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विकास दुबे एनकाउंटर केसः जस्टिस चौहान जांच आयोग को पुलिस के खिलाफ नहीं मिले कोई सबूत

एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल किलिंग के लिए संविधान और कानून की किताबों में कोई जगह नहीं है। साथ ही कोई भी सभ्य समाज (सिविलाइज़्ड सोसायटी) में भी इसकी इज़ाज़त नहीं है, लेकिन ब्रिटिश राज से आजतक फ़र्ज़ी मुठभेड़ में पुलिस एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल किलिंग करती रही है। राजनेता और नौकरशाह भी इसमें शामिल रहते हैं। अभी 11 फरवरी 2021 को उच्चतम न्यायालय ने एक बार फिर से दोहराया है कि पुलिस हिरासत में मौत को सभ्य समाज में अस्वीकार्य है। हिरासत में हिंसा से मौत की घटना घृणित है। इस निर्णय की सुर्खियाँ अभी सूखी भी नहीं थी कि कानपुर में हुए विकास दुबे और उसके पांच साथियों के एनकाउंटर मामले में जस्टिस बीएस चौहान आयोग ने उत्तर प्रदेश पुलिस को क्लीन चिट दे दी है।

उत्तर प्रदेश में कानपुर के चौबेपुर थाना क्षेत्र के बिकरू गांव के दुर्दांत अपराधी विकास दुबे और उसके गैंग के साथियों के एनकाउंटर में जांच कमेटी ने यूपी पुलिस की टीम को क्लीन चिट दी है। पूर्व न्यायाधीश जस्टिस बीएस चौहान जांच आयोग को इस मामले में पुलिस के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला। जब जांच आयोग के अध्यक्ष जस्टिस चौहान बनाए गए थे तभी यह सर्वविदित हो गया था कि इस मामले में पुलिस को क्लीनचिट मिलना ही है।

दरअसल सत्ता में बैठे लोगों को फर्जी मुठभेड़ या हिरासत में थर्ड डिग्री टॉर्चर सूट करता है और यदि उनके इशारे पर एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल किलिंग होती है तो वे दोषियों को बचने के लिए अपने सारे घोड़े खोल देते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण गुजरात का इशरत जहाँ, शोहराबुद्दीन शेख, तुलसी प्रजापति मुठभेड़ कांड हैं, जिनमें सीबीआई जाँच में दोषी पाए गये आईपीएस अधिकारीयों के खिलाफ सरकार ने मुकदमा चलाने की इजाजत ही नहीं दी।

न्यायिक जांच में इस मुठभेड़ को सही माना गया है। विकास दुबे के एनकाउंटर के बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित रिटायर्ड जस्टिस बीएस चौहान कमेटी ने कई पुलिसकर्मियों से पूछताछ की, लेकिन उनको एक भी पुख्ता सबूत नहीं मिले, जिससे यह साबित हो सके कि एनकाउंटर फर्जी था। साक्ष्यों के अभाव में विकास दुबे एनकाउंटर मामले में यूपी पुलिस को क्लीन चिट दे दी। रिटायर्ड जस्टिस बीएस चौहान ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि यूपी पुलिस के खिलाफ कोई सबूत नही मिले हैं।

विकास दुबे एनकाउंटर केस की जांच के लिए उच्चतम न्यायालय ने तीन सदस्यीय कमेटी गठित की थी। पूर्व न्यायाधीश बीएस चौहान और इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश शशिकांत अग्रवाल और पूर्व पुलिस महानिदेशक केएल गुप्ता ने करीब आठ महीने की जांच के बाद सोमवार को उत्तर प्रदेश सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। अब इस रिपोर्ट को उच्चतम न्यायालय में दाखिल किया जाएगा।

उच्चतम न्यायालय में इस एनकाउंटर को लेकर छह जनहित याचिकाएं दायर की गईं, जिनको बाद में एक ही साथ सुना गया और सुप्रीम कोर्ट ने जांच आयोग का गठन किया। जस्टिस चौहान ने आयोग की अपनी 130-पृष्ठों की जांच रिपोर्ट में यह दावा किया है कि जांच के दौरान दल ने मुठभेड़ स्थल का निरीक्षण करने के साथ ही बिकरू गांव का भी दौरा किया। मुठभेड़ करने वाली पुलिस टीम के सदस्यों के बयान लेने का प्रयास करने के साथ मौके पर मौजूद लोगों तथा मीडिया से भी बात की। जांच कमेटी ने विकास दुबे की पत्नी, रिश्तेदारों और गांव के लोगों को भी बयान के लिए बुलाया, लेकिन कोई भी आगे नहीं आया।

