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वे दंगे-दंगे खेलें और हम मरते जाएं

गृहमंत्री अमित शाह जब आज राज्यसभा में दिल्ली के दंगों पर चर्चा का जवाब दे रहे थे तो उन्होंने कहा कि देश मे जितने दंगे आज तक होते रहे हैं, उनमें अधिकतर कांग्रेस के कार्यकाल में हुए। उन्होंने बाकायदा आंकड़े दिए कि किस साल कहां- कहां दंगे हुए और उस समय भाजपा सत्ता में नहीं थी। उन्होंने बताया कि आज तक देश मे दंगे में जितने लोग मारे गए हैं उनमें 76 प्रतिशत लोग कांग्रेस के कार्यकाल में मारे गए हैं लेकिन उन्होंने भाजपा के कार्यकाल में हुए दंगों की कोई लिस्ट नहीं पेश की। उन्हें स्वीकार करना चाहिए था कि गुजरात के दंगे उनकी विफलता थी या उनकी मिली भगत। लेकिन अमित शाह में इतना साहस नहीं है कि वह सच स्वीकार कर सकें। जब अमित शाह कांग्रेस के कार्यकाल में हुए दंगों का आंकड़ा पेश कर रहे थे तो कांग्रेस के लोग चुपचाप सुन रहे थे। वे उसका जवाब देने की स्थिति में नहीं थे।

एक तरह से अपनी विफलता स्वीकार कर रहे थे लेकिन दिल्ली दंगे में सरकार की विफलता अमित शाह कबूल नहीं कर रहे थे। कांग्रेस को दंगों के लिए जिम्मेदार बताने वाले अमित शाह के इस बयान में  सच्चाई जरूर थी लेकिन वे इसकी आड़ में अपने गुनाह छिपाने का प्रयास कर रहे थे। जब भाजपा 84 के दंगे के लिए आज तक कांग्रेस को घेरती रही है तो कांग्रेस क्यों न आज भाजपा को दिल्ली दंगे के लिए  घेरे। कांग्रेस के सवाल करने से भाजपा के गुनाह नहीं छिप सकते और न भाजपा द्वारा कांग्रेस को घेरने से उसके गुनाहों पर पर्दा डाला जा सकता है। लेकिन अमित शाह संसद में अर्ध सत्य बोल रहे थे। उसे समझने की जरूरत है।

वे अपने तर्कों की आड़ में खुद का बचाव कर रहे थे। जब संसद के बजट सत्र का दूसरा चरण शुरू हुआ तो सभापति ने राज्यसभा में कहा कि अभी बोर्ड की परीक्षाएं चल रही हैं इसलिए दंगे पर चर्चा नहीं सम्भव है क्योंकि संसद में चर्चा से छात्र तनाव में आ  जाएंगे। इसलिये चर्चा होली के बाद होगी लेकिन दंगे में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि तक नहीं दी गई। क्या मृतकों को श्रद्धांजलि देने से भी तनाव पैदा हो जाता है? यह बात किसी के गले नहीं उतरेगी। अब सरकार ने तर्क बदल दिया और अमित शाह कह रहे हैं कि होली से पहले चर्चा करने पर साम्प्रदायिक तनाव पैदा हो जाता। इसलिये चर्चा होली के बाद कराई गई ताकि साम्प्रदायिक सौहर्द्र न बिगड़े। क्या अमित शाह के इस तर्क में दम है? क्या हर बार संसद में दंगों पर चर्चा से साम्प्रदायिक सौहार्द्र बिगड़ा है?क्या इसका कोई आंकड़ा उनके पास है? खैर।

गृहमंत्री ने इस दंगे के पीछे सोची समझी साज़िश बताया और यह भी कहा कि 24 फरवरी से पहले हवाला से भारत में धन आया था। और उसे दिल्ली में बांटा भी गया। यह जानकारी उन्हें आईबी से मिल गयी थी और इसकी जांच चल रही थी तब अमित भाई ने दंगे रोकने के लिए क्या एहतियातन  कर्रवाई की, इसकी जानकारी उन्होंने नहीं दी। उनके पास इसका जवाब नहीं है शायद यही कारण है कि जब उनका जवाब खत्म हुआ तो आनंद शर्मा और डेरेक ओ ब्रायन ने  उनसे सवाल पूछा तो पूछने नहीं दिया गया। अमित शाह ने दंगे के लिए हेट स्पीच को जिम्मेदार ठहराया और रामलीला मैदान में कांग्रेस के नेताओं के भाषणों का जिक्र किया लेकिन कपिल मिश्रा की हेट स्पीच या ट्वीटर का जिक्र तक नहीं किया। इससे पता चलता है कि गृहमंत्री निष्पक्ष नहीं हैं। उन्होंने बताया कि 700 से अधिक एफआईआर दर्ज किए गए लेकिन कपिल मिश्रा के खिलाफ आज तक एक भी एफआईआर क्यों नही दर्ज किया गया, इसका जवाब नहीं दिया गया।

