Friday, April 19, 2024

फिलिस्तीन की जांबाज औरतें और अबोध बच्चे क्या-क्या झेल रहे हैं?

कुछ लोगों को भले ही लगा हो कि फिलिस्तीन को तबाह करने का प्रोजेक्ट 7 अक्टूबर को उस समय शुरू हुआ जब हमास ने इज़राइल पर अचानक हमला किया, पर इतिहास कुछ और ही कहता है। विश्व भर में सहानुभूति बटोरने के लिए इज़राइल प्रचार कर रहा है कि हमास द्वारा बंधक बनाई गई औरतों और बुज़ुर्गों के साथ बदसलूकी की जा रही है और हमले में छोटे-छोटे बच्चों तक के गर्दन रेत डाले गए। पर, बाद में यह पूरी कहानी साक्ष्य के अभाव में झूठी साबित हो गई।

हमास द्वारा हमले में कुछ लोग ज़रूर मारे गए और कुछ को बंधक बनाया गया पर बाकी सब दुष्प्रचार है। इज़राइल और पश्चिमी सरकारें, जो हमास को एक आतंकवादी संगठन बताती हैं, लोगों को विश्वास दिलाना चाहती हैं कि अब डेढ़ महीने से गाज़ा में जो नरसंहार जारी है वह हमास के हमले की प्रतिक्रिया है। पर इतिहास के जानकार इस बात से वाकिफ हैं कि यह सच नहीं है।

1917 से फिलिस्तीन ब्रिटेन का उपनिवेश था और ब्रिटेन ने 1923 में नाज़ी हमलों के शिकार यहूदियों को फिलिस्तीन में बसाने का मैनडेट कर लिया था, इसलिए अन्य देशों से भारी पैमाने पर उनका पलायन फिलिस्तीन की ओर होने लगा। इस फैसले में फिलिस्तीनियों की कोई सहमति नहीं ली गई; फिर भी वे सहानुभूतिवश चुप रहे। पर बसने की प्रक्रिया शान्तिपूर्ण न थी। फिलिस्तीनियों को उनके घरों से बेदखल किया गया और उनके साथ लगातार हिंसा होती रही।

1947-48 में संयुक्त राष्ट्र ने टू-नेशन थ्योरी की पेशकश की, यानि फिलिस्तीन को दो हिस्सों में बांटने का निर्णय ले लिया, जिसके तहत यहूदियों को 55 प्रतिशत भूमि का मालिक बनाया गया। पर फिलिस्तीनी इस बंटवारे से सहमत न थे क्योंकि उपजाऊ भूमि उनसे छीनकर यहूदियों को दी गई थी और उन्हें गाज़ा और वेस्ट बैंक में सिमटकर रहने पर मजबूर किया जा रहा था।

ज़मीन खाली कराने के लिए शुरू हुआ हिंसक ‘नक़्बा’ या ‘तबाही; जिसमें 15,000 से ज्यादा फिलिस्तीनी मारे गए, 531 शहरों को इज़राइल ने पूरी तरह तबाह कर डाला और 774 गांवों और शहरों पर अपना अधिकार जमा लिया। औरतों और बच्चियों के साथ यौन अपराध हुए। 1967 तक आते-आते सेना की मदद से फिलिस्तीन में इज़राइल का संपूर्ण सैनिक कब्ज़ा हो गया और मध्य-पूर्व में इज़राइल ने अपने को एक परमाणु शक्ति के रूप में भी स्थापित कर लिया।

इज़राइली सेना ने फिलिस्तीनियों के सारे अधिकार समाप्त कर दिये, और उन्हें हर दिन मौत के साये में घुट-घुटकर जीने को मजबूर किया गया। उसके बाद भी यहूदियों की विस्तारवादी नीति का अन्त नहीं हुआ। आज वे हमास अटैक का बहाना बनाकर फिलिस्तीनियों को पूरी तरह गाज़ा और वेस्ट बैंक से खदेड़ देना चाहते हैं।

