चंदौली जिले के काली महाल की तंग गलियों से गुज़रते हुए हम राजकुमारी के घर की तरफ़ बढ़े। इसी बीच कुछ बच्चे हमारे पास आए और पूछा आप वहीं जाना चाहता हैं, जिनकी मौत हो गई है? ये बच्चे हमें राजकुमारी के घर ले गए, जिनके 25 वर्षीय बेटे लोहा सिंह की 08 मई 2024 की रात सेप्टिक टैंक की सफाई करते हुए मौत हो गई थी।
62 वर्षीय राजकुमारी मुगलसराय नगर पालिका में सफाई कर्मचारी थीं। दो साल पहले ही वो रिटायर हो गई थीं। इनके तीन बच्चे थे। सबसे बड़े बेटे का नाम लोह और छोटे का तांबा था। 17 वर्षीया बेटी संजना दिमागी रूप से अस्वस्थ है। यही हाल छोटे बेटे तांबा का है। परिवार का खर्च चलाने के लिए बड़ा बेटा लोहा सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई का काम करता था।

मुगलसराय में आठ मई की रात एक मकान के सेप्टिक टैंक की सफाई करते हुए चार जिंदगियां अचानक हाथ से फिसल गई थीं, जिनमें नौजवान लोहा भी शामिल था। जहरीली गैस ने टैंक के अंदर जाने वाले लोगों को चीखने तक का मौका नहीं दिया।
बड़े बेटे को खो चुकीं राजकुमारी बच्चों के साथ अपने जर्जर आवास में गुमसुम और उदास सी बैठी थीं। वहां कुछ पास-पड़ोस के बच्चे और औरतों थी। कमरा भी करीब 6×8 का रहा होगा, जहां एक चौकी रखी थी। उन चौकियों पर फटे और मैले-कुचैले कपड़े थे। कुछ कपड़े तख्त के ऊपर गठरी बांधकर रखे थे। घर में न शैचालय है और न ही हैंडपंप। पड़ोसी जेट पंप से पानी देते हैं। इस परिवार में कमाई का इकलौता ज़रिया रहे लोहा के दुनिया से जाने का दुख इस छोटे से कमरे में ज़्यादा बड़ा जान पड़ता है।

ग़रीबी, लाचारी, बेटे की मौत और अपने दुख व भविष्य की चिंता में डूबी राजकुमारी से मुलाकात हुई तो उनकी आंखें छलछला उठीं। सुबकते हुए वह कहती हैं, ” एक बरस पहले ही हमने धानपुर इलाके के तोरवां गांव में लोहा की धूमधाम से शादी कराई थी। लोहा की पत्नी सुरमिला अब हमारे साथ रहने के लिए तैयार नहीं है। बेटा लोहा कायदे से लिख-पढ़ नहीं पाया। बचपन से उसने हमारे हाथों में छाड़ू और पोछा देखा। हम उसे खूब पढ़ने के लिए कहते थे। मेरे पति चाहते थे कि हमारे बच्चे उनके जैसा काम न करें और एक दिन बड़ा अफ़सर बनें। दस बरस पहले हमारे पति राजू की मौत हुई और अब जवान बेटे की मौत मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रही है।”

राजकुमारी के पास बैठी रंजू ने शिकायती लहजे में कहा, “पिछले दो दिनों से सुबह से मीडिया वाले आ रहे हैं। कोई इस ग़रीब को न्याय भी दिलाएगा या ऐसे ही आ रहे हैं।” कुछ पूछने से पहले ही पड़ोस की महिलाएं कहती हैं, “आप बस इस ग़रीब परिवार को इतना मुआवजा दिला दीजिए ताकि वो अपने दोनों मंद बुद्धि वाले बच्चों को पाल सकें।”
लोहा की मां राजकुमारी बताती हैं, “हमारा बेटा बहुत दिलेर था। वो किसी काम के लिए कभी मना नहीं करता था। कभी बेलदारी, कभी मिस्त्री तो कभी सीवर या नाले की सफ़ाई के लिए चला जाता था। कई दिनों के बाद सेप्टिक टैंक की सफाई का काम मिला था। हमारे पड़ोसी विनोद उसे अपने साथ ले गए थे। टैंक के मालिक ने सफाई के तत्काल बाद मुंहमांगा पैसा देने की बात कही थी। सफ़ाई के दौरान उनकी मौत हो गई। उस समय उनके पास सुरक्षा के उपकरण नहीं थे। मालिक ने सफाई के लिए रस्सी भी नहीं दिया था।”