थोड़ी देर के लिए हम मान लेते हैं कि कांग्रेस के नेताओं ने हेट स्पीच दिया तब सवाल उठता है कि गृहमंत्री के रूप में अमित शाह ने आज तक क्या कर्रवाई की। क्यों उन्होंने उन्हें अभी तक नही पकड़ा।लेकिन अमित के पास इसका जवाब नहीं है। अमित शाह अपने भाषणों में दोनों सदनों में विपक्ष को ही लपेटने में लगे रहे और बोलते रहे कि यह सुनियोजित दंगे थे। अमित शाह के पास आईबी है उसकी रिपोर्ट आती है। क्या आईबी ने उन्हें पहले से इत्तला नहीं किया कि दंगों की साज़िश रची जा रही है? अगर नहीं किया तो क्या यह उनकी विफलता नहीं है? अमित शाह ने दिल्ली पुलिस का बचाव किया और कहा कि आप पुलिस को कटघरे में न खड़ा करें बल्कि मुझे कटघरे में खड़ा रखें और यह, मुझे मंजूर है।

अमित शाह ने एक बार यह नहीं कहा कि अगर पुलिस ने इस दंगे में कोताही बरती है तो उसके खिलाफ भी कार्यवाही की जाएगी। अमित शाह के भाषण का एक ही एजेंडा था कि शाहीन बाग के धरने से विषाक्त माहौल हुआ और इस आंदोलन की परिणति दंगे में हुई। लेकिन अमित शाह यह भूल जाते हैं कि शाहीन बाग में आज तक कोई हिंसा नहीं हुई बल्कि हिंसा उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुई जहां मुसलमान से अधिक आबादी हिंदुओं की है। अमित शाह ने उन आरोपों का जवाब नहीं दिया कि पुलिस ने मुसलमानों के खिलाफ क्यों मनमाने एफआईआर दर्ज करवाये। उन्होंने यह भी नहीं कहा कि वह इसकी जांच कराएंगे। जाहिर है भाजपा यह तैयारी करके आई थी कि दंगे के लिए विपक्ष को घेरा जाए ताकि विपक्ष सरकार को न घेर पाए।

अमित शाह ने भाषण में खुद को बेदाग बताते हुए बड़ी विनम्रता और संवेदनशीलता का परिचय दिया कि वे इस दंगे से व्यथित हैं लेकिन दंगा ग्रस्त इलाके का वह एक बार भी दौरा नहीं कर पाए। मोदी सरकार गांधी जी की 150 वीं जयन्ती मना रही है लेकिन गृह मंत्री या प्रधानमंत्री मोदी  गांधी की तरह नोआ खाली जैसे उत्तर-पूर्वी दिल्ली के दंगा ग्रस्त क्षेत्र में नहीं गए। अमित शाह ने बहुत ही लचर तर्क दिया कि वे दंगे के इलाके में इसलिए नही गए क्योंकि उनके साथ बड़ी संख्या में पुलिस जाती और उस इलाके की  सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित होती। भाजपा और अमित शाह पर दंगे के दाग पहले ही लग चुके हैं लेकिन उनमें आत्मावलोकन की नितांत कमी है। इसलिए उनके सारे तर्क थोथे लगे।

उनके पूरे भाषण में किसी तरह का आत्मनिरीक्षण का कोई भाव नजर नहीं आया। वे केवल  दोषारोपण करते हैं। दरअसल भारतीय राजनीति की कथा दो हत्यारों की कथा हो गई जो एक दूसरे पर हत्या के आरोप लगाता रहता है और खुद को बेगुनाह बताता रहता है। यह लोकतंत्र इतना असंवेदनशील और हास्यास्पद हो गया है कि हत्या करने के बाद और उस पर थोड़ी चर्चा करा कर इसकी इतिश्री कर लेता है।

सरकार कहती है कि चर्चा करने से लोकतंत्र में थोड़ी और मजबूती नजर आएगी। जब 84 के दंगे के सभी आरोपियों को आज तक पूरी सज़ा नहीं दी गयी तो 2020 के दंगे के आरोपियों को  2040 से पहले न्याय कम ही मिल पायेगा।।दरअसल राज्य मशीनरी द्वारा प्रायोजित दंगे में सबूत भी मिटा दिए जाते हैं। दिल्ली का दंगा प्रायोजित था। अमित शाह ने खुद बताया कि 300 से अधिक दंगाई उत्तर प्रदेश से आये थे। किसको नहीं पता है कि  उत्तर प्रदेश में किसकी सरकार है। अमित शाह ने जाने अनजाने सच बोल दिया लेकिन जनता दंगे में कब तक मरती रहे और वे कब तक दंगे-दंगे खेलते रहें।

अमित शाह दंगे में मारे गए लोगों के परिजनों से मिलने तक नहीं गए। क्या गृह मंत्री को इतना असंवेदनशील होना चाहिए। वह बार-बार अपने भाषण में अपनी नैतिक जिम्मेदारी से बचते रहे उल्टे विपक्ष को कसूरवार ठहराते रहे।

(विमल कुमार वरिष्ठ पत्रकार और कवि हैं। आप आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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This post was last modified on March 13, 2020 9:21 am

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