इस प्राॅजेक्ट में पश्चिमी देश, प्रमुख तौर पर अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन इज़राइल के पक्षधर हैं, यहां तक कि उसके सारे युद्ध अपराधों को माफ करते जा रहे हैं और उसे हर तरह की मदद दे रहे हैं। शायद यही कारण है कि फिलिस्तीनियों का क्रूरतम नरसंहार जारी है, जिसमें बच्चे और औरतें सबसे बड़ी संख्या में मारे जा रहे हैं ओर यौन हिंसा के शिकार हुए हैं। यह ‘एथनिक क्लींजिंग’ है, ‘अपार्थाइड’ है, जिसमें सारे अंतर्राष्ट्रीय कानूनों की धज्जियां उड़ा दी गईं हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि संयुक्त राष्ट्र भी बयान जारी करने के अलावा कुछ न कर सका।

औरतों और बच्चों की तबाही सबसे भारी

वेस्टबैंक और गाज़ा पट्टी केयर इंटरनेशनल, यानि कोऑपरेटिव फाॅर रिलीफ ऐंड रिलीफ एवरीव्हेयर की कंट्री निदेशक हीबा टिबी का कहना है कि अब तक जो 11,500 से अधिक लोग इज़राइली हमलों में मारे गए हैं उनमें 70 प्रतिशत महिलाएं और बच्चे हैं। हीबा टिबी ने युद्धविराम के लिए आग्रह किया है।

हीबा टिबी यूएन सुरक्षा परिषद के समक्ष अपनी बात रखते हुए बोलीं कि इन हमलों में सबसे बड़ी कीमत औरतों और बच्चों को चुकानी पड़ रही है। उनके अनुसार हर 10 मिनट में एक बच्चा/बच्ची मारी जाती है। अस्पतालों की हालत बुरी है। ऐनेस्थीसिया खत्म हो चुका है इसलिए गर्भवती माताओं को बिना ऐनेस्थीसिया के सिज़ेरियन ऑपरेशन का कष्ट झेलना पड़ रहा हैं। उनकी चींखें चारों ओर गूंजती हैं।

उन्होंने कहा कि गाज़ा में 50 हजार महिलाएं गर्भवती हैं और प्रतिदिन करीब 180 महिलाओं की डिलीवरी होती है पर उनको किसी प्रकार की चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं है। नतीजा है कि उनको मेडिकल जटिलताओं का सामना करना पड़ रहा है। वे ठसा-ठस भरे कैंपों या मलबे से अटे पड़े सड़कों पर बच्चे जनने को मजबूर हैं, क्योंकि 14 अस्पताल और 45 प्राथमिक चिकित्सा केंद्र बन्द हो गए हैं। 1 नवम्बर को अल अहली अरब जच्चा-बच्चा अस्पताल पर बम गिराया गया था।

हीबा टिबी ने कहा कि अब महिलाओं व लड़कियों के लिए सेनेटरी पैड तक नहीं हैं। इस स्थिति में उन्हें संक्रमण का शिकार होने से नहीं बचाया जा सकता। कुछ बचे हुए अस्पताल इस कदर खचाखच भरे हुए हैं कि डिलिवरी के बाद हर जच्चे-बच्चे को 2-3 घंटों में डिस्चार्ज होना पड़ रहा है। कई औरतों को भारी तनाव और हमलों के कारण ट्राॅमा की वजह से मिसकैरेज हो रहे हैं, शिशु मरे हुए पैदा हो रहे हैं या फिर समय से पहले पैदा हो जा रहे हैं। पर उनके लिए इनक्यूबेटर सुविधा नहीं है।

डब्लूएचओ के अनुसार उनको जैसे पैदा होने से पहले ही मृत्युदंड दे दिया गया है। समय से पहले पैदा होने वाले बच्चों के लिए इनक्यूबेटर मशीन चलाने लायक बिजली नहीं थी, तो ये बच्चे मर रहे हैं। नवजात शिशु मेडिकल सुविधाओं के अभाव और संक्रमण से भी मर रहे हैं।