सेप्टिक टैंक निगल गया चार जिंदगियां
मुगलसराय के लाठ नंबर-दो निवासी भरतलाल जायसवाल के घर 08 मई 2024 की रात सीवर टैंक में रात करीब 11 बजे सफाई शुरू हुई। कालीमहाल निवासी सफाईकर्मी विनोद रावत (35), कुंदन (42) और लोहा (25) सेप्टिक टैंक सफाई का कार्य कर रहे थे। सेप्टिक टैंक करीब आठ फुट गहरा था। वो दो टैंक साफ कर चुके थे और आखिरी टैंक से सिल्ट निकलाने के लिए तीनों बारी-बारी से अंदर घुसे, लेकिन बाहर नहीं निकले। इन्हें बचाने के लिए मकान मालिक का इकलौता बेटा अंकुर जायसवाल (23) रस्सी के सहारे टैंक में उतरने प्रयास करने लगा। इसी बीच रस्सी खुल गई और वह भी टैंक में गिर गया।

चीख-पुकार के बाद मौके पर भारी भीड़ जमा हो गई। किसी तरह से चारों को टैंक से बाहर निकाला गया, लेकिन डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस घटना पर दुख व्यक्त करते हुए सोशल हैंडल एक्स पर सभी की आर्थिक मदद देने की बात कही। बाद में मुगलसराय नगर पालिका के अधिशासी अधिकारी रोहित सिंह ने सफाई कर्मचारियों के पीड़ित परिवारों को दस-दस हजार रुपये की सहायता दी।

लोहा के पड़ोस में ही सफाई कर्मचारी विनोद का भी घर है। इनकी मां लक्ष्मीना का रोते-रोते गला बैठ गया है। उन्होंने गले में चूना लगा रखा था, ताकि वो किसी से बात कर सकें। विनोद के चार बेटे हैं, जिनमें सबसे बड़ा बेटा विवेक 19 साल, अभिषेक 17 साल, रोहन 13 साल और ऋषभ 07 साल का है। विनोद अपनी बड़ी बेटी मुस्कान के हाथ पीले कर चुके हैं। विनोद के अलावा परिवार में कोई व्यक्ति ऐसा नहीं था जो दो वक्त की रोटी का जुगाड़ कर सके।

विनोद की मां लक्ष्मीना नगर निगम में परमानेंट सफाई कर्मचारी पद पर तैनात थी। चार महीने पहले ही वो रिटायर हुई थीं, लेकिन उन्हें आज तक फूटी कौड़ी नहीं मिली। न अर्जित अवकाश का पैसा मिला और न ही दूसरा बकाया। फंड का पैसा भी नहीं मिल सका है। लक्ष्मीना कहती हैं, “पालिका के अफसर ठेकेदारों का पैसा तो समय पर दे देते हैं, लेकिन सफाई कर्मचारियों का पैसा रोक देते हैं। पिछले साल सफाई कर्मचारियों ने वेतन के लिए लगातार एक हफ्ते तक आंदोलन और अनशन किया था। फिर भी कोई नतीजा नहीं निकला। दिवाली के समय एक महीने का पैसा मिला था। बाकी पैसा कब मिलेगा, पता नहीं है? नगर पालिकाध्यक्ष किन्नर सोनू वोट मांगने आई थीं तब उन्होंने कहा था कि तुम लोग चिंता मत करो। हम अपना गहना बेचकर पैदा देंगे। चुनाव जीतने के बाद वो इधर झांकने तक नहीं आईं।”
पेट पालने की लाचारी में गई जान
विनोद की पत्नी सुनीता का रो-रोकर बुरा हाल है। वह कहती हैं, “हमारे पति बचपन से ही सफाई का काम करते थे। इन दिनों वह नगर पालिका में अनुबंध (आउट सोर्सिंग) पर सफाई का काम करते थे। पिछले 11 महीने से नगर पालिका ने मजूरी नहीं दी। लाचारी में उन्हें प्राइवेट काम करना पड़ रहा था। नगर पालिका के अधिशासी अधिकारी रोहित सिंह ने हमें सिर्फ दस हजार रुपये सहायता दी है। ये पैसा आखिर कितने दिन चलेगा? हमारे बच्चों का अब कोई सहारा नहीं है? “
