Wednesday, June 7, 2023

भूख फैलाने वाले यूएन के तहत कार्यरत खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम को शांति का नोबेल

यूनाइटेड नेशन्स के विश्व खाद्य कार्यक्रम (World Food Programme) को नोबल शांति पुरस्कार से सम्मानित किए जाने की घोषणा की गयी है। विश्व खाद्य दिवस 16 अक्तूबर से ठीक एक सप्ताह पूर्व ये घोषणा की गई है।

क्या विडंबना है कि जो व्यवस्था दुनिया की 820 मिलियन (82 करोड़) भूखे लोगों को सोने के लिए बाध्य करती है उसी व्यवस्था के एक संगठन को भूखों को खाना खिलाने के लिए नोबल पुरस्कार दिया जा रहा है। यूनाइटेड नेशन्स को पूँजीवादी हितों का संरक्षक माना जाता है। यूनाइटेड नेशन्स के भी दो रूप हैं। एक तरफ इसका विश्व व्यापार संगठन (WTO) है जो तमाम देशों को अपने यहां फूड सब्सिडी खत्म करने के लिए बाध्य करता है। वो भारत समेत तमाम विकासशील देशों पर खाद्यान्न सब्सिडी, खाद्यान्न भंडारण और सार्वजनिक वितरण प्रणाली को खत्म करने के लिए मजबूर करता है तो दूसरी ओर इसका खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम भूखे को खाना देने जाता है।

एक तरफ ये बैद्धिक संपदा अधिकार कानून लागू करके खाद्यों, बीजों और दवाइयों को कंपनी विशेष के मालिकाना हक़ तक सीमित करता है तो दूसरी ओर वैक्सीनेशन कार्यक्रम भी चलाता है। माने यूनाइटेड नेशन्स को समझना है तो बिल गेट्स को समझ लीजिए। वैसे भी दोनों ही अमेरिका की देन हैं। और मजे की बात ये है कि खुद यूनाइटेड नेशन्स ही दुनिया भर में भूखे, कुपोषित लोगो का आंकड़ा भी जुटाता है।  

यूनाइटेड नेशन्स के दो और संगठन है फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन (FAO)  और इंटरनेशनल फंड फॉर एग्रीकल्चर डेवलपमेंट (IFAD), जो खाद्य और कृषि पर फोकस्ड हैं। ये संगठन कृषि और खाद्यान्न में पूँजीवादी कार्पोरेट के लिए संभावनाएं तलाशने का काम करते हैं। भारत की नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा कोरोनाकाल में जो तीन कृषि कानून बनाए गए हैं वो कृषि क्षेत्र को कार्पोरेट को हस्तांतरित करने वाले कानून हैं। ये कृषि व्यवस्था जो भारत पर थोपी जा रही है और जिसका किसान वर्ग तीव्र विरोध कर रहा है वो यूनाइटेड नेशन्स के ये दो संगठन अमेरिका और यूरोप के तमाम देशों में लागू करवा चुके हैं। और उसके दुष्परिणाम के बावजूद वो उसे भारत में लागू करवाना चाहते हैं। जबकि भारत में दुनिया के भूखों की एक चौथाई (20 करोड़) आबादी रहती है। 

अमेरिका और यूरोपीय देशों के हित में विकासशील देशों से बारगेनिंग का काम करता है यूनाइटेड नेशन्स

अमेरिका, यूरोपियन यूनियन, ऑस्ट्रेलिया और जापान समेत विकसित देशों को भारत व दूसरे विकासशील देशों की खाद्यान्न नीति से समस्या होती है। वे खाद्यान्न खरीद, न्यूनतम समर्थन मूल्य, सार्वजनिक वितरण व्यवस्था जैसे विषयों पर भारत सरकार से नीति में बदलाव कर इन्हें खत्म या कम करने की मांग करते आ रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ, भारत देश में बढ़ते कृषि संकट, किसानों की आत्महत्या, जनता के बहुत बड़े हिस्से को पौष्टिक भोजन न मिल पाने जैसी समस्याएं लगातार चुनौती बनी हुई हैं। जबकि अमीर देश चाहते हैं भारत अपने किसानों और गरीब उपभोक्ताओं को संरक्षण देना छोड़ उन्हें बाज़ार के हवाले कर दे। जिन्हें यूनाइटेड नेशन्स के विश्व खाद्य कार्यक्रम कभी-कभार भीख देकर अपने पापों को कम कर सकें और नोबल पुरस्कार हासिल कर सकें।