पानी का संकट, साफ-सफाई का अभाव

आप कल्पना करें कि जब पानी नहीं है तो साफ-सफाई कैसे रखी जाएगी? एक-एक बूंद पानी के लिए तरस रहे लोग ज़िंदा रहने के लिए उसे पीने के लिए बचा रहे हैं। नहाना, कपड़े धोना, मासिक धर्म के समय अपने को साफ रखना असंभव है। अस्पतालों को बमबारी से ध्वस्त करने के चलते, ज़ाहिर है कि जो थोड़ी बहुत शौचालय और सफाई की सुविधा थी, वह भी नहीं रह गई। इस स्थिति में औरतें और लड़कियां सबसे अधिक संक्रमण की शिकार हुई हैं।

गाज़ा की आधी से अधिक आबादी अपर्याप्त जल और खाद्य आपूर्ति के चलते विकट परिस्थितियों में यूएनआरडब्लूए की सुविधाओं में शरण ले रही है, जहां खाद्य सप्लाई की कमी के कारण लोग भूख, कुपोषण, डिहाइड्रेशन और जलजनित बीमारियों के शिकार हुए हैं

यूएनआरडब्लूए के शुरुआती आंकलन के अनुसार 4600 विस्थापित गर्भवती महिलाओं और इन सुविधाओं में रहने वाले लगभग 400 नवजात शिशुओं के जीवन को खतरा है। तीव्र श्वसन संक्रमण के 22,500 मामले और डायरिया के 12,000 मामले पहले ही सामने आ चुके हैं, जो कुपोषण के उच्च दर को देखते हुए विशेष रूप से चिंताजनक है।

निरंतर और सुरक्षित पहुंच की कमी के बावजूद संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों ने गाज़ा में जीवन रक्षक दवाएं और उपकरण भेजे हैं जिनमें नवजात शिशुओं और प्रजनन स्वास्थ्य देखभाल के लिए आपूर्ति भी शामिल है। लेकिन गर्भवती महिलाओं, बच्चों और नवजात शिशुओं सहित नागरिकों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए और भी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है।

मानवतावादी एजेंसियों को गाज़ा में अधिक दवाएं भेजने व पानी तथा ईंधन लाने के लिए तत्काल निरंतर और सुरक्षित पहुंच की ज़रूरत है, जिसे बमबारी के चलते मुश्किल बना दिया गया है।

डब्लूएचओ के कर्मचारियों ने उठाया जोखिम

जब अस्पतालों को टार्गेट करके जमींदोज़ किया गया- जैसे गाज़ा का सबसे बड़ा अस्पताल अल-शिफ़ा पर जब बम बरसाये गए तो बहुत अधिक खतरा उठाकर रेड क्रिसेन्ट और डब्लूएचओ के कर्मचारियों ने हेलमेट और बुलट-प्रूफ जैकेट पहनकर मलबे में फंसे बच्चों को निकाला।

डब्लूएचओ ने एक बयान में कहा कि 31 ऐसे शिशुओं को बचाने का प्रयास किया जा रहा है, जो समय से पहले जन्मे हैं। इनमें से 11 नवजात शिशुओं की हालत बहुत गंभीर है। उन्हें दूसरे अस्पताल, और फिर इजिप्ट ले जाया जा रहा है, पर समय नहीं है कि उनके माता-पिता व परिजनों का तक पता लगाया जाए; इसलिए एक सार्वजनिक सूचना जारी कर दी गई है कि वे बाद में अपने बच्चों की पहचान करने के लिए मिस्र जाएं।

4 शिशु तो मर चुके हैं और संभावना है कि और भी मर सकते हैं। पर इन नन्हें बच्चों में से कइयों ने अपनी माताओं को खो दिया है क्योंकि वे प्रसव के समय संक्रमण की शिकार हो गईं या बमबारी में मारी गईं। कई शिशु तो अपने परिवार में इकलौते बचे हुए हैं।

