Tuesday, January 18, 2022

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क्या मोदी की हो गयी उल्टी गिनती की शुरुआत?

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क्या योगी आदित्यनाथ और नरेन्द्र मोदी के बीच संघर्ष खत्म हो गया है? क्या आरएसएस दोनों के बीच समन्वय बनाने में सफल रहा है? संघ की दिल्ली बैठक में तय हुआ है कि योगी ही यूपी चुनाव में चेहरा होंगे। इतना ही नहीं आने वाले तमाम विधानसभा चुनावों में स्थानीय क्षत्रपों को ही आगे किया जाएगा। मोदी बड़ी-बड़ी रैलियों में स्टार प्रचारक होंगे। इससे एक सवाल पैदा होता है। क्या मोदी ब्रांड की गिरती साख से आरएसएस भी घबराया हुआ है? क्या आरएसएस ने मान लिया है कि गिरती लोकप्रियता के कारण मोदी का चेहरा अब चुनाव जीतने की गारंटी नहीं है? क्या बंगाल चुनाव में भाजपा की हार और कोरोना आपदा में कुप्रबंधन ने मोदी के इमेज को इतना नुकसान पहुंचा दिया है? 

विधानसभा चुनावों से मोदी को दूर रखने की आरएसएस की क्या कोई रणनीति है ? आरएसएस ने बंगाल का उदाहरण देते हुए कहा है कि मोदी के चेहरे पर होने वाले विधानसभा चुनावों में पराजय से मोदी की इमेज को धक्का लगता है। विरोधी मोदी को टारगेट करते हैं। इसलिए आरएसएस के शताब्दी वर्ष यानी 2024 में लोकसभा चुनाव के लिए मोदी की इमेज को सुरक्षित रखना जरूरी है।

मोदी के लिए 2024 में चुनावी हैट्रिक और योगी को यूपी की कमान देकर क्या संघ ने भाजपा में होने वाली अंतरकलह को समाप्त कर दिया है? योगी आदित्यनाथ सन्यासी होने के कारण हिंदुत्व का स्वाभाविक चेहरा तो हैं ही,उनमें एक एग्रेशन भी है। इसके साथ योगी अति महत्वकांक्षी भी हैं। बेहद कम उम्र में राजनीति की शुरुआत करने वाले योगी 45 साल की उम्र में देश के सबसे बड़े सूबे यूपी के सीएम बने। गौरतलब है कि 2017 का विधानसभा चुनाव भाजपा ने नरेंद्र मोदी के चेहरे पर लड़ा था। तीन चौथाई से अधिक सीटें जीतने के बावजूद नरेंद्र मोदी अपनी पसंद के मनोज सिन्हा को मुख्यमंत्री नहीं बना सके। माना जाता है कि संघ के दबाव में योगी आदित्यनाथ को सीएम बनाया गया था।

लगभग एक ही मिजाज वाले मोदी और योगी में 2017 से ही एक अंदरूनी संघर्ष शुरू हो गया था। योगी की बढ़ती महत्वाकांक्षाएं और मोदी के एकाधिकारवादी स्वभाव में टकराव होना अवश्यंभावी है। मोदी में एक उपराष्ट्रवादी गुजराती भावना भी है। मोदी अपने खासम खास गृह मंत्री अमित शाह को आगे बढ़ाना चाहते हैं। लेकिन कुछ विश्लेषकों का मानना है कि 2017 में योगी के माध्यम से आरएसएस आने वाली राजनीति की नई इबारत लिख रहा था। माना जाता है कि नरेंद्र मोदी आरएसएस की पसंद नहीं बल्कि मजबूरी हैं। आरएसएस कभी नहीं चाहता कि पार्टी के ऊपर कोई व्यक्ति हावी हो जाए। लेकिन मोदी ने आरएसएस की बहुत परवाह ना करते हुए 2007 के बाद ही अपनी ब्रांडिंग शुरू कर दी थी। गुजरात का सीएम बनने के बाद मोदी ने खासतौर पर गोधरा दंगों से उपजी हिंदू हृदय सम्राट की छवि का इस्तेमाल करके तमाम स्थानीय क्षत्रपों की राजनीतिक साख को ध्वस्त कर दिया था।

