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बजट में भी दिखी किसानों के प्रति सरकार की बेरुखी

इस वर्ष का आम बजट वह अवसर था जब आंदोलित किसान यह आकलन कर सकते थे कि सरकार क्या वास्तव में उनकी मांगों को लेकर गंभीर है? आम जन भी यह मूल्यांकन कर सकते थे कि सरकार के मंत्रियों और प्रवक्ताओं द्वारा मीडिया में बार-बार किया जाने वाला यह दावा कि उनकी सरकार स्वतंत्र भारत की सर्वाधिक किसान हितैषी सरकार है, क्या सचमुच सत्य है? यह कहना कि बजट किसानों के लिए निराशाजनक है, सरकार की रणनीतिक उदासीनता और कठोरता को कम कर आंकना होगा। दरअसल सरकार इस बजट के माध्यम से किसानों को यह संदेश देना चाहती है कि उनके आंदोलन से प्रभावित होकर वह अपनी प्राथमिकताओं में बदलाव करने वाली नहीं है, बल्कि किसानों के लिए पिछले बजटों में जो थोड़े-बहुत प्रावधान किए गए थे, उन्हें लेकर भी वह कंजूसी बरतने का दुस्साहस अवश्य करने वाली है।

किसान आंदोलन से जुड़े नेताओं और बहुत सीमित संख्या में शेष रह गए निष्पक्ष और निरपेक्ष कृषि अर्थशास्त्रियों के विश्लेषण यह दर्शाते हैं कि सरकार न केवल किसानों के साथ पूर्व में किए गए वादों को लेकर गंभीर नहीं है, बल्कि आगे भी उसका इरादा किसानों को आकर्षक घोषणाओं और झूठे वादों के भ्रमजाल में फंसाए रखने का है। यदि विगत वर्ष से तुलना करें तो संपूर्ण बजट में कृषि और अन्य सहायक गतिविधियों के लिए आवंटन में इस वर्ष कटौती की गई है। पिछले वर्ष यह आवंटन 1.54 लाख करोड़ था, जबकि इस वर्ष आवंटित राशि 1.48 लाख करोड़ रुपये है। यदि संपूर्ण बजट में कृषि की हिस्सेदारी की बात करें तो पिछले वर्ष के 5.1 प्रतिशत से घटकर यह इस वर्ष 4.3 प्रतिशत रह गई है।

कम से कम पिछले सालों के बजट भाषणों में कृषि और किसानों का प्रारंभ में ही जिक्र होता था और उनके प्रशंसात्मक उल्लेख के बाद कुछ आकर्षक घोषणाएं भी की जाती थीं, यद्यपि यह घोषणाएं कागजी होती थीं, और इनसे किसानों की बदहाली और गरीबी खत्म करने में कुछ खास मदद नहीं मिलती थी, किंतु इस बार तो ऐसा भी कोई प्रयास  नहीं हुआ। बजट भाषण में कृषि का उल्लेख बहुत बाद में आया और लगभग उतनी ही अनिच्छा से इसकी चर्चा हुई, जितनी उपेक्षा से किसानों के लिए यह बजट बनाया गया है।

किसानों को बेहतर आय देने और बाजार में हस्तक्षेप द्वारा किसानों को उचित मूल्य दिलाने के लिए पिछले बजटों से संचालित प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (पीएम-आशा) तथा मार्केट इंटरवेंशन स्कीम एवं प्राइस सपोर्ट स्कीम के लिए आवंटित फंड में प्रति वर्ष कटौती की जा रही है और अब इनके लिए आवंटन इतना कम है कि इसे आवश्यकता की तुलना में नगण्य कहा जा सकता है।

पीएम आशा के लिए आवंटन वर्ष 2019-20 में 1500 करोड़ रुपये था, जो वर्ष 2020-21 में घटाकर 500 करोड़ रुपये कर दिया गया था और अब वर्ष 2021-22 में यह मात्र 400 करोड़ रुपये रह गया है, जबकि एमआईएस-पीएसएस के लिए यह 2019-20 में 3000 करोड़ रुपये था, जिसमें कमी की गई और यह 2020-21 में 2000 करोड़ रुपये रह गया (जिसमें से केवल 996 करोड़ रुपये ही खर्च हुए), जबकि वर्तमान वित्तीय वर्ष 2021-22 में यह आवंटन मात्र 1501 करोड़ रुपये ही है।