11 नवम्बर के बाद से 40 से अधिक मरीज़ मर गए क्योंकि बिजली के अभाव में डायलिसिस मशीनें और वेंटिलेटरों ने काम करना बंद कर दिया। यहां बताना ज़रूरी है कि इज़राइल यह साबित करने पर आमादा है कि अस्पताल हमास का अड्डा है और वहां एक सुरंग पाई गयी है, जबकि यह वीडियो झूठा पाया गया है।

डब्लूएचओ ने अपने बयान में कहा कि अल-हेलाल अस्पताल, जहां बच्चों को चिकित्सा दी जा रही है, में भी अब बिजली नहीं रहेगी। तो मरीज़ों को मिस्र भेजना पड़ेगा। शनिवार को 2500 नागरिकों- जिनमें मरीज़, अस्पताल के स्टाफ और डब्लूएचओ व रेड क्रिसेन्ट के कर्मी थे, को अल-शिफ़ा अस्पताल खाली कर देना पड़ा क्योंकि वे सुरक्षित नहीं रह गया था। डब्लूएचओ ने उसे ‘डेथ ज़ोन’ तक कहा है।

11 प्रतिशत परिवारों की मुखिया औरतें, क्या होगा उनका भविष्य?

गाज़ा में लगभग आधी आबादी महिलाओं और बच्चों की है और 11 प्रतिशत परिवारों की मुखिया औरतें ही हैं। वर्तमान दौर में हज़ारों औरतें अपने पतियों को बमबारी में खो चुकी हैं। उन्हें ही अपने परिवार चलाने पड़ेंगे। और यह काम आसान नहीं होगा, क्योंकि उनके घर मलबे के ढेर बन चुके हैं, उनके पास रोज़गार नहीं होगा, और उनके बच्चे इज़राइली नरसंहार के बाद कई सालों तक ट्राॅमा में रहेंगे।

लम्बे समय तक भूखी रहने वाली महिलाएं अपने बच्चों को स्तनपान कराएं भी तो वे अपने और अपने बच्चों को कुपोषण का शिकार बनने से नहीं बचा पाएंगी; वे अनीमिया की शिकार बनेंगी और इस तरह मातृत्व व शिशु मृत्यु दर बढ़ेगा। तो हम समझ सकते हैं कि इन एकल औरतों का जीवन कितना जटिल है। कम से कम 5 लाख औरतें और लड़कियां अपने घर से बाहर हैं- वे खचाखच भरे शेल्टरों में या अस्थाई जगहों पर हैं, जहां उनकी कोई सुरक्षा नहीं हैं- कभी भी उनके आश्रय पर बमबारी हो सकती है या रेड पड़ सकती है।

फिलिस्तीनी युवतियां जंग के बीच बना रहीं वीडियो

जब संयुक्त राष्ट्र सेक्रेटरी जनरल ऐन्टोनियो गुटरेज़ ने बयान दिया कि ‘हमास का हमला वैक्यूम में नहीं हुआ था और 56 वर्षों से फिलिस्तीनी लोग घुटन में जी रहे थे’ तो यूएन के रिपोटर्स पर इज़राइल द्वारा वीसा बैन लगा दिया गया। अधिकतर इलाकों में इंटरनेट नहीं था। 39 पत्रकार, यहां तक कि अल जज़ीरा के ब्यूरो चीफ के परिवार को मार डाला गया। फिर भी बहुत सी बहादुर लड़कियां बम धमाकों के बीच वीडियो बनाकर सोशल मीडिया में डाल रही हैं।

वे रोती हैं, बमों के धमाके से सिहर जाती हैं, पर दृढ़ता से अपना फर्ज़ अदा कर रही हैं। 4 दिनों के सीज़फायर में बंधकों को रिहा किया जाएगा। आगे क्या होगा, यह देखना बाकी है, पर इज़राइल अपने मकसद में अब तक सफ़ल नहीं हुआ है, क्योंकि विश्वभर से फ़िलिस्तीन को समर्थन मिल रहा है और इज़राइल भयंकर अलगाव में है।

(कुमुदिनी पति, सामाजिक कार्यकर्ता और इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ की पूर्व उपाध्यक्ष हैं।)

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