इसके बाद मोदी ने दुनिया के तमाम हिस्सों में बसे गुजराती व्यवसायियों से अपने संबंध जोड़े। 2007 के चुनाव से पहले होने वाले ‘वाइब्रेंट गुजरात समिट’ में भी देसी उद्योगपतियों के साथ साथ एनआरआई उद्योगपति शामिल हुए थे। एनआरआई गुजरातियों के बीच मोदी ने अपनी एक साख बनाई। 2007 का चुनाव भी मोदी ने बड़े बहुमत के साथ जीता। इसके बाद उन्होंने ‘दिल्ली सल्तनत’ को ललकारना शुरू किया। मोदी दिल्ली के लाल किले से देश को संबोधित करने की तैयारी करने लगे। संभवतया, पहली बार मोदी आरएसएस से टकराए। मोदी ने आरएसएस की अनेक नीतियों से खुद को अलग कर लिया। संरक्षणवादी स्वदेशी अर्थव्यवस्था को छोड़कर मोदी वैश्वीकरण और मुक्त अर्थव्यवस्था की बात करने लगे। इसके बाद निरंतर मोदी आरएसएस पर अपनी निर्भरता कम करते गए।

2012 का चुनाव जीतकर मोदी ने हैट्रिक बनाई। लेकिन इस चुनाव से पहले उन्होंने विवेकानंद की आध्यात्मिकता को ओढ़कर दिल्ली पर चढ़ाई करने की तैयारी कर ली थी। इधर गुजरात की जीत और उधर यूपीए सरकार पर लगने वाले भ्रष्टाचार के आरोप मोदी के लिए मानो रास्ता तैयार कर रहे थे। 2012 से दिल्ली में यूपीए सरकार के खिलाफ शुरू हुए जन आंदोलनों ने कांग्रेस की इमेज को ध्वस्त कर दिया था।

मोदी अपने पूंजीपति मित्रों, एनआरआई गुजरातियों और दुनिया के तमाम तकनीकी कौशल से संपन्न लोगों के साथ अपना मेलजोल बढ़ाते हुए प्रधानमंत्री पद की दावेदारी को पुख्ता कर रहे थे। यह मौका उन्हें पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने दिया। प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने के बाद मोदी ने चुनाव प्रबंधन अपने हाथ में ले लिया। चारों तरफ उनकी ही ब्रांडिंग थी। आरएसएस व्यक्तिवाद को बढ़ावा नहीं देना चाहता था। लेकिन मोदी अपनी ब्रांडिंग के जरिए आरएसएस की मजबूरी बन गए थे। मोदी ने अपनी भाषण कला और कुशल चुनावी प्रबंधन से खुद को साबित किया। यह चुनाव भाजपा ने पूर्ण बहुमत के साथ जीता। इसके साथ ही मोदी भाजपा और संघ पर भी हावी होते गए। लेकिन आरएसएस के लिए अपना एजेंडा अपरिहार्य था। मोदी ने राम मंदिर और धारा 370 जैसे एजेंडे को लागू किया।

बावजूद इसके माना जाता है कि नरेंद्र मोदी के एकाधिकारवादी व्यवहार से आरएसएस खुश नहीं है। मोदी अमित शाह को अपने उत्तराधिकारी के रूप में आगे बढ़ाना चाहते हैं। लेकिन आरएसएस ऐसा नहीं चाहता। माना जाता है कि इसीलिए आरएसएस ने योगी आदित्यनाथ को यूपी का सीएम बनाकर आगे की रणनीति तय कर रखी थी। इसीलिए योगी की महत्वाकांक्षाओं को पंख लगे हुए हैं। योगी और मोदी के बीच अभी भले ही सीजफायर हो गया हो, लेकिन यह संघर्ष आने वाले दौर में और तेज हो सकता है। इस संघर्ष में कौन 2024 का खेवनहार होगा, अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। मोदी अपने प्रतिद्वंद्वी को कतई नहीं बख्शते। लेकिन योगी के साथ आरएसएस ढाल बनकर खड़ा हुआ है। संघर्ष दिलचस्प होगा। लेकिन डर इस बात का है कि मोदी और योगी द्वारा खुद को हिंदुत्व का बड़ा अलंबरदार साबित करने में कहीं मानवता लहूलुहान ना हो जाए!

(रविकांत लखनऊ विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।)

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