अनेक स्वतंत्र एजेंसियों द्वारा एकत्रित आंकड़े यह बताते हैं कि कीमतों के समर्थन मूल्य से नीचे चले जाने के कारण किसानों को प्रतिवर्ष लगभग 50000 करोड़ रुपये का नुकसान होता है, इसके बावजूद सरकार द्वारा इन महत्वपूर्ण योजनाओं के फंड में वृद्धि के स्थान पर की जा रही लगातार कटौती यह दर्शाती है कि सरकार एमएसपी के मामले में जरा भी गंभीर नहीं है।

आपरेशन ग्रीन के संबंध में कहा गया कि अब इसमें पूर्व सम्मिलित तीन फसलों (टमाटर, प्याज, आलू) को बढ़ाकर 22 अन्य खराब होने वाली फसलों को शामिल किया जाएगा, किंतु वस्तुस्थिति यह है कि इसके अधीन केवल पांच प्रोजेक्ट सैंक्शन हुए हैं और इनमें से किसी पर भी काम शुरू नहीं है।

अनेक कृषि अर्थशास्त्रियों एवं किसान नेताओं ने कोविड-19 और मंदी से कृषि तथा उसके सहयोगी क्षेत्रों को उबारने का दावा करने वाले आत्मनिर्भर भारत पैकेज के खोखलेपन पर सवाल उठाए हैं और नवीनतम इकॉनॉमिक सर्वे को देखें तो इनके सवाल एकदम जायज लगते हैं। वर्तमान इकॉनॉमिक सर्वे के वॉल्यूम दो के चैप्टर 7 के अनुसार आत्मनिर्भर भारत पैकेज में घोषित एक लाख करोड़ के बहुचर्चित एग्रीकल्चर इंफ्रा फंड में से मई 2020 से अब तक कुछ भी खर्च नहीं हुआ है। जनवरी 2021 के मध्य तक इसमें से केवल 2991 करोड़ रुपये के अनुबंध हस्ताक्षरित हुए हैं। यह भी इन प्रिंसिपल कमिटमेंट के स्तर पर हैं। वित्त मंत्री ने कहा कि अब एग्रीकल्चर इंफ्रा फंड एपीएमसी के लिए उपलब्ध होगा, किंतु सरकार ने जो आवंटन दिया है वह एकदम नाकाफ़ी और खटकने वाला है। 

पिछले वित्तीय वर्ष में इस पर सरकार ने अपने खजाने से केवल 200 करोड़ रुपये खर्च किए थे, जबकि इस वर्ष सरकारी खजाने से एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर फंड के लिए केवल 900 करोड़ रुपये व्यय होंगे। इसी प्रकार 15000 करोड़ रुपये के एनिमल हसबेंडरी फंड से भी एक रुपया भी खर्च नहीं हुआ है। कमोबेश यही स्थिति रूरल इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फंड (पहले 30000 हजार करोड़ अब बढ़ाकर इस वित्तीय वर्ष में 40000 करोड़) तथा माइक्रो इरीगेशन फंड (पूर्व में 5000 करोड़ वर्तमान वित्तीय वर्ष में 10000 करोड़) की है। जिन फंड्स की हम चर्चा कर रहे हैं, इनके लिए सरकारी खजाने से कोई आवंटन नहीं होता।

इनका निर्माण कुछ खास प्रोजेक्ट्स के वित्तपोषण के लिए होता है। सरकार की ऐसी घोषणाओं के आकलन की यही विधि होती है कि हम पता लगाएं कि इन फंड्स का यथार्थ में कितना उपयोग हो पाया है। सरकार को चाहिए कि जनता के सामने इन फंड्स के उपयोग की सही तस्वीर रखे, किंतु सरकार जानती है कि ऐसा करने से उसके खोखले दावों की हकीकत सामने आ जाएगी। इसलिए इस पर चर्चा करने से वह कतराती है।