इससे पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी इस केस की जांच के लिए एसआईटी का गठन किया था, जिसने अपनी रिपोर्ट में 50 से अधिक पुलिसकर्मियों को विकास दुबे गैंग के साथ लगातार सम्पर्क में रहने का दोषी माना था। अपर मुख्य सचिव संजय भूसरेड्डी की अध्यक्षता वाली एसआईटी और इसमें अतिरिक्त डीजी हरि राम शर्मा और डीआईजी रविंदर गौड़ शामिल थे। इस एसआईटी ने विकास दुबे के साथ सम्पर्क में लगातार रहने वाले पुलिस तथा तहसील कर्मियों के खिलाफ जांच की सिफारिश की है।

एसआईटी ने बीते नवंबर में दी गई 3,500 पेज की अपनी रिपोर्ट में तत्कालीन डीआईजी कानपुर अनंत देव तिवारी को इस गिरोह के साथ सांठगांठ के लिए दोषी ठहराया था, जिसके बाद तिवारी को निलंबित कर दिया गया था।

दरअसल 2 जुलाई 2020 की रात कानपुर के बिकरू गांव में आठ पुलिसवालों की हत्या कर दी गई थी। इस मामले का मुख्य आरोपी विकास दुबे एक हफ्ते बाद मध्य प्रदेश के उज्जैन से गिरफ्तार हुआ था, लेकिन 24 घंटे के भीतर ही कानपुर के पास उसकी पुलिस एनकाउंटर में मौत हो गई थी। विकास दुबे को यूपी एसटीएफ और यूपी पुलिस की टीम उज्जैन से कार के जरिए ला रही थी। इसी दौरान कानपुर में एंट्री के दौरान तेज बारिश हो रही थी, जिसके चलते काफिले की एक गाड़ी पलट गई। गाड़ी पलटने के बाद विकास दुबे ने पुलिसवालों का हथियार छीना और भागने की कोशिश की। जब पुलिस की ओर से उसे घेरा गया, तो उसने पुलिस पर फायरिंग की कोशिश की। पुलिस ने कहा कि इसके बाद मौजूद जवानों ने आत्मरक्षा के दौरान गोली चलाई और विकास दुबे मारा गया।

देश में पुलिस हिरासत या न्यायिक हिरासत में अक्सर मौत के मामले में सरकार ने संसद में जवाब दिया कि सरकारी आंकड़ों के अनुसार, न्यायिक हिरासत में सबसे ज्यादा मौतें उत्तर प्रदेश में होती हैं। वहीं पुलिस कस्टडी में मौत के मामले में गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र आगे हैं। साल 2017-18 में न्यायिक हिरासत में मौतों के सबसे ज्यादा 390 मामले यूपी से सामने आए। पश्चिम बंगाल से 138, पंजाब से 127, महाराष्ट्र से 125, बिहार से 109 मामले सामने आए। साल 2018-19 में यूपी 452 मामलों के साथ पहले स्थान पर रहा, जबकि दूसरे नंबर पर 149 मामलों के साथ महाराष्ट्र रहा। 2018-19 में मध्य प्रदेश से 143 मामले न्यायिक हिरासत में मौत के आए, जबकि चौथे नंबर पर पंजाब (117) और पांचवें नंबर पर पश्चिम बंगाल (115) रहे। साल 2019-20 में भी यूपी 400 मामलों के साथ पहले नंबर पर रहा, वहीं इस साल 143 मामलों के साथ मध्य प्रदेश दूसरे, 115 मामलों के साथ पश्चिम बंगाल तीसरे नंबर पर रहा।

इसी साल न्यायिक हिरासत में मौत के 105 मामले बिहार और 93 मामले पंजाब से सामने आए। मौजूदा वर्ष 2020-21 में 28 फरवरी 2021 तक के आंकड़े बताते हैं कि इस साल भी न्यायिक हिरासत में मौत के मामलों में यूपी (395) पहले, पश्चिम बंगाल (158) दूसरे, मध्य प्रदेश (144) तीसरे, बिहार (139) चौथे और महाराष्ट्र (117) पांचवें नंबर पर रहे।

हाल ही में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हिरासत में रोज़ाना औसतन पाँच लोगों की मौत होती है। इंडिया एनुअल रिपोर्ट ऑन टार्चर 2019 के मुताबिक़ साल 2019 में हिरासत में कुल 1731 मौतें हुईं इनमें से 125 मौतें पुलिस हिरासत में हुईं थीं। एनसीआरबी के डेटा के मुताबिक़ साल 2017 में पुलिस हिरासत में कुल 100 मौतें पुलिस हिरासत में हुईं थीं। इनमें से 58 लोग ऐसे थे जिन्हें हिरासत में तो लिया गया था, लेकिन अदालत के समक्ष पेश नहीं किया गया था।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और इलाहाबाद में रहते हैं।)

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This post was last modified on April 21, 2021 4:18 pm

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