सुनीता कहती हैं, “हमारे पति विनोद टैंक में अंदर गए तो जहरीली गैस के गुबार में फंस गए और उनका दम घुट गया। हम तत्काल मौके पर पहुंचे और चीखने-चिल्लाने लगे। इलाके के लोगों ने सभी को अचेत हालत में सेप्टिक टैंक से बाहर निकाला। सभी लोग हाथ से ही काम कर रहे थे। मकान मालिक ने कोई उपकरण नहीं दिया था। यहां तक कि मास्क तक नहीं दिया। पुलिस ने इस मामले में रिपोर्ट तो लिखी है, लेकिन उसमें सफाई कर्मचारी मैनुअल (स्कैवेंजर्स अधिनियम की धारा 7 और 9) के तहत मामला दर्ज नहीं किया गया है। कानून के मुताबिक, सैफ्टी टैंक की सफाई के लिए फेस मास्क, गैस सिलेंडर, वर्दी सुरक्षा के उपकरण मकान मालिक को मुहैया कराना चाहिए था। सैप्टी टैंक बहुत छोटा था। उसमें न बैठकर जाया जा सकता था और न ही खड़े होकर।”
घटना के एकमात्र चश्मदीद गवाह दीपू भी सफाई का काम करता है। मौके पर मौजूद था, लेकिन वो सेप्टिक टैंक में नहीं उतरा। वह कहता है, “हमें किस्मत ने बचा लिया। हमें पहले ही एहसास हो गया था कि टैंक में जहरीली गैस हो सकती है। हम जानते थे कि इस गैस से जान को ख़तरा होता है। इसके लिए फेस मास्क, वर्दी, ऑक्सीजन गैस सिलेंडर जैसे उपकरणों की ज़रूरत पड़ती है। गैस सिलेंडर केवल 20 मिनट तक ही चलता है इसलिए इस तय सीमा में अंदर से बाहर आना होता है। सफाई करने वाले लोगों के पास कोई सुरक्षा का उपकरण नहीं था।”

सेप्टिक टैंक में जान गंवाने वालों में 45 वर्षीय कुंदन भी थे। इनकी 40 वर्षीय पत्नी गीता देवी मुगलसराय नगर पालिका में मुलाजिम हैं। वो भी सफाई का काम करती हैं। दोनों को बच्चे नहीं थे तो अपने भतीजे अमित को गोद ले लिया। अमित अपनी पत्नी कबूतरी के संग कुंदन के घर बेटे की तरह रहता है। उसका दो साल का बेटा है। गीता को ज्यादा आर्थिक दिक्कत नहीं है, लेकिन पति के खोने के गम से वो बेहाल हैं। हम गीता के घर पहुंचे तो उनके घर चूल्हे पर सब्जी पक रही थी। इनके कई रिश्तेदार भी मौजूद थे। हर किसी को सरकार और नगर पालिका प्रशासन के निकम्मेपन से शिकायत थी। सभी का यही कहना था कि नगर पालिका वाले सुरक्षा के उपकरण नहीं देते। जान चली जाती है और वो देखते रहते हैं।
सफाई कर्मचारियों को बचाने की फेर में मकान मालिक भरतलाल जायसवाल ने अपने इकलौते बेटे अंकुर के भी खो दिया है। 23 वर्षीय अंकुर नई सट्टी में अपने पिता के कबाड़ में हाथ बंटाया करता था। अंकुर की मौत के बाद पिता भरत और मां चंदा देवी, बहन निर्जला का रो-रोकर बुरा हाल है। बेटे के गम में चंदा ने पिछले तीन दिनों से एक अन्न नहीं खाया है। वो फूट-फूटकर रो-रो रही थीं और बार-बार बेहोश हो रही थीं। होश में आने पर वह कहती हैं कि वह जिंदा नहीं रह पाएंगी। जिस बेटे को पालने में हमने न जाने कितने जतन किए, वो अब रहा नहीं। अब किसके लिए और क्यों जिंदा रहें?”
