पर अपनी पैनी नजर रखते हुए कोमोडोर बत्रा ने इस विषय पर कई स्रोतों से सामग्री जुटाई है, लेकिन आरबीआई गवर्नर के पत्र को सार्वजनिक कर उन्होंने कई महत्वपूर्ण विषयों पर से पर्दा उठा दिया है। आज भारत का चुनाव आयोग इस मामले में पूरी तरह से चुप्पी साधे हुए बैठा है, लेकिन 2017 में यही चुनाव आयोग केंद्र सरकार से लगातार इसको लेकर प्रश्न कर रहा था। इस विषय में भी सूचना आज सार्वजनिक संज्ञान में आ चुकी है, और यदि माननीय सर्वोच्च अदालत सख्ती बरतता है तो बहुत संभव है कि कई अन्य रहस्यों से पर्दा उठ सकता हिया।  

वित्त मंत्री अरुण जेटली के नाम लिखे इस पत्र में उर्जित पटेल आरबीआई के 14 सितंबर 2017 को वित्त मंत्रालय को लिखे पत्र का हवाला देते हैं, जिसके जवाब में मंत्रालय 21 सितंबर को आरबीआई को सूचित करता है कि सरकार इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों के बजाय इलेक्टोरल बांड्स को प्राथमिकता देना चाहेगा। पत्र के मुताबिक केंद्र सरकार को चुनावी बांड्स के अलावा अन्य उपाय में दानदाता की जानकारी लीक होने का संदेह था। 

पत्र में पटेल आरबीआई की कमेटी की बैठक में इलेक्टोरल बांड्स के संबंध में लिए गये प्रस्तावों की चर्चा करते हुए कई आपत्तियों का उल्लेख करते हैं। उनके अनुसार सरकार के इस कदम से आरबीआई की एकमात्र करेंसी जारी करने के अधिकार का उल्लंघन होता है, क्योंकि आरबीआई एक्ट की धारा 31 के मुताबिक देश में सिर्फ आरबीआई को ही धारक उपकरण जारी करने का अधिकार है। इलेक्टोरल बांड्स भी एक प्रकार से करेंसी के तौर पर शक्ति ग्रहण कर लेता है, जिसे आरबीआई की अनुशंसा के खिलाफ धारा 31 में संशोधन कर सरकार ने मुमकिन कर दिया है।

इसके अलावा आरबीआई कमेटी ने इलेक्टोरल बांड्स में मनी लांड्रिंग की भी आशंका व्यक्त की थी। इसके दुष्परिणामों के बारे में इशारा करते हुए उर्जित पटेल पत्र में साफ़ लिखते हैं कि इससे आरबीआई की प्रतिष्ठा पर भी गहरा झटका लगने की संभावना है। इसी पत्र में आगे स्वीकार किया गया है कि नोटबंदी के कारण शुरू में आरबीआई की प्रतिष्ठा को धक्का पहुंचा था, लेकिन आरबीआई और देश ने यह मानकर इस फैसले को सहर्ष स्वीकार किया था कि इससे देश में काले धन पर अंकुश लगेगा। लेकिन इलेक्टोरल बांड्स के माध्यम से मनी लांड्रिंग को बढ़ावा मिल सकता है, जो सरकार और आरबीआई को सार्वजनिक आलोचना को आमंत्रण दे सकता है, और इस एक कदम से दोनों की प्रतिष्ठा धूमिल हो सकती है।

यहां तक कि पत्र में आरबीआई की केंद्रीय बोर्ड कमेटी सुझाव के तौर पर सरकार को डीमेट इलेक्टोरल बांड्स का प्रस्ताव पेश करती है, जिसमें सरकार की सभी चिंताओं को ध्यान में रखकर तैयार किये जाने की बात कही गई है। इसके दोहरे फायदे को गिनाते हुए कमेटी ने वित्त मंत्री के नाम लिखे इस पत्र में स्पष्ट किया है कि इसमें दानदाता की गोपनीयता भी कायम रहने वाली है, और दूसरा मनी ट्रांसफर भी एक बैंक से दूसरे बैंक में में होने से नकदी, कैश ट्रांजेक्शन या कहें काले धन की गुंजाइश नहीं रह जाती। 

लेकिन सरकार ने तब आरबीआई की टिप्पणियों और सुझाव को यह कहकर दरकिनार कर दिया था कि आरबीआई को मजमून समझने में कोई दिक्कत रह गई। लिहाजा, मोदी सरकार इलेक्टोरल बांड्स के अपने एजेंडे को लागू कर जिस मुकाम तक पहुंचना चाहती थी, वहां पहुँच गई, जिसका खामियाजा आज देश को भुगतना पड़ रहा है। इसका शिकार विपक्षी दल, विपक्षी पार्टियों को इलेक्टोरल बांड्स के जरिये चंदा देने वाले कॉर्पोरेट्स भी संभव है अवश्य  हुए होंगे। लेकिन सबसे बड़ा नुकसान तो आज देश के सबसे बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक, भारतीय स्टेट बैंक की साख पर लगा है, जिसे चंद हजार इलेक्टोरल बांड्स का हिसाब-किताब देने के लिए 5 महीने से भी अधिक समय चाहिए।  

