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एमएसपी पर खरीद की गारंटी नहीं तो बढ़ोत्तरी का क्या मतलब है सरकार!

नई दिल्ली। किसानों के आंदोलन से घबराई केंद्र सरकार ने गेहूं समेत छह फसलों के एमएसपी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोत्तरी की घोषणा की है। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने बताया कि कैबिनेट ने गेहूं की एमएसपी में 2.6 फीसदी की बढ़ोत्तरी करने का फैसला लिया है। जबकि पिछले साल गेहूं के एमएसपी में 4.6 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई थी। बताया जा रहा है कि पिछले 10 सालों में यह सबसे कम बढ़ोत्तरी है।

एमएसपी वह दर है जिस पर सरकार किसानों से अनाज खरीदती है। और यह किसानों द्वारा लगायी गयी लागत के डेढ़ गुना लाभ के गणित पर आधारित होती है। गेहूं के न्यूनतम खरीद मूल्य में 2.6 फीसदी की बढ़ोत्तरी का मतलब है प्रति कुंतल पर 50 रुपये की बढ़ोत्तरी यानी आने वाले रवी सीजन में गेहूं का दाम 1975 रुपये प्रति कुंतल होगा। यह फैसला कैबिनेट कमेटी ऑन इकोनॉमिक अफेयर्स ने लिया है। गेहूं के अलावा जिन पांच दूसरी फसलों के एमएसपी रेट में बढ़ोत्तरी की गयी है उसमें चना, मसूर दाल, सूर्यमुखी, जौ, सफेद सरसों, सरसों शामिल हैं।

दशकों से रवी के सीजन के लिए एमएसपी की घोषणा अक्तूबर या फिर नवंबर में होती रही है। जब जाड़े में इनकी बुआई शुरू होती है। लेकिन इस बार एमएसपी की घोषणा संसद से किसानों से संबंधित उन दो बिलों को पास करने के तुरंत बाद कर दी गयी जिनमें खेती को ठेके पर देने की छूट दी गयी है साथ ही इस बात की भी इजाजत दी गयी है कि किसान अपनी फसलों के उत्पाद को परंपरागत मंडियों से बाहर भी बेच सकेंगे।

तोमर ने लोकसभा में कहा कि जब कांग्रेस पूरे देश को बता रही है कि कृषि विधेयकों को पारित करके एमएसपी और एपीएमसी को खत्म कर दिया गया है तब कैबिनेट का यह फैसला इस बात का प्रमाण है कि वे हमेशा बने रहेंगे।

विपक्षी दल और ढेर सारे किसान संगठन जिसमें आरएसएस से भी जुड़े किसान संगठन भी शामिल हैं, ने चेतावनी दी है कि इन विधेयकों के पारित हो जाने से एमएसपी रेजीम जैसी कोई चीज नहीं रहेगी। वे सरकार से इस बात की मांग कर रहे हैं कि वह एमएसपी की कानूनी गारंटी करे जिससे न केवल सरकारी एजेंसियां बल्कि प्राइवेट खरीदार भी उसी रेट पर अनाज खरीदने के लिए मजबूर हों। और यह खरीद मंडी के भीतर हो या कि बाहर उससे फर्क नहीं पड़ना चाहिए।

सवाल सबसे बड़ा यही है। सरकार अगर एमएसपी घोषित भी कर दे और उसकी उस दर पर खरीद की गारंटी न करे तो फिर भला उस एमएसपी का मतलब ही क्या रह जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि दोनों विधेयकों में एमएसपी शब्द तक दर्ज नहीं है। उसकी दर बढ़ाने और उस पर खरीद करने की तो बात ही दूर है। दरअसल जब किसानों को आजाद किए जाने की बात कही जा रही है तो वह यही बात है कि उन्हें अब अपना अनाज किसी भी रेट पर और कहीं भी बेचने की आज़ादी है।

अब कोई मूर्ख ही इस आजादी का मतलब नहीं समझ पाएगा। दरअसल यह आज़ादी नहीं बल्कि किसानों के मौत का फरमान है। जिसमें उनके लिए किसी लाभ की बात तो दूर अपनी लागत तक को वसूल कर पाना मुश्किल हो जाएगा। क्योंकि मंडियों से लेकर बाजार तक पर कारपोरेट कंपनियों का कब्जा हो जाएगा और वो अपने हितों और लाभ के हिसाब से उसे चला रही होंगी। जिसकी पहली शर्त होगी किसानों के अनाज को कम से कम कीमत पर खरीदना। किसानों को अपने अनाज की एमएसपी के रेट पर बिक्री की गारंटी तभी हो पाती थी जब सरकार एपीएमसी यानी एग्रिकल्चर प्रोड्यूस मार्केट कमेटियों के जरिये उनकी खरीदारी करवाती थी। और जगह-जगह उसकी मंडियां हुआ करती थीं। अब ये सभी मंडियां खत्म हो जाएंगी और उनमें कमेटी जैसी कोई व्यवस्था नहीं होगी। ऐसे में किसान औने-पौने दामों पर अपने अनाजों को बेचने के लिए मजबूर हो जाएंगे।

इसकी सच्चाई हाल में उत्पादित कपास और मक्के की फसलों में सामने आ गयी है। अभी जब सरकार ने अध्यादेश जारी करके इस कानून को लागू कर दिया था। तब कपास और मक्के की दो फसलें सामने आयी हैं। कपास का न्यूनतम समर्थन मूल्य 5825 रुपये था लेकिन किसान उसे 4000 रुपये के हिसाब से बेचने के लिए मजबूर हुए। यानी उन्हें घोषित एमएसपी पर अपने उत्पाद की कीमत नहीं मिल सकी। इसी तरह से मक्के के मामले में हुआ। मक्के की एमएसपी 1700 रुपये प्रति कुंतल थी लेकिन किसान उसे 700 रुपये प्रति कुंतल के हिसाब से बेचने के लिए मजबूर थे।

और कल जिस एमएसपी में 2.6 फीसदी की बढ़ोत्तरी की सरकार ने घोषणा की है वह पिछले 10 सालों में सबसे कम तो है ही। इसके साथ ही यह किसानों से डीजल और पेट्रोल की बढ़ी एक्साइज ड्यूटी की वसूली की भी भरपाई नहीं कर पाती है। ऐसे में समझा जा सकता है कि सरकार ने इस बीच जितनी किसानों से वसूली की थी उसकी भी उसे भरपाई नहीं कर सकी। ऐसे में इन्फ्लेशन की भरपाई करना तो बहुत दूर की बात है। उस पर तो विचार करने का सरकार के पास न तो मौका है और न ही पैसा। बहरहाल सरकार के इस एमएसपी से क्या होने जा रहा है अगर उस पर बिक्री की कोई गारंटी ही नहीं है।

(जनचौक न्यूज़ डेस्क)

This post was last modified on September 22, 2020 9:21 am

Janchowk

Janchowk Official Journalists in Delhi

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