अंधेरे सीवरों में बसती है मौत
मुगलसराय के कालीमहाल में सफाई कर्मचारियों की एक छोटी सी बस्ती है, जहां वो तंग कमरों में रहते हैं। इनका जीवन स्तर दयनीय है। ज्यादातर सफाई कर्मचारियों के मकानों के प्लास्टर छूट गए हैं। यहीं हमें मिले शिवा। वो नगर पालिका में अनुबंध पर सफाई का काम करते हैं। “जनचौक” से बातचीत में कहते हैं, “हम सड़कों के अलावा सीवर की सफाई भी करते हैं। तीन लोगों की मौत के लिए अगर कोई जिम्मेदार है तो वो है सरकार और नगर पालिका प्रशासन। अनुबंध पर सफाई करने वाले कर्मचारियों का वेतन पिछले 11 महीनों से बकाया है। पिछले साल होली पर पैसा मिला था। उसके बाद से ही सफाई कर्मचारी वेतन का इंतजार कर रहे हैं। पालिका के अफसर पूरे दिन काम कराते हैं और पैसे मांगने पर कहते हैं कि काम छोड़कर चले जाओ। सभासद के यहां जाते हैं तो वो भी इसी तरह का रेकार्ड बजाना शुरू कर देते हैं।”

शिवा का यह भी कहना था कि इन अंधियारे सीवरों में मौत बसती है। कभी-कभी मैला पानी उनकी नाक की उंचाई तक चला जाता है। कई बार जाम सीवर को साफ करने के लिए एक हाथ में बांस की खपच्ची और हाथ में लोहे का कांटा लेकर काम करना पड़ता है। काला पानी गैस का पानी होता है। वही गैस सफाई कर्मचारियों की जान ले लेती है। आमतौर पर वही लोग मरते हैं जब वो बिना देखे घुस जाते हैं। तीन सौ रुपये कमाने के लिए सफाई कर्मचारियों को नाले में पाए जाने वाले सांप, मेढक, बिच्छू जैसे जंतुओं से भी मुकाबला करना पड़ता है।
शिवा को इस बात का भी रंज है कि सरकार हर साल लाखों लाख नए शौचालय बनाने की बात करती है, लेकिन उनके लिए बनाए जा रहे पिट्स या गड्ढ़ों को साफ़ करने के बारे में कोई नहीं सोचता। शिवा कहता है, “हम अनपढ़ हैं। हमारे पास कोई काम नहीं है। परिवार को पालने के लिए हमें ये काम करना पड़ता है। अगर हम बंद सीवर के बारे में पूछते हैं तो अफ़सर कहते हैं, आप इसमें घुसिये और काम करिए। पेट के लिए हमें करना पड़ता है। कई बार हम अपनी पत्नी और बच्चों को नहीं बताते, क्योंकि ये गंदा काम होता है। हम कह देते हैं कि हम मज़दूरी करते हैं।”
“हम सोचते हैं कि अगर हमने उन्हें सच बता दिया तो वो हमसे नफ़रत करने लगेंगे। कुछ लोग शराब भी पीते हैं। मजबूरी में आंख मीचकर काम करते हैं। लोग हमें दूर से पानी देते हैं। कहते हैं कि वहां रखा है, ले लो। बहुत से लोग हमसे नफ़रत करते हैं क्योंकि ये गंदा काम है। हम अगर नफ़रत करेंगे तो हमारा परिवार कैसे चलेगा। हम दूसरों की गंदगी साफ करते हैं। हमारी सबसे बड़ी पीड़ा यह है कि समाज में हमें हेय नज़र से देखा जाता है। एक तरह से समाज भी सफाई कर्मचारियों को कूड़ा-करकट ही समझता है। कूड़े के डम्पिंग ग्राउंड के आसपास कैंटीन अथवा चेंजिंग रूम जैसी सुविधाएं नहीं हैं, ताकि वे अपने कपड़े बदल सकें या आराम कर सकें।”

