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Monday, July 26, 2021

मंत्रिमंडल में फेरबदल: जिंदगी में मुसीबतों के नये दौर की शुरुआत तो नहीं?

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में फेरबदल से भले ही दुनिया में संदेश जाए कि उन्होंने कोरोना से मुकाबले में फेल हुई सरकार को सक्रिय करने के लिए निर्णायक कदम उठाए हैं, भारत के लोग जानते हैं कि यह सच्चाई नहीं है। मंत्रिमंडल को जो शक्ल उन्होंने दी है वह देश के लोकतंत्र पर आ रहे खतरों का ही संकेत दे रही है। लोगों को भले ही यह बढ़ा-चढ़ा कर कही गई बात लगे, लेकिन सच यही है कि देश एक ऐसे जनविरोधी दौर में पहुंच गया है जो आम लोगों के साथ-साथ अपनी बात कहने की आजादी को जरूरी मानने वालों के लिए कठिन रहेगा। यह उन लोगों के लिए भी कठिन होगा जो देश की संपदा को अमीरों के हाथ में जाने देने के खिलाफ हैं।

मंत्रिमंडल में शामिल किए गए चेहरों को देखकर यह साफ हो जाता है कि अब प्रधानमंत्री मोदी तथा गृह मंत्री अमित शाह के हाथों में फैसले लेने की ताकत पहले से ज्यादा होगी और वे विरोधियों की आवाज को वे ज्यादा सख्ती से दबाएंगे। उन्होंने मंत्रिमंडल के उन सदस्यों को निकाल दिया है जिनके चेहरे जाने-पहचाने थे और जो दबावों के बावजूद कुछ फैसले कर लिया करते थे। मोदी-शाह फैसलों में मामूली दखलंदाजी सहने को तैयार नहीं हैं क्योंकि पश्चिम बंगाल के चुनावों में पराजय के बाद उन्हें सत्ता जाने का डर सताने लगा है।  

लेकिन इससे भी अहम बात यह है कि मोदी सरकार को अंदाजा हो गया है कि किसानों के बाद अब कामगार, बेरोजगार और छात्र सड़क पर उतरेंगे क्योंकि जीएसटी, नोटबंदी और कोरोना से मची तबाही के बीच भी देश की संपदा को अमीरों के हाथ में देने में मशगूल सरकार को आम लोगों की ओर ध्यान देने का वक्त ही नहीं मिला। कोरोना को रोकने के कदम उठाने तथा बीमार लोगों की जान बचाने के उपाय करने के बदले मोदी-शाह की जोड़ी बंगाल के चुनावों में निचले स्तर पर जाकर लड़ रही थी। यह कैसे संभव है कि इसके बाद भी विरोध की आवाज नहीं उठे? मंत्रिमंडल का यह विस्तार प्रतिरोध दबाने की तैयारी है। मोदी-2 के दूसरे फेज में एक निरंकुश शासन के लिए लोगों को तैयार रहना चाहिए।
लोगों को सत्ता के केंद्रीकरण तथा लोकतंत्र को कमजोर करने के इस नए अभियान में पहले से मजबूत बन गया आरएसएस भी पूरे दमखम से शामिल है। वास्तव में, मंत्रिमंडल के विस्तार का ब्लूप्रिंट भाजपा-आरएसएस की उन संयुक्त बैठकों में तैयार हुआ है जो उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनावों के लिए कई दिनों तक चलती रही हैं।

नए मंत्रिमंडल में उत्तर प्रदेश के जाति और क्षेत्र के समीकरणों के हिसाब से नए चेहरे शामिल किए गए हैं। मंत्रिमंडल में ओबीसी, दलितों, आदिवासियों तथा औरतों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व भी मिला है। इसका विश्लेषण मीडिया में बड़े उत्साह के साथ किया जा रहा है कि मोदी सरकार ने असरदार सोशल इंजीनियरिंग कर दी है। लेकिन सरकार की स्तुति गाने वाले यह सच नहीं बता रहे हैं कि सिर्फ चुनावी समीकरण ही नहीं बल्कि आम लोगों को सड़क पर उतरने से रोकने के लिए भी यह जरूरी है कि इन तबकों को प्रतिनिधत्व देने का नाटक किया जाए। इस तरह कुर्सी पर जा बैठने वाले कभी भी अपनी जाति या समुदाय के प्रतिनिधि नहीं होते बल्कि हक पाने के रास्ते में बाधक होते हैं।  