पीएम किसान योजना के लिए आवंटन पिछले वर्ष के 75 हजार करोड़ रुपये से घटाकर 65 हजार करोड़ रुपये कर दिया गया है। इस योजना को स्वयं प्रधानमंत्री किसानों की बेहतरी के एक क्रांतिकारी एवं अभूतपूर्व प्रयास की संज्ञा देते रहे हैं, किंतु सच्चाई यह है कि पीएम किसान योजना के लाभार्थियों की संख्या चिंताजनक रूप से कम हो रही है। इंस्टीट्यूट फॉर सोशल एंड इकॉनॉमिक चेंज के विशेषज्ञों के अनुसार बड़ी संख्या में किसान इस योजना से बाहर हो रहे हैं। कृषि मंत्रालय की ‘पीएम किसान’ वेबसाइट यह दर्शाती है कि इस योजना के तहत कुल 8.80 करोड़ लाभार्थी चिह्नित किए गए थे, जिसमें से 8.35 करोड़ लाभार्थियों को पहली किस्त के रूप में दो हजार रुपये दिए गए।

दूसरी किस्त में लाभार्थियों की संख्या घटकर 7.51 करोड़, तीसरी में 6.12 करोड़ और चौथी किस्त में केवल 3.01 करोड़ (29 जनवरी 2021 तक) रह गई है। चाहे कारण पोर्टल के आंकड़ों में गड़बड़ी हो या फिर बैंक खातों को आधार के साथ लिंक करने जैसी शर्तें हों, लेकिन किसान बड़ी संख्या में इस योजना से बाहर हो रहे हैं। कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा के अनुसार इस योजना के तहत कृषि से संबंधित सभी क्षेत्रों के लोगों को लाभार्थियों की सूची में सम्मिलित किया जाना चाहिए।

पीएम किसान सम्मान योजना सिर्फ 14.5 करोड़ खेती की जमीन का उत्तराधिकार रखने वाले परिवारों को ही लाभ पहुंचा सकती है। यदि बटाईदार एवं किराएदार किसान भी इसमें सम्मिलित कर लिए जाएं तो यह संख्या बहुत बड़ी हो सकती है, लेकिन सरकार द्वारा आवंटन में दस हजार करोड़ की कमी और योजना के लाभार्थियों की घटती संख्या उसकी कथनी और करनी के अंतर को दर्शाने के लिए पर्याप्त है। 6000 रुपये वार्षिक की अल्प और अपर्याप्त सहायता को बढ़ाने का भी सरकार का कोई इरादा नहीं है।

सरकार का यह भी कहना है कि भूमिहीन, किराएदार और बटाईदार किसानों को मनरेगा के माध्यम से सहायता दी जा रही है, किंतु यहां भी सरकारी दावे खोखले हैं। वर्ष 2021-22 के बजट में मनरेगा के लिए 73000 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। यह राशि वर्ष 2020-21 के संशोधित एस्टीमेट एक लाख ग्यारह हजार पांच सौ करोड़ रुपये से 34.52 प्रतिशत कम है। जहां पर्सन डेज की संख्या 3.4 बिलियन तक पहुंच रही है, वहीं सरकार के प्रावधान लगभग 2.8 बिलियन पर्सन डेज के लिए ही पर्याप्त हैं। कोविड-19 महामारी के दौर में संवेदनशील परिवारों के लिए मनरेगा जीवन दायिनी सिद्ध हुई थी और हम ग्रामीण रोजगार के लिए इस योजना पर बहुत अधिक निर्भर हैं। इसके बाद भी सरकार द्वारा 38500 करोड़ रुपये कम आवंटित करना दुर्भाग्यपूर्ण है। शायद आने वाले समय में सरकार को अतिरिक्त फंड आवंटित करने के लिए बाध्य होना पड़े।