शिवा के एक साथी ने अपना नाम नहीं बताने की शर्त पर ‘जनचौक’ से कहा, “कुछ लोग तो जान जोखिम में डालकर ज़हरीली गैस से भरे चैंबरों में घुस कर सफ़ाई करते हैं। मुगलसराय में सिर्फ दो सौ सफाई कर्मचारी हैं, जिनमें कुछ लोग सीवर साफ करते हैं। आबादी के आधार पर इस शहर की सफाई के लिए कम से कम एक हजार सफाई कर्मचारियों की जरूरत है। नगर पालिका के पास वेतन देने के लिए पैसे नहीं हैं, इसलिए एक सफाई कर्मचारी को चार-चार लोगों का काम करना पड़ता है। भीषण गंदगी के चलते मुगलसराय में हर साल हैज़ा, टाइफ़ाइड, हेपेटाइटिस और प्लेग जैसी कई घातक बीमारियां फैलती हैं।”
मुगलसराय नगर पालिका के अधिशासी अधिकारी रोहित सिंह दो महीने पहले ही यहां तबादले पर आए थे। वह कहते हैं, ” सफाई कर्मचारियों का पैसा राज्य वित्त आयोग से आता है। यहां कर्मचारियों का करीब छह करोड़ रुपये पहले से ही बकाया है। हम स्थिति को सुधारने की कोशिश कर रहे हैं। हमने काफी बैकलाक खत्म किया है। स्थायी कर्मचारियों को पहले दो महीने बाद सेलरी मिलती थी और अब एक महीने का बैकलाक रह गया है। यहां पहले 293 आउट सोर्सिंग वाले सफाई कर्मचारी थी। साल 2023 में नगर पालिका बोर्ड की बैठक के बाद इनकी संख्या घटाकर दो सौ कर दी गई। यहां मुकम्मल सफाई व्यवस्था करा पाना आसान नहीं है।
देश में 1550 से ज्यादा मौतें
सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन संस्था की ओर से जुटाए गए आंकड़ों के मुताबिक 1993 से अब तक पूरे भारत में हुईं करीब 1550 मौतों के दस्तावेज़ मिले हैं। हालांकि असल संख्या इससे कहीं ज़्यादा है। ज़्यादातर सफ़ाई कर्मचारी शराब पीते हैं। इनमें से कई लोगों पर शराब के नशे में अपनी बीवी और बच्चों को मारने-पीटने के भी आरोप अक्सर लगते रहते हैं। देश में लाखों लोग आज भी इस काम से जुड़े हैं। इनमें ज़्यादातर दलित हैं। सीवर में मौतें हाईड्रोजन सल्फ़ाइड के कारण होती हैं। सीवर में काम करने वालों को सांस, चमड़ी और पेट की तरह तरह की बीमारियों से भी जूझना पड़ता है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, सफाई कर्मियों को पशुओं के मल-मूत्र, फेंके गए सड़े खाद्य पदार्थ, धातुओं के टुकड़े, तार, अस्पतालों से निकले कूड़े, कांच के टुकड़े, ब्लेड जैसी चीज़ों की सफ़ाई करनी पड़ती है। सफाई कर्मचारी सुबह छह बजे काम पर पहुंच जाते हैं। उन्हें हमेशा डर रहता है कि अगर उन्हें देर हुई तो सुपरवाइज़र उन्हें ग़ैरहाज़िर मान लेगा और उनकी जगह किसी दूसरे अस्थायी मजदूर को काम पर रख लेगा।
जब सफ़ाई कर्मी नालों में उतरते हैं तो अंदर घुप अंधेरा होता है। बाहरी दुनिया से उनका संपर्क पूरी तरह ख़त्म हो जाता है। ज़हरीली गैसों की चपेट में आने या फिसल जाने का ख़तरा रहता है। कई बार वे बेहोश हो जाते हैं। कई बार तो पानी और कूड़े के बहाव से भी मुश्किलें पैदा हो जाती हैं। इस तरह का काम शायद किसी भी शख़्स को नहीं करना चाहिए।