बेंगलुरु मुख्य शाखा, भोपाल मुख्य शाखा, भुवनेश्वर मुख्य शाखा, चंडीगढ़ मुख्य शाखा, चेन्नई मुख्य शाखा, गांधीनगर मुख्य शाखा, गुवाहाटी मुख्य शाखा, हैदराबाद मुख्य शाखा, जयपुर, कोलकाता, लखनऊ, मुंबई, नई दिल्ली, पणजी, पटना, रायपुर, रायपुर, तिरुवनंतपुरम और स्टेट बैंक विशाखापत्तनम मुख्य ब्रांच।

स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया की कुल 14 शाखाओं में इन इलेक्टोरल बांड्स को भुनाया गया। ये शाखाएं हैं:

  1. एसबीआई बादामी बाग़, श्रीनगर, 
  2. बेंगलुरु, मुख्य शाखा
  3. भुवनेश्वर मुख्य शाखा 
  4. चंडीगढ़ मुख्य शाखा 
  5. चेन्नई मुख्य शाखा
  6. गंगटोक मुख्य शाखा 
  7. हैदराबाद मुख्य शाखा 
  8. कोलकाता मुख्य शाखा 
  9. लखनऊ मुख्य शाखा 
  10. मुंबई मुख्य शाखा 
  11. नई दिल्ली मुख्य शाखा 
  12. पणजी मुख्य शाखा 
  13. पटना मुख्य शाखा और 
  14. रांची मुख्य शाखा 

इलेक्टोरल बांड्स मामले में सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया को 21 दिनों का समय दिया गया था, जिसकी अवधि 6 मार्च को खत्म हो रही थी। लेकिन 4 मार्च 2024 को ही एसबीआई ने अदालत के सामने अपनी अक्षमता जताते हुए इस सूची को 30 जून तक का समय मांग लिया। 

देश में आम लोग इसे सर्वोच्च न्यायालय की खुली अवमानना के तौर पर देख रहे हैं। कल सर्वोच्च न्यायालय में इस बारे में शाम 5 बजे तक कोई हलचल नहीं हुई। देश में यह धारणा बन रही है कि एसबीआई के लिए यह काम चंद मिनटों का है, जिसे वह 6 मार्च से पहले ही सर्वोच्च अदालत में जमा करा सकती थी। लेकिन एसबीआई पर केंद्र सरकार का प्रत्यक्ष दबाव काम कर रहा है, जो उसे सुप्रीम कोर्ट और परोक्ष तौर पर देश के संविधान की बेअदबी करने के लिए प्रेरित कर रहा है।

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा देश के करदाताओं पर आश्रित होने के बावजूद ऐसी धृष्टता की मिसाल आज तक देखने को नहीं मिली होगी। सोशल मीडिया में युवा एसबीआई अकाउंट को टैग कर चुनावी बांड्स की गणना में हो रही उसकी मुश्किलों को हल करने के लिए मुफ्त में अपनी सेवाएं देने तक की पेशकश कर रहे हैं। कई यूजर्स अवमानना के लिए एसबीआई अधिकारियों को दंडित किये जाने की मांग करने लगे हैं। उनका कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय इस मामले में अवमानना का संज्ञान लेते हुए तत्काल बैंक के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स की गिरफ्तारी का आदेश जारी करे तो पलक झपकते ही सारे आंकड़े हासिल किये जा सकते हैं। कई लोग बैंक की वेबसाइट से निदेशकों की तस्वीरों सहित सूची तक जारी कर रहे हैं।  

बैंक की वेबसाइट पर बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स की सूची में सबसे पहले नाम है दिनेश कुमार खरा का, जो वर्तमान में स्टेट बैंक के चेयरमैन हैं। इसके अलावा 4 प्रबंध निदेशकों में सीएस सेट्टी, अश्विनी कुमार तिवारी, अलोक कुमार चौधरी और विनय एम तोंसे हैं। बोर्ड में डायरेक्टर पद पर केतन एस विकामसे, मृगांक एम परांजपे, राजेश कुमार दुबे, धर्मेंद्र सिंह शेखावत, प्रफुल्ल पी छाजेड, स्वाति गुप्ता, विवेक जोशी और अजय कुमार हैं।

(रविंद्र पटवाल जनचौक संपादकीय टीम के सदस्य हैं।)

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