यूनाइटेड नेशन्स के विश्व व्यापार संगठन के मुताबिक़, भारत सरकार द्वारा कृषि उत्पादों का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने से इनकी कीमत पर सरकार का नियंत्रण बना रहता है और बड़े कॉरपोरेट घरानों का मुनाफा कम हो जाता है। चूंकि भारत सरकार केवल न्यूनतम समर्थन मूल्य ही तय नहीं करती बल्कि किसानों से गेहूं, चावल, गन्ना और दाल खरीदती भी है तो इस तरह ये किसान बहुराष्ट्रीय कंपनियों की पहुंच से बच जाते हैं। यूनाइटेड नेशन्स के WTO को इस पर ऐतराज है।

अमीर देशों को यह भी मंजूर नहीं कि भारत अपनी गरीब जनता को सस्ती दरों पर राशन की दुकान से खाद्यान्न मुहैया कराए। उनकी निगाह में इस तरह सरकार उनसे उनके संभावित ग्राहक छीन कर मुक्त बाजार के नियमों का उल्लंघन करती है। डब्ल्यूटीओ भारत सरकार के इन सभी कदमों की गिनती सब्सिडी में करता है और उसे बैड या बुरी सब्सिडी बताता है। बैड इसलिए क्योंकि इससे बाजार प्रभावित होता है मतलब बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां मुनाफा कमाने से रह जाती हैं।

तीन तरह के सब्सिडी बॉक्स

विश्व व्यापार संगठन ने सब्सिडी को ग्रीन बॉक्स, ब्लू बॉक्स और एंबर बॉक्स सब्सिडी में बांटा है। ब्लू व ग्रीन बॉक्स सब्सिडी ऐसी सब्सिडी हैं जिनसे विश्व व्यापार पर फर्क नहीं पड़ता या पड़ता भी है तो बहुत कम असर पड़ता है। जैसे कि संयुक्त राज्य अमेरिका में सरकार किसानों को कुछ रकम इसलिए देती है कि वे अपने खेत खाली छोड़ दें ताकि उत्पादन कम हो और बाज़ार भाव स्थिर रहे। वहीं, एंबर बॉक्स सब्सिडी वे हैं जिनसे घरेलू उत्पादन प्रभावित होता है व जिसका असर विश्व व्यापार पर पड़ता है। उदाहरण के लिए भारत में बिजली, खाद वगैरह में सब्सिडी देने का सीधा असर उत्पादन पर पड़ता है।

हर 9 व्यक्ति में से एक व्यक्ति भूखा है

विश्व का हर नौवां व्यक्ति भूखा है। भूखों की वैश्विक आबादी 82.16 करोड़ है। एशिया में 51.39 करोड़ भूखे लोग रहते हैं। वहीं अफ्रीका में 25.61 करोड़ लोग भूखे रहने को विवश हैं। लैटिन अमेरिका और कैरिबियन देशों में 4.25 करोड़। जबकि विश्व में लगभग 2 अरब लोगों को पर्याप्त भोजन नहीं मिल पाता है। जो कि विश्व की कुल आबादी का लगभग 26 प्रतिशत है। वहीं दुनिया में पैदा होने वाला हर 7वां बच्चा (2.05 करोड़) औसत से बेहद कम वजन का होता है। 

अंतरराष्ट्रीय संस्था ‘कंसर्न वर्ल्डवाइड’ और जर्मनी की सबसे बड़ी संस्थाओं में से एक ‘वेल्ट हंगर हिल्फ’ द्वारा बनाये गए “वर्ल्ड हंगर इंडेक्स” की 2019 की रैंकिंग के मुताबिक 117 देशों वाले सूचकांक में भारत 102वें नंबर पर है। भारत को 30.3 के स्कोर के साथ, गंभीर श्रेणी में रखा गया है। भारत के पड़ोसी देशों में पाकिस्तान 94वें पायदान पर है, नेपाल 73 पर और बांग्लादेश 88 पर। भारत का स्थान कुछ अफ्रीकी देशों से भी नीचे है। सिर्फ अफ्रीका के कुछ अत्यंत पिछड़े देश ही भारत से नीचे हैं। 

पिछले सूचकांकों के मुताबिक 2010 में 24.1 के स्कोर के साथ भारत 67वें पायदान पर था। ऐसा लगता है कि भारत 9 साल में 35 पायदान नीचे खिसक गया है। 

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।) 

जनचौक से जुड़े

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of

guest
0 Comments
Inline Feedbacks
View all comments

Latest Updates

Latest

Related Articles