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निर्मला की थाली में गरीब के हिस्से पर डाका, टैक्स स्लैब और एलआईसी संबंधी घोषणा ने मध्यवर्ग को किया निराश

नई दिल्ली। मौजूदा वित्त वर्ष के लिए सरकार का बजट आ गया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन के 2 घंटे 42 मिनट के भाषण में जनता के लिए क्या था उसे समझना किसी के लिए बेहद मुश्किल है। एलआईसी के निजीकरण की घोषणा कर दी गयी है। जब किसान और उसकी खेती इतिहास के अपने सबसे संकट के दौर से गुजर रहे हैं तब उसे हल करने और उसको अतिरिक्त सहयोग और मदद देने की जगह सरकार ने उसके हिस्से के पैसे में कटौती कर दी है। देश में जब बेरोजगारी सबसे बड़ा मुद्दा बनी हुई है तब वित्तमंत्री मनरेगा के बजट को कम करके पीएम मोदी के उसे स्मारक में बदलने का रास्ता साफ कर दिया है।

टैक्स स्लैब में कहने को तो छूट दे दी गयी है लेकिन उसके साथ जो शर्तें जोड़ दी गयी हैं शायद ही कोई उस नये विकल्प को चुनना पसंद करेगा।

कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों जिसमें सिंचाई और ग्रामीण क्षेत्र शामिल हैं,  की बजट राशि 2019-20 में 2.84 लाख करोड़ रुपये थी। उसे 2020-21 में 2.83 लाख करोड़ कर दिया गया है। अगर बढ़े इंफ्लेशन के साथ इसकी तुलना की जाएगी तो यह राशि और कम हो जाएगी।

मनरेगा के बजट में 9500 करोड़ रुपये की कमी कर दी गयी है। 2019-2020 में यह राशि 71 हजार करोड़ रुपये थी 2020-2021 में यह घटाकर 61500 करोड़ रुपये कर दी गयी है। इंफ्लेशन और तमाम दूसरी चीजों के लागू होने के बाद यह कटौती और बढ़ जाती है।

इसके अलावा फूड सब्सिडी में बड़े पैमाने पर कटौती की गयी है। 2019-2020 में फूड सब्सिडी के मद में 1.84 लाख करोड़ रुपये आवंटित किया गया था। मौजूदा वित्तीय वर्ष के लिए यह राशि घटाकर 1.08 लाख करोड़ कर दी गयी। यानी 76 हजार करोड़ रुपये की कटौती। सब्सिडी का बड़ा हिस्सा गरीबों को जाता है। इस नजरिये से कहा जा सकता है कि सरकार ने गरीबों के पेट पर सीधा लात मारा है। गांव में रहने वाले गरीब पहले ही तमाम समस्याओं से जूझ रहे हैं इस कटौती का सबसे ज्यादा असर उनके बच्चों के पोषण और महिलाओं पर पड़ेगा।

खाद के मद में आवंटित राशि में 11 फीसदी की कटौती की गयी है। इतना ही नहीं बाबा साहेब आंबेडकर का राग अलापने वाली मोदी सरकार ने अनुसूचित जातियों के मद में होने वाले खर्चे में बड़े पैमाने पर कटौती की है। उसे पिछले साल के मुकाबले 81340 करोड़ रुपये से घटाकर 72936 रुपये करोड़ कर दिया गया है। इस तरह से कुल 8400 करोड़ की कटौती की गयी है।

बजट में पांच और स्मार्ट सिटी बनाने की घोषणा की गयी है। इसके पहले 2015 में सरकार ने 100 स्मार्ट सिटी के निर्माण की घोषणा की थी। लेकिन उनका क्या हुआ बजट में इसकी कोई चर्चा नहीं है।

स्किल इंडिया के मद में सरकार ने 3000 करोड़ रुपये का आवंटन किया है। जबकि 2017-18 में यह राशि 17000 करोड़ रुपये थी। इसके तहत सात सालों में 40 करोड़ भारतीयों को प्रशिक्षित किया जाना था। बताया गया कि 3.5 साल में 2.5 करोड़ लोगों को प्रशिक्षित किया गया। लेकिन अब कोई पूछ सकता है कि 17000 करोड़ में अगर केवल ढाई करोड़ लोग प्रशिक्षित हो पाए तो फिर तीन हजार करोड़ रुपये में क्या होगा और इन सबसे ऊपर उस 40 करोड़ के लक्ष्य का क्या होगा?