मंत्रिमंडल के गठन में अपनाए गए तरीके में भी तानाशाही के संकेत हैं। पूरे घटनाक्रम पर गौर करें तो यह साफ हो जाता है कि गोदी मीडिया सरकार का भोंपू भले ही बन जाए, पार्टनर नहीं बन सकता है। कैबिनेट विस्तार की सूचना उसे दे दी गई, लेकिन उसे न तो इसकी भनक लगने दी गई कि कितने लोगों को शामिल किया जा रहा है और न ही उसे यह बताया गया कि किन लोगों को हटाया जा रहा है। एक प्रमुख चैनल के जाने-पहचाने चेहरे ने निराश होकर कहा भी कि यह तस्वीर तो आ गई है कि मंत्रिमंडल में शामिल किए जा रहे नए सदस्यों को प्रधानमंत्री संबोधित कर रहे हैं, लेकिन मास्क के कारण उन्हें पहचानना संभव नहीं हो रहा है। इसी तरह विभागों के वितरण की जानकारी भी आधिकारिक सूची जारी होने के बाद ही मीडिया के पास पहुंची। इस पूरी कहानी का सार यही है कि मोदी के कार्यकाल के दूसरे फेज में सूचना तक लोगों की पहुंच और भी कम हो जाएगी। इससे अंदाजा मिलता है कि अघोषित आपातकाल के इस नए फेज में सूचना पर सेंसरशिप कितना सख्त होगा। अब एक ज्यादा अपारदर्शी शासन हमारे सामने आ खड़ा हुआ है।  

मीडिया सिर्फ नए मंत्रियों के बारे में ही अंधेरे में नहीं रहा बल्कि शपथ-ग्रहण के ठीक पहले तक उन मंत्रियों का नाम भी नहीं जान पाया जिन्हें दरवाजा दिखा दिया गया। मंत्रिमंडल से बाहर किए गए दो सबसे महत्वपूर्ण चेहरों-रविशंकर प्रसाद तथा प्रकाश जावड़ेकर के बाहर होने की खबर देर शाम को ही मिल पाई। प्रसाद और जावड़ेकर सालों से मीडिया के चहेते थे और पार्टी प्रवक्ता के रूप में हर चैनल तथा अखबार में घरेलू नाम थे। लेकिन मीडिया को उनके आंसू पोंछने की हिम्मत भी नहीं हुई। एक भी कैमरा उन तक पहुंचने की कोशिश करते नहीं दिखा। उलटे सरकार के मीडिया मैनेजरों ने उनकी अक्षमता के किस्से चला दिए। बताया जाने लगा कि वे मोदी के मिशन को पूरा करने में फेल रहे। प्रसाद के बारे में यह बताया जा रहा है कि उन्होंने गांव-गांव तक नेट पहुंचाने का मोदी का सपना पूरा नहीं किया। किस्सागोई का इससे बेहतर नमूना क्या हो सकता है कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को धूल चटाने का सपना पाल रहे मोदी के पास भारत के गांवों के लिए भी एक सपना था और हारने के बाद उन्हें यह अचानक याद आ गया। मीडिया के पास बच्चों को सुनाई जाने वाली ऐसी और भी कहानियां आएंगी।