मैनुअल स्कैवेंजिंग (हाथ से मैला ढोना) को 1993 में अवैध कर दिया गया था। सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई को हाल ही में संशोधित अधिनियम 2013 में खतरनाक पाया गया था। मैनुअल स्कैवेंजर्स और उनके पुनर्वास अधिनियम, 2013 के रूप में रोजगार के निषेध के अनुसार, मैनुअल स्कैवेंजर्स के रोजगार, सुरक्षा उपकरणों के बिना सीवरों और सेप्टिक टैंक की हाथ से सफाई प्रतिबंधित है। इस अधिनियम के तहत उन्हें वैकल्पिक रोजगार प्रदान करके मैनुअल स्वेवेंजर्स के पुनर्वास की भी मांग की गई थी।
चंदौली ग्रामीण पत्रकार एसोसिएशन के अध्यक्ष आनंद सिंह मानते हैं कि नरेंद्र मोदी सरकार के स्वच्छ भारत अभियान का मैनुअल स्कैवेंजिंग को खत्म करने पर ध्यान केंद्रित नहीं रहा है, बल्कि वे केवल अधिक शौचालयों के निर्माण पर जोर देते रहे हैं। शौचालयों के साथ मल या मैले को संभालने के लिए कोई प्रावधान किए बिना अधिक सेप्टिक टैंक और अधिक सीवर लाइनें बनाई जाती हैं। जब स्वच्छ भारत की घोषणा की गई, तो लोगों ने सोचा कि यह मैनुअल स्कैवेंजिंग को खत्म कर देगा, लेकिन हुआ इसके उलटा। अब तो मैनुअल स्कैवेंजिंग की घटनाएं और मौतें लगातार बढ़ गई हैं।
सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, “ज़्यादातर कर्मचारी नंगे बदन सीवर में काम करते हैं। ऐसी घटना में हर मृत के परिवार को 10 लाख की मदद दिए जाने का प्रावधान है, लेकिन अखिल भारतीय दलित महापंचायक के मोर सिंह के मुताबिक इसमें कागज़ी कार्रवाई इतनी होती है कि हर व्यक्ति को ये मदद नहीं मिल पाती। साल 2013 में क़ानून बना दिया गया था कि मैनुअली सीवर साफ़ करना गैरक़ानूनी है, फिर भी ये काम किया जा रहा है। सरकार इन लोगों पर ध्यान नहीं देती, क्योंकि उन्हें कोई सरकारी फ़ायदा नहीं होता। जबकि उन्हें इसे बंद करवाने के लिए कड़े कदम उठाना चाहिए, उनके पुर्नवास के लिए काम करना चाहिए ये एक दंडनीय अपराध है। लेकिन वे सब एक दूसरे पर डालने की कोशिश करते हैं और इस मुद्दे से पीछा छुड़ा लेते हैं।”
कागजी साबित हो रही ‘नमस्ते’ योजना
भारत सरकार ने सफाई कर्मचारियों के लिए ‘नमस्ते’ योजना शुरू की है, जिसमें एक ऐसा विधान है जहां किसी भी सफाई कर्मचारी को सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई जैसे खतरनाक कार्य को अपने हाथों से नहीं करना होगा। यह योजना सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय और आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय ने शुरू की है, जिसके लिए राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी वित्त और विकास निगम (एनएसकेएफडीसी) ने साल 2023 से 2026 तक के लिए 349.73 करोड़ रुपये रूपये के बजट आवंटित किया है। केंद्र सरकार की यह योजना अभी तक कागजी साबित हो रही है।
केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास अठावले ने पिछले साल भारत में मैला ढोने की प्रथा के संबंध में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सदस्य अपरूपा पोद्दार द्वारा पूछे गए एक प्रश्न के लिखित उत्तर में कहा था कि साल 2018 में सेप्टिक टैंक और सीवर की सफाई के दौरान 76 मौतें हुईं। इसके बाद साल 2019 में 133, साल 2020 में 35, साल 2021 में 66, साल 2022 में 84 और साल 2023 में 49 मौतें हुईं। मैनुअल स्कैवेंजर्स के रूप में रोजगार पर प्रतिबंध और उनके पुनर्वास अधिनियम, 2013 के अनुसार, देश में मैनुअल स्कैवेंजिंग एक निषिद्ध गतिविधि है। 29 नबंबर 2023 तक, देश के 766 जिलों में से 714 जिलों ने खुद को मैन्युअल स्कैवेंजिंग के रूप में रिपोर्ट किया है।
स्थानी निकाय निदेशालय की ओर से देश के सभी नगर निकायों को दिशा-निर्देश जारी कर कहा गया है कि निजी एजेंसियां संविदा पर सीवर सफाई का काम करने वाले कर्मचारियों का 10 लाख रुपये का बीमा कराएं। सफाई के दौरान सफाई कर्मी की मौत होने पर यह धनराशि उसके परिजनों को दी जाएगी। यह बीमा उन निजी एजेंसियों को करानी होगी, जिनके माध्यम से सफाई कर्मियों को नियुक्त किया जाएगा। बिना बीमा कवर वाले कर्मियों से काम नहीं लिया जाएगा। स्थानीय निकाय निदेशालय ने कहा है कि शर्त का पालन न करने की दशा में किसी भी प्रकार की दुर्घटना होने पर एजेंसियों को दी जाने वाली राशि से कटौती करते हुए भुगतान किया जाएगा। हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम 2013 के अंतर्गत अधिनियम में दी गई व्यवस्था के अनुसार सीवर एवं सेप्टिक टैंक सफाई के दौरान मरने पर उनके परिजनों को 10 लाख रुपये मुआवजा देने की व्यवस्था है।

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने मुगलसराय में सेप्टिक टैंक में जान गंवाने वाले सफाई कर्मचारियों के परिजनों को चार-चार लाख रुपये की आर्थिक मदद देने की घोषणा की है। वहीं पुलिस का कहना है कि सफ़ाई कर्मचारी जब टैंक में उतरे थे तब उनके पास सुरक्षा उपकरण नहीं थे। चंदौली के पूर्व विधायक मनोज सिंह डब्लू कहते हैं, “सरकार मूर्तियां बनाने में हजारों करोड़ रुपये ख़र्च कर सकती है, लेकिन सफ़ाई कर्मचारियों को गटर में न उतरना पड़े या मैला न ढोना पड़े उसके लिए मशीनरी में निवेश नहीं कर रही है।”
उचित उपकरणों और सुरक्षा उपायों के अभाव में सीवेज से संबंधित कार्यों में मौतों की निरंतर घटनाओं पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए, मनोज यह भी कहते हैं, “नाला-नालियों और टैंकों की सफाई करते समय सर्वाधिक मौतें यूपी में हो रही हैं। दूसरा नंबर तमिलनाडु का और तीसरा गुजरात का है। मैला ढोने में शामिल 98 फीसदी लोग दलित समुदाय से हैं, इसलिए सरकार उन पर ध्यान नहीं दे रही है।”
“कोई भी व्यक्ति दूसरे का मल-मूत्र साफ़ नहीं करना चाहता, लेकिन मौजूदा सामाजिक ढांचे के कारण दलित ये काम करने के लिए मजबूर हैं। जब हम बुलेट ट्रेन चलाने को सोच सकते हैं तो इस समस्या से क्यों नहीं निपट पा रहे हैं? अच्छे दिन ख्वाब दिखाने और मंगलयान तक जाने का ढोल पीटने वाले हुक्मरां आखिर कहां हैं?”
(विजय विनीत बनारस के वरिष्ठ पत्रकार हैं)
+ There are no comments
Add yours