Thursday, October 28, 2021

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तुगलकी फरमान और मजदूरों का दिल्ली से दौलताबाद का मुश्किल सफ़र

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नई दिल्ली। दिल्ली एनसीआर में प्रवासी मजदूरों का हब है जहाँ लाखों मजदूर रहते हैं। इसमें दिल्ली की सीमा से लगे हरियाणा का गुड़गाँव, रेवाड़ी, मानेसर, दिल्ली का चांदनी चौक, द्वारका, महिपालपुर, उत्तमनगर और दिल्ली की सीमा से लगे उत्तर प्रदेश के नोएडा, साहिबाबाद और गाजियाबाद में लाखों मजदूर रहते हैं। इनमें से अधिकांशतः यूपी के पूर्वांचल, बिहार उड़ीसा पश्चिम बंगाल, झारखंड के मजदूर हैं। इनके अलावा रेहड़ी पटरी पर दुकानदारी करने वाले टुटपुँजिए दुकानदार और चाँदनी चौक की तंग गलियों में पल्लेदारी करने वाले दिहाड़ी मजदूर भी रहते हैं। 

24 मॉर्च को मोदी सरकार के ऑल इंडिया लॉकडाउन की घोषणा के बाद दिल्ली एनसीआर में रहने वाले लाखों दिहाड़ी मजदूरों और कंपनी, कारखाने के मजदूरों के सामने रहने खाने का संकट खड़ा हो गया। 

ट्रेन, बस सेवा बंद होने के चलते सौ, दो सौ, पाँच सौ, हजार के टुकड़ों में मजदूर पैदल चल चलकर अपने देश की ओर चल दिए हैं। कईयों के तो फरवरी महीने की सैलरी भी नहीं मिली है। मॉर्च का तो खैर मिलने का कोई तुक ही नहीं बनता। ऐसे में कईयों के पास खाने पीने की चीजें और पैसे तक नहीं हैं। छोटे-छोटे बच्चों को साथ लेकर पैदल चलने को विवश हैं। कई उत्तमपुर दिल्ली से यूपी के फतेहपुर जाने और बिहार से सहरसा जिला जा रहे मजदूरों से हमने बात की। 

बारिश में भीगते जा रहे हैं मजदूर

दिल्ली में फिलवक्त झमाझम बारिश हो रही है। रात के बियाबान सन्नाटे और झमाझम बरसते पानी के बीच दुधमुँहे बच्चे को गोद में उठाए मजदूर दंपत्ति के कदम अपने गंतव्य की ओर बढ़े जा रहे हैं। उनके पास बारिश से बचने के लिए साधन भी तो नहीं है। न छाता है न रेनकोट न ठहरने भर की कोई छांव छप्पड़। दिल्ली जैसे शहर में किसी घर के सामने खड़े भी तो नहीं हो सकते। 

सबसे ज़्यादा बुरा लगता है दुधमुंहे और दूसरे छोटे-छोटे बच्चों को भीगते देखना। इन्हें यूँ पीड़ा और दुख, में देखकर अपनी छटपटाहट और पत्रकार होने की सीमित क्षमता और बेबसी पर गुस्सा आता है। 

स्त्रियां और बच्चियां भी साथ में 

दिल्ली एनसीआर से हजारों किलोमीटर दूर स्थित अपने घर तक का पैदल सफर तय कर रहे इन मजदूरों में से कई के साथ स्त्रियां और बच्चियां भी हैं। उन्हें रास्ते में किसी अनहोनी की भी आशंका रहती है। बावजूद इसके कि उनके पास कोई सुरक्षित विकल्प नहीं है वो ये जोखिम उठाकर सफर कर रहे हैं। जिन मजदूरों के साथ स्त्रियां और बच्चियां हैं वो जत्थे में ही सफर तय कर रहे हैं। रास्ते में कहीं सुरक्षित जगह देख कर रात भर आराम करेंगे और फिर भोर होते ही गंतव्य की ओर को निकल लेंगे। घर तक का सफर तय करने में इन्हें 10 से 12 दिन लग जाएंगे। 