ऐसी बात नहीं है कि पत्रकारों को असली कहानी समझ में नहीं आती है। लेकिन उनके हाथ-पांव और दिमाग बंधे हैं। प्रसाद, जावड़ेकर और हर्षवर्धन के जाने की कहानी को समझने के लिए उनकी जगह लाए गए चेहरों को जानना जरूरी है। प्रसाद की जगह आईटी तथा संचार मंत्री बनने और पीयूष गोयल जैसे प्रधानमंत्री के चहेते से रेल मंत्री हथियाने वाले अश्विनी वैष्णव जीई इलेक्ट्रोनिक तथा सीमेंस कंपनी के मुलाजिम रह चुके हैं जो रेल विभाग के लिए इंजन बनाने से लेकर कई तरह के कामों में लगी है। सीमेंस तो प्राईवेट ट्रेनों को चलाने का काम भी लेने की कोशिश में हैं। इन दो कंपनियों ने रेल की सरकारी कंपनियों को बंद होने की कगार पर पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई है। सीमेंस तो अडानी समूह से इस तरह जुड़ा हुआ है कि ग्रेटा थनबर्ग जैसे पर्यावरणवादियों की अपील के बाद भी आस्ट्रेलिया के उस कोयला खनन के प्रोजेक्ट से अलग नहीं हुआ जिसके विरोध में वहां के स्थानीय आदिवासी खड़े हैं। जीई भी अंबानी से जुड़ा है। इन कंपनियों का आईटी कारोबार भी बहुत बड़ा है। इन कंपनियों से प्रसाद के वैसे ताल्लुकात नहीं हो सकते थे जैसे नए मंत्री वैष्णव के हैं। रेल को प्राइवेट हाथों में देने का काम वह बेहतर ढंग से कर सकते हैं।

कोरोना महामारी को संभालने का ठीकरा भले ही हर्षवर्धन पर फोड़ दिया गया, लेकिन इसमें उनकी कोई भूमिका नहीं थी। सारे फैसले तो प्रधानमंत्री कार्यालय और टास्क फोर्स वाले ले रहे थे, हर्षवर्धन का काम तो मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के सवालों का जवाब देना था। वह भी प्रधानमंत्री कार्यालय की सहमति के बगैर संभव नहीं था। उनकी छुट्टी का एक और कारण उनका डॉक्टर होना था। यही वजह है कि उन्होंने बाबा रामदेव को डाक्टरों के खिलाफ दिए गए बयान को वापस लेने के लिए चिट्ठी लिख दी। प्रधानमंत्री मोदी से लेकर तमाम भाजपाई कोरोना काल में भी योग और आयुर्वेद को प्रमोट करने में लगे हैं, वैसे में कोरोना वायरस तथा वैक्सीन के वैज्ञानिक पहलुओं को जानने वाले की क्या जरूरत है? उनकी जगह लेने वाले मनसुख मंडाविया ‘मोदी हैं तो मुमकिन है’ के ब्रांड को मजबूत करने वालों में से हैं। वे दवा कंपनियों के चहेते हैं और केमिकल राज्य मंत्री के रूप में उन्होंने कोरोना काल में दवा कंपनियों की ओर से हुई लूट के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया। हाथ जोड़ कर बीच-बीच में उनसे दाम कम होने की घोषणा करवा दी, भले ही रेमडेसिविर जैसी दवाई बाजार में उस दाम पर लोगों को मिली ही नहीं। वह आयुर्वेद में भी गहरी रूचि लेते हैं और डाक्टरों के साथ अगर बाबा रामदेव जैसों का पंगा होगा तो वह किधर रहेंगे यह समझना मुश्किल नहीं है।

जावड़ेकर की जगह लेने वाले अनुराग ठाकुर के खिलाफ चुनाव आयोग को दिल्ली विधान सभा चुनावों के समय दिए गए नारे ‘देश के गद्दारों को गोली मारो…….’ के लिए कार्रवाई करनी पड़ी थी। उन पर सेंसरशिप कानून में संशोधन कराने तथा आईटी नियमों को लागू कराने की जिम्मेदारी है। दोनों को लेकर फिल्मी दुनिया में काफी बेचैनी है। प्रस्तावित सेंसरशिप कानून में सेंसर बोर्ड से पास फिल्मों के प्रमाण-पत्र वापस लेने का प्रावधान है। सबसे बड़ी जिम्मेदारी प्रधानमंत्री की गिरती छवि को बचाने की है। इस काम को पूरा करने में प्रसाद और जावड़ेकर ने बहुत जोर लगाया, लेकिन फेल हो गए। अब यह देखना है कि नए मंत्री कितना सफल होते हैं। लेकिन इतना तो तय है कि अघोषित आपातकाल के इस फेज में अभिव्यक्ति की आजादी और भी मुश्किल में रहेगी।
(अनिल सिन्हा वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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