बैंकों के प्रति विश्वास में लगातार आ रही कमी को दूर करने के लिए बैंक डिपॉजिट पर इंश्योरेंस वाली राशि 1 लाख से बढ़ाकर 5 लाख कर दी गयी है। यानी पहले बैंकों में जमा आपके 1 लाख रुपये सुरक्षित रहा करते थे अब 5 लाख तक की राशि के सुरक्षित होने की गारंटी कर दी गयी है।

राष्ट्रीय गैस ग्रिड को 16200 किमी से बढ़ाकर 27000 किमी करने का प्रस्ताव है। हालांकि 2015 में यह 15000 किमी थी। 2020 में पुराने वादे को एक बार फिर दोहरा दिया गया है लेकिन इसका लक्ष्य 30 हजार किमी से घटाकर 27 हजार किमी कर दिया गया है। मेक इन इंडिया का दो घंटे 42 मिनट के भाषण में एक बार जिक्र भी करना सीतारमन ने जरूरी नहीं समझा।

इनकम टैक्स के लिए अब दो सिस्टम होंगे। बचत करने पर पुराने टैक्स स्लैब लागू होंगे। बचत न करने पर नये टैक्स स्लैब को प्रस्तावित किया गया है। हालांकि सरकार इसे टैक्स सिस्टम को सरल करने की कोशिश का हिस्सा बता रही है।

जिस सेना और उसके सैनिकों पर मौजूदा सरकार और उसके समर्थक दिन रात छाती पीटते हैं उनके बजट में कटौती कर दी गयी है। रक्षा बजट 10.6 फीसदी से घटकर 10.1 फीसदी कर दिया गया है। आपको बता दें कि पिछले बजट में यह 10.6 था फिर संशोधित करके उसे 10.7 कर दिया गया था। इस बजट में यह 10.1 कर दिया गया है।

कामर्स और इंडस्ट्री के बजट की राशि भी कम कर दी गयी है।

ऊर्जा क्षेत्र के बजट में भी कटौती की गयी है। इसमें 1913 करोड़ रुपये की कटौती की गयी है। मौजूदा वित्तीय वर्ष के लिए इस क्षेत्र में 42725 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। जबकि पिछले वित्तवर्ष में यह राशि 44638 करोड़ रुपये था।

विदेश मंत्रालय के बजट में भी 538 करोड़ रुपये की कटौती की गयी है। मौजूदा वित्त वर्ष के लिए यह राशि 17347 करोड़ है। पिछले बजट में यह 17885 करोड़ रुपये थी।

स्वास्थ्य के बजट में 2485 करोड़ रुपये की बढ़ोत्तरी की गयी है। जो महज 3.8 फीसदी है। यानी महंगाई दर से भी कम। इस बजट में यह राशि 67484 करोड़ रुपये है। जबकि पिछले बजट में यह 64999 करोड़ रुपये थी।

सबसे ज्यादा फायदा टेलीकॉम विभाग को हुआ है। इसके बजट में 272 फीसदी की बढ़ोत्तरी की गयी है। पिछले बजट में उसे 21783 करोड़ रुपये दिए गए थे। जबकि इस बार उसे 59349 करोड़ देकर मालामाल कर दिया गया है। लेकिन इसके साथ ही एक बात और जानना जरूरी है कि मंत्रालय अपनी राशि का तकरीबन एक चौथाई हिस्सा खर्च ही नहीं कर पाया था। वह 16000 करोड़ रुपये ही खर्च कर सका था।

शिक्षा के बजट में कहने के लिए 4.7 फीसदी की बढ़ोत्तरी की गयी है। लेकिन महंगाई दर के हिसाब से घटाने पर यह बढ़ोत्तरी नगण्य हो जाती है। मौजूदा वित्तवर्ष के लिए 99312 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। जबकि पिछले साल 94854 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे।

वित्तमंत्री ने अपने भोजन की थाली बढ़ा ली है। वित्तमंत्रालय के बजट में दोगुने की बढ़ोत्तरी की गयी है। पिछले साल यह 21708 करोड़ रुपये था उसे बढ़ाकर 41829 करोड़ रुपये कर दिया गया है।

शहरी विकास के मद में केवल 2008 करोड़ रुपये की वृद्धि की गयी है। जबकि सच्चाई यह है कि नई संसद के निर्माण और इंडिया गेट के आस-पास के सौंदर्यीकरण में ही बड़ी राशि खर्च हो जाएगी। लिहाजा कहा जा सकता है कि देश के बाकी शहरी क्षेत्रों को बड़ा नुकसान होने जा रहा है। पिछली बार यह राशि 48032 करोड़ रुपये थी। इस साल इसे बढ़ाकर 50040 करोड़ रुपये कर दिया गया है।

(कुछ इनपुट सीपीएम और कुछ गुरदीप सिंह सप्पल के ट्विटर हैंडल से लिए गए हैं।)

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This post was last modified on February 1, 2020 6:39 pm

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