पिछले कुछ बजटों से सरकार एग्रीकल्चर क्रेडिट टारगेट में बढ़ोतरी को अपनी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करने की अतिरंजित और हास्यास्पद कोशिश करती रही है। इस वर्ष भी कहा गया कि एग्रीकल्चर क्रेडिट टारगेट वर्ष 2019-20 के 13.5 लाख करोड़ रुपये से बढ़ाकर 2020-21 में 15 लाख करोड़ रुपये किया गया और अब यह वित्तीय वर्ष 2021-22 के लिए 16.5 लाख करोड़ रुपये है। पुनः इस एग्रीकल्चर क्रेडिट टारगेट के लिए बजट में कोई आवंटन नहीं होता।

दरअसल सरकार बैंकों द्वारा कृषि क्षेत्र को दिए जाने वाले ऋण के संबंध में एग्रीकल्चर क्रेडिट टारगेट का निर्धारण बैंकों के लिए करती है। कृषि क्षेत्र, प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में से एक है, इसलिए स्वाभाविक रूप से बैंकों द्वारा दिए गए कुल ऋण का लगभग 18 प्रतिशत कृषि क्षेत्र को मिलता ही है। इस ऋण का मुख्य भाग एग्री बिज़नेस कॉर्पोरेशंस को जाता है, किंतु कृषि से जुड़े छोटे किसानों को जिनकी संख्या लगभग 90 प्रतिशत है, इससे कोई विशेष फायदा नहीं मिलता।

प्रधानमंत्री कृषि और किसानों से संबंधित अपने प्रत्येक उद्बोधन में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का उल्लेख करते रहे हैं, किंतु इस योजना की जमीनी हकीकत प्रधानमंत्री द्वारा उकेरी गई काल्पनिक रंगीन छवि से बिल्कुल अलग एकदम स्याह और निराशाजनक है। लगभग 50 प्रतिशत किसानों को कवर करने का दावा करने वाली फसल बीमा योजना बमुश्किल 20 प्रतिशत किसानों को ही कवर कर पा रही है। इस योजना के लिए बजटीय आवंटन तथा इस योजना के मद में खर्च दोनों एकदम अपर्याप्त हैं तथा लाभान्वित किसानों की संख्या में तेजी से कमी आ रही है।

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के लिए वर्ष 2020-21 में व्यय 15307 करोड़ रुपये रहा, जो बजट एस्टीमेट से 388 करोड़ रुपये कम था। इस वर्ष बजट एस्टीमेट में दो प्रतिशत की मामूली बढ़ोतरी की गई है। 2016 से प्रारंभ हुई यह योजना निजी बीमा कंपनियों के लिए मुनाफे का सौदा सिद्ध हुई है। वर्ष 2018 के आंकड़े बताते हैं कि 18 बीमा कंपनियों ने वर्ष 2018 में 42114 करोड़ रुपये एकत्रित किए, जिसमें से 17 प्रतिशत हिस्सा किसानों से और 83 प्रतिशत भाग केंद्र और राज्य सरकारों से आया था। इसी वर्ष इन निजी बीमा कंपनियों ने 32912 करोड़ रुपये का मुआवजा दिया था, इस प्रकार ये लगभग 9000 करोड़ रुपये के फायदे में रहीं। आंकड़े यह भी बताते हैं कि बड़ी संख्या में किसानों के दावों का भुगतान नहीं किया गया।

एक अन्य महत्वपूर्ण योजना इंटरेस्ट सबवेंशन स्कीम है, जो किसानों को अल्प समय के लिए सब्सिडी वाली ब्याज दरों पर ऋण उपलब्ध कराने से संबंधित है। वर्ष 2021-22 में इसके लिए आवंटन आठ प्रतिशत घटा दिया गया है, जबकि प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (जो किसानों को किसी न किसी प्रकार की सिंचाई सुविधा देने से संबंधित है) के फंड में मामूली बढ़ोतरी की गई है। इन दोनों योजनाओं में वर्ष 2020-21 का वास्तविक व्यय बजट एक्सपेंडिचर से कम था।

