Tuesday, March 5, 2024
प्रदीप सिंह
प्रदीप सिंहhttps://www.janchowk.com
दो दशक से पत्रकारिता में सक्रिय और जनचौक के राजनीतिक संपादक हैं।

संविधान की नई प्रति से ‘समाजवाद’ और ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्द गायब, अधीर रंजन चौधरी ने उठाए सवाल

नई दिल्ली। नए संसद भवन में काम शुरू होते ही बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। सांसदों को दिए गए संविधान की नई प्रति में प्रस्तावना से ‘समाजवाद’ (socialist) और ‘पंथनिरपेक्ष’ (secular) शब्द को हटा दिया गया है। लोकसभा में विपक्ष के नेता अधीर रंजन चौधरी ने यह दावा किया है। संसद में जब उन्होंने यह सवाल उठाया तो कानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल ने कहा कि ‘क्या ऐसा था?’ यानि कानून मंत्री को भी यह नहीं पता कि संविधान की प्रस्तावना से समाजवाद और पंथनिरपेक्ष शब्द को हटा दिया गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि संविधान के साथ छेड़छाड़ करने वाला कौन है।

कांग्रेस सांसद अधीर रंजन चौधरी ने बुधवार को कहा कि नई संसद की पहली बैठक के अवसर पर सांसदों को वितरित की गई संविधान की प्रति की प्रस्तावना में “समाजवाद” और “धर्मनिरपेक्ष” शब्द नहीं है।

उन्होंने मीडिया से बातचीत में कहा कि “जब कल मैं संविधान (संविधान की नई प्रति) पढ़ रहा था तो मुझे ये (धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी) दो शब्द नहीं मिले। तब मैंने इन्हें अपने आप से जोड़ दिया और उसके बाद मैंने इसे राहुल गांधी को भी दिखाया… इसमें 1976 में संशोधन किया गया था, तो हमें आज संशोधन क्यों नहीं मिलेगा। हम संशोधन क्यों करते हैं? यह हमारे संविधान को बदलने की जानबूझकर की गई कोशिश को दर्शाता है।”

1976 में आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी की सरकार ने 42वें संविधान संशोधन के द्वारा प्रस्तावना में ‘समाजवाद’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द जोड़ा था। संघ-भाजपा लंबे समय से उक्त दोनों शब्दों को संविधान से हटाने की कोशिश कर रही थी। आखिर में संविधान संशोधन द्वारा हटाने की हिम्मत नहीं हुई तो नए संस्करण में चुपके ही हटवा दिया।

अधीर रंजन चौधरी ने मीडिया से कहा कि “हमें जो संविधान की प्रति दी गई उसमें समाजवाद और धर्मनिरपेक्ष शब्द नहीं थे। वे (सरकार) कह सकते हैं कि यह पुराना संस्करण है। लेकिन उन्हें संशोधित संस्करण भी शामिल करना चाहिए था। वे कह सकते हैं कि उन्होंने हमें मूल संस्करण दे दिया है। मुझे लगता है कि यह एक जानबूझकर की गई योजना है।”

हालांकि, केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने इस मुद्दे को ज्यादा तवज्जो नहीं देते हुए कहा कि सदस्यों को मूल संविधान की प्रति दी गई होगी। “जब संविधान अपनाया गया था तब यह (प्रस्तावना) ऐसा ही था। उसके बाद, 42वां संशोधन आया… इसलिए यह मूल प्रति होनी चाहिए”।

संसद के विशेष सत्र के पहले दिन 18 सितंबर को लोकसभा सचिवालय द्वारा जारी बुलेटिन में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि सदस्यों को संविधान की एक प्रति और भारत के मूल संविधान की एक सुलेखित प्रति दी जाएगी।

बुलेटिन में कहा गया था कि “भारत के संसद भवन (संसद की नई इमारत) में ऐतिहासिक पहली बैठक को चिह्नित करने के लिए भारत के संविधान की एक प्रति, भारत के मूल संविधान की सुलेखित प्रति, समाचार पत्र “गौरव” और स्मारक टिकट और सिक्का इस अवसर पर जारी किया गया। संसद के नए भवन के उद्घाटन का कार्यक्रम माननीय सदस्यों को प्रस्तुत किया जाएगा।”

संविधान में अब तक हो चुके हैं 127 संशोधन

कानून मंत्री और लोकसभा सचिवालय का तर्क कहीं से भी सही नहीं लगता है। संविधान के मूल संस्करण का महत्व है। लेकिन जब सांसदों को संविधान की प्रति दी जा रही है तो उसे अद्यतन होना चाहिए। संविधान में कोई एक दो संशोधन तो हुए नहीं हैं। बल्कि 1951 में पहली बार अधिनियमित होने के बाद से अगस्त 2023 तक भारत के संविधान में 127 संशोधन हुए हैं।

संविधान में तीन प्रकार से होता है संशोधन

भारत के संविधान में तीन प्रकार के संशोधन हैं जिनमें से दूसरे और तीसरे प्रकार के संशोधन अनुच्छेद 368 द्वारा शासित हैं। पहले प्रकार के संशोधनों में वे शामिल हैं जिन्हें भारत की संसद के प्रत्येक सदन में “साधारण बहुमत” द्वारा पारित किया जा सकता है। दूसरे प्रकार के संशोधनों में वे शामिल हैं जो संसद द्वारा प्रत्येक सदन में निर्धारित “विशेष बहुमत” द्वारा प्रभावी किए जा सकते हैं; और तीसरे प्रकार के संशोधनों में वे शामिल हैं जिनकी आवश्यकता संसद के प्रत्येक सदन में ऐसे “विशेष बहुमत” के अलावा, कम से कम आधी राज्य विधानसभाओं द्वारा अनुसमर्थन से है।

संविधान संशोधन के लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत

हालांकि संवैधानिक संशोधनों के लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत के समर्थन की आवश्यकता होती है (कुछ संशोधनों के लिए राज्य विधानसभाओं के बहुमत से अनुसमर्थन की आवश्यकता होती है), भारतीय संविधान दुनिया में सबसे संशोधित राष्ट्रीय संविधान है। संविधान सरकारी शक्तियों को इतने विस्तार से बताता है कि अन्य लोकतंत्रों में क़ानून द्वारा संबोधित कई मामलों को भारत में संवैधानिक संशोधन के माध्यम से संबोधित किया जाना चाहिए। परिणामस्वरूप, संविधान में वर्ष में लगभग दो बार संशोधन किया जाता है।

(प्रदीप सिंह जनचौक के राजनीतिक संपादक हैं।)

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