सरकार के प्रति गुस्से में हैं मजदूर

रात के साढ़े नौ बज रहे हैं। काफी दूर से चलकर आ रहे ये मजदूर अब किसी को अपनी पीड़ा अपना दुख सुनाने के मूड में नहीं हैं। अतः ये रोकने पर भी नहीं रुक रहे हैं। कोरोना से ज़्यादा सरकार की मार से हलकान हैं। सैंकड़ों किलोमीटर की यात्रा तय कर सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा आँखों में लिए इन मजदूरों के चेहरे पर भूख, थकान और गुस्से के भाव स्पष्ट पढ़े जा सकते हैं। ये गुस्सा सरकार के निर्दयी बर्ताव के प्रति है। जो लॉकडाउन की घोषणा करके इन मजदूरों को इनके हाल पर भूखे मरने के लिए छोड़ दिया। कई मजदूर कह रहे हैं समय आने पर हम भी इस मतलबी और निर्दयी सरकार को उखाड़ फेकेंगे।

मजदूरों का कहना है, “सरकार ने 22 मार्च को जब एक दिन के लिए जनता कर्फ्यू लगाया था तभी बता देते तो हम सब अपने गाँव घर परिवार के पास लौट जाते। हम अब यहां महीने- दो महीने बैठकर कैसे गुजारा करेंगे। कंपनी मालिक ने कंपनी बंद कर दिया है। हाथ में ज़्यादा पैसे नहीं हैं। इतना मिलता ही नहीं था कि घर भेजने के बाद कुछ बचे। मॉर्च की पगार तो गई अब। हम मजदूर शहर नगर में बैठकर नहीं खा सकते। हमारे पास इतनी बचत पूँजी नहीं होती। समझ में नहीं आ रहा कि हम क्या करें? कहाँ जाएं? कुछ लोग कह रहे हैं 14 अप्रैल के बाद सरकार लॉकडाउन की मियाद को दो-तीन महीने के लिए और बढ़ा सकती है। वॉट्सअप पर मेसेज मिलता है। हम देखते हैं। बाहर सड़कों पर भी पुलिस मजदूरों को पीट रही है।”

दिल्ली पुलिस मजदूरों को खाना खिलाती दिखी

पिछले चार दिनों से मजदूरों पर पुलिसिया दमन की तस्वीरें देखते-देखते हमारा दिमाग आतंक और पुलिस के प्रति नफरत से भर गया था। हालांकि सुकून की बात ये है कि आज दिल्ली में कई जगह पुलिस ने बैरिकेड्स हटा दिए हैं। और जो मजदूर पैदल ही अपने गांव घर जा रहे हैं उन्हें बेवजह परेशान नहीं कर रहे हैं। दिल्ली पुलिस का एक मानवीय रूप भी दिखा। शाम 6 बजे के करीब पुलिसकर्मी मंडी हाउस में लाइन लगाकर चलते मजदूरों को खाना खिलाते दिखे। अनुमानतः लाइन में करीब 500 से ज़्यादा मजदूर रहे होंगे।  

 जयपुर, हरियाणा और दिल्ली से पैदल बिहार जा रहा मजदूरों का जत्था     

जयपुर से बिहार के लिए निकले उपेंद्र, लखन और मनोज बताते हैं। ये सफ़र जीवन भर याद रखेंगे। बिहार चुनाव होने वाला है जिस-जिस से मिलेंगे इस मजदूर विरोधी सरकार को उखाड़ फेंकने की अपील करेंगे। किसी ने रास्ते में खाने पीना तक नहीं पूछा।

हरियाणा के चंचल पार्क से शाहजहांपुर के लिए निकले एक युवा दंपति अपने साथ एक दुधमुंहा बच्चा लिए हुए है। दिल्ली में फिलहाल तेज बारिश हो रही है। और ये लोग भीगते हुए जाने को अभिशप्त हैं। इनमें से अधिकांश के पास न तो मास्क है न सैनेटाइजर। 

नजफगढ़ का एक मजदूर बताता है कि लॉकडाउन की घोषणा के बाद हमारा ठेकेदार ही भाग गया। उसका फोन भी नहीं लग रहा तब से। हमें बिहार से वही लाया था हमारे रहने खाने की व्यवस्था उसी के जिम्मे था। लेकिन उसके भाग जाने के बाद हमारा कोई ठिकाना नहीं है। 

हरियाणा के करनाल से सीतामढ़ी बिहार के लिए निकले लोग बताते हैं कि रास्ते में उन्हें एक सज्जन ने एक बिस्कुट का पैकेट और पानी का बोतल भेंट किया। लेकिन इससे भूख नहीं मिटी, न थकान। सरकार ने हमारे साथ जो सुलूक किया है उसे हम ताउम्र याद रखेंगे।

दिल्ली एनसीआर को बनाने वाले इन मजदूरों की क्यों नहीं हुई दिल्ली

दिल्ली इतनी क्रूर क्यों है? केंद्र सरकार के नकारेपन को यदि दरकिनार कर दें तो भी दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने इनके दिल्ली में ठहरने खाने की पर्याप्त इंतजाम क्यों नहीं किया। जबकि यूपी बिहार के इन्हीं प्रवासी मजदूरों की बदौलत ही वो सत्ता में आए हैं। इन मजदूरों के बिना दिल्ली एक भी दिन नहीं चल पाएगी। बावजूद इसके दिल्ली के रंगदारों ने इन गरीब मजदूरों के बारे में चिंता करने की जहमत तक नहीं उठायी।

लॉकडाउन से पहले प्रधानमंत्री ने लाखों प्रवासी मजदूरों के बार में क्यों नहीं सोचा

24 मार्च को रात आठ बजे प्रधानमंत्री मोदी टीवी स्क्रीन पर प्रकट होते हैं और कहते हैं आज 12 बजे के बाद से 21 दिनों तक ऑल इंडिया लॉकडाउन रहेगा। यानि प्रधानमंत्री की घोषणा और लॉकडाउन लागू होने के बीच सिर्फ रात के 4 घंटे की मियाद थी। महज 4 घंटे में प्रवासी मजदूर कहाँ जाएं। वो भी तब जब ट्रेन और बस सब पहले से ही बंद थीं। इससे यही साबित होता है कि मौजूदा सरकार मजदूर मेहनतकश वर्ग के प्रति बेहद लापरवाह और असंवेदनशील है। यदि सरकार को गरीब मेहनतकश वर्ग की थोड़ी भी फिक्र होती तो वो लॉकडाउन की घोषणा करने से पहले मजदूरों को अपने गांव घर लौटने के लिए एक-दो दिन का समय देती। या फिर लॉकडाऊन की घोषणा के बाद उन कंपनियों और कारखानों को आदेश देती कि मजदूरों के रहने खाने का इंतजाम उनके जिम्मे है। या फिर लॉकडाउन के बाद मजदूरों को उनके घर छोड़ने के लिए विशेष अभियान चलाती। 

विदेशों में फंसे लोगों को एयरलिफ्ट किया जा सकता है देश के दूसरे राज्यों में फँसे प्रवासी मजदूरों को क्यों नहीं

कोविड-19 महामारी के चलते मोदी सरकार ने कई देशों में फँसे भारतीयों को एयरलिफ्ट करके विदेशों से निकालकर उन्हें उनके घर पहुँचाया है। चीन, ईरान, इटली से तो कई खेप में एयरलिफ्ट करके इंडिया लाया गया। यदि ये सरकार विदेश में फंसे लोगों को एयरलिफ्ट कर सकती है तो वह देश के ही अलग-अलग राज्यों में फँसे प्रवासी मजदूरों को विशेष साधनों की व्यवस्था करके उनके घर क्यों नहीं पहुंचाती।

दरअसल इस सवाल को सरकार और व्यवस्था के क्लास-कैरेक्टर (वर्ग-चरित्र) को जाने बिना नहीं समझा जा सकता। सरकार ने जिन लोगों को कोविड-19 संक्रमित देशों से एयरलिफ्ट के जरिए निकाला है वो सत्ताधारी वर्ग के लोग थे। पूँजीवादी वर्ग व्यवस्था में वो वर्ग बुर्जुआ वर्ग कहलाता है। जबकि देश के भीतर तमाम राज्यों में फँसे प्रवासी मजदूर सत्ताधारी वर्ग के नहीं हैं। मनुवादी व्यवस्था में भी वो निचले पायदान पर हैं और शोषणकारी पूँजीवादी व्यवस्था में भी वो मजदूर वर्ग से संबंध रखते हैं जिनके शोषण उत्पीड़न पर ही पूरी व्यवस्था टिकी है। पूँजावादी, फासीवादी व्यवस्था में।   

अगर याद हो तो इसी मोदी-योगी सरकार ने 2018 में कांवड़ियों पर पुष्पवर्षा के लिए हेलीकॉप्टर मुहैया करवाया था लेकिन पुलवामा में फँसे अर्धसैनिकों को वहां से एयरलिफ्ट करने के लिए हेलीकॉप्टर नहीं मुहैया करवाया गया।

(अवधूत आज़ाद और सुशील मानव की रिपोर्ट।) 

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