28 फरवरी 2016 को प्रधानमंत्री ने घोषणा की थी कि वे स्वंत्रता की 75वीं वर्षगांठ अर्थात वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी कर देंगे। इस घोषणा को पांच वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। वित्तीय वर्ष 2021-22 पंद्रह अगस्त 2022 के पहले का अंतिम पूर्ण वित्तीय वर्ष है, इसलिए यह आशा की जा रही थी कि बजट में वित्त मंत्री इस बात का लेखा जोखा प्रस्तुत करेंगी कि सरकार ने किसानों की आमदनी दोगुनी करने के लिए क्या-क्या प्रयास किए और अब तक किसानों की आमदनी कितने प्रतिशत बढ़ चुकी है? किंतु एक सतही उल्लेख के अलावा वित्त मंत्री के बजट भाषण में इस विषय पर कुछ नहीं कहा गया।

निश्चित ही यह बजट आंदोलनरत किसानों को सरकार का रूखा सा जवाब है कि वे जो चाहे कर लें, सरकार को रत्ती भर फर्क नहीं पड़ने वाला। सरकार के इस आत्मविश्वास के रहस्य को जानना होगा। मुख्य धारा का सरकार समर्थक मीडिया 26 जनवरी की प्रायोजित हिंसा के बाद हमलावर हुआ था, किंतु उसने अब एक नई रणनीति अपना ली है। आंदोलन की कवरेज को किसान आंदोलन का नेतृत्व करने वाले एक नेता विशेष पर केंद्रित किया जा रहा है।

उनकी लार्जर दैन लाइफ छवि निर्मित की जा रही है। उन पर प्राइम टाइम के महत्वपूर्ण घंटे न्योछावर किए जा रहे हैं। यह पैटर्न हमने जनलोकपाल आंदोलन के दौरान भी देखा था जब अन्ना हजारे को आंदोलन से बड़ा बना दिया गया था। आज जब जनलोकपाल आंदोलन और अन्ना हजारे के वास्तविक लक्ष्य और असली चरित्र हमें पता हैं तब हम बड़ी आसानी से इसका विश्लेषण कर लेते हैं, किंतु तब हममें से बहुत से लोगों ने अन्ना हजारे में गांधी जी की छवि देखी थी और इस आंदोलन को परिवर्तनकामी शक्तियों के निर्णायक उभार के रूप में व्याख्यायित किया था।

हम इसमें निहित प्रतिगामी प्रवृत्तियों को समझ पाने में नाकाम रहे थे। किसान आंदोलन के साथ ऐसा नहीं होना चाहिए। जिस प्रकार मीडिया द्वारा आंदोलन की पवित्रता-अपवित्रता का निर्धारण अनुचित है, आंदोलन को किसी कौम या प्रदेश की स्थानीय परिस्थितियों द्वारा नियंत्रित बताना गलत है उसी प्रकार आंदोलन के अब तक सामूहिक रहे नेतृत्व को किसी नायक में आबद्ध करना भी गलत है।

समूह को व्यक्ति से अधिक महत्वपूर्ण होना ही चाहिए। जब तक किसान आंदोलन में हर प्रदेश के किसानों की समस्याओं को प्रतिनिधित्व नहीं मिलेगा और देश भर में विभिन्न स्थानों पर किसानों के समुदाय अपने हक के लिए निर्णायक संघर्ष नहीं करेंगे तब तक किसानों की राह कठिन बनी रहेगी। ऐसा तभी संभव है जब भूमिहीन किसानों को उनकी जोत वाली जमीनों का मालिकाना हक देने जैसे मुद्दे आंदोलनकारियों की मांगों में शामिल हों। मजदूर और कर्मचारी वर्ग को भी ध्यान रखना होगा कि उनके नैतिक समर्थन भर से काम नहीं चलेगा। उन्हें भी सड़कों पर आना होगा तब ही सरकार पर दबाव बन सकेगा।

(डॉ. राजू पाण्डेय लेखक और गांधीवादी चिंतक हैं आजकल आप रायगढ़ में रहते हैं।)

This post was last modified on February 5, 2